Ramcharitmanas Katha Hindi: गरुड़ का मोह और काकभुशुण्डि का सत्संग, रामचरितमानस का दिव्य प्रसंग

Ramcharitmanas Katha Hindi: रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड का यह दिव्य प्रसंग बताता है कि गरुड़जी का मोह और संशय काकभुशुण्डि जी के सत्संग तथा रामकथा श्रवण से कैसे दूर हुआ।

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Published on: 7 Jun 2026 12:44 PM IST
Ramcharitmanas Katha Garud aur Kakbhushundi Ki Kahani
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Ramcharitmanas Katha Garud aur Kakbhushundi Ki Kahani 

“गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा।

मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।

देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ।

माया मोह सोच सब गयऊ।।”

(रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड 62/1)

रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड का यह अत्यन्त सुंदर प्रसंग है। इसमें बताया गया है कि काकभुशुण्डि जी नीलगिरि पर्वत पर निवास करते हैं और निरंतर श्रीरामकथा का गान करते रहते हैं। तुलसीदासजी लिखते हैं कि जब गरुड़जी वहाँ पहुँचे और उस पर्वत के दर्शन किए, तभी उनका मन प्रसन्न हो उठा। संतों के निवास-स्थान का प्रभाव ही ऐसा होता है कि वहाँ पहुँचते ही मन की व्याकुलता कम होने लगती है।

इसके बाद जब गरुड़जी को काकभुशुण्डि जी का सत्संग प्राप्त हुआ, तब उनके भीतर का माया, मोह और चिंता पूरी तरह समाप्त हो गई। यही कारण है कि मानस में कहा गया—

“माया मोह सोच सब गयऊ।”

यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक संकेत है। जब जीव भ्रम, संशय और मानसिक अशांति में घिर जाता है, तब सत्संग और भगवान की कथा ही उसके भीतर स्थिरता और शांति लाती है।

“मति अकुंठ हरि भगति अखंडा” का अर्थ है— ऐसी निर्मल बुद्धि, जो किसी संदेह या संकीर्णता से रहित होकर अखंड रूप से भगवान की भक्ति में स्थित हो जाए।

रामचरितमानस का यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य होने पर भी मनुष्य मोह में पड़ सकता है। गरुड़जी स्वयं भगवान विष्णु के वाहन हैं, फिर भी उन्हें सत्संग की आवश्यकता पड़ी। इसलिए संतों का संग, भगवान का स्मरण और कथा-श्रवण जीवन में अत्यन्त आवश्यक माना गया है।

(साभार— रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड एवं पारंपरिक मानस-टीका परंपरा)

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