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RO का पानी ही सबसे बेहतर है? पीने के पानी से जुड़े 10 सवालों के जवाब जानिए
RO vs Boiled Water: आपके घर में आने वाला पानी कितना सुरक्षित है? आरओ, उबालने और सामान्य फिल्टर में क्या अंतर है, कौन-सा पानी पीना स्वास्थ्य के लिए बेहतर है?
RO vs Boiled Water Safe to Drink Information in Hindi | Newstrack Hindi News
RO vs Boiled Water: हम रोज पानी पीते हैं, उससे खाना बनाते हैं और बच्चों को पिलाते हैं। लेकिन क्या कभी यह जानने की कोशिश करते हैं कि नल से आने वाला पानी वास्तव में कितना सुरक्षित है? पानी बिल्कुल साफ दिखाई दे सकता है, उसमें कोई गंध नहीं हो सकती और उसका स्वाद भी सामान्य लग सकता है, फिर भी उसमें बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव या ऐसे रासायनिक पदार्थ मौजूद हो सकते हैं जिन्हें हमारी आँखें नहीं देख सकतीं। दूसरी ओर, ऐसा पानी जिसमें कुछ प्राकृतिक खनिज मौजूद हैं, उसे केवल इसलिए असुरक्षित नहीं कहा जा सकता कि उसमें घुले हुए पदार्थों की मात्रा अधिक है। यही कारण है कि पानी की सुरक्षा का निर्णय केवल उसके रंग, स्वाद, गंध या टीडीएस मीटर की रीडिंग से नहीं किया जा सकता।
आज भारतीय घरों में पानी साफ करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं। कुछ परिवार पानी उबालकर पीते हैं, कुछ साधारण फिल्टर इस्तेमाल करते हैं, जबकि अनेक घरों में आरओ मशीन लगी होती है। बाजार में ऐसी मशीनें भी उपलब्ध हैं जिनमें आरओ, यूवी, यूएफ और अन्य तकनीकों को एक साथ जोड़ा गया है। इनके विज्ञापनों में कभी शुद्धता, कभी खनिजों और कभी लगभग पूरी तरह अशुद्धियाँ हटाने का दावा किया जाता है। लेकिन वैज्ञानिक प्रश्न यह है कि क्या हर घर में आरओ आवश्यक है? क्या उबालने से पानी पूरी तरह सुरक्षित हो जाता है? क्या सामान्य फिल्टर रासायनिक प्रदूषण दूर कर सकता है? और यदि किसी घर में पानी पहले से सुरक्षित है, तो उसे अतिरिक्त रूप से साफ करने का वास्तविक लाभ कितना है?
इन सवालों का उत्तर देने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पीने के पानी में खतरे कितने प्रकार के होते हैं। क्योंकि हर प्रकार की अशुद्धि को दूर करने के लिए एक ही तकनीक पर्याप्त नहीं होती।
साफ दिखने वाला पानी भी असुरक्षित क्यों हो सकता है?
पीने के पानी में मौजूद संभावित समस्याओं को मोटे तौर पर तीन वर्गों में समझा जा सकता है। पहला है जैविक प्रदूषण, जिसमें बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी शामिल हो सकते हैं। दूसरा है रासायनिक प्रदूषण, जिसमें आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, सीसा और अन्य पदार्थ शामिल हो सकते हैं। तीसरा है भौतिक प्रदूषण, जिसमें मिट्टी, रेत, जंग और पानी में तैरते दूसरे कण आते हैं।
जैविक प्रदूषण का संबंध अक्सर मलजनित संदूषण से होता है। यदि पानी की आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन में रिसाव है और आसपास दूषित पानी मौजूद है, तो कुछ परिस्थितियों में रोगजनक सूक्ष्मजीव पाइपलाइन में प्रवेश कर सकते हैं। इसी तरह घर की पानी की टंकी लंबे समय तक साफ न की जाए या पानी निकालने वाले बर्तन दूषित हों, तो सुरक्षित स्रोत से आया पानी भी बाद में असुरक्षित हो सकता है।
दूषित पानी के माध्यम से हैजा, टाइफाइड और अनेक प्रकार के दस्त संबंधी संक्रमण फैल सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को होने वाली हर पेट की बीमारी का कारण पीने का पानी नहीं होता। संक्रमण भोजन, हाथों और अन्य माध्यमों से भी फैल सकता है।
रासायनिक प्रदूषण की प्रकृति अलग है। भूजल में कुछ रसायन प्राकृतिक भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण मौजूद हो सकते हैं। कुछ प्रदूषक कृषि, उद्योग, अपशिष्ट या जलापूर्ति व्यवस्था से भी संबंधित हो सकते हैं। ऐसे पदार्थ पानी में घुले होने के कारण सामान्यतः दिखाई नहीं देते। कुछ रसायनों के लंबे समय तक सेवन से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो सकते हैं, भले ही पानी पीने के तुरंत बाद कोई लक्षण दिखाई न दे।
इसलिए पानी की वास्तविक सुरक्षा का निर्धारण उसके स्रोत, आपूर्ति व्यवस्था, भंडारण और उपयुक्त परीक्षणों के आधार पर होना चाहिए।
पानी उबालना कितना प्रभावी है और इससे क्या नहीं हटता?
