Condom Failure Explained: कंडोम इस्तेमाल करने के बाद भी गर्भ कैसे ठहर सकता है?

Condom Failure Explained: कंडोम इस्तेमाल करने के बाद भी गर्भधारण क्यों हो सकता है? जानिए कंडोम फटने के कारण, इमरजेंसी गर्भनिरोधक, पुरुषों की गर्भनिरोधक गोली, जेल और भारत के RISUG शोध की पूरी कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 31 Oct 2026 1:01 PM IST
Can You Get Pregnant Even After Using a Condom | Newstrack Hindi News
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Can You Get Pregnant Even After Using a Condom | Newstrack Hindi News

Condom Failure Explained: कंडोम गर्भधारण रोकने के सबसे आसान, सुलभ और लोकप्रिय तरीकों में से एक है। इसके बावजूद हर साल ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें कंडोम इस्तेमाल करने के बाद भी गर्भ ठहर जाता है। इसकी वजह हमेशा कंडोम की खराब क्वालिटी नहीं होती। कई बार उसे पहनने, इस्तेमाल करने या उतारने में हुई छोटी-सी गलती भी गर्भधारण का जोखिम बढ़ा सकती है।

अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, सामान्य इस्तेमाल की स्थिति में पुरुष कंडोम का उपयोग करने वाले हर 100 दंपतियों में से लगभग 13 को एक साल के भीतर गर्भधारण का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, अगर कंडोम का हर बार सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो इसकी प्रभावशीलता लगभग 98 प्रतिशत तक होती है।

इसका मतलब है कि कंडोम बहुत उपयोगी है, लेकिन कोई भी गर्भनिरोधक तरीका पूरी तरह अचूक नहीं होता।

इस विषय से जुड़ा एक दूसरा बड़ा सवाल भी है। महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियाँ, इंजेक्शन, प्रत्यारोपण और गर्भाशय में लगाए जाने वाले उपकरण जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। लेकिन पुरुषों के लिए मुख्य रूप से कंडोम और नसबंदी ही उपलब्ध हैं। ऐसा क्यों है? क्या पुरुषों के शरीर में गर्भनिरोधक विकसित करना ज्यादा कठिन है, या इस दिशा में पर्याप्त शोध और निवेश नहीं हुआ?

सितंबर 2026 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पुरुषों के लिए नए गर्भनिरोधक विकसित करने के उद्देश्य से पहली बार विशेष वैश्विक मानदंड जारी किए। इससे उम्मीद जगी है कि भविष्य में गर्भनिरोधक की जिम्मेदारी पुरुष और महिला के बीच अधिक समान रूप से बँट सकेगी।

कंडोम गर्भधारण रोकता कैसे है?

गर्भधारण के लिए पुरुष के शुक्राणु और महिला के अंडाणु का मिलना जरूरी है। पुरुष के वीर्य में मौजूद शुक्राणु महिला की प्रजनन प्रणाली तक पहुँचकर अंडाणु को निषेचित कर सकते हैं। इसके बाद गर्भधारण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

कंडोम इस प्रक्रिया को रोकने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। इसे लिंग पर पहना जाता है, ताकि स्खलन के समय वीर्य इसके भीतर ही रहे और शुक्राणु योनि में न पहुँचें।

कंडोम का सही समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो गर्भधारण की आशंका काफी कम हो जाती है।

इसकी एक खास बात यह भी है कि कंडोम सिर्फ गर्भधारण रोकने का साधन नहीं है। इसका सही और नियमित इस्तेमाल एचआईवी सहित कई यौन संचारित संक्रमणों का खतरा भी कम करता है। हालाँकि, यह हर संक्रमण से पूरी सुरक्षा नहीं देता। कुछ संक्रमण ऐसी त्वचा के संपर्क से भी फैल सकते हैं, जो कंडोम से ढकी नहीं होती। यही वजह है कि गर्भनिरोध के दूसरे कई तरीकों की तुलना में कंडोम का विशेष महत्त्व है।

98 प्रतिशत प्रभावी होने के बावजूद गर्भ कैसे ठहर सकता है?

