TRENDING TAGS :
RO Water Purifier Explained: सावधान फिल्टर के पानी से! जान लें वाटर प्यूरीफायर के फायदे और नुकसान?
RO वाटर प्यूरीफायर पानी से क्या हटाता है और क्या नहीं? जानें RO के फायदे, नुकसान, TDS, जरूरी मिनरल्स और पानी की बर्बादी से जुड़ी अहम बातें।
RO Water Purifier Benefits| RO Water Purifier Disadvantages | Health Newstrack Hindi
RO Water Purifier Explained: आज भारत के लाखों घरों की रसोई में लगा आरओ (RO) प्यूरीफायर जिस तकनीक पर चलता है, उसके पीछे एक दक्षिण भारतीय वैज्ञानिक का हाथ है। श्रीनिवासा सौरिराजन ने 1950 के दशक के आख़िर में अमेरिका की UCLA यूनिवर्सिटी में सिडनी लोएब के साथ मिलकर पहली व्यावहारिक RO झिल्ली (मेम्ब्रेन) बनाई। इससे पहले यह प्रक्रिया सिर्फ़ प्रयोगशाला की जिज्ञासा थी, क्योंकि पानी इतना धीरे निकलता था कि किसी काम का नहीं था। उनकी बनाई झिल्ली ने समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने का रास्ता खोल दिया।
वैसे, इसकी बुनियाद कहीं पुरानी है। 1748 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक ज्यां-एंटोन नोले ने देखा कि सूअर के मूत्राशय की झिल्ली से पानी एक दिशा में ज़्यादा आसानी से गुज़रता है। यही परासरण (ऑस्मोसिस) की खोज थी। RO यानी रिवर्स ऑस्मोसिस इसी प्राकृतिक प्रक्रिया को उलट देता है।
यह काम कैसे करता है?
सामान्य ऑस्मोसिस में पानी कम घुलित पदार्थ वाली तरफ़ से ज़्यादा घुलित पदार्थ वाली तरफ़ जाता है। मान लीजिए एक झिल्ली के एक तरफ़ साफ़ पानी है और दूसरी तरफ़ नमकीन। साफ़ पानी अपने आप नमकीन वाली तरफ़ रिसेगा, ताकि दोनों तरफ़ संतुलन बन सके। RO में हम नमकीन तरफ़ पर पंप से भारी दबाव डालकर उल्टा काम करवाते हैं। पानी के अणु झिल्ली पार करके साफ़ तरफ़ चले जाते हैं, और नमक, धातुएँ और बाकी घुली हुई चीज़ें पीछे रह जाती हैं।
यह झिल्ली एक छन्नी जैसी नहीं है, जिसमें दिखने वाले छेद हों। इसके छेद लगभग 0.0001 माइक्रोन के होते हैं, यानी इंसानी बाल की मोटाई से कई लाख गुना बारीक। पानी का अणु बहुत छोटा होता है, इसलिए निकल जाता है, जबकि हाइड्रेटेड आयनों और बड़े अणुओं को निकलने में दिक्कत होती है। घरेलू RO में आमतौर पर पाँच से छह बार का दबाव लगता है, जबकि समुद्र के पानी को साफ़ करने वाले बड़े संयंत्रों में यह 55 से 80 बार तक पहुँचता है। यानी समुद्र की गहराई में लगभग 550 से 800 मीटर नीचे जितना दबाव होता है।
घर के प्यूरीफायर में RO अकेला नहीं होता। पहले सेडिमेंट फ़िल्टर रेत और गाद रोकता है, फिर कार्बन फ़िल्टर क्लोरीन और कुछ गंध वाले रसायनों को सोख लेता है। इसके बाद RO झिल्ली आती है, और अंत में अक्सर UV या UF चरण लगाया जाता है। कार्बन फ़िल्टर का काम सिर्फ़ स्वाद सुधारना नहीं है। नगरपालिका के पानी का क्लोरीन RO झिल्ली को धीरे-धीरे खा जाता है, इसलिए उसे पहले ही हटाना ज़रूरी है।
RO पानी से क्या हटाता है?
RO की असली ताक़त घुली हुई चीज़ों पर है, जिन्हें दूसरे फ़िल्टर नहीं पकड़ पाते। साधारण कपड़े या सिरेमिक फ़िल्टर गंदगी रोक लेते हैं, लेकिन नमक पानी में घुलकर पूरी तरह एकसार हो जाता है, इसलिए उसे सिर्फ़ छानकर नहीं निकाला जा सकता। RO आमतौर पर घुले हुए लवणों का 90 से 99 प्रतिशत तक हिस्सा हटा देता है, इसलिए जिस पानी का TDS (कुल घुले ठोस) 1000 या 2000 के पार हो और जो खारा-कड़वा लगता हो, वह यहाँ मीठा और पीने लायक बन जाता है।
सबसे बड़ा फ़ायदा भारी धातुओं और ज़हरीले तत्वों के मामले में है। सीसा, पारा, कैडमियम और क्रोमियम जैसे तत्व अच्छे ढंग से रुक जाते हैं। फ्लोराइड, जो राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कई दूसरे इलाकों के भूजल में ज़्यादा मात्रा में मिलता है और हड्डियों तथा दाँतों की गंभीर बीमारी फ्लोरोसिस की वजह बनता है, उसे भी RO काफ़ी हद तक हटा देता है। बंगाल और बिहार के गंगा के मैदानों में भूजल में आर्सेनिक की समस्या है, और RO इसे हटाने में अच्छा है, बशर्ते आर्सेनिक सही रासायनिक रूप में हो। नाइट्रेट, जो खेती के उर्वरकों से भूजल में पहुँचता है और शिशुओं के लिए ख़तरनाक होता है, उसे भी कम किया जा सकता है, हालाँकि इसकी दक्षता दूसरे तत्वों से थोड़ी कम रहती है।
सूक्ष्मजीवों के मामले में, झिल्ली सैद्धांतिक रूप से बैक्टीरिया, वायरस और सिस्ट को रोक सकती है, क्योंकि ये मेम्ब्रेन के छेदों से कहीं बड़े होते हैं। फिर भी निर्माता सिर्फ़ इस पर भरोसा नहीं करते, क्योंकि झिल्ली में छोटी-सी दरार या सील की ख़राबी भी रोगाणुओं को निकलने दे सकती है। इसलिए UV चरण जोड़ा जाता है, जो पूरा भरोसेमंद सुरक्षा-कवच बनाता है। माइक्रोप्लास्टिक के कण और कीटनाशकों के बड़े अणु भी अच्छे से रुकते हैं।
RO क्या नहीं हटाता?
यहीं बहुत से लोगों की गलतफ़हमी है। RO हर चीज़ का इलाज नहीं है। कुछ चीज़ें इसमें से निकल जाती हैं।
पहली श्रेणी घुली हुई गैसों की है। कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फ़ाