Osho Teachings: संकल्प की अदभुत शक्ति, जब एक मृत देह ने भी तय किया दो हज़ार मील का सफ़र!

Osho Teachings in Hindi: क्या संकल्प मृत्यु के बाद भी अपना मार्ग बना सकता है? ओशो के इस प्रेरक प्रसंग में जानिए संकल्प शक्ति, इच्छाशक्ति, चेतना और जीवन के उद्देश्य पर गहरे आध्यात्मिक विचार, जो आपके सोचने का दृष्टिकोण बदल सकते हैं।

Newstrack Network
Published on: 11 July 2026 5:47 PM IST
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Osho Teachings 

Osho Teachings in Hindi: मैं एक बेहद अनूठी और विस्मयकारी घटना के बारे में पढ़ रहा था। अमेरिका के एक बहुत प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता ने अपनी मृत्यु से लगभग दस वर्ष पूर्व एक वसीयतनामा तैयार किया था। उसकी वसीयत में लिखा था कि मृत्यु के पश्चात उसके पार्थिव शरीर को उसी के पैतृक और छोटे से गाँव की मिट्टी में दफ़नाया जाए जहाँ उसका जन्म हुआ था। नियति का खेल देखिए, जब उस अभिनेता की मृत्यु हुई, तो वह अपने उस छोटे से गाँव से करीब दो हजार मील दूर था। संसार का नियम है कि इंसान के विदा होते ही लोग उसकी इच्छाओं को भूल जाते हैं; जब यहाँ मरने के बाद महात्माओं की इच्छाओं की फिक्र नहीं की जाती, तो फिर एक अभिनेता की कौन करता?

मरते क्षण भी उसने बहुत कातर भाव से अपने करीबियों से कहा था, "देखो, मुझे यहाँ मत दफ़ना देना। मैं आखिरी बार तुमसे कह रहा हूँ कि मुझे मेरे गाँव तक पहुँचा देना, जहाँ मैं पैदा हुआ था। मेरी अंतिम इच्छा यही है।" लेकिन उसके प्राण पखेरू उड़ते ही लोगों ने व्यावहारिकता की दुहाई दी। उन्होंने सोचा कि दो हज़ार मील दूर शव को ले जाने का झंझट कौन उठाए! उन्होंने मरे हुए आदमी की वसीयत को दरकिनार किया, उसे एक ताबूत में बंद किया और वहीं स्थानीय स्तर पर दफ़ना दिया।

नियति और संकल्प का महामिलन

परंतु, असली रहस्यमयी घटना उसी रात घटी। जिस रात उसे दफ़नाया गया, अचानक एक भयंकर चक्रवाती तूफान आया। प्रकृति ने ऐसा तांडव मचाया कि उसकी नई बनी कब्र उखड़ गई। कब्र के ठीक पास खड़ा एक विशालकाय वृक्ष जड़ से उखड़कर गिर पड़ा। उस उथल-पुथल में उसका ताबूत सरककर सीधे समुद्र की लहरों में बह गया।

चमत्कार यहीं नहीं रुका। उस बेजान ताबूत ने समुद्र की उफनती लहरों पर दो हजार मील की एक लंबी और अंतहीन यात्रा की। लहरें उसे ठीक उसी दिशा में बहाकर ले गईं, जहाँ उसका पैतृक गाँव था। कुछ दिनों बाद वह ताबूत उसी छोटे से गाँव के समुद्र किनारे जाकर लग गया।

सुबह जब गाँव के मछुआरों और स्थानीय लोगों ने उस अज्ञात ताबूत को देखा और उसे खोला, तो पूरा गाँव हैरान रह गया। वह तो उन्हीं के गाँव का बेटा था, जो सारी दुनिया में नाम कमाकर अब एक मृत देह के रूप में लौट आया था। गाँव वालों ने पूरे सम्मान के साथ उसे उसी मिट्टी में सुपुर्द-ए-खाक किया, जहाँ उसने पहली बार सांस ली थी।

क्या मृत देह भी संकल्प कर सकती है?

उस अभिनेता की जीवन-कथा के लेखक ने अंत में एक बहुत बड़ा दार्शनिक प्रश्न उठाया है—“क्या यह सब महज एक इत्तफाक था, या यह उस व्यक्ति के मरते क्षण के प्रचंड संकल्प का परिणाम था?”

यदि मैं आज के आम मनुष्यों की निर्बल इच्छाशक्ति की तरफ देखूँ, तो संदेह पैदा होता है कि कोई मरा हुआ इंसान ऐसा कैसे कर सकता है? आज के लोग तो अपनी पूरी ज़िंदगी में जहाँ पहुँचना चाहते हैं, अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी ज़िंदा रहते हुए वहाँ नहीं पहुँच पाते। फिर यह आदमी मर कर, एक बेजान लकड़ी के बक्से में बंद होकर भी वहाँ कैसे पहुँच गया जहाँ वह पहुँचना चाहता था?

इतनी लंबी दो हज़ार मील की समुद्री यात्रा, उसी रात तूफान का आना और ताबूत का सीधे अपने गाँव के किनारे ही लगना—यह सब कुछ पूरी तरह से संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य ही उस व्यक्ति का एक अति-कठोर, अटूट और अंतिम क्षणों का आत्मिक संकल्प काम कर रहा था। उसकी चेतना ने मरने के बाद भी प्रकृति को अपनी इच्छा के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया।

ज़िंदा लोगों की सोई हुई इच्छाशक्ति

ओशो कहते हैं कि यदि संकल्प की इतनी असीम शक्ति है कि एक मुर्दा भी दो हज़ार मील की यात्रा कर अपनी मंजिल पा सकता है, तो फिर हम ज़िंदा लोग अपनी मंजिलों तक क्यों नहीं पहुँच पाते? क्या हम ज़िंदा होकर भी मृत देह से बदतर हैं?

सच्चाई यह है कि हमने कभी वास्तव में यात्रा ही नहीं करनी चाही। हमने कभी अपनी सोई हुई आंतरिक इच्छाशक्ति को पुकारा ही नहीं है। हम बस परिस्थितियों के बहाव में बहते चले जा रहे हैं। हमने कभी एकांत में बैठकर यह सोचा ही नहीं कि हम भी इस अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, हम भी जीवन में कुछ अदभुत कर सकते हैं, या हम इस धरती पर किसी विशेष और गहरे प्रयोजन (Purpose) के लिए पैदा हुए हैं।

जब तक आपके भीतर एक 'प्रचंड संकल्प' का जन्म नहीं होता, तब तक आप ज़िंदा होकर भी एक चलती-फिरती लाश की तरह हैं। जिस दिन आप अपने भीतर की संकल्प शक्ति को जगा लेंगे, उस दिन पूरी कायनात आपकी इच्छा को पूरा करने के लिए रास्ते बनाने लगेगी।

जीवन सूत्र: जीवन में केवल इच्छाएं मत करिए, बल्कि 'संकल्प' करिए। इच्छाएं कमज़ोर होती हैं जो बिखर जाती हैं, लेकिन संकल्प वह ऊर्जा है जो मृत्यु के पार भी अपना मार्ग खोज लेती है।

(ओशो के प्रवचनों से संकलित व संपादित)

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