पानी को उबालना घरेलू स्तर पर रोगजनक सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय करने के सबसे विश्वसनीय तरीकों में से एक है। पर्याप्त तापमान तक गर्म करने से अनेक बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी निष्क्रिय हो जाते हैं। इसीलिए जब किसी क्षेत्र में जलापूर्ति के दूषित होने की आशंका होती है, तो स्वास्थ्य अधिकारी पानी उबालकर पीने की सलाह दे सकते हैं।
अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र, सीडीसी, के अनुसार साफ पानी को अच्छी तरह उबाल आने के बाद एक मिनट तक उबलने देना चाहिए। समुद्र तल से लगभग 2,000 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले स्थानों के लिए तीन मिनट की सलाह दी जाती है। पानी ठंडा होने के बाद उसे साफ, ढके हुए बर्तन में रखना चाहिए। यदि पानी मटमैला है, तो पहले उसे बैठने देना या साफ कपड़े अथवा उपयुक्त फिल्टर से बड़े कण हटाना उपयोगी हो सकता है। 
लेकिन पानी उबालने की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उबालने से आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, सीसा और अधिकांश घुले हुए रासायनिक प्रदूषक नहीं हटते। उबालने के दौरान पानी का कुछ हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है, जबकि अनेक घुले हुए पदार्थ बर्तन में ही रहते हैं। इसलिए कुछ परिस्थितियों में शेष पानी में उनकी सांद्रता बढ़ भी सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी भूजल स्रोत में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उस पानी को उबाल देने से फ्लोराइड की समस्या समाप्त नहीं होगी। इसी प्रकार आर्सेनिक युक्त पानी को उबालना उसका विश्वसनीय उपचार नहीं है। ऐसे मामलों में पानी के रासायनिक परीक्षण और प्रदूषक के अनुसार उपयुक्त शोधन तकनीक की आवश्यकता होती है।
उबालने की एक और सीमा है कि पानी ठंडा होने के बाद दोबारा दूषित हो सकता है। यदि उबला हुआ पानी गंदे बर्तन में रखा जाए या उसमें अस्वच्छ गिलास डुबोया जाए, तो संक्रमण का जोखिम फिर पैदा हो सकता है। उबालने से पानी में कोई ऐसा अवशिष्ट कीटाणुनाशक नहीं रह जाता जो बाद में प्रवेश करने वाले सूक्ष्मजीवों से उसकी रक्षा करे। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस सीमा का उल्लेख किया है। 
इसलिए उबालना मुख्यतः जैविक प्रदूषण के विरुद्ध प्रभावी उपाय है, सभी प्रकार के प्रदूषण का समाधान नहीं।
सामान्य वाटर फिल्टर क्या करता है?
