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इंसान का नॉर्मल टेम्परेचर 98.6°F ही क्यों माना गया? यह संख्या कहाँ से आई और क्या आज भी सही है?
Normal Body Temperature: 98.6°F को सामान्य शरीर का तापमान क्यों माना गया? जानिए इसकी शुरुआत, Carl Wunderlich की रिसर्च, आधुनिक विज्ञान और सही नॉर्मल तापमान की पूरी कहानी।
Normal Body Temperature History
Normal Body Temperature: मानव शरीर का ‘सामान्य’ तापमान 98.6 डिग्री फ़ारेनहाइट यानी 37 डिग्री सेल्सियस माना जाता रहा है। यह चिकित्सा विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध आंकड़ों में से एक है। स्कूल की किताबों से लेकर अस्पतालों, घरेलू थर्मामीटरों और आम बातचीत तक, पीढ़ियों से 98.6°F को स्वस्थ शरीर के तापमान का मानक बताया जाता रहा है। किसी व्यक्ति का तापमान 98.6°F हो तो उसे सामान्य समझा जाता है और इससे ऊपर जाते ही बुखार की आशंका होने लगती है।
लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इस संख्या को अब कहीं अधिक सावधानी से देखता है।
98.6°F कोई ऐसी जैविक लक्ष्मण रेखा नहीं है, जिस पर हर स्वस्थ व्यक्ति का शरीर स्थिर रहता हो। शरीर का तापमान व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलता है। उम्र, दिन का समय, शारीरिक गतिविधि, हार्मोन, बीमारी, वातावरण और तापमान मापने की जगह तक इसका असर डालते हैं। इसलिए आज वैज्ञानिकों के लिए ‘सामान्य तापमान’ का अर्थ एक अकेली संख्या से अधिक एक सीमा और व्यक्तिगत आधार रेखा है।
फिर सवाल उठता है कि 98.6°F की यह मशहूर संख्या आई कहाँ से?
इसकी कहानी 19वीं सदी के जर्मन चिकित्सक कार्ल राइनहोल्ड ऑगस्ट वुंडरलिष से जुड़ी है। और दिलचस्प बात यह है कि वुंडरलिष ने स्वयं मानव शरीर को किसी एक स्थिर तापमान में बांधने की कोशिश नहीं की थी। बाद की चिकित्सा शिक्षा और लोकप्रिय संस्कृति ने उनके अध्ययन के औसत को एक कठोर नियम में बदल दिया।
98.6°F की शुरुआत कहाँ से हुई?
19वीं सदी के मध्य में डॉक्टरों के पास आज जैसे रक्त परीक्षण, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई या आधुनिक जैव-रासायनिक जांच उपलब्ध नहीं थीं। चिकित्सक मुख्यतः रोगी की नाड़ी, सांस, त्वचा, दर्द और दिखाई देने वाले लक्षणों के आधार पर बीमारी का अनुमान लगाते थे।
थर्मामीटर का सिद्धांत तब तक पुराना हो चुका था, लेकिन उसे नियमित चिकित्सकीय उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना आसान नहीं था। पुराने थर्मामीटर बड़े और धीमे थे और तापमान मापने में काफी समय लगता था।
इसी दौर में वुंडरलिष ने शरीर के तापमान को बीमारी समझने का व्यवस्थित वैज्ञानिक उपकरण बनाने का प्रयास किया। वे जर्मनी के लीपज़िग में चिकित्सक और अध्यापक थे। 1850 के दशक से उन्होंने मरीजों के शरीर का तापमान नियमित रूप से दर्ज करना शुरू किया। बाद में उनके अध्ययन का व्यापक निष्कर्ष 1868 में प्रकाशित पुस्तक Das Verhalten der Eigenwärme in Krankheiten में सामने आया।
बताया जाता है कि वुंडरलिष ने करीब 25,000 मरीजों से दस लाख से अधिक तापमान माप एकत्र किए। उस समय के लिए यह असाधारण रूप से बड़ा डेटा सेट था।
वुंडरलिष का सबसे महत्वपूर्ण योगदान केवल औसत तापमान निकालना नहीं था। उन्होंने देखा कि स्वस्थ शरीर का तापमान दिनभर बदलता है। सुबह तापमान अपेक्षाकृत कम होता है और शाम को बढ़ सकता है। बीमारी के दौरान तापमान किस दिशा में और किस पैटर्न में बदल रहा है, यह भी चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
उनके अध्ययन से लगभग 37°C के आसपास का तापमान सामान्य मानव तापमान के एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में स्थापित हुआ।
यहीं से आगे चलकर 37°C और फिर 98.6°F की प्रसिद्ध संख्या लोकप्रिय हुई।
37°C से 98.6°F कैसे बना?