कंडोम की प्रभावशीलता को समझने के लिए दो बातों में अंतर जानना जरूरी है। पहली है सही इस्तेमाल और दूसरी है सामान्य इस्तेमाल।

जब कोई व्यक्ति हर बार सही तरीके से कंडोम का इस्तेमाल करता है, तो उसकी प्रभावशीलता लगभग 98 प्रतिशत तक हो सकती है। इसका मतलब है कि एक साल तक सही इस्तेमाल करने वाले हर 100 दंपतियों में लगभग दो को गर्भधारण हो सकता है।

लेकिन सामान्य जीवन में लोग हमेशा पूरी सावधानी नहीं बरत पाते। कभी कंडोम देर से पहना जाता है, कभी वह बीच में खिसक जाता है और कभी उसे उतारते समय वीर्य बाहर निकल सकता है। ऐसी गलतियों के कारण इसकी प्रभावशीलता कम हो जाती है। इसीलिए सामान्य इस्तेमाल में हर 100 दंपतियों में से लगभग 13 को एक साल के भीतर गर्भधारण हो सकता है।

ध्यान रहे कि ये आँकड़े एक साल के इस्तेमाल पर आधारित हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर 100 बार यौन संबंध बनाने पर 13 बार गर्भ ठहर सकता है। यह भी किसी एक व्यक्ति का निश्चित जोखिम नहीं है। वास्तविक संभावना कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे कंडोम का सही इस्तेमाल, यौन संबंधों की संख्या, उम्र और प्रजनन क्षमता।

कंडोम इस्तेमाल करते समय कौन-सी गलतियाँ नहीं करनी चाहिए?

सबसे आम गलती है कंडोम देर से पहनना। कुछ लोग सोचते हैं कि स्खलन से ठीक पहले कंडोम पहन लेना काफी है। लेकिन ऐसा करना सुरक्षित नहीं है। लिंग का योनि से संपर्क शुरू होने से पहले ही कंडोम पहन लेना चाहिए। शुरुआत में बिना कंडोम के हुआ संपर्क भी गर्भधारण और संक्रमण का जोखिम पैदा कर सकता है।

कंडोम पहनते समय उसके आगे के हिस्से में थोड़ी जगह छोड़नी चाहिए, ताकि स्खलन के समय वीर्य वहाँ जमा हो सके। उसे पहनने से पहले आगे की हवा निकालनी चाहिए और फिर धीरे-धीरे लिंग के आधार तक खोलना चाहिए।

अगर कंडोम गलती से उल्टा पहन लिया जाए और फिर उसे पलटकर इस्तेमाल करने की कोशिश की जाए, तो ऐसा नहीं करना चाहिए। उसकी जगह नया कंडोम इस्तेमाल करना बेहतर है।

कंडोम का पैकेट भी सावधानी से खोलना चाहिए। दाँत, कैंची या किसी नुकीली चीज से पैकेट खोलने पर कंडोम कट सकता है या उसमें छोटा छेद हो सकता है।

यौन संबंध खत्म होने के बाद लिंग बाहर निकालते समय कंडोम के निचले हिस्से को पकड़ना चाहिए। इससे उसके खिसकने और वीर्य बाहर निकलने की आशंका कम होती है। ये छोटी-छोटी सावधानियाँ कंडोम की प्रभावशीलता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।

क्या कंडोम बिना पता चले फट सकता है?

हाँ, कुछ परिस्थितियों में कंडोम फट सकता है या अपनी जगह से खिसक सकता है। सही आकार और तरीके से इस्तेमाल किया गया अच्छी गुणवत्ता का कंडोम सामान्यतः भरोसेमंद होता है। लेकिन गलत इस्तेमाल, खराब भंडारण, पैकेट का क्षतिग्रस्त होना या पर्याप्त चिकनाई न होना परेशानी पैदा कर सकता है।

लेटेक्स से बने कंडोम के साथ तेल वाली चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पेट्रोलियम जेली, कुछ तेल और तेल आधारित लुब्रिकेंट लेटेक्स को कमजोर कर सकते हैं। इससे कंडोम फटने का खतरा बढ़ सकता है।

इसके बजाय पानी या सिलिकॉन आधारित लुब्रिकेंट का इस्तेमाल किया जा सकता है। फिर भी संबंधित कंडोम के पैकेट पर दिए गए निर्देश देखना बेहतर है।

एक आम गलतफहमी यह भी है कि दो कंडोम एक साथ पहनने से सुरक्षा दोगुनी हो जाती है। वास्तव में ऐसा नहीं है। दो कंडोम एक साथ पहनने से उनके बीच घर्षण बढ़ सकता है और फटने या खिसकने का खतरा भी बढ़ सकता है। इसलिए एक समय में केवल एक ही कंडोम इस्तेमाल करना चाहिए। कंडोम की एक्सपायरी डेट भी देखनी चाहिए। बहुत पुराना, क्षतिग्रस्त पैकेट में रखा हुआ या लंबे समय तक अधिक गर्मी में पड़ा कंडोम इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

क्या स्खलन से पहले निकलने वाले द्रव से भी गर्भ ठहर सकता है?