सामान्य भाषा में वाटर फिल्टर एक व्यापक शब्द है। इसके अंतर्गत कई अलग तकनीकें आती हैं। कुछ फिल्टर केवल पानी में मौजूद बड़े कणों को रोकते हैं, जबकि कुछ विशेष प्रकार के रसायनों, गंध या सूक्ष्मजीवों को कम करने के लिए बनाए जाते हैं।
सबसे साधारण फिल्टर में कपड़ा, रेत, सिरेमिक या अन्य छिद्रयुक्त सामग्री हो सकती है। इनसे पानी में मौजूद कुछ ठोस कण हटाए जा सकते हैं। लेकिन प्रत्येक साधारण फिल्टर बैक्टीरिया, वायरस या घुले हुए रसायनों को प्रभावी रूप से नहीं हटाता। उसकी क्षमता उसके छिद्रों के आकार, सामग्री, निर्माण गुणवत्ता और रखरखाव पर निर्भर करती है।
सक्रिय कार्बन वाले फिल्टर कुछ प्रकार के कार्बनिक पदार्थों, स्वाद और गंध को प्रभावित करने वाले यौगिकों तथा क्लोरीन को कम कर सकते हैं। लेकिन सक्रिय कार्बन के सभी फिल्टर समान नहीं होते। सामान्य कार्बन फिल्टर को आर्सेनिक, फ्लोराइड या नाइट्रेट हटाने का विश्वसनीय उपाय नहीं मानना चाहिए, जब तक किसी विशिष्ट उत्पाद के लिए उपयुक्त परीक्षण और प्रमाणन उपलब्ध न हो।
यहाँ एक दिलचस्प बात है। पानी में क्लोरीन की हल्की गंध होने का अर्थ हमेशा यह नहीं कि पानी असुरक्षित है। नगर जलापूर्ति में नियंत्रित मात्रा में क्लोरीन का उपयोग कीटाणुशोधन के लिए किया जाता है। यदि कोई कार्बन फिल्टर अवशिष्ट क्लोरीन हटा देता है, तो पानी का स्वाद बेहतर लग सकता है, लेकिन उसके बाद भंडारण में दोबारा सूक्ष्मजीवी प्रदूषण से बचाव का महत्व बढ़ जाता है।
यूएफ फिल्टर और यूवी प्यूरीफायर में क्या अंतर है?
यूएफ अर्थात अल्ट्राफिल्ट्रेशन एक झिल्ली आधारित तकनीक है। इसमें पानी को बहुत छोटे छिद्रों वाली झिल्ली से गुजारा जाता है। उपयुक्त यूएफ झिल्ली अनेक बैक्टीरिया, परजीवियों और सूक्ष्म कणों को रोक सकती है। लेकिन सभी वायरस को विश्वसनीय रूप से रोकना प्रत्येक यूएफ प्रणाली की क्षमता नहीं होती। यह झिल्ली की वास्तविक विशेषताओं और प्रणाली के प्रदर्शन पर निर्भर करता है। सामान्य यूएफ प्रणाली घुले हुए लवणों को आरओ की तरह नहीं हटाती।
यूवी अर्थात पराबैंगनी कीटाणुशोधन का सिद्धांत अलग है। इसमें उपयुक्त तरंगदैर्ध्य और पर्याप्त मात्रा की पराबैंगनी ऊर्जा से सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय किया जाता है। इससे वे संक्रमण फैलाने की क्षमता खो सकते हैं। लेकिन यूवी प्रणाली पानी से मृत या निष्क्रिय सूक्ष्मजीवों को भौतिक रूप से बाहर नहीं निकालती और सामान्यतः घुले हुए रसायनों को भी नहीं हटाती।
यूवी का प्रदर्शन पानी की पारदर्शिता, प्रकाश की मात्रा, उपकरण की स्थिति और रखरखाव पर निर्भर करता है। यदि पानी अत्यधिक मटमैला है, तो उसमें मौजूद कण सूक्ष्मजीवों को पराबैंगनी प्रकाश से बचा सकते हैं। इसलिए यूवी उपकरण में पानी की गुणवत्ता और निर्धारित रखरखाव महत्वपूर्ण हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन घरेलू जलशोधन तकनीकों का मूल्यांकन उनके वास्तविक सूक्ष्मजीवी प्रदर्शन के आधार पर करने पर जोर देता है। केवल किसी तकनीक का नाम देखकर यह मान लेना कि वह सभी रोगजनकों से समान सुरक्षा देगी, उचित नहीं है। 
आरओ तकनीक वास्तव में कैसे काम करती है?