वुंडरलिष का मूल तापमान मान सेल्सियस में था। 37°C को फ़ारेनहाइट में बदलने पर तापमान लगभग 98.6°F आता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
98.6°F की दशमलव सटीकता का मतलब यह नहीं है कि वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में यह साबित किया था कि हर स्वस्थ मनुष्य का तापमान ठीक 98.600°F होता है।
असल में यह 37°C के एक औसत मान का फ़ारेनहाइट रूपांतरण था।
लेकिन समय के साथ 98.6°F इतनी लोकप्रिय संख्या बन गई कि लोग इसे शरीर के एक सटीक जैविक मानक की तरह समझने लगे। यानी जो संख्या मूल रूप से एक औसत थी, वह धीरे-धीरे ‘नॉर्मल’ की कठोर परिभाषा बन गई।
यही इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी गलतफहमी है।
वुंडरलिष की गलती क्या थी?
दिलचस्प बात यह है कि वुंडरलिष को इस तरह पेश करना कि उन्होंने कहा था ‘हर स्वस्थ इंसान का तापमान ठीक 37°C होता है’, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
उन्होंने तापमान में प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को पहचाना था। उनके लिए दिन का समय और बीमारी के दौरान तापमान का पैटर्न महत्वपूर्ण था।
यानी समस्या मूल अध्ययन से ज्यादा उस अध्ययन की बाद की व्याख्या में थी। 19वीं और 20वीं सदी की चिकित्सा शिक्षा में 37°C एक सुविधाजनक औसत बन गया। फिर यही 98.6°F में बदलकर सामान्य शरीर तापमान का लोकप्रिय प्रतीक बन गया। लेकिन आधुनिक चिकित्सा के पास बेहतर थर्मामीटर, बड़ी आबादी और कहीं अधिक डेटा उपलब्ध है। इनसे तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है।
आधुनिक अध्ययन बताते हैं कि औसत तापमान 98.6°F से कम हो सकता है
1992 में अमेरिकी चिकित्सकों फिलिप मैकोविएक, स्टीवन वासरमैन और मायरोन लेविन ने 98.6°F की धारणा को आधुनिक उपकरणों के साथ दोबारा जांचा।
उन्होंने 148 स्वस्थ वयस्कों के लगभग 700 मौखिक तापमान माप लिए। तापमान दिन के अलग-अलग समय पर और कई दिनों तक रिकॉर्ड किया गया।
अध्ययन में औसत मौखिक तापमान लगभग 36.8°C यानी 98.2°F पाया गया। यह 37°C से बहुत बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। इससे यह सवाल मजबूत हुआ कि 98.6°F को पूरे मानव समाज का सार्वभौमिक औसत मानना उचित है या नहीं।
इस अध्ययन का मतलब यह नहीं था कि 98.6°F असामान्य तापमान है। 98.6°F आज भी पूरी तरह सामान्य हो सकता है।
बदलाव केवल इतना था कि वैज्ञानिकों ने कहना शुरू किया कि ‘सामान्य’ का अर्थ एक निश्चित संख्या नहीं, बल्कि एक सीमा है।
क्या इंसान का शरीर सचमुच पहले से ठंडा हो गया है?