कुछ लोगों को लगता है कि जब तक पुरुष का स्खलन नहीं हुआ, तब तक गर्भधारण का कोई खतरा नहीं है। यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। यौन उत्तेजना के दौरान स्खलन से पहले लिंग से एक पारदर्शी द्रव निकल सकता है। इसे प्री-इजैक्युलेट कहा जाता है। कुछ परिस्थितियों में इस द्रव में शुक्राणु मौजूद हो सकते हैं। इसलिए अगर शुरुआत में बिना कंडोम के योनि संपर्क हुआ और बाद में कंडोम पहना गया, तो गर्भधारण की आशंका पूरी तरह खत्म नहीं होती।

इसी कारण केवल स्खलन से पहले लिंग बाहर निकाल लेना, जिसे विथड्रॉल या सहवास विच्छेदन कहते हैं, भरोसेमंद गर्भनिरोधक तरीका नहीं माना जाता। इसमें सही समय पर लिंग बाहर निकालना जरूरी होता है और थोड़ी-सी चूक भी जोखिम बढ़ा सकती है। हालाँकि, हर व्यक्ति के स्खलन-पूर्व द्रव में शुक्राणु हों, यह जरूरी नहीं है। लेकिन गर्भधारण की संभावना को देखते हुए इसे संभावित जोखिम मानना चाहिए।

कंडोम खिसक जाए तो क्या गर्भ ठहर सकता है?

अगर यौन संबंध के दौरान कंडोम लिंग से उतर जाए, खिसक जाए या वीर्य उसके बाहर निकलकर योनि तक पहुँच जाए, तो गर्भधारण संभव है। स्खलन के बाद लिंग बाहर निकालते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए। इस दौरान लिंग की कठोरता कम होने पर कंडोम ढीला पड़ सकता है। अगर उसका निचला हिस्सा नहीं पकड़ा गया, तो वह खिसक सकता है और वीर्य बाहर निकल सकता है।

कंडोम का सही आकार चुनना भी जरूरी है। बहुत ढीला कंडोम आसानी से खिसक सकता है, जबकि बहुत तंग कंडोम असुविधा पैदा कर सकता है। सही फिटिंग से सुरक्षा और आराम दोनों बेहतर रहते हैं।

कंडोम फट जाए या उतर जाए तो क्या करें?

अगर यौन संबंध के दौरान कंडोम फट जाए, उतर जाए या वीर्य के योनि तक पहुँचने की आशंका हो, तो इसे गर्भनिरोधक की संभावित विफलता मानना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि गर्भधारण निश्चित रूप से हो गया है, लेकिन जोखिम को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए।

ऐसी स्थिति में आपातकालीन गर्भनिरोधक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए कुछ विशेष गोलियाँ और कॉपर आईयूडी उपलब्ध हैं।

लेवोनॉर्जेस्ट्रेल नाम की आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली आमतौर पर असुरक्षित यौन संबंध के 72 घंटों के भीतर लेना बेहतर माना जाता है। यूलिप्रिस्टल एसीटेट नाम की गोली 120 घंटे यानी पाँच दिनों तक इस्तेमाल की जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में लेवोनॉर्जेस्ट्रेल भी पाँच दिनों तक उपयोगी हो सकती है, लेकिन समय बीतने के साथ इसकी प्रभावशीलता घट सकती है।

कॉपर आईयूडी को असुरक्षित यौन संबंध के पाँच दिनों के भीतर लगवाया जाए, तो यह आपातकालीन गर्भनिरोध के सबसे प्रभावी विकल्पों में से एक है। कौन-सा तरीका उपयुक्त रहेगा, यह व्यक्ति की स्थिति और उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करता है। इसके लिए डॉक्टर या प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लेना बेहतर है।

यह समझना भी जरूरी है कि आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियाँ गर्भपात की दवाएँ नहीं हैं। इनका मुख्य काम गर्भधारण होने से पहले अंडोत्सर्जन यानी अंडाशय से अंडाणु निकलने की प्रक्रिया को रोकना या टालना है। पहले से स्थापित गर्भावस्था को ये समाप्त नहीं करतीं।

अगर कंडोम फटने या उतरने से यौन संचारित संक्रमण का भी खतरा है, तो केवल गर्भनिरोधक गोली लेना पर्याप्त नहीं होगा। संक्रमण की जाँच और जरूरत पड़ने पर उपचार की सलाह लेनी चाहिए।

उदाहरण के लिए, एचआईवी के संभावित जोखिम वाले संपर्क के बाद पीईपी नाम का बचाव उपचार उपलब्ध है। इसे संपर्क के 72 घंटों के भीतर शुरू करना जरूरी होता है। जितनी जल्दी उपचार शुरू हो, उतना बेहतर है।

गर्भधारण का पता कब चल सकता है?

