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Sita Swayamvar Ki Kahani: श्रीराम के सामने ठिठक गईं सीता, जयमाला पहनाने में क्यों हुआ विलंब?
Sita Swayamvar Ki Kahani: श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जानें कि श्रीराम को जयमाला पहनाते समय माता सीता क्यों ठिठक गई थीं। पढ़ें प्रेम, संकोच और समर्पण से जुड़ा यह सुंदर प्रसंग।
Ramayana Story in Hindi | Sita Swayamvar Ki Kahani | Newstrack Hindi News
Sita Swayamvar Ki Kahani: गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह का प्रसंग भारतीय भक्ति साहित्य में प्रेम, मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत सुंदर उदाहरण है। शिवधनुष भंग होने के बाद राजा जनक की सभा में आनंद और उत्साह का वातावरण है। जिस कठिन शर्त को पूरा करने में अनेक प्रतापी राजा असफल रहे थे, उसे श्रीराम ने सहजता से पूरा कर दिया है। अब वह क्षण आ गया है, जिसकी प्रतीक्षा सीता के हृदय में लंबे समय से चल रही थी। उन्हें श्रीराम के गले में जयमाला पहनानी है। लेकिन जैसे ही वे उनके समीप पहुँचती हैं, उनके मन में प्रेम और संकोच का ऐसा अद्भुत संगम उत्पन्न होता है कि वे कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह जाती हैं। मन में अपार उत्साह है, लेकिन शरीर संकोच से भरा हुआ है। हृदय अपने आराध्य को प्राप्त करने की प्रसन्नता से उमड़ रहा है, पर उस आनंद को व्यक्त करने के लिए हाथ भी सहजता से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। तुलसीदास ने इस मनोदशा को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया है।
शरीर में संकोच, मन में अपार उत्साह
श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में तुलसीदास लिखते हैं—
तन सकोचु मन परम उछाहू।
गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।
जाइ समीप राम छबि देखी।
रहि जनु कुअरि चित्र अवरेखी।।
अर्थात् सीता के शरीर में संकोच है, लेकिन मन में अत्यधिक उत्साह है। उनका प्रेम इतना गहरा और गोपनीय है कि कोई उसे समझ नहीं पा रहा है। श्रीराम के समीप जाकर जब राजकुमारी सीता उनके सौंदर्य को देखती हैं, तो इस प्रकार स्थिर रह जाती हैं, मानो किसी चित्र में अंकित हों।
इन चौपाइयों में तुलसीदास ने प्रेम की एक अत्यंत स्वाभाविक मनोवैज्ञानिक स्थिति का वर्णन किया है। मन में उत्पन्न भावनाएँ हमेशा शरीर की गतिविधियों से स्पष्ट नहीं होतीं। कई बार मन अत्यधिक प्रसन्न होता है, लेकिन व्यक्ति बाहरी व्यवहार में शांत और संकोचशील दिखाई देता है। सीता की स्थिति भी ऐसी ही है। उनके हृदय में श्रीराम के प्रति गहरा अनुराग है, लेकिन उनकी मर्यादा और लज्जा उस अनुराग को बाहरी रूप में प्रकट नहीं होने देती।
तुलसीदास इसीलिए उनके प्रेम को 'गूढ़ प्रेम' कहते हैं। गूढ़ का अर्थ है ऐसा भाव, जो भीतर गहराई में विद्यमान हो, लेकिन सहजता से दिखाई न दे। सीता के मन में प्रेम का अथाह विस्तार है, पर बाहर केवल संकोच दिखाई देता है। उनकी शारीरिक मुद्रा देखकर कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता कि उनके हृदय में कितनी तीव्र भावनाएँ उमड़ रही हैं।
सीता के गूढ़ प्रेम में जनक के स्वभाव की झलक
इस प्रसंग की एक सुंदर व्याख्या राजा जनक और उनकी पुत्री सीता के स्वभाव के संबंध में भी की जाती है। राजा जनक को विदेह कहा जाता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में उनका व्यक्तित्व ज्ञान, वैराग्य, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना गया है। वे सांसारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए भी अपने भीतर गहरी आत्मिक स्थिरता बनाए रखने वाले आदर्श राजा के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
सीता भी जनक की पुत्री हैं। उनके व्यक्तित्व में गंभीरता, मर्यादा और आत्मसंयम दिखाई देता है। इस दृष्टि से उनके गूढ़ प्रेम को जनक के स्वभाव से जोड़कर देखा जा सकता है। हालांकि तुलसीदास की इन चौपाइयों में यह स्पष्ट नहीं कहा गया है कि सीता का प्रेम पिता के स्वभाव के कारण गुप्त है, लेकिन भावार्थ की दृष्टि से यह व्याख्या उनके चरित्र की गरिमा को समझने में सहायक है।
सीता का प्रेम किसी आवेगपूर्ण प्रदर्शन का रूप नहीं लेता। वे अपनी भावनाओं को मर्यादा के भीतर रखती हैं। यही कारण है कि उनके मन में अपार उत्साह होने के बावजूद शरीर संकोच से भरा रहता है। यहाँ प्रेम और संकोच एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों मिलकर उनके व्यक्तित्व की सुंदरता को और अधिक बढ़ा देते हैं।
श्रीराम के समीप पहुँचकर चित्रवत् स्थिर हो गईं सीता
पुष्पवाटिका में प्रथम दर्शन के समय सीता ने श्रीराम के सौंदर्य को देखा था। उस समय उनके मन में जो अनुराग उत्पन्न हुआ, वह धीरे-धीरे गहरा होता गया। गौरी पूजन के दौरान उन्होंने श्रीराम को पति के रूप में प्राप्त करने की मनोकामना की और माता गौरी से आशीर्वाद प्राप्त किया। स्वयंवर की सभा में भी उनकी दृष्टि बार-बार श्रीराम की ओर जाती रही। लेकिन जयमाला पहनाने का अवसर इन सभी अनुभवों से अलग था।
अब सीता श्रीराम के इतने समीप आ गई हैं कि उन्हें अपने हाथों से माला पहनानी है। दूर से दिखाई देने वाले सौंदर्य और निकट से अनुभव होने वाले सौंदर्य में एक सूक्ष्म अंतर होता है। समीप पहुँचने पर व्यक्ति के मुखमंडल, नेत्रों, भावों और व्यक्तित्व की अनेक बारीक विशेषताएँ अधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं। सीता जब इतने निकट से श्रीराम की छवि देखती हैं, तो उनके मन का अनुराग और भी तीव्र हो उठता है।
तुलसीदास लिखते हैं कि राजकुमारी इस प्रकार स्थिर हो गईं, मानो किसी चित्र में अंकित हों। यह उपमा अत्यंत अर्थपूर्ण है। कुछ समय पहले शिवधनुष भंग होने के प्रसंग में सभा के लोग श्रीराम को देखकर चित्रवत् स्थिर हो गए थे। अब जयमाला के अवसर पर स्वयं सीता की स्थिति वैसी हो जाती है। अंतर केवल इतना है कि सभा के लोगों की स्थिरता आश्चर्य और विस्मय से उत्पन्न हुई थी, जबकि सीता की स्थिरता के मूल में प्रेम, संकोच और आनंद का अद्भुत संगम है।
उनकी दृष्टि श्रीराम की छवि पर ठहर जाती है। मन उस सौंदर्य में इतना डूब जाता है कि कुछ क्षणों के लिए शरीर की गतिविधियाँ भी मानो रुक जाती हैं। यह प्रेम की उस अवस्था का काव्यात्मक चित्रण है, जिसमें व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण को भूलकर केवल अपने प्रिय के दर्शन में तल्लीन हो जाता है।