इसके बाद एक और दिलचस्प सवाल सामने आया।
अगर आज लोगों का औसत तापमान 98.6°F से कम है तो क्या इसका कारण सिर्फ पुराने थर्मामीटरों की त्रुटि थी? या आधुनिक मनुष्य का शरीर वास्तव में अतीत की तुलना में थोड़ा ठंडा हो गया है? स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की चिकित्सक और महामारी विशेषज्ञ जूली पार्सोनेट और उनके सहयोगियों ने 2020 में इस सवाल पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया। उन्होंने अलग-अलग समय के तीन बड़े अमेरिकी डेटा सेटों की तुलना की। इनमें अमेरिकी गृहयुद्ध के समय के सैनिकों के रिकॉर्ड, 1970 के दशक के स्वास्थ्य सर्वेक्षण और आधुनिक स्टैनफोर्ड मेडिकल डेटाबेस के रिकॉर्ड शामिल थे।
अध्ययन में पाया गया कि जन्म के प्रत्येक दशक के साथ औसत शरीर तापमान लगभग 0.03°C कम होता गया।
इसका मतलब यह नहीं कि पिछले 150 वर्षों में इंसान अचानक बहुत ठंडा हो गया है। गिरावट बेहद छोटी है। लेकिन अध्ययन ने यह संकेत जरूर दिया कि तापमान में कमी को केवल थर्मामीटर की तकनीकी समस्या से पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता।
संभव है कि आधुनिक जीवनशैली और बेहतर स्वास्थ्य ने मानव शरीर के औसत तापमान में थोड़ा बदलाव किया हो।
19वीं सदी में तपेदिक, मलेरिया, दांतों के संक्रमण और अन्य पुरानी सूजन वाली बीमारियां कहीं अधिक आम थीं। आज एंटीबायोटिक्स, टीकाकरण, बेहतर स्वच्छता और बेहतर दंत स्वास्थ्य ने संक्रमण और शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन को काफी कम किया है।
इसके अलावा आज लोग नियंत्रित तापमान वाले घरों और कार्यालयों में अधिक समय बिताते हैं। शरीर को अत्यधिक ठंड या गर्मी से निपटने के लिए पहले की तुलना में कम ऊर्जा खर्च करनी पड़ सकती है।
हालांकि इस विषय पर शोध अभी समाप्त नहीं हुआ है। ऐतिहासिक डेटा की माप पद्धतियां अलग थीं और अलग-अलग आबादी की स्वास्थ्य स्थितियां भी अलग थीं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि आधुनिक मानव का शरीर निश्चित रूप से किसी एक मात्रा में ठंडा हो गया है।
आज सामान्य शरीर तापमान कितना माना जाता है?
आधुनिक चिकित्सा में 98.6°F को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। यह आज भी सामान्य तापमान हो सकता है। लेकिन स्वस्थ वयस्कों में सामान्य तापमान अक्सर लगभग 97°F से 99°F के बीच पाया जा सकता है। व्यक्ति का अपना सामान्य तापमान इस दायरे के किसी भी हिस्से में हो सकता है।
किसी व्यक्ति का सामान्य तापमान 97.2°F हो सकता है, जबकि दूसरे का 98.8°F। दोनों स्वस्थ हो सकते हैं।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति का तापमान 99°F है तो केवल इस संख्या से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे बुखार है।
यहीं ‘औसत’ और ‘सामान्य’ के बीच अंतर समझना जरूरी है। औसत का अर्थ है किसी बड़ी आबादी के तापमानों का सांख्यिकीय केंद्र। सामान्य का अर्थ है वह जैविक सीमा जिसमें स्वस्थ लोग रह सकते हैं।
शरीर का तापमान सुबह और शाम अलग क्यों होता है?