आरओ का पूरा नाम रिवर्स ऑस्मोसिस, अर्थात विपरीत परासरण है। इसका मूल सिद्धांत एक विशेष अर्धपारगम्य झिल्ली और दबाव पर आधारित है। सामान्य परासरण में पानी उपयुक्त परिस्थितियों में कम घुले पदार्थों वाले हिस्से से अधिक घुले पदार्थों वाले हिस्से की ओर जाता है। आरओ में दबाव की सहायता से इस प्रवाह की दिशा को उलट दिया जाता है।
आरओ मशीन पानी को एक विशेष झिल्ली से गुजारती है। यह झिल्ली अनेक घुले हुए लवणों और अन्य प्रदूषकों को काफी हद तक रोक सकती है। परिणामस्वरूप एक ओर अपेक्षाकृत कम घुले पदार्थों वाला शुद्ध किया गया पानी मिलता है और दूसरी ओर अधिक सांद्रता वाला पानी निकलता है, जिसे प्रायः रिजेक्ट वाटर कहा जाता है।
आरओ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह उन पदार्थों को भी कम कर सकता है जिन्हें साधारण कण फिल्टर या उबालने से नहीं हटाया जा सकता। उपयुक्त और सही ढंग से संचालित आरओ प्रणालियाँ कई घुले हुए लवणों तथा कुछ हानिकारक रसायनों की मात्रा घटा सकती हैं। सीडीसी के अनुसार आरओ प्रणालियाँ सीसा, ताँबा और कुछ अन्य रसायनों को कम कर सकती हैं। आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट जैसे प्रदूषकों के मामले में वास्तविक क्षमता उत्पाद, झिल्ली, पानी की संरचना और संचालन की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए संबंधित प्रदूषक को हटाने के प्रमाणित दावे की जाँच आवश्यक है। 
लेकिन आरओ का अर्थ यह नहीं कि मशीन से निकला पानी हर परिस्थिति में पूर्णतः सुरक्षित होगा। यदि झिल्ली खराब है, उपकरण की सील में समस्या है या शुद्ध पानी रखने की टंकी दूषित है, तो अंतिम पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए आरओ के साथ रखरखाव और समय-समय पर पानी का परीक्षण भी आवश्यक है।
क्या हर घर में आरओ लगाना जरूरी है?
नहीं। प्रत्येक घर में आरओ की आवश्यकता नहीं होती। आरओ की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि घर में आने वाले पानी में कौन-सी समस्या है।
यदि किसी घर में ऐसी नगर जलापूर्ति आती है जिसका पानी नियमित परीक्षण में सूक्ष्मजीवी और रासायनिक दृष्टि से सुरक्षित पाया गया है, तो केवल अधिक शुद्ध पानी पाने की इच्छा से आरओ लगाना अनिवार्य नहीं है। ऐसे पानी में यदि पाइपलाइन या घरेलू भंडारण के कारण जैविक प्रदूषण का जोखिम है, तो उस जोखिम के अनुसार उपयुक्त कीटाणुशोधन या अन्य व्यवस्था अधिक प्रासंगिक हो सकती है।
इसके विपरीत यदि घर में बोरवेल का पानी आता है और परीक्षण में घुले हुए लवण या ऐसे रासायनिक प्रदूषक अधिक पाए गए हैं जिन्हें आरओ प्रभावी रूप से कम कर सकता है, तो उपयुक्त आरओ प्रणाली उपयोगी हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरओ खरीदने का निर्णय पानी की वास्तविक गुणवत्ता के आधार पर होना चाहिए, केवल विज्ञापन, स्वाद या टीडीएस मीटर के अंक के आधार पर नहीं।
टीडीएस क्या है और क्या कम टीडीएस वाला पानी हमेशा बेहतर होता है?
टीडीएस का अर्थ है पानी में कुल घुले हुए ठोस पदार्थ। इनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम और अन्य घुले हुए पदार्थ शामिल हो सकते हैं। टीडीएस को सामान्यतः मिलीग्राम प्रति लीटर में व्यक्त किया जाता है।
भारतीय मानक ब्यूरो के पेयजल मानक आईएस 10500:2012 में, उसके संबंधित संशोधनों सहित, टीडीएस की स्वीकार्य सीमा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर तथा वैकल्पिक स्रोत के अभाव में अनुमेय सीमा 2,000 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित की गई है। लेकिन इस दूसरी सीमा को यह प्रमाण नहीं समझना चाहिए कि 2,000 टीडीएस वाला हर पानी सभी दृष्टियों से सुरक्षित है। अन्य रासायनिक और सूक्ष्मजीवी मानकों को भी पूरा करना आवश्यक है। 
टीडीएस की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह पानी में घुले पदार्थों की कुल मात्रा बताता है, उनकी पहचान नहीं। उदाहरण के लिए, दो पानी के नमूनों का टीडीएस समान हो सकता है, लेकिन एक में मुख्यतः कैल्शियम और मैग्नीशियम हों, जबकि दूसरे में किसी अवांछनीय पदार्थ की अधिक मात्रा मौजूद हो। दोनों की स्वास्थ्य संबंधी उपयोगिता समान नहीं होगी।
इसी प्रकार बहुत कम टीडीएस वाला पानी भी सूक्ष्मजीवों से दूषित हो सकता है। टीडीएस मीटर बैक्टीरिया, वायरस या परजीवियों की जाँच नहीं करता। सामान्य घरेलू टीडीएस मीटर विद्युत चालकता के आधार पर अनुमान देता है। वह किसी विशिष्ट जहरीले पदार्थ की पहचान नहीं कर सकता।
इसलिए केवल 50, 100 या 200 टीडीएस देखकर पानी को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना वैज्ञानिक रूप से गलत है।
क्या आरओ पानी के जरूरी खनिज भी हटा देता है?