कंडोम फटने या असुरक्षित यौन संपर्क के तुरंत बाद गर्भावस्था की जाँच करने से भरोसेमंद नतीजा नहीं मिलता। गर्भधारण के बाद शरीर में गर्भावस्था से जुड़ा हार्मोन बनने और उसका स्तर जाँच में पकड़ में आने लायक होने में समय लगता है।

ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) के अनुसार, घरेलू गर्भावस्था परीक्षण माहवारी रुकने के पहले दिन से अधिक भरोसेमंद होते हैं। अगर अगली माहवारी की तारीख पता नहीं है, तो असुरक्षित यौन संबंध के कम से कम 21 दिन बाद जाँच की जा सकती है।

बहुत जल्दी जाँच करने पर नतीजा नकारात्मक आ सकता है, जबकि कुछ समय बाद गर्भावस्था की पुष्टि हो सकती है। इसलिए माहवारी न आने पर सही समय पर दोबारा जाँच करना या डॉक्टर से सलाह लेना उपयोगी है।

एक और बात ध्यान रखने योग्य है। कंडोम का सही इस्तेमाल करने के बावजूद गर्भधारण हो जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि किसी साथी ने जानबूझकर गलती की या धोखा दिया। कोई भी गर्भनिरोधक तरीका सौ प्रतिशत प्रभावी नहीं होता।

पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक के इतने कम विकल्प क्यों हैं?

यह प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा वैज्ञानिक सवाल है। महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियाँ, हार्मोनल और कॉपर आईयूडी, इंजेक्शन, प्रत्यारोपण, त्वचा पर चिपकाए जाने वाले पैच और योनि रिंग जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं।

लेकिन पुरुषों के लिए मुख्य रूप से दो चिकित्सकीय विकल्प हैं - कंडोम और नसबंदी। इसके अलावा सहवास विच्छेदन जैसा व्यवहार आधारित तरीका भी है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता कम है।

सितंबर 2026 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस असमानता की ओर ध्यान दिलाया। उसके अनुसार, पुरुषों के पास अभी गर्भनिरोधक के सीमित विकल्प हैं। इसके बावजूद लगभग 30 प्रतिशत दंपती पुरुषों से जुड़े गर्भनिरोधक तरीकों पर निर्भर करते हैं।

इससे पता चलता है कि पुरुषों में गर्भनिरोधक की जिम्मेदारी लेने की इच्छा की कमी ही समस्या नहीं है। कई पुरुष नए विकल्प अपनाने में रुचि रखते हैं। फिर सवाल उठता है कि जब मांग और जरूरत मौजूद है, तो पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोली अब तक आम इस्तेमाल के लिए क्यों उपलब्ध नहीं हो सकी? इसका जवाब पुरुषों के शरीर की बनावट, शुक्राणु बनने की प्रक्रिया, दवाओं की सुरक्षा, लंबे परीक्षणों और दवा कंपनियों के निवेश से जुड़ा है।

पुरुषों में शुक्राणु बनना रोकना कठिन क्यों है?

महिलाओं में सामान्य मासिक चक्र के दौरान आमतौर पर एक अंडाणु परिपक्व होकर निकलता है। कई महिला गर्भनिरोधक दवाएँ अंडाणु निकलने की प्रक्रिया को रोककर गर्भधारण की आशंका कम करती हैं।

पुरुषों में स्थिति अलग है। उनके शरीर में लगातार बहुत बड़ी संख्या में शुक्राणु बनते रहते हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, पुरुषों के शरीर में हर दिन लाखों शुक्राणु बनते हैं। औसतन यह संख्या लगभग एक हजार शुक्राणु प्रति सेकंड तक हो सकती है।

गर्भधारण रोकने के लिए शुक्राणुओं की संख्या इतनी कम करनी पड़ती है कि वे अंडाणु को निषेचित न कर सकें। केवल थोड़ी-सी कमी लाना पर्याप्त नहीं होता।

इसके अलावा शुक्राणु बनने की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। अगर कोई दवा शुक्राणु उत्पादन कम करती है, तो उसका असर तुरंत नहीं दिखता। पहले से बने शुक्राणु कुछ समय तक प्रजनन मार्ग में मौजूद रह सकते हैं। इसी तरह दवा बंद करने के बाद सामान्य शुक्राणु उत्पादन लौटने में भी समय लग सकता है। यही वजह है कि पुरुषों के लिए ऐसी गर्भनिरोधक दवा बनाना चुनौतीपूर्ण है, जो प्रभावी भी हो, सुरक्षित भी रहे और दवा बंद करने के बाद प्रजनन क्षमता भी सामान्य हो जाए।

क्या टेस्टोस्टेरोन कम करके शुक्राणु बनना रोका जा सकता है?