शरीर का तापमान पूरे दिन स्थिर नहीं रहता। इसके पीछे शरीर की सर्केडियन रिद्म, यानी जैविक घड़ी, काम करती है। आमतौर पर तापमान सुबह सबसे कम और देर दोपहर या शाम में सबसे अधिक होता है।
दिनभर का अंतर लगभग 0.5°C तक हो सकता है।
इसलिए सुबह 99°F और शाम 99°F को बिल्कुल एक जैसा संदर्भ नहीं माना जा सकता। शाम को शरीर का तापमान स्वाभाविक रूप से थोड़ा अधिक हो सकता है।
वुंडरलिष ने 19वीं सदी में ही इस दैनिक बदलाव को पहचान लिया था। आधुनिक अध्ययनों ने इसे बेहतर उपकरणों के साथ फिर से साबित किया है।
उम्र भी बदल देती है ‘नॉर्मल’ तापमान
बच्चों और बुजुर्गों में शरीर का तापमान वयस्कों से अलग हो सकता है।
बुजुर्ग लोगों का आधारभूत तापमान अक्सर युवा वयस्कों की तुलना में थोड़ा कम होता है। इसलिए किसी बुजुर्ग व्यक्ति का तापमान उसके सामान्य तापमान से काफी ऊपर जा सकता है, भले ही वह 100.4°F तक न पहुंचा हो।
यही कारण है कि डॉक्टर केवल किसी एक तय संख्या को देखकर संक्रमण का फैसला नहीं करते।
यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति का सामान्य तापमान 97°F के आसपास रहता है और अचानक 99°F हो गया है तथा साथ में कमजोरी, भ्रम, खांसी या सांस की समस्या भी है, तो यह बदलाव महत्वपूर्ण हो सकता है।
महिलाओं में हार्मोन भी तापमान बदलते हैं
महिलाओं के शरीर का तापमान मासिक धर्म चक्र के साथ भी बदल सकता है।
ओव्यूलेशन के बाद प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के प्रभाव से बेसल बॉडी टेम्परेचर थोड़ा बढ़ जाता है। इसी कारण प्रजनन चक्र की निगरानी में बेसल तापमान का इस्तेमाल किया जाता है।
गर्भावस्था, हार्मोनल बदलाव और रजोनिवृत्ति भी शरीर के ताप नियंत्रण को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी तरह व्यायाम, तनाव, गर्म वातावरण, भारी कपड़े और कुछ दवाएं भी शरीर का तापमान अस्थायी रूप से बढ़ा सकती हैं।
तापमान कहां से मापा गया, यह भी बहुत महत्वपूर्ण है
शरीर का तापमान मापने की जगह बदलते ही परिणाम बदल सकता है।
मुँह, कान, बगल, माथे और मलाशय से लिए गए तापमान एक जैसे नहीं होते।
आमतौर पर मलाशय का तापमान मौखिक तापमान से थोड़ा अधिक होता है, जबकि बगल का तापमान अक्सर कम आता है।
इसलिए डॉक्टर को केवल यह बताना कि ‘मेरा तापमान 101°F है’, पर्याप्त जानकारी नहीं हो सकती। यह भी बताना उपयोगी है कि तापमान कहां और किस प्रकार के थर्मामीटर से मापा गया।
गर्म चाय या कॉफी पीने के तुरंत बाद मुंह से तापमान लेने पर रीडिंग बढ़ सकती है। ठंडा पानी पीने के बाद कम हो सकती है। इसी तरह व्यायाम या गर्म स्नान के तुरंत बाद शरीर का तापमान अस्थायी रूप से बढ़ सकता है।
क्या 100.4°F ही बुखार की अंतिम सीमा है?