चतुर सखी ने समझी सीता के मन की स्थिति
सीता की इस अवस्था को देखकर उनकी एक चतुर सखी उन्हें समझाती है। तुलसीदास लिखते हैं—
चतुर सखी लखि कहा बुझाई।
पहिरावहु जयमाल सुहाई।।
सुनत जुगल कर माल उठाई।
प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।
अर्थात् एक चतुर सखी ने सीता की स्थिति को समझकर कहा कि अब सुंदर जयमाला पहना दीजिए। यह सुनते ही सीता ने दोनों हाथों से माला उठा ली, लेकिन प्रेम के वशीभूत होने के कारण वे उसे श्रीराम के गले में नहीं पहना पा रही थीं।
यहाँ सखी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह केवल विवाह समारोह में साथ आई हुई सहेली नहीं है, बल्कि सीता की भावनाओं को समझने वाली आत्मीय सहचरी भी है। वह जानती है कि सीता के हृदय में क्या चल रहा है। बाहर से दिखाई देने वाला संकोच उसके लिए अपरिचित नहीं है। वह समझ जाती है कि सीता प्रेम की तीव्रता के कारण कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध हो गई हैं।
इस प्रसंग को पुष्पवाटिका की उस घटना से जोड़कर भी देखा जा सकता है, जब एक चतुर सखी ने सीता को श्रीराम और लक्ष्मण के दर्शन के लिए प्रेरित किया था। उस समय सखी ने कहा था—
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू।
भूपकिसोर देखि किन लेहू।।
अर्थात् गौरी का ध्यान फिर कर लेना, पहले इन राजकुमारों को देख क्यों नहीं लेतीं?
दोनों प्रसंगों में सखी की भूमिका समान दिखाई देती है। पुष्पवाटिका में वह सीता को राजकुमारों के दर्शन के लिए प्रेरित करती है और जयमाला के अवसर पर उन्हें अपने संकोच से बाहर आकर माला पहनाने के लिए समझाती है। यद्यपि पाठ से यह निश्चित नहीं होता कि दोनों अवसरों पर वही एक सखी थी, फिर भी दोनों प्रसंगों में सखी का चातुर्य और आत्मीयता विशेष रूप से उभरते हैं।
प्रेम की तीव्रता से क्यों नहीं उठ पा रहे थे सीता के हाथ?
सखी के समझाने पर सीता दोनों हाथों से जयमाला उठा लेती हैं, लेकिन उसे श्रीराम के गले में नहीं पहना पातीं। यह स्थिति सामान्य संकोच से कुछ अधिक गहरी है। तुलसीदास ने इसे 'प्रेम बिबस' कहा है, अर्थात् प्रेम के कारण विवश हो जाना।
भारतीय काव्यशास्त्र में भावनाओं की तीव्रता से उत्पन्न कुछ शारीरिक अवस्थाओं को सात्त्विक भाव कहा गया है। इनमें स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय जैसे भावों का वर्णन मिलता है। स्तम्भ का अर्थ है तीव्र भावनात्मक अनुभव के कारण शरीर की गतिविधियों का क्षणिक रूप से रुक जाना। वेपथु का संबंध शरीर के काँपने से है। प्रेम, आनंद, भय, आश्चर्य अथवा अन्य प्रबल भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए संस्कृत काव्यशास्त्र में इन अवस्थाओं का उपयोग किया गया है।
सीता के चित्रवत् स्थिर हो जाने को सात्त्विक भाव 'स्तम्भ' की दृष्टि से समझा जा सकता है। इसी प्रकार जयमाला उठाने के बाद भी उसे न पहना पाने की स्थिति प्रेमजनित संकोच और भावविभोरता को प्रकट करती है। कुछ व्याख्याकार इसे हाथों के काँपने अथवा वेपथु से भी जोड़ते हैं, हालांकि इन चौपाइयों में हाथ काँपने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। तुलसीदास ने केवल इतना कहा है कि प्रेम के वशीभूत होने के कारण सीता माला नहीं पहना पा रही हैं।
