ओणम जिसे केरलम में हिंदू-मुस्लिम-ईसाई सब मनाते हैं, क्या है इसकी पूरी कहानी?

Onam Festival: ओणम की जड़ें हिंदू परंपरा और राजा महाबली की कथा से जुड़ी हैं, लेकिन केरल में यह हिंदू-मुस्लिम-ईसाई सभी की साझा सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। जानिए ओणम की पूरी कहानी।

Neel Mani Lal
Published on: 28 Aug 2026 11:32 PM IST
Onam Festival
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Onam Festival (Image Credit-Social Media)

Onam History: केरलम में ओणम उत्सव शुरू हो चुके हैं। बाजारों से लेकर घरों और शहरों की सड़कों तक त्योहार का रंग छाया हुआ है। कहीं फूलों से पूक्कलम सज रहे हैं, कहीं ओणसद्या की तैयारी हो रही है और कहीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ओणम का जश्न मनाया जा रहा है। केले के पत्ते पर लंबी-चौड़ी दावत लगती है, नावें पानी पर दौड़ती हैं और लोग नए कपड़े पहनकर एक-दूसरे के घर जाते हैं। सोशल मीडिया पर तमाम विडियो भी वायरल हो रहे हैं जिनमें हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई युवक-युवतियों को मिल कर ओणम का जश्न मनाते हुए दिखाया जा रहा है।

एक सवाल फिर चर्चा में आता है - आखिर ओणम किसका त्योहार है? इसकी कहानी राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है, फिर केरलम में मुस्लिम और ईसाई परिवार भी इसे क्यों मनाते हैं? क्या ओणम सच में सभी धर्मों का त्योहार है, या इसके पीछे कहानी कुछ और है? इसकी सच्चाई समझने के लिए ओणम की धार्मिक कथा के साथ केरल की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा को भी समझना होगा।

केरलम में ओणम को समझने के लिए सिर्फ धार्मिक कहानी जान लेना काफी नहीं है। इसकी कहानी में धर्म है, लेकिन उसके साथ खेती है, फसल है, राजा और प्रजा की लोककथा है, बराबरी की कल्पना है और सबसे बढ़कर एक ऐसी सामाजिक संस्कृति है जिसने सदियों में इस त्योहार को अपने तरीके से अपनाया है। यही वजह है कि ओणम को लेकर सबसे सटीक जवाब शायद यह है - ओणम की जड़ें हिंदू परंपरा में हैं, लेकिन आज यह केरल की साझा सांस्कृतिक पहचान का त्योहार है।

महाबली कौन थे और ओणम उनसे क्यों जुड़ा?



ओणम की सबसे मशहूर कहानी राजा महाबली की है। केरलम की मान्यताओं में महाबली एक बेहद लोकप्रिय और न्यायप्रिय राजा हैं। उनके शासन को ऐसे समय के रूप में याद किया जाता है जब लोगों के बीच भेदभाव नहीं था, सब खुशहाल थे और राज्य में समृद्धि थी। कहानी के मुताबिक महाबली असुर वंश से थे और इतने शक्तिशाली हो गए थे कि देवताओं को उनका बढ़ता प्रभाव पसंद नहीं आया। तब भगवान विष्णु ने वामन यानी बौने ब्राह्मण का रूप धारण किया और महाबली के पास पहुंचे। वामन ने राजा से केवल तीन पग जमीन मांगी। महाबली ने वचन दे दिया। इसके बाद वामन ने विराट रूप धारण किया। दो कदम में उन्होंने पूरी धरती और आकाश नाप लिया। तीसरा कदम रखने के लिए कोई जगह नहीं बची तो महाबली ने अपना सिर आगे कर दिया। वामन ने उनके सिर पर तीसरा कदम रखा और महाबली को पाताल लोक जाना पड़ा। लेकिन महाबली की प्रजा के प्रति उनकी निष्ठा और उदारता से प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने की अनुमति दी। मान्यता है कि ओणम के दौरान महाबली अपनी प्रजा से मिलने के लिए केरलम लौटते हैं।

इसीलिए ओणम के दिनों में घरों के सामने फूलों से सजावट की जाती है। इसे महाबली के स्वागत से जोड़ा जाता है। केरलम पर्यटन भी ओणम की प्रमुख कथा को महाबली की इसी सालाना वापसी से जोड़ता है।

महाबली की कहानी सिर्फ धार्मिक कहानी क्यों नहीं रह गई?