38°C यानी 100.4°F को बुखार की एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय सीमा माना जाता है, लेकिन इसे हर व्यक्ति और हर परिस्थिति पर लागू होने वाला कठोर नियम नहीं समझना चाहिए।
उम्र, तापमान मापने की जगह, दिन का समय और अन्य लक्षणों के आधार पर चिकित्सकीय महत्व बदल सकता है।
खासकर बहुत छोटे बच्चों में 38°C या उससे अधिक तापमान गंभीरता से लिया जाता है और तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन की जरूरत हो सकती है।
वहीं स्वस्थ वयस्क में मामूली तापमान वृद्धि का अर्थ बीमारी तभी माना जाएगा जब वह व्यक्ति के सामान्य तापमान और दूसरे लक्षणों के संदर्भ में देखी जाए।
इसलिए ‘98.6°F गलत है, अब 97.5°F ही नया सामान्य है’ कहना भी उतना ही गलत होगा।
बुखार और शरीर के ज्यादा गर्म होने में फर्क
बुखार में मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस शरीर के तापमान का निर्धारित स्तर ऊपर कर देता है। अक्सर संक्रमण या सूजन के दौरान शरीर ऐसा करता है।
इस स्थिति में व्यक्ति को ठंड लग सकती है, कंपकंपी हो सकती है और शरीर गर्म होने के लिए अतिरिक्त ऊर्जा खर्च कर सकता है।
इसके विपरीत हीट स्ट्रोक जैसी स्थिति में शरीर का तापमान इसलिए बढ़ता है क्योंकि शरीर जितनी तेजी से गर्म हो रहा है, उतनी तेजी से गर्मी बाहर नहीं निकाल पा रहा।
यानी बुखार और अत्यधिक गर्मी से शरीर का तापमान बढ़ना एक ही प्रक्रिया नहीं है।
शरीर का थर्मोस्टेट कौन है?
शरीर के तापमान नियंत्रण में हाइपोथैलेमस की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे अक्सर शरीर का ‘थर्मोस्टेट’ कहा जाता है।
जब शरीर गर्म होता है तो त्वचा की रक्त वाहिकाएं फैलती हैं और पसीना बढ़ता है। जब शरीर ठंडा होता है तो रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं और कंपकंपी के जरिए ऊष्मा पैदा होती है।
इस पूरी प्रणाली का उद्देश्य शरीर को किसी एक संख्या पर स्थिर रखना नहीं, बल्कि एक अपेक्षाकृत संकीर्ण और सुरक्षित सीमा में रखना है।
इसीलिए स्वस्थ शरीर का तापमान हर मिनट बिल्कुल एक जैसा नहीं रहता।
तो क्या 98.6°F गलत है?
नहीं। लेकिन इसे सही तरीके से समझना जरूरी है।
98.6°F मानव शरीर के सामान्य तापमान के दायरे में आने वाला एक उपयोगी संदर्भ मान है। समस्या तब पैदा होती है जब इसे यह मान लिया जाए कि हर स्वस्थ व्यक्ति का तापमान ठीक 98.6°F होना चाहिए।
आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि स्वस्थ लोगों का औसत तापमान कई अध्ययनों में इससे कुछ कम पाया गया है। लेकिन औसत व्यक्ति-व्यक्ति, उम्र, समय और मापने की विधि के अनुसार बदलता है।
इसलिए 97.5°F, 98.2°F, 98.6°F या 99°F—इनमें से कोई भी तापमान अपने आप में बीमारी का प्रमाण नहीं है।
वुंडरलिष आज भी महत्वपूर्ण क्यों हैं?
यदि आधुनिक विज्ञान ने 98.6°F के पुराने मानक को संशोधित किया है तो क्या इसका मतलब वुंडरलिष का अध्ययन गलत था?