इस दिशा में वैज्ञानिक लंबे समय से काम कर रहे हैं। पुरुषों में शुक्राणु बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने में टेस्टोस्टेरोन और मस्तिष्क से निकलने वाले कुछ हार्मोन की अहम भूमिका होती है।

कुछ हार्मोनल दवाओं की मदद से शरीर के उन संकेतों को दबाया जा सकता है, जो वृषणों में शुक्राणु बनने की प्रक्रिया को बनाए रखते हैं। इससे शुक्राणुओं का उत्पादन काफी कम हो सकता है।

लेकिन इसमें एक समस्या है। टेस्टोस्टेरोन केवल शुक्राणु बनाने में ही मदद नहीं करता। यह यौन इच्छा, मांसपेशियों, हड्डियों और शरीर की दूसरी प्रक्रियाओं के लिए भी जरूरी है।

अगर टेस्टोस्टेरोन का स्तर बहुत कम हो जाए, तो स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक ऐसे उपचार विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे शुक्राणु बनना कम हो, लेकिन शरीर में जरूरी टेस्टोस्टेरोन का स्तर बना रहे। अमेरिका के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य एवं मानव विकास संस्थान के अनुसार, इस सिद्धांत पर कई पुरुष गर्भनिरोधक दवाओं का अध्ययन किया जा रहा है। लेकिन हर पुरुष में शुक्राणु उत्पादन को पर्याप्त स्तर तक कम करना और लंबे समय तक दवा की सुरक्षा सुनिश्चित करना अभी चुनौती है।

पुरुषों की गोली क्यों नहीं बन पाई?

महिलाओं की गर्भनिरोधक गोलियों के भी दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कुछ महिलाओं को मतली, सिरदर्द, रक्तस्राव के तरीके में बदलाव और दूसरी परेशानियाँ होती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम भी हो सकते हैं। अलग-अलग गर्भनिरोधक दवाओं के लाभ और जोखिम भी अलग होते हैं।

पुरुषों के लिए बनाई जा रही हार्मोनल गर्भनिरोधक दवाओं के परीक्षण में भी मुँहासे, मनोदशा में बदलाव और दूसरे दुष्प्रभाव सामने आए हैं। पुरुष गर्भनिरोधक के मामले में एक अतिरिक्त चुनौती यह है कि दवा पुरुष लेगा, लेकिन गर्भधारण का सीधा शारीरिक जोखिम महिला को होता है। इसलिए परीक्षणों में दोनों साझेदारों की सुरक्षा और गर्भनिरोधक के लाभ को ध्यान में रखना पड़ता है।

फिर भी अनचाहे गर्भधारण का सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक असर दोनों पर पड़ता है। इसलिए पुरुष गर्भनिरोधक के लाभ को केवल पुरुष के स्वास्थ्य तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।

सितंबर 2026 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार, इस क्षेत्र में सीमित निवेश, लंबे सुरक्षा परीक्षण और दवा कंपनियों की व्यावसायिक अनिश्चितता भी बड़ी बाधाएँ रही हैं। समीक्षा में 2016 में रोके गए एक पुरुष हार्मोनल इंजेक्शन परीक्षण का भी जिक्र किया गया। इस परीक्षण में गर्भनिरोधक प्रभाव अच्छा था, लेकिन मुँहासे और मनोदशा में बदलाव जैसे दुष्प्रभावों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएँ सामने आई थीं। इस घटना को केवल यह कहकर समझना कि पुरुष दुष्प्रभाव सहन नहीं कर सकते, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

दवा कंपनियाँ पुरुष गर्भनिरोधक बनाने में ज्यादा रुचि क्यों नहीं दिखातीं?