यही इस वर्णन की विशेषता है। कवि ने सीता की भावनाओं को विस्तार से समझाने के बजाय उनकी एक छोटी-सी क्रिया के माध्यम से पूरे मनोभाव को व्यक्त कर दिया है। वे माला उठाती हैं, लेकिन उसे पहना नहीं पातीं। इस क्षणिक विलंब में प्रेम की तीव्रता, संकोच की मर्यादा और हृदय के आनंद का पूरा संसार समाहित हो जाता है।
सखियों के मंगलगीतों के बीच श्रीराम को पहनाई जयमाला
सीता की भावविभोर अवस्था देखकर सखियाँ आनंदित हो उठती हैं। वे इस अद्भुत दृश्य को देखकर मंगलगीत गाने लगती हैं। तुलसीदास लिखते हैं—
गावहिं छबि अवलोकि सहेली।
सियँ जयमाल राम उर मेली।।
अर्थात् इस सुंदर दृश्य को देखकर सखियाँ गीत गाने लगीं और सीता ने श्रीराम के वक्षस्थल पर जयमाला डाल दी।
यह क्षण पूरे स्वयंवर प्रसंग का अत्यंत महत्वपूर्ण और भावपूर्ण दृश्य है। शिवधनुष भंग करके श्रीराम ने स्वयंवर की शर्त पूरी कर दी थी, लेकिन जयमाला पहनाने के साथ सीता की स्वीकृति भी सार्वजनिक रूप से व्यक्त होती है। इस प्रकार दोनों के मिलन की दिशा में एक निर्णायक चरण पूरा होता है।
सखियों के मंगलगीत वातावरण को आनंद और उल्लास से भर देते हैं। कुछ क्षण पहले तक सीता के मन में जो संकोच और भावनात्मक आवेग था, वह अब जयमाला पहनाने की क्रिया में परिणत हो जाता है। उनके दोनों हाथों से उठाई गई माला अंततः श्रीराम के गले में पहुँचती है। यह केवल विवाह समारोह की एक रस्म नहीं रह जाती, बल्कि उस प्रेम की सार्वजनिक अभिव्यक्ति बन जाती है, जो अब तक उनके हृदय में गुप्त था।
तुलसीदास इस दृश्य को अत्यंत मर्यादित ढंग से प्रस्तुत करते हैं। यहाँ प्रेम की अभिव्यक्ति में न कोई असंयम है और न अनावश्यक प्रदर्शन। सीता का संकोच, सखियों का उत्साह और श्रीराम की गरिमामयी उपस्थिति मिलकर एक ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं, जिसमें प्रेम और मर्यादा दोनों अपनी पूर्ण सुंदरता के साथ उपस्थित हैं।
जयमाला पड़ते ही देवताओं ने की पुष्पवर्षा
श्रीराम के वक्षस्थल पर जयमाला पड़ते ही कथा का वातावरण उत्सवमय हो उठता है। देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा और मंगलध्वनि का वर्णन इस घटना के दिव्य महत्व को प्रकट करता है। भारतीय धार्मिक साहित्य में देवताओं की पुष्पवर्षा किसी महान, मंगलकारी अथवा दैवी घटना के प्रति प्रसन्नता व्यक्त करने का प्रचलित काव्यात्मक और धार्मिक प्रतीक है।
श्रीराम और सीता का मिलन रामकथा की धार्मिक परंपरा में केवल दो व्यक्तियों का विवाह नहीं माना जाता, बल्कि विष्णु और लक्ष्मी के अवतारों के मिलन के रूप में भी देखा जाता है। इसी कारण उनके विवाह से जुड़े प्रसंगों में लौकिक आनंद के साथ अलौकिक मंगल का भी वर्णन मिलता है।
जयमाला के समय देवताओं की प्रसन्नता इसी व्यापक धार्मिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। राजा जनक की सभा में उपस्थित लोगों के लिए यह एक असाधारण स्वयंवर की सफलता है, जबकि भक्तिपरक व्याख्या में यह एक दिव्य मिलन का उत्सव बन जाता है।