बिल्कुल नहीं।
उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने शरीर के तापमान को नियमित रूप से मापे जाने वाले वैज्ञानिक संकेतक में बदल दिया। उन्होंने यह दिखाया कि बीमारी के दौरान तापमान का पैटर्न डॉक्टर को महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है।
उनके उपकरण आधुनिक थर्मामीटरों की तुलना में कम सुविधाजनक थे। उनके डेटा में आज की तरह विविध आबादी का प्रतिनिधित्व भी नहीं था। लेकिन उस समय दस लाख से अधिक तापमान माप एकत्र करना और उनसे बीमारी तथा तापमान के बीच संबंध समझना चिकित्सा विज्ञान में ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
विज्ञान की खूबसूरती यही है कि बाद की पीढ़ियां पुराने निष्कर्षों को फेंकती नहीं, बल्कि बेहतर उपकरण और अधिक डेटा के साथ उन्हें और सटीक बनाती हैं।
भारत में भी एक ही ‘नॉर्मल’ तापमान मानना सही नहीं
भारतीय संदर्भ में भी यही सावधानी जरूरी है।
भारत की जलवायु, जीवनशैली, आयु संरचना, पोषण, संक्रमण का इतिहास और रहने की परिस्थितियां अमेरिका या यूरोप से अलग हैं। इसलिए किसी दूसरे देश की आबादी में मिला औसत हर भारतीय व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत मानक नहीं बन सकता।
व्यक्ति का अपना सामान्य तापमान, उम्र, दिन का समय, मापने की जगह और साथ मौजूद लक्षण अधिक महत्वपूर्ण हैं।
इसी कारण डॉक्टर के लिए किसी एक थर्मामीटर रीडिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है कि उस व्यक्ति के सामान्य तापमान की तुलना में कितना बदलाव आया है।
आखिर सही जवाब क्या है?
अगर आज पूछा जाए कि इंसान का सामान्य शरीर तापमान कितना है, तो केवल ‘98.6°F’ कहना अधूरा जवाब होगा।
बेहतर जवाब है कि 98.6°F एक ऐतिहासिक औसत और सामान्य तापमान का उपयोगी संदर्भ है, लेकिन मानव शरीर का कोई एक स्थिर सामान्य तापमान नहीं होता।
बहुत से स्वस्थ वयस्कों का औसत तापमान 98.6°F से कुछ कम हो सकता है और सामान्य तापमान अक्सर लगभग 97°F से 99°F के दायरे में पाया जाता है। लेकिन यह सीमा व्यक्ति, उम्र, समय, गतिविधि, हार्मोन और मापने की विधि के अनुसार बदलती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शरीर का तापमान अकेले स्वास्थ्य का फैसला नहीं करता।
डॉक्टर यह भी देखते हैं कि तापमान व्यक्ति के सामान्य स्तर से कितना बदला है, कब से बढ़ा है, किस जगह से मापा गया है और उसके साथ कौन-से लक्षण मौजूद हैं।
इसलिए 98.6°F की कहानी केवल एक संख्या की कहानी नहीं है। यह इस बात की कहानी है कि विज्ञान कैसे काम करता है।
19वीं सदी में वुंडरलिष ने विशाल डेटा के आधार पर 37°C को एक महत्वपूर्ण औसत के रूप में स्थापित किया। बाद में बेहतर थर्मामीटर और बड़े आधुनिक अध्ययनों ने दिखाया कि आज का औसत इससे थोड़ा कम हो सकता है। फिर ऐतिहासिक डेटा ने यह सवाल उठाया कि शायद आधुनिक मनुष्य का शरीर भी पिछली सदियों की तुलना में थोड़ा ठंडा हुआ है।
लेकिन किसी भी चरण में विज्ञान ने यह नहीं कहा कि 98.6°F अचानक ‘गलत’ हो गया।
सही निष्कर्ष यह है कि 98.6°F सामान्य तापमान हो सकता है, लेकिन सामान्य मानव तापमान की पूरी कहानी नहीं है।
मानव शरीर किसी मशीन की तरह एक निश्चित संख्या पर नहीं चलता। वह लगातार अपने तापमान को बदलते हुए भी एक सुरक्षित सीमा में बनाए रखता है। इसलिए अगली बार थर्मामीटर पर 98.6°F के बजाय 97.8°F या 99°F दिखे तो घबराने की जरूरत नहीं है। असली सवाल यह है कि वह तापमान उस व्यक्ति के लिए सामान्य है या नहीं और उसके साथ बीमारी के दूसरे संकेत मौजूद हैं या नहीं।
यही आधुनिक चिकित्सा की सबसे महत्वपूर्ण सीख है किस्वास्थ्य को किसी एक संख्या में कैद नहीं किया जा सकता।