किसी नई दवा को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुँचाना आसान नहीं होता। पहले उसका प्रयोगशाला में अध्ययन किया जाता है। इसके बाद पशुओं और फिर मनुष्यों पर परीक्षण होते हैं।

मानव परीक्षणों में यह देखना पड़ता है कि दवा कितनी सुरक्षित है, कितनी प्रभावी है, उसका सही इस्तेमाल कैसे होगा और उसे बंद करने के बाद प्रजनन क्षमता सामान्य होती है या नहीं। लंबे समय तक इस्तेमाल के संभावित असर भी जाँचने पड़ते हैं।

पुरुष गर्भनिरोधक के मामले में यह भी देखना जरूरी है कि दवा लेने वाले पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने वाली महिलाओं में वास्तव में गर्भधारण रुकता है या नहीं। केवल शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाना गर्भनिरोधक की प्रभावशीलता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इन परीक्षणों में समय और पैसा दोनों लगते हैं। दवा कंपनियों को यह भी अनुमान लगाना होता है कि दवा बाजार में आने के बाद कितने लोग उसका इस्तेमाल करेंगे और उससे कितना आर्थिक लाभ होगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने भी सीमित वित्तपोषण और व्यावसायिक रुचि की कमी को पुरुष गर्भनिरोधक विकसित करने की प्रमुख बाधाओं में शामिल किया है। इसलिए पुरुषों के लिए विकल्प कम होने की वजह सिर्फ शरीर की जैविक जटिलता नहीं है। अनुसंधान और निवेश की प्राथमिकताओं ने भी इसमें भूमिका निभाई है।

क्या पुरुषों की गर्भनिरोधक गोली बन चुकी है?

पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों पर शोध चल रहा है और कुछ दवाओं का शुरुआती मानव परीक्षण भी हो चुका है। लेकिन 30 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार, पुरुषों के लिए कोई नई प्रतिवर्ती गर्भनिरोधक गोली आम इस्तेमाल के लिए व्यापक रूप से स्वीकृत और उपलब्ध नहीं है।

इस क्षेत्र में एक चर्चित दवा YCT-529 है। इसे गैर-हार्मोनल पुरुष गर्भनिरोधक के रूप में विकसित किया जा रहा है। यानी इसका उद्देश्य शरीर के टेस्टोस्टेरोन जैसे हार्मोन के स्तर को सीधे बदलना नहीं है।

यह दवा विटामिन ए से जुड़ी एक जैविक प्रक्रिया को प्रभावित करती है, जो शुक्राणु बनने के लिए जरूरी होती है।

22 जुलाई 2025 को वैज्ञानिक पत्रिका 'कम्युनिकेशंस मेडिसिन' में प्रकाशित इसके शुरुआती मानव परीक्षण में 16 स्वस्थ पुरुषों को शामिल किया गया था। उन्हें दवा की अलग-अलग निर्धारित खुराकें दी गईं। शुरुआती नतीजों में गंभीर प्रतिकूल प्रभाव सामने नहीं आए और दवा सामान्यतः सहन करने योग्य पाई गई।

लेकिन इस परीक्षण का मुख्य उद्देश्य दवा की शुरुआती सुरक्षा और शरीर में उसके व्यवहार को समझना था। इससे यह साबित नहीं हुआ कि दवा वास्तविक जीवन में गर्भधारण रोकने में कितनी प्रभावी है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पुरुषों के लिए सुरक्षित गर्भनिरोधक गोली तैयार हो चुकी है और जल्द बाजार में आने वाली है। इसके लिए बड़े मानव परीक्षण और लंबे समय तक सुरक्षा की जाँच जरूरी है।

क्या पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक जेल भी बन रहा है?

पुरुषों के लिए एक हार्मोनल जेल पर भी शोध चल रहा है। इसे एनईएस/टी या नेस्टोरोन-टेस्टोस्टेरोन जेल कहा जाता है। इसमें नेस्टोरोन नाम का एक हार्मोन और टेस्टोस्टेरोन शामिल होता है। इसका उद्देश्य शरीर के उन हार्मोनल संकेतों को कम करना है, जो वृषणों में शुक्राणु बनने की प्रक्रिया को बनाए रखते हैं। साथ ही शरीर में जरूरी टेस्टोस्टेरोन का स्तर बनाए रखने की कोशिश की जाती है।

इस जेल को शरीर की त्वचा पर निर्धारित स्थानों पर लगाया जाता है। यह कंडोम की तरह यौन संबंध से ठीक पहले इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसे नियमित रूप से लगाने पर समय के साथ शुक्राणुओं का उत्पादन काफी कम करने का लक्ष्य है।

अमेरिका के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य एवं मानव विकास संस्थान और पॉपुलेशन काउंसिल के सहयोग से इस जेल पर मानव परीक्षण किए गए हैं। संस्थान की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट में इसे पुरुष गर्भनिरोधक के संभावित विकल्पों में शामिल किया गया था।

अगर भविष्य में यह जेल स्वीकृत होता है, तो पुरुषों को कंडोम और स्थायी नसबंदी के बीच एक नया विकल्प मिल सकता है। लेकिन यह कंडोम की जगह नहीं ले सकेगा, क्योंकि इससे यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा नहीं मिलती।

क्या हार्मोन बदले बिना भी पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक बनाया जा सकता है?