गूढ़ प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है सीता का संकोच
श्रीराम और सीता के जयमाला प्रसंग की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रेम की वह अभिव्यक्ति है, जिसमें शब्दों की अपेक्षा मौन और शारीरिक संकेत अधिक प्रभावशाली बन जाते हैं। सीता अपने मन की बात किसी से नहीं कहतीं, लेकिन उनका संकोच, श्रीराम की छवि में तल्लीन हो जाना और माला उठाकर भी न पहना पाना उनके हृदय की स्थिति को स्पष्ट कर देता है।
तुलसीदास ने प्रेम को केवल आकर्षण अथवा भावनात्मक आवेग के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। उनके यहाँ प्रेम के साथ मर्यादा, विनम्रता, आत्मसंयम और समर्पण भी जुड़े हुए हैं। सीता के मन में परम उत्साह है, लेकिन वे अपने व्यवहार में मर्यादा का उल्लंघन नहीं करतीं। उनका प्रेम जितना गहरा है, उसकी अभिव्यक्ति उतनी ही संयमित है।
यह प्रसंग मानवीय संबंधों की एक महत्वपूर्ण विशेषता भी सामने लाता है। गहरी भावनाओं को हमेशा शब्दों में व्यक्त करना आवश्यक नहीं होता। कभी-कभी मौन, दृष्टि, संकोच और छोटी-छोटी गतिविधियाँ मन की स्थिति को अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रकट कर देती हैं। सीता के हाथों में उठी हुई जयमाला और उसे पहनाने में होने वाला क्षणिक विलंब इसी भावनात्मक सूक्ष्मता का सुंदर उदाहरण है।
सखी की भूमिका भी इस प्रसंग को विशेष अर्थ देती है। वह सीता की भावनाओं को समझती है और उन्हें उचित समय पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। उसके व्यवहार में आत्मीयता, संवेदनशीलता और परिस्थितियों को समझने की क्षमता दिखाई देती है। इस प्रकार यह प्रसंग केवल श्रीराम और सीता के प्रेम का चित्रण नहीं करता, बल्कि सखी के रूप में एक संवेदनशील सहचरी के महत्व को भी सामने लाता है।
अंततः श्रीराम के गले में जयमाला पड़ने का क्षण प्रेम की उस यात्रा का सुंदर पड़ाव है, जिसकी शुरुआत पुष्पवाटिका में प्रथम दर्शन से हुई थी। उस समय जो अनुराग सीता के हृदय में जागृत हुआ था, वह गौरी पूजन के समय प्रार्थना बना, स्वयंवर की सभा में व्याकुल प्रतीक्षा के रूप में सामने आया और अंततः जयमाला के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति प्राप्त करता है।
तुलसीदास की काव्य प्रतिभा इसी बात में दिखाई देती है कि वे इतनी बड़ी भावनात्मक यात्रा को कुछ छोटी-छोटी घटनाओं और अत्यंत प्रभावशाली उपमाओं के माध्यम से प्रस्तुत कर देते हैं। सीता का चित्रवत् स्थिर हो जाना, दोनों हाथों से माला उठाना, प्रेम के कारण उसे न पहना पाना और अंततः सखियों के मंगलगीतों के बीच श्रीराम के गले में जयमाला डाल देना, ये सभी दृश्य मिलकर प्रेम की एक अविस्मरणीय छवि निर्मित करते हैं।
इस प्रसंग का मूल संदेश यही है कि प्रेम की गहराई उसके प्रदर्शन से नहीं मापी जाती। कई बार सबसे प्रगाढ़ प्रेम वही होता है, जो हृदय में अत्यंत गहरा होने के बावजूद व्यवहार में विनम्र, संयमित और मर्यादित बना रहता है। माता सीता का गूढ़ प्रेम और श्रीराम के प्रति उनका संकोचपूर्ण समर्पण इसी आदर्श की सुंदर अभिव्यक्ति है।


