रक्षाबंधन 2026: द्रौपदी से हुमायूं तक, राखी की ये ऐतिहासिक कहानियां कर देंगी हैरान

Raksha Bandhan Historical Stories: जानिए द्रौपदी-कृष्ण, राजा बलि, रानी कर्णावती, इंद्राणी और हुमायूं समेत रक्षाबंधन से जुड़ी ऐतिहासिक व पौराणिक कहानियां।

Jyotsana Singh
Published on: 6 Aug 2026 5:11 PM IST
Raksha Bandhan Historical Stories
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Raksha Bandhan Historical Stories

Raksha Bandhan Historical Stories: रक्षाबंधन करीब आते ही हर घर में त्यौहार से जुड़ी तैयारियों के साथ बहनों और भाइयों के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देने लगती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भाई-बहन के अटूट प्रेम का यह पर्व सिर्फ एक पारिवारिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है। महाभारत से लेकर पुराणों और मध्यकालीन इतिहास तक ऐसी कई कहानियां मिलती हैं, जिन्होंने रक्षाबंधन को सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि विश्वास, त्याग, सम्मान और रक्षा के संकल्प का प्रतीक बना दिया। इनमें से कुछ कथाएं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जबकि कुछ लोककथाओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। आइए जानते हैं रक्षाबंधन से जुड़े रोचक किस्सों, परंपराओं और इतिहास के बारे में जो इस पर्व को और भी खास बनाते हैं।

रक्षाबंधन का क्या है महत्व?

'रक्षाबंधन' दो शब्दों से मिलकर बना है,' रक्षा' यानी सुरक्षा और 'बंधन' यानी पवित्र संबंध। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व बहन के स्नेह और भाई के संरक्षण के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। समय के साथ यह त्योहार केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गुरु-शिष्य, सैनिकों, मित्रों और समाज में विश्वास के रिश्तों का भी प्रतीक बन गया।

महाभारत की सबसे प्रसिद्ध कथा-द्रौपदी और श्रीकृष्ण

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय मान्यताओं में द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की कथा शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, शिशुपाल वध के दौरान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी। यह देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने इस स्नेह और अपनत्व का ऋण चुकाने का वचन दिया। बाद में महाभारत में द्रौपदी चीरहरण के समय जब संकट में थीं, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बचाकर अपने वचन को निभाया। यही कारण है कि इस कथा को रक्षाबंधन की भावना का सबसे सशक्त प्रतीक माना जाता है।

जब इंद्राणी के बांधे रक्षा सूत्र ने बदल दी युद्ध की दिशा

रक्षाबंधन की सबसे प्राचीन मान्यताओं में से एक का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों के बीच लगातार 12 वर्षों तक भीषण युद्ध चलता रहा। देवताओं के राजा इंद्र अपनी पूरी शक्ति के साथ युद्ध कर रहे थे, लेकिन असुरों का पलड़ा लगातार भारी पड़ रहा था। देवताओं की हार लगभग तय मानी जा रही थी और स्वर्ग पर संकट के बादल मंडराने लगे थे।

युद्ध से पहले इंद्र की पत्नी सची (इंद्राणी) ने वैदिक मंत्रों के साथ एक पवित्र रक्षा सूत्र तैयार किया। उन्होंने अपने पति इंद्र की कलाई पर वह रक्षा सूत्र बांधते हुए उनकी विजय और कुशलता की कामना की। धार्मिक मान्यता है कि इस रक्षा सूत्र और देवी-देवताओं की कृपा से इंद्र को नया आत्मबल मिला और अगले युद्ध में उन्होंने असुरों को पराजित कर विजय प्राप्त की। इसी कथा के आधार पर माना जाता है कि रक्षा सूत्र केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास, शुभता और ईश्वरीय संरक्षण का भी प्रतीक है। यही कारण है कि आज भी कई धार्मिक अनुष्ठानों में पंडित यजमान की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं।

महाभारत में रक्षाबंधन का महत्व

महाभारत में भी रक्षा सूत्र की महिमा का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आने वाले समय में युद्ध, संकट और विपत्तियों से स्वयं तथा अपने परिवार की रक्षा कैसे की जा सकती है।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें रक्षा सूत्र की महिमा बताते हुए श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन मनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और विश्वास के साथ बांधा गया रक्षा सूत्र व्यक्ति को मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और ईश्वर का आशीर्वाद प्रदान करता है। इसी प्रसंग के माध्यम से श्रीकृष्ण ने उन्हें एक प्राचीन कथा सुनाई, जिसे आज राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा के रूप में जाना जाता है। कुछ लोक मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले माता कुंती ने अपने प्रिय पौत्र अभिमन्यु की रक्षा की कामना करते हुए उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। महाभारत के सभी प्रामाणिक संस्करणों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन कई क्षेत्रों में यह कथा श्रद्धा और आस्था के साथ सुनाई जाती है।

राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा

रक्षाबंधन की सबसे लोकप्रिय पौराणिक कथाओं में राजा बलि और माता लक्ष्मी की कहानी प्रमुख मानी जाती है। भविष्य पुराण के अनुसार, दानवों के राजा महाबली अपनी दानशीलता, सत्यनिष्ठा और भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया और उनके द्वारपाल बनने का वचन दिया। इसके बाद भगवान विष्णु अपना धाम वैकुंठ छोड़कर राजा बलि के राज्य सुतल लोक में रहने लगे। भगवान विष्णु के वैकुंठ से चले जाने के कारण माता लक्ष्मी अत्यंत चिंतित और दुखी हो गईं। उन्होंने अपने पति को वापस लाने का उपाय खोजा। श्रावण पूर्णिमा के शुभ दिन माता लक्ष्मी साधारण स्त्री का वेश धारण कर सुतल लोक पहुंचीं। वहां उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई स्वीकार किया। राजा बलि इस स्नेह और सम्मान से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी नई बहन से मनचाहा वर मांगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ लौटने का वरदान मांगा। राजा बलि धर्म और वचन के पक्के थे, इसलिए उन्होंने तुरंत यह वरदान दे दिया।

कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि से किए अपने वचन का सम्मान करते हुए यह व्यवस्था की कि वर्षा ऋतु के चार पवित्र महीनों यानी चतुर्मास के दौरान वे राजा बलि के साथ रहेंगे, जबकि शेष समय वैकुंठ में निवास करेंगे। ब्रह्मा और भगवान शिव ने भी राजा बलि की रक्षा का दायित्व निभाने का आश्वासन दिया। इसी घटना को रक्षाबंधन की परंपरा का आधार माना जाता है। इसी कथा के कारण कई स्थानों पर रक्षाबंधन को 'बलेवा' के नाम से भी जाना जाता है। आज भी रक्षा सूत्र बांधते समय पुरोहित एक प्रसिद्ध वैदिक मंत्र का उच्चारण करते हैं-

'येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।'

इस मंत्र का अर्थ है, जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि बंधे थे, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षा! तुम अपने कर्तव्य से कभी विचलित मत होना और सदैव इस व्यक्ति की रक्षा करना।

रक्षाबंधन से जुड़ी मुगल काल की चर्चित कहानी

रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कथाओं में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं का प्रसंग शामिल है। लोककथाओं के अनुसार, गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से घिरी रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। कहा जाता है कि राखी का सम्मान करते हुए हुमायूं उनकी मदद के लिए निकल पड़े। यह कहानी सांस्कृतिक सद्भाव और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है।

सिकंदर, रॉक्साना और राजा पुरु की रक्षासूत्र से जुड़ी कहानी

एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा सिकंदर महान की पत्नी रॉक्साना और भारतीय राजा पुरु से जुड़ी है। कहा जाता है कि रॉक्साना ने युद्ध से पहले पुरु की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर सिकंदर के प्राणों की रक्षा का वचन मांगा था। युद्ध के दौरान पुरु ने इस वचन का सम्मान किया।

यह कथा वर्षों से रक्षाबंधन की लोकप्रिय कहानियों में शामिल रही है।

सिर्फ भाई-बहन का नहीं, सामाजिक विश्वास का भी पर्व

भारत के कई हिस्सों में महिलाएं न सिर्फ भाइयों को बल्कि सैनिकों, पुलिसकर्मियों, शिक्षकों और संतों की रक्षा की कामना के साथ उनकी कलाइयों पर भी राखी बांधती हैं। कई स्थानों पर पेड़ों को राखी बांधकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपने कृषि उपकरणों और पशुओं की भी पूजा करते हैं। समूचे देश में रक्षाबंधन केवल पारिवारिक त्योहार नहीं बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन चुका है।

अलग-अलग राज्यों में अलग परंपराएं

देश के विभिन्न राज्यों में रक्षाबंधन अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। राजस्थान और उत्तर भारत में इसे रक्षाबंधन के रूप में, महाराष्ट्र में नारळी पूर्णिमा के साथ, गुजरात में पवित्रोपण और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में उपाकर्म के रूप में मनाने की परंपरा है। ब्राह्मण समुदाय इस दिन मान्यताओं के अनुरूप नया यज्ञोपवीत धारण करता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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