हाँ। आरओ झिल्ली केवल हानिकारक पदार्थों और उपयोगी खनिजों के बीच मनुष्य की जरूरत के अनुसार चयन नहीं करती। वह अनेक प्रकार के घुले हुए आयनों को कम करती है। इनमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिज भी शामिल हो सकते हैं।
लेकिन इससे तुरंत यह निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा कि आरओ का पानी पीने से हर व्यक्ति में खनिजों की कमी हो जाएगी। शरीर को कैल्शियम, मैग्नीशियम और अन्य आवश्यक खनिज भोजन तथा पानी दोनों से मिल सकते हैं। अलग-अलग लोगों के आहार और पेयजल से मिलने वाले खनिजों का योगदान अलग होता है।
यदि किसी क्षेत्र का पानी पहले से रासायनिक रूप से सुरक्षित है, तो केवल टीडीएस अत्यंत कम करने के लिए आरओ का उपयोग करने का लाभ स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर यदि पानी में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायन निर्धारित सीमा से अधिक हैं, तो उन्हें कम करना प्राथमिकता होगी।
कुछ आरओ मशीनों में बाद में खनिज जोड़ने या पानी का स्वाद समायोजित करने की व्यवस्था होती है। लेकिन केवल 'मिनरल' या 'अल्कलाइन' लिखा होने से कोई उत्पाद स्वतः अधिक स्वास्थ्यवर्धक सिद्ध नहीं हो जाता। उसकी वास्तविक संरचना और गुणवत्ता की जाँच आवश्यक है।
क्या बहुत कम टीडीएस वाला पानी शरीर से खनिज खींच लेता है?
यह दावा अक्सर विज्ञापनों और सोशल मीडिया पर दिखाई देता है कि बहुत कम टीडीएस वाला पानी पीते ही शरीर की हड्डियों और कोशिकाओं से खनिज खींचने लगता है। इस प्रकार की सीधी व्याख्या वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
मानव शरीर में पानी और खनिजों का संतुलन गुर्दों, हार्मोन तथा अनेक जैविक प्रक्रियाओं द्वारा नियंत्रित होता है। पानी में खनिजों की मात्रा पोषण के कुल संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन केवल कम टीडीएस के आधार पर यह कहना कि पानी शरीर से खनिज चूस लेगा, अतिरंजना है।
दूसरी ओर यह भी सही नहीं कि पानी में जितने कम घुले पदार्थ हों, वह उतना ही अधिक स्वास्थ्यवर्धक होगा। पेयजल की गुणवत्ता का आकलन स्वास्थ्य संबंधी मानकों, प्रदूषकों की वास्तविक मात्रा और संपूर्ण पोषण संबंधी परिस्थितियों के आधार पर करना चाहिए।
आरओ मशीन कितना पानी बर्बाद करती है?