महाबली की कहानी में एक ऐसा राजा सामने आता है जिसे लोग उसकी सत्ता के लिए नहीं, बल्कि उसके न्याय और अच्छे शासन के लिए याद करते हैं। राज्य की सरकार के प्रकाशन में ओणम से जुड़ी महाबली की लोककथा को समृद्धि, समानता और न्याय के आदर्श से जोड़ा गया है। वहां यह भी कहा गया है कि महाबली की कहानी को अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक नजरियों से देखा गया है। यानी महाबली धीरे-धीरे सिर्फ पौराणिक पात्र नहीं रहे। वे केरलम की लोक कल्पना में एक ऐसे आदर्श राजा का प्रतीक बन गए जिसके राज्य में सब बराबर थे। यही बात ओणम को दूसरे त्योहारों से थोड़ा अलग बनाती है।

किसी के लिए यह भगवान विष्णु और वामन से जुड़ा धार्मिक पर्व है। किसी के लिए यह फसल का त्योहार है। किसी के लिए परिवार के साथ मिलने का मौका है। और बहुत से लोगों के लिए यह उस समाज की याद है जिसमें बराबरी और खुशहाली की कल्पना की गई है।

ओणम सिर्फ महाबली की कहानी नहीं, फसल का त्योहार भी है

ओणम का दूसरा बड़ा पहलू खेती से जुड़ा है। केरलम पर्यटन के मुताबिक ओणम की परंपरा पौराणिक कथा के साथ-साथ पुराने कृषि जीवन और फसल से भी जुड़ी हुई है। मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में यह त्योहार आता है, जब फसल और समृद्धि का समय माना जाता है। दरअसल, एक किसान के लिए फसल सिर्फ अनाज नहीं होती। पूरे साल की मेहनत का नतीजा होती है। जब खेत भरते हैं तो घर में खाना आता है, बाजार चलता है और परिवार के पास जश्न मनाने की वजह होती है। इसलिए ओणम में धार्मिक कथा के साथ फसल, भोजन और खुशहाली भी जुड़ गए। और शायद यही वह जगह है जहां ओणम ने धर्म की सीमाओं से बाहर निकलना शुरू किया।

मुस्लिम और ईसाई ओणम क्यों मनाते हैं?

इस राज्य की सामाजिक संरचना इस सवाल का जवाब देती है। केरलम में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय लंबे समय से एक-दूसरे के साथ रहते आए हैं। वहां कई त्योहारों और स्थानीय परंपराओं में अलग-अलग समुदायों की सामाजिक भागीदारी देखने को मिलती है। ओणम के मामले में बात और दिलचस्प है। किसी मुस्लिम या ईसाई परिवार के लिए ओणम मनाने का मतलब जरूरी नहीं कि वह वामन और महाबली की धार्मिक कथा को उसी धार्मिक विश्वास के साथ स्वीकार करता हो जिस तरह कोई हिंदू करता है। वह ओणम को मलयाली संस्कृति का त्योहार मानकर मना सकता है। घर में फूलों की सजावट करना, नए कपड़े पहनना, परिवार के साथ खाना खाना, रिश्तेदारों से मिलना, बच्चों के साथ त्योहार मनाना, सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना - इन सबका किसी एक धर्म से संबंध जरूरी नहीं है। यही वजह है कि ओणम को धर्म और जाति से परे सभी केरलवासियों द्वारा मनाए जाने वाले त्योहार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ये भी सच है कि राज्य का हर मुस्लिम और ईसाई ओणम नहीं मनाता है। किसी भी बड़े समुदाय के भीतर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और व्यक्तिगत पसंद होती हैं। लेकिन फिर भी ये भी सही बात यह है कि ओणम में दूसरे धर्मों के लोगों की व्यापक सामाजिक भागीदारी है और यह त्योहार धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर मलयाली सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया है।

