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Ramcharitmanas Katha Hindi: महाराज दशरथ का सत्य प्रेम और राम-विरह
Ramcharitmanas Katha Hindi: महाराज दशरथ और श्रीराम के सत्य प्रेम की कथा, जिसमें राम-विरह को सहन न कर पाने वाले दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। जानिए तुलसीदास जी द्वारा वर्णित निष्कपट प्रेम और विरह का भाव।
Ramcharitmanas Katha Ram Father Raza Dashrath Ki Kahani
वंदौ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल प्रियतनु तृन इव परिहरेउ।। १/१६
मैं अयोध्या के महाराज दशरथ की वंदना करता हूँ, जिनका श्रीरामजी के चरणों में सत्य एवं निष्कपट प्रेम था। जिन्होंने दीनदयाल श्रीराम के वियोग होते ही अपने प्रिय शरीर को तिनके के समान त्याग दिया।
सच्चा प्रेम उसी का कहलाता है, जो अपने प्रेमपात्र का विरह सहन न कर सके। महाराज दशरथ का प्रेम ऐसा ही निष्कलुष और प्राणमय था। राम-वियोग में वे जीवित न रह सके। इसी कारण उनके सामने अन्य सभी का प्रेम कुछ कच्चा और अपूर्ण-सा प्रतीत होता है, क्योंकि सब लोग प्रेम तो करते रहे, परन्तु विरह में शरीर त्यागने का सामर्थ्य किसी में न हुआ।
स्वयं माता कौशल्या कहती हैं—
“अस विचारि नहीं करउ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।”
अर्थात् मैं यह सोचकर हठपूर्वक अपने प्रेम को नहीं बढ़ाती, क्योंकि यदि मेरा प्रेम सत्य होता, तो मैं भी राम-वियोग में जीवित न रहती। अतः मेरा स्नेह अभी अपूर्ण है।
भरतजी भी कहते हैं—
“संकर साखि रहउ एहि धाए।”
अर्थात् हे शंकरजी! आप साक्षी हैं, मैं केवल श्रीराम के लिए ही जीवित हूँ।
सुमंत्रजी भी कहते हैं—
“रहिहि न अंतहु अधम सरीरू। जस न लहइ विछुरत रघुबीरू।। ”
अर्थात् यदि रघुबीर के वियोग में भी यह अधम शरीर नष्ट नहीं होता, तो इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा?
सुमंत्रजी तो केवल छह दिन श्रीराम को वन पहुँचाने और लौटने में लगे थे, किन्तु महाराज दशरथ को वह समय भी असह्य और अनन्त प्रतीत हुआ। वे तो केवल इस आशा में शरीर धारण किए थे कि शायद श्रीराम लौट आएँगे।
इसी भाव से वे कहते हैं—
“हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। ”
हे रघुनन्दन! हे प्राणप्रिय राम! तुम्हारे बिना जीवित रहते हुए बहुत दिन बीत गए।
इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं—
“प्रियतनु तृन इव परिहरेउ।”
अर्थात् महाराज दशरथ ने अपने प्रिय शरीर को ऐसे त्याग दिया, जैसे कोई मनुष्य बिना ममता के तिनके को तोड़कर फेंक देता है। उन्हें शरीर से कोई मोह नहीं रहा; श्रीराम-वियोग ने सब आसक्ति समाप्त कर दी।
सत्य प्रेम में महाराज दशरथ का कोई साथी नहीं दिखाई देता। माताओं में भी कोई ऐसा नहीं हुआ, जिसने राम-वियोग में प्राण त्याग दिए हों। इसी कारण गोस्वामी तुलसीदास जी ने उनकी अकेले ही विशेष वंदना की है।