वैज्ञानिक ऐसे तरीके भी खोज रहे हैं, जिनसे पुरुषों के सामान्य हार्मोन स्तरों को प्रभावित किए बिना गर्भधारण रोका जा सके।

इस दिशा में तीन तरह के उपायों पर काम हो रहा है। पहला, शुक्राणु बनने की प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकना। दूसरा, पहले से बने शुक्राणुओं की गति या अंडाणु को निषेचित करने की क्षमता को प्रभावित करना। तीसरा, शुक्राणुओं को वीर्य तक पहुँचाने वाले रास्ते को अस्थायी रूप से बंद करना।

इनमें शुक्राणुओं की गति रोकने वाला तरीका खास तौर पर दिलचस्प है। वैज्ञानिक ऐसे पदार्थ विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें लेने के कुछ समय बाद शुक्राणु अस्थायी रूप से निष्क्रिय हो जाएँ। इससे हर दिन हार्मोनल दवा लेने की जरूरत कम हो सकती है।

फरवरी 2023 में अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने एक ऐसे प्रायोगिक पदार्थ से जुड़े शोध का उल्लेख किया था, जिसने चूहों में शुक्राणुओं की गति और गर्भधारण की संभावना को अस्थायी रूप से प्रभावित किया।

क्या भारत में RISUG नाम का पुरुष गर्भनिरोधक विकसित किया गया है?

भारत में पुरुष गर्भनिरोधक के क्षेत्र में RISUG एक महत्त्वपूर्ण शोध है। इसका पूरा नाम 'रिवर्सिबल इनहिबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेंस' है। इस तकनीक में शुक्राणुओं को ले जाने वाली नली, जिसे वास डिफरेंस कहते हैं, में एक विशेष पदार्थ डाला जाता है। इसका उद्देश्य शुक्राणुओं के रास्ते या उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करके गर्भधारण रोकना है।

इस तकनीक पर भारतीय वैज्ञानिक लंबे समय से काम कर रहे हैं। इसका एक बड़ा उद्देश्य ऐसा गर्भनिरोधक विकसित करना है, जो नसबंदी की तरह प्रभावी हो, लेकिन जरूरत पड़ने पर प्रजनन क्षमता वापस पाने की संभावना भी रखे।

सितंबर 2026 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पुरुष गर्भनिरोधक के लिए जो नए मानदंड जारी किए, उनमें शुक्राणु बनने की प्रक्रिया रोकने के अलावा उनकी कार्यक्षमता और परिवहन को प्रभावित करने वाली तकनीकों को भी शामिल किया गया। इससे स्पष्ट है कि पुरुष गर्भनिरोधक पर शोध केवल गोली या जेल तक सीमित नहीं है।

पुरुष नसबंदी कितनी प्रभावी है? क्या इससे यौन क्षमता पर असर पड़ता है?

पुरुषों के लिए आज उपलब्ध सबसे प्रभावी गर्भनिरोधक तरीकों में नसबंदी यानी वैसेक्टॉमी शामिल है। इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं को वृषणों से आगे ले जाने वाली नलियों को बंद कर दिया जाता है। इससे वीर्य के साथ शुक्राणु बाहर नहीं निकल पाते और गर्भधारण की संभावना बहुत कम हो जाती है।

नसबंदी का उद्देश्य शुक्राणुओं का रास्ता रोकना है। इससे शरीर में टेस्टोस्टेरोन बनना बंद नहीं होता। आमतौर पर पुरुष की यौन इच्छा, इरेक्शन और स्खलन की क्षमता पर भी इसका सीधा असर नहीं पड़ता। वीर्य पहले की तरह बनता और बाहर निकलता रहता है, लेकिन उसमें शुक्राणु नहीं होने चाहिए।

हालाँकि, नसबंदी के तुरंत बाद गर्भधारण से पूरी सुरक्षा नहीं मिलती। प्रक्रिया से पहले बने कुछ शुक्राणु प्रजनन मार्ग में मौजूद रह सकते हैं। इसलिए डॉक्टर द्वारा बताए गए समय के बाद वीर्य की जाँच करानी जरूरी होती है।

जाँच में यह पुष्टि होने तक कि वीर्य में शुक्राणु नहीं हैं या उनकी संख्या निर्धारित सुरक्षित सीमा से नीचे है, दूसरी गर्भनिरोधक विधि का इस्तेमाल जारी रखना चाहिए।