आरओ तकनीक की एक महत्वपूर्ण सीमा यह है कि वह शुद्ध पानी के साथ एक अधिक सांद्रता वाली अपशिष्ट जलधारा भी उत्पन्न करती है। घरेलू आरओ प्रणालियों में शुद्ध पानी और रिजेक्ट पानी का अनुपात मशीन के डिजाइन, पानी के दबाव, झिल्ली, स्रोत के पानी की गुणवत्ता तथा रखरखाव पर निर्भर करता है।
कुछ प्रणालियों में एक लीटर शुद्ध पानी बनाने के लिए कई लीटर पानी रिजेक्ट हो सकता है, जबकि बेहतर दक्षता वाली प्रणालियों में यह मात्रा कम हो सकती है। इसलिए किसी भी आरओ मशीन के लिए एक ही सार्वभौमिक अनुपात बताना सही नहीं होगा।
यदि किसी क्षेत्र में पानी की कमी है, तो अनावश्यक आरओ उपयोग जल संरक्षण के दृष्टिकोण से भी प्रश्न खड़े करता है। कुछ परिस्थितियों में रिजेक्ट पानी का उपयोग फर्श की सफाई या अन्य गैर-पेय कार्यों में किया जा सकता है, लेकिन उसकी रासायनिक संरचना जाने बिना उसे पौधों, पालतू जानवरों या किसी विशेष घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित नहीं मानना चाहिए। अधिक लवणयुक्त पानी मिट्टी और पौधों को नुकसान पहुँचा सकता है।
इसलिए आरओ खरीदते समय केवल मशीन की कीमत नहीं, बल्कि पानी की खपत और संचालन की वास्तविक लागत भी देखनी चाहिए।
आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट के मामले में कौन-सा तरीका बेहतर है?
ये तीनों प्रदूषक अलग-अलग स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते हैं और इनके लिए शोधन तकनीक का चुनाव सावधानी से करना चाहिए।
आर्सेनिक कुछ भूजल स्रोतों में प्राकृतिक रूप से मौजूद हो सकता है। लंबे समय तक अधिक आर्सेनिक वाला पानी पीने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। भारतीय पेयजल मानक में आर्सेनिक की स्वीकार्य सीमा 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर है और संबंधित मानक में वैकल्पिक स्रोत के अभाव की एक अलग अनुमेय सीमा का भी प्रावधान रहा है। लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से कम जोखिम वाला स्रोत चुनना महत्वपूर्ण है। आर्सेनिक हटाने के लिए विशेष शोधन तकनीकें उपलब्ध हैं। आरओ कुछ परिस्थितियों में प्रभावी हो सकता है, लेकिन परिणाम आर्सेनिक के रासायनिक रूप और प्रणाली पर निर्भर करता है।
फ्लोराइड की कम मात्रा दाँतों के स्वास्थ्य से संबंधित हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक अधिक फ्लोराइड के सेवन से दंत और अस्थि फ्लोरोसिस का जोखिम पैदा हो सकता है। भारतीय मानक में फ्लोराइड की स्वीकार्य सीमा 1.0 मिलीग्राम प्रति लीटर तथा अनुमेय सीमा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर है। फ्लोराइड की अधिकता के लिए आरओ सहित कुछ विशेष तकनीकें उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उनकी क्षमता का सत्यापन आवश्यक है।
नाइट्रेट की अधिकता विशेष रूप से शिशुओं के लिए चिंता का विषय हो सकती है। भारतीय मानक में नाइट्रेट की अधिकतम सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर है और इसमें सामान्यतः छूट का प्रावधान नहीं है। उबालना नाइट्रेट नहीं हटाता। उपयुक्त आरओ या अन्य विशेष शोधन प्रणालियाँ इसकी मात्रा कम कर सकती हैं, लेकिन वास्तविक प्रभावशीलता की जाँच जरूरी है। 
इन तीनों मामलों में सबसे सुरक्षित निर्णय प्रयोगशाला परीक्षण के आधार पर होना चाहिए। केवल यह जानना कि किसी इलाके में भूजल की समस्या है, पर्याप्त नहीं है। उसी इलाके के अलग-अलग जलस्रोतों में प्रदूषकों की मात्रा भिन्न हो सकती है।
घर में आने वाले पानी की जाँच कैसे कराएँ?
