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Ramcharitmanas Katha in Hindi: जनक का संताप हरने का क्षण, रामचरितमानस का मंगल प्रसंग
Ramcharitmanas Katha in Hindi:: रामचरितमानस के बालकाण्ड का यह भावपूर्ण प्रसंग बताता है कि किस प्रकार विश्वामित्र जी की आज्ञा से श्रीराम ने शिवधनुष भंग कर राजा जनक का संताप दूर किया।
“गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं।
मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे।
प्रेम समेत निकट बैठारे॥”
“बिस्वामित्र समय सुभ जानी।
बोले अति सनेहमय बानी॥
उठहु राम भंजहु भवचापा।
मेटहु तात जनक परितापा॥”
(रामचरितमानस, बालकाण्ड)
रामचरितमानस का यह प्रसंग केवल एक धनुष-भंग की घटना नहीं है, बल्कि गुरु-आज्ञा, मर्यादा, विनम्रता और दिव्य नियति का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। मिथिला की सभा में समस्त राजा-महाराजा शिवधनुष को उठाने में असफल हो चुके हैं। राजा जनक के मन में चिंता गहराती जा रही है। उन्हें लगने लगा था कि कहीं उनकी प्रतिज्ञा असफल न हो जाए।
सभा में उपस्थित सभी ऋषि-मुनि और राजपुरुष स्थिति को देख रहे थे। तभी विश्वामित्र जी शुभ समय को पहचानते हैं। उनके हृदय में यह स्पष्ट था कि अब वह क्षण आ चुका है, जिसके लिए यह समूची लीला रची गई है।
उससे पहले एक अत्यन्त कोमल दृश्य आता है। लक्ष्मण जी के भीतर उत्साह और तेज उमड़ रहा था, किन्तु राम जी ने केवल संकेत से उन्हें शांत कर दिया और प्रेमपूर्वक अपने पास बैठा लिया। यह प्रसंग बताता है कि शक्ति का सबसे सुंदर रूप संयम होता है।
इसके बाद विश्वामित्रजी प्रेमपूर्ण वाणी में कहते हैं—
“उठहु राम भंजहु भवचापा,
मेटहु तात जनक परितापा।”
अर्थात्— “हे राम! उठिए, शिवधनुष को तोड़कर राजा जनक के संताप को दूर कीजिए।”
यहाँ ‘भवचाप’ । केवल शिवधनुष नहीं है। संत-व्याख्याओं में इसे संसार के अहंकार, संशय और असंभव प्रतीत होने वाली बाधाओं का प्रतीक भी माना गया है। श्रीराम का धनुष तोड़ना केवल बल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा की विजय का उद्घोष है।
तुलसीदासजी ने इस पूरे प्रसंग को अत्यन्त मानवीय संवेदनाओं के साथ लिखा है। सभा में उत्सुकता है, जनक के मन में चिंता है, लक्ष्मण के भीतर तेज है