ओणम की थाली में भी छिपी है इसकी कहानी

ओणम की सबसे मशहूर चीजों में से एक है - ओणसद्या। केले के पत्ते पर कई तरह के शाकाहारी व्यंजन, सांभर, अवियल, थोरन, पचड़ी, अचार, चावल और आखिर में पायसम जैसी चीजें परोसी जाती हैं। यह सिर्फ खाना नहीं है। यह एक साथ बैठकर खाने की संस्कृति है। ओणम के दौरान घर में यह सवाल कम महत्वपूर्ण हो जाता है कि सामने वाला किस धर्म का है और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह आपके साथ त्योहार की खुशी बांट रहा है या नहीं। यही वजह है कि ओणम के कई सार्वजनिक कार्यक्रम धार्मिक आयोजन की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव की तरह दिखाई देते हैं।

फूलों की रंगोली किसके लिए?

ओणम के दौरान घर के बाहर फूलों से बनाई जाने वाली सजावट को पूक्कलम कहा जाता है। लोक मान्यता में इसे महाबली के स्वागत से जोड़ा जाता है। कई घरों में दस दिनों तक हर दिन इसमें नए फूल और नया डिजाइन जुड़ता जाता है। दूसरे धर्मों के लोग भी पूक्कलम बनाते हैं।

दीपावली में बहुत से लोग रोशनी करते हैं लेकिन उसके धार्मिक अर्थों को अलग-अलग तरीके से देखते हैं। क्रिसमस पर भी दुनिया भर में ऐसे लोग पेड़ सजाते हैं जो ईसाई नहीं हैं। इसी तरह ओणम में भी फूल, भोजन और मिलना-जुलना सांस्कृतिक प्रतीक बन चुके हैं।

ओणम को सार्वजनिक त्योहार कैसे बनाया?



आज ओणम पूरे केरलम में एक बड़े सार्वजनिक त्योहार की तरह दिखाई देता है। लेकिन इसका वर्तमान स्वरूप हमेशा ऐसा नहीं था। 1961 में तत्कालीन सरकार ने ओणम को केरल का राष्ट्रीय त्योहार घोषित किया। इसके बाद सरकारी स्तर पर ओणम बड़े सार्वजनिक आयोजन के रूप में विकसित हुआ। बाद के वर्षों में पर्यटन विभाग की भूमिका से भी इन समारोहों का विस्तार हुआ। यानी आज जिस ओणम को हम बड़े स्तर पर देखते हैं, उसमें सिर्फ पुरानी धार्मिक परंपराएं नहीं हैं। नाव दौड़, सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य, संगीत, जुलूस और शहरों में होने वाले बड़े समारोह इसी सार्वजनिक स्वरूप का हिस्सा हैं।

एक जुलूस में मंदिर के पुजारी, मुस्लिम धार्मिक नेता और ईसाई पादरी

ओणम की सामुदायिक प्रकृति का एक दिलचस्प उदाहरण त्रिपुनिथुरा का अथाचमयम जुलूस है। यह ओणम के दस दिन के उत्सव की शुरुआत का प्रमुख आयोजन माना जाता है। इस आयोजन में धार्मिक सद्भाव का प्रतीकात्मक रूप भी दिखाई देता है। परंपरा में मंदिर के पुजारी के साथ मुस्लिम समुदाय के धार्मिक नेता और ईसाई पादरी की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। यानी यहां ओणम सिर्फ एक धर्म का त्योहार बनकर नहीं रहता। यही केरलम के ओणम मॉडल की सबसे बड़ी खासियत है।

केरलम सरकार के एक प्रकाशन में कवि के. सच्चिदानंदन ने भी ओणम को सिर्फ अतीत की याद नहीं, बल्कि एक बेहतर भविष्य की कल्पना से जोड़ते हुए लिखा है कि महाबली की कथा न्याय, समानता, ईमानदारी और सभी नागरिकों के समान व्यवहार जैसे आदर्शों को सामने रखती है। यही शायद वह जगह है जहां ओणम धार्मिक त्योहार से आगे निकल जाता है।

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