पानी की गुणवत्ता जानने के लिए सबसे पहले उसके स्रोत की पहचान करनी चाहिए। क्या पानी नगर निगम की पाइपलाइन से आता है, बोरवेल से आता है, टैंकर से मँगाया जाता है या किसी सामुदायिक जलापूर्ति प्रणाली से मिलता है? प्रत्येक स्रोत के जोखिम अलग हो सकते हैं।
यदि घर में नगर जलापूर्ति आती है, तो संबंधित जलापूर्ति संस्था से पानी की गुणवत्ता संबंधी जानकारी माँगी जा सकती है। यदि घर में बोरवेल का पानी उपयोग होता है, तो उसकी रासायनिक जाँच विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। टैंकर के पानी के मामले में स्रोत, परिवहन और भंडारण तीनों का महत्व है।
पानी की जाँच ऐसी प्रयोगशाला से करानी चाहिए जो आवश्यक परीक्षणों के लिए उपयुक्त रूप से मान्यता प्राप्त या अधिकृत हो। परीक्षण का चयन पानी के स्रोत और स्थानीय जोखिम के अनुसार किया जाना चाहिए। सामान्यतः सूक्ष्मजीवी परीक्षण में ई. कोलाई जैसे मलजनित प्रदूषण के संकेतकों की जाँच महत्वपूर्ण होती है। रासायनिक परीक्षण में पीएच, टीडीएस, कठोरता, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक और अन्य प्रासंगिक पदार्थों की जाँच की जा सकती है।
हर घर को हर बार सभी संभावित रसायनों की जाँच कराने की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन केवल टीडीएस मापकर पानी को सुरक्षित घोषित करना भी पर्याप्त नहीं है। विशेष रूप से जब पानी के स्रोत में बदलाव हुआ हो, बाढ़ या सीवर रिसाव की आशंका हो, पाइपलाइन की मरम्मत हुई हो या पानी के रंग और गंध में अचानक परिवर्तन आया हो, तब उपयुक्त जाँच महत्वपूर्ण हो सकती है।
नमूना एकत्र करने की प्रक्रिया भी सही होनी चाहिए। सूक्ष्मजीवी परीक्षण के लिए सामान्य घरेलू बोतल में पानी भरकर कई दिन बाद प्रयोगशाला पहुँचाना विश्वसनीय तरीका नहीं है। प्रयोगशाला से उपयुक्त पात्र, नमूना लेने की विधि और समय सीमा की जानकारी लेनी चाहिए।
घर की पानी की टंकी और पाइपलाइन कितनी महत्वपूर्ण हैं?
कई बार समस्या पानी के मूल स्रोत में नहीं, बल्कि घर तक पहुँचने और उसके भंडारण की व्यवस्था में होती है। यदि नगर जलापूर्ति का पानी निर्धारित मानकों के अनुसार सुरक्षित है, लेकिन घर की टंकी दूषित है, तो अंतिम नल तक पहुँचने वाले पानी की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
टंकी का ढक्कन ठीक से बंद न होना, उसमें धूल या कीड़े प्रवेश करना, लंबे समय तक सफाई न होना या पाइपलाइन में रिसाव होना जोखिम बढ़ा सकता है। इसी प्रकार किसी फिल्टर की टंकी और पाइपों में लंबे समय तक पानी जमा रहने तथा रखरखाव ठीक न होने से भी समस्या पैदा हो सकती है।
इसलिए केवल महँगा आरओ खरीद लेना सुरक्षित पेयजल की गारंटी नहीं है। सुरक्षित स्रोत, ठीक जलापूर्ति व्यवस्था, साफ भंडारण और उपयुक्त शोधन, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं।
क्या पानी को बार-बार उबालना हानिकारक है?
सामान्यतः पानी को दोबारा उबालने मात्र से वह जहरीला नहीं बन जाता। इंटरनेट पर यह दावा मिलता है कि पानी को दूसरी या तीसरी बार उबालने से उसमें अचानक खतरनाक रसायन बन जाते हैं। इस प्रकार का सामान्य दावा वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
लेकिन यदि पानी में पहले से ऐसे घुले पदार्थ मौजूद हैं जो भाप के साथ नहीं निकलते, तो बार-बार उबालने और पानी की मात्रा कम होने से उनकी सांद्रता बढ़ सकती है। इसलिए रासायनिक रूप से दूषित पानी को बार-बार उबालना उसकी समस्या का समाधान नहीं है।
दूसरी ओर यदि पानी रासायनिक रूप से सुरक्षित है और उसे केवल रोगजनक सूक्ष्मजीवों से सुरक्षा के लिए उबाला गया है, तो दोबारा गर्म करने को अपने आप स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं कहा जा सकता। फिर भी अनावश्यक बार-बार उबालना ऊर्जा की बर्बादी हो सकती है।
बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए कौन-सा पानी बेहतर है?
इन समूहों के लिए भी मूल सिद्धांत समान है कि पानी सूक्ष्मजीवी और रासायनिक दोनों दृष्टियों से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन कुछ जोखिम विशेष महत्व रखते हैं। उदाहरण के लिए, शिशुओं के लिए अधिक नाइट्रेट वाला पानी गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। छोटे बच्चों के लिए सीसा जैसे प्रदूषकों का संपर्क भी विशेष चिंता का विषय है।
बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों में कुछ जलजनित संक्रमण अधिक गंभीर हो सकते हैं। इसलिए ऐसे घरों में जलस्रोत की विश्वसनीयता, शोधन प्रणाली का सही रखरखाव और स्वच्छ भंडारण विशेष महत्व रखते हैं।
शिशुओं के लिए दूध का घोल तैयार करते समय केवल पानी की रासायनिक गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि शिशु आहार तैयार करने के सुरक्षित तरीके भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए किसी विशेष स्वास्थ्य परिस्थिति में चिकित्सकीय सलाह और स्थानीय जल गुणवत्ता संबंधी जानकारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।
आरओ, उबालना या फिल्टर: आखिर किसे चुनें?
यदि पानी में मुख्य समस्या रोगजनक सूक्ष्मजीवों की है और रासायनिक गुणवत्ता सुरक्षित है, तो उचित उबालना प्रभावी घरेलू उपाय हो सकता है। कुछ परिस्थितियों में प्रमाणित यूवी या अन्य उपयुक्त कीटाणुशोधन प्रणाली भी उपयोगी हो सकती है।
यदि पानी में मिट्टी, रेत या जंग जैसे कण हैं, तो उपयुक्त कण फिल्टर आवश्यक हो सकता है। लेकिन यदि इसके साथ जैविक प्रदूषण भी है, तो केवल साधारण फिल्टर पर्याप्त नहीं होगा।
यदि पानी में अधिक घुले हुए लवण या ऐसे रासायनिक प्रदूषक मौजूद हैं जिन्हें आरओ प्रभावी रूप से कम कर सकता है, तो सही क्षमता और उपयुक्त प्रमाणन वाली आरओ प्रणाली उपयोगी हो सकती है। लेकिन प्रत्येक प्रदूषक के लिए मशीन की वास्तविक क्षमता देखनी चाहिए।
यदि पानी पहले से भारतीय पेयजल मानकों के अनुरूप है और घर की पाइपलाइन तथा भंडारण व्यवस्था भी सुरक्षित है, तो अतिरिक्त आरओ लगाना आवश्यक नहीं हो सकता।
इसलिए सबसे उचित प्रश्न यह नहीं है कि बाजार में सबसे महँगा या सबसे आधुनिक प्यूरीफायर कौन-सा है। सही प्रश्न है कि मेरे घर के पानी में कौन-सी समस्या है और उसे दूर करने के लिए कौन-सी तकनीक वास्तव में आवश्यक है?
सुरक्षित पानी का मतलब सबसे कम टीडीएस नहीं, सही गुणवत्ता है
घर में आने वाले पानी की सुरक्षा का निर्णय उसकी पारदर्शिता, स्वाद, गंध या किसी मशीन के विज्ञापन से नहीं किया जा सकता। पानी में रोगजनक सूक्ष्मजीव, घुले हुए रसायन और भौतिक अशुद्धियाँ अलग-अलग प्रकार की समस्याएँ पैदा करते हैं। उबालना सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय करने में प्रभावी है, लेकिन घुले हुए हानिकारक रसायन नहीं हटाता। साधारण फिल्टर कुछ कणों और विशेष प्रकार के पदार्थों को कम कर सकते हैं, लेकिन उनकी क्षमता सीमित होती है। आरओ अनेक घुले हुए पदार्थों को कम कर सकता है, लेकिन उसकी आवश्यकता हर घर में नहीं होती और उसके साथ पानी की खपत तथा रखरखाव की चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं।
सुरक्षित पेयजल का सबसे विश्वसनीय रास्ता है, स्रोत की जानकारी, उपयुक्त परीक्षण, समस्या के अनुसार शोधन और स्वच्छ भंडारण। यदि पानी पहले से सुरक्षित है, तो उसे केवल अत्यंत कम टीडीएस वाला बनाने के लिए महँगी मशीन लगाना आवश्यक नहीं है। यदि पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड या नाइट्रेट जैसे प्रदूषक अधिक हैं, तो केवल उबालने से समस्या समाप्त नहीं होगी।
सबसे शुद्ध दिखने वाला पानी हमेशा सबसे सुरक्षित नहीं होता और सबसे कम टीडीएस वाला पानी हमेशा सबसे बेहतर नहीं होता। अच्छा पेयजल वह है जिसमें बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव और हानिकारक रसायन सुरक्षित सीमाओं के भीतर हों तथा जो घर में पीने तक दोबारा दूषित न हो।


