Ramcharitmanas Katha: हृदय में स्थित प्रभु फिर भी जीव दुःखी क्यों है?

Ramcharitmanas: क्या भगवान हर जीव के हृदय में निवास करते हैं, फिर भी मनुष्य दुःखी क्यों है? जानिए रामचरितमानस की चौपाई के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी का गहन आध्यात्मिक उत्तर और नाम-स्मरण का महत्व।

Newstrack Network
Published on: 11 Jun 2026 4:51 PM IST
Ramcharitmanas Ki Katha Padhe
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Ramcharitmanas Ki Katha Padhe 

अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।

सकल जीव जग दीन दुखारी।।

नाम निरूपन नाम जतन ते।

सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन ते।।

(बालकाण्ड, दोहा 23, चौपाई 4)

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परमात्मा अविनाशी, निर्विकार और सच्चिदानंद स्वरूप हैं। वे प्रत्येक जीव के हृदय में विराजमान हैं, फिर भी संसार के अधिकांश जीव दीनता, मोह, भय और दुःख से घिरे हुए दिखाई देते हैं।

यह एक गहन आध्यात्मिक प्रश्न है। यदि भगवान सबके भीतर विद्यमान हैं, तो फिर जीव अशांत और दुःखी क्यों है?

तुलसीदास जी इसका उत्तर अगले चरण में देते हैं—

नाम निरूपन नाम जतन ते।

सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन ते।।

अर्थात् भगवान के नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा और प्रभाव को समझकर जब श्रद्धा, प्रेम और नियमित साधना के साथ नाम-स्मरण किया जाता है, तब वही परमात्मा साधक के अनुभव में प्रकट होने लगते हैं।

तुलसीदास जी यहाँ एक अत्यंत सुंदर उपमा देते हैं। जैसे किसी व्यक्ति के पास बहुमूल्य रत्न हो, पर वह उसके मूल्य से अनभिज्ञ हो, तो उसे उस रत्न का वास्तविक लाभ नहीं मिल सकता। किंतु जब उसे रत्न का महत्व ज्ञात हो जाता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है। उसी प्रकार भगवान सर्वत्र और सर्वदा उपस्थित हैं, परंतु अज्ञान के कारण जीव उनके सान्निध्य का अनुभव नहीं कर पाता।

मानस में ही कहा गया है—

सेवक सदन स्वामी आगमनू।

मंगल मूल अमंगल दमनू।।

स्वामी के घर आने से मंगल होता है और अमंगल का नाश होता है। किंतु यहाँ अंतर यह है कि भगवान बाहर से आने वाले अतिथि नहीं हैं; वे तो पहले से ही हृदय में स्थित हैं। समस्या उनकी अनुपस्थिति नहीं, बल्कि हमारी विस्मृति है।

जीव संसार के आकर्षणों, अहंकार, कामना और अज्ञान में इतना उलझ जाता है कि अपने ही अंतःकरण में विराजमान प्रभु को पहचान नहीं पाता। इसलिए तुलसीदास जी नाम-स्मरण को जागरण का साधन बताते हैं।

भक्ति परंपरा का निष्कर्ष है कि जब श्रद्धा, विश्वास और प्रेम के साथ भगवान का भजन किया जाता है, तब धीरे-धीरे हृदय का आवरण हटता है और साधक को अपने भीतर स्थित दिव्य सत्ता का अनुभव होने लगता है।

अतः इस चौपाई का संदेश यह है कि भगवान की प्राप्ति किसी दूर स्थान की यात्रा नहीं, बल्कि अंतर्मन की जागृति है। परमात्मा को बाहर से बुलाना नहीं पड़ता; उन्हें पहचानना पड़ता है।

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