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Padmini Ekadashi: क्यों मानी जाती है सबसे दुर्लभ और फलदायी एकादशी, जानिए कार्तवीर्यार्जुन की कथा
Padmini Ekadashi 2026: पद्मिनी एकादशी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व जानिए।
Padmini Ekadashi 2026 (Newstrack AI)
Padmini Ekadashi 2026: पद्मिनी एकादशी को वैष्णव परंपरा में इसे अत्यंत दुर्लभ और विशेष फलदायी एकादशी माना गया है, क्योंकि यह केवल ‘अधिक मास’ अथवा ‘पुरुषोत्तम मास’ में ही आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के पालन से भगवान विष्णु के श्रीचरणों में स्थान प्राप्त होता है और साधक के जीवन में भक्ति, संयम तथा आत्मिक शुद्धि का भाव प्रबल होता है।
वैष्णव ग्रंथों में ‘पद्मिनी एकादशी’ का माहात्म्य अत्यंत विस्तार से वर्णित है। कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था कि यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और भक्ति प्रदान करने वाली तिथि है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पालन करने वाला साधक अंततः भगवान के धाम को प्राप्त करता है।
पुराणों में वर्णित एक कथा इस एकादशी की विशेषता को और अधिक रोचक बना देती है। महर्षि पुलस्त्य ने देवर्षि नारद को बताया था कि हैहयवंश के महान प्रतापी राजा कार्तवीर्यार्जुन ने एक समय लंका के राजा रावण को युद्ध में पराजित कर बंदी बना लिया था। बाद में पुलस्त्य ऋषि की प्रार्थना पर उन्होंने रावण को मुक्त कर दिया।
यह प्रसंग सुनकर देवर्षि नारद के मन में स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने पूछा कि जो रावण इन्द्र समेत अनेक देवताओं को परास्त कर चुका था, वह आखिर कार्तवीर्यार्जुन से कैसे हार गया? ऐसा कौन-सा तप, साधना या पुण्य था जिसने कार्तवीर्यार्जुन को इतना अद्भुत बल प्रदान किया? तब पुलस्त्य ऋषि ने एक विस्तृत कथा सुनाई।
त्रेतायुग में कृतवीर्य नामक एक राजा माहिष्मतीपुरी में राज्य करते थे। उनके पास वैभव, सामर्थ्य और विशाल राज्य तो था, किन्तु संतान सुख नहीं था। कहा जाता है कि उनकी एक हजार रानियाँ थीं, फिर भी उन्हें पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। अंततः उन्होंने राजपाट का भार मंत्रियों और प्रजाजनों को सौंपकर तपस्या का मार्ग चुना। उनकी पत्नी रानी पद्मिनी भी उनके साथ मन्दर पर्वत पर तप करने चली गईं।
लंबी और कठोर तपस्या ने राजा कृतवीर्य के शरीर को अत्यंत दुर्बल बना दिया। वर्षों तक तप करते-करते उनका शरीर कृश हो गया। यह देखकर रानी पद्मिनी अत्यंत व्यथित हुईं। उन्होंने महान पतिव्रता अनुसूया देवी से प्रार्थना की कि उनके पति को स्वास्थ्य प्राप्त हो और उन्हें एक तेजस्वी तथा पराक्रमी पुत्र का आशीर्वाद मिले। यहीं से ‘पद्मिनी एकादशी’ का आध्यात्मिक महत्व कथा के केंद्र में आता है।
अनुसूया देवी ने रानी पद्मिनी को बताया कि लगभग बत्तीस महीनों के अंतराल में आने वाला अतिरिक्त मास ‘अधिक मास’, ‘मलमास’ अथवा ‘पुरुषोत्तम मास’ कहलाता है। इस मास की दोनों एकादशियों का श्रद्धापूर्वक व्रत करने से भगवान विष्णु विशेष कृपा करते हैं। अनुसूया देवी के निर्देशानुसार रानी पद्मिनी ने व्रत और उपासना का पालन किया। धार्मिक मान्यता है कि उसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें कार्तवीर्यार्जुन जैसे अत्यंत पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति हुई।
भारतीय धार्मिक परंपरा में ‘हरिवासर’ का भी विशेष महत्व माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है—
‘श्रीहरिवासरे हरिकीर्तन विधान।’
अर्थात् इस तिथि में भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला और भक्तों का स्मरण तथा कीर्तन करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। यही कारण है कि एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं मानी जाती, बल्कि इसे आत्मसंयम, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का अवसर भी समझा जाता है।
परंपरागत वैष्णव आचार्यों का मत है कि इस दिन साधु-संतों, गुरुजनों और भक्तों के संग में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना, ‘श्रीमद्भागवत’ का पाठ, ‘हरिनाम-संकीर्तन’ तथा भगवान की कथाओं का श्रवण विशेष फलदायी होता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक स्थिरता का भाव विकसित होता है।
आज के व्यस्त और तनावपूर्ण समय में भी एकादशी जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रह गई हैं। बहुत से लोग इसे आत्मनियंत्रण, मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़कर देखते हैं। शायद इसी कारण सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी भारतीय समाज के भीतर गहरी आस्था के साथ जीवित दिखाई देती है।
(साभार— पद्म पुराण, स्कन्द पुराण, वैष्णव परंपरा में प्रचलित पद्मिनी एकादशी महात्म्य कथाएँ)