सीडीसी के अनुसार, जाँच से सफलता की पुष्टि होने के बाद भी गर्भधारण का जोखिम पूरी तरह शून्य नहीं होता। अनुमान के मुताबिक, सफल नसबंदी के बाद लगभग 2,000 में से एक मामले में गर्भधारण हो सकता है।

नसबंदी को स्थायी गर्भनिरोधक मानकर ही चुनना चाहिए। कुछ मामलों में इसे उलटने की सर्जरी संभव होती है, लेकिन इससे प्रजनन क्षमता वापस आने की गारंटी नहीं होती। इसलिए भविष्य में संतान की इच्छा हो सकती है, तो यह फैसला बहुत सोच-समझकर लेना चाहिए।

क्या गर्भनिरोधक की जिम्मेदारी महिलाओं पर ज्यादा डाल दी गई है?

गर्भधारण महिला के शरीर में होता है। इसलिए अनचाही गर्भावस्था और गर्भनिरोधक से जुड़े कई शारीरिक प्रभाव सीधे महिला को झेलने पड़ते हैं। लंबे समय तक गर्भनिरोधक अनुसंधान का बड़ा हिस्सा भी महिलाओं पर केंद्रित रहा। लेकिन गर्भधारण की प्रक्रिया में पुरुष और महिला दोनों की भूमिका होती है। इसलिए गर्भनिरोधक की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की नहीं होनी चाहिए।

पुरुष इस जिम्मेदारी में कई तरीकों से भागीदारी कर सकते हैं। वे कंडोम का सही इस्तेमाल कर सकते हैं, गर्भनिरोधक के फैसलों में सहयोग कर सकते हैं और जरूरत के अनुसार उपलब्ध विकल्प अपना सकते हैं।

भविष्य में अगर पुरुषों के लिए सुरक्षित और प्रभावी गोली, जेल या दूसरे प्रतिवर्ती तरीके उपलब्ध होते हैं, तो दंपतियों के पास जिम्मेदारी बाँटने के अधिक विकल्प होंगे। इसके साथ आपसी भरोसा और सही जानकारी भी जरूरी है। दोनों साझेदारों को पता होना चाहिए कि वे किस गर्भनिरोधक तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं और उसकी सीमाएँ क्या हैं। हर व्यक्ति को अपने शरीर और स्वास्थ्य से जुड़े फैसले लेने का अधिकार होना चाहिए।

यह भी याद रखना जरूरी है कि पुरुषों के लिए नई गोली या जेल उपलब्ध हो जाने के बाद भी कंडोम की जरूरत खत्म नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर दूसरे गर्भनिरोधक तरीके यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा नहीं देते।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने क्या नई पहल की?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 22 सितंबर 2026 को पुरुषों के लिए नए गर्भनिरोधक विकसित करने के उद्देश्य से पहली बार विशेष उत्पाद मानदंड जारी किए। इन्हें 'टारगेट प्रोडक्ट प्रोफाइल' कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो ये ऐसे दिशा-निर्देश हैं, जिनकी मदद से वैज्ञानिक और दवा कंपनियाँ तय कर सकती हैं कि भविष्य में बनने वाला पुरुष गर्भनिरोधक कैसा होना चाहिए।

इन मानदंडों में दवा या तकनीक की प्रभावशीलता, सुरक्षा, इस्तेमाल में आसानी, लोगों की स्वीकार्यता और उपचार बंद करने के बाद प्रजनन क्षमता वापस आने जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तीन प्रमुख वैज्ञानिक रास्तों पर ध्यान दिया है। पहला, शुक्राणु बनने की प्रक्रिया को रोकना। दूसरा, शुक्राणुओं की गति या निषेचन की क्षमता को प्रभावित करना। तीसरा, शुक्राणुओं को आगे ले जाने वाले रास्ते को रोकना। इस पहल से पुरुष गर्भनिरोधक पर शोध को व्यवस्थित और तेज करने में मदद मिल सकती है। लेकिन किसी नई दवा को आम लोगों तक पहुँचने के लिए अभी भी बड़े मानव परीक्षण और नियामकीय मंजूरी की जरूरत होगी।

इस पूरे विषय का सबसे अहम संदेश यही है कि गर्भधारण रोकने की जिम्मेदारी दोनों साझेदारों की है। महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों को भी गर्भनिरोधक के सुरक्षित और प्रभावी विकल्प मिलने चाहिए। विज्ञान की असली सफलता तभी होगी, जब पुरुष और महिला दोनों अपने प्रजनन संबंधी फैसले अधिक जानकारी, सुरक्षा और स्वतंत्रता के साथ ले सकें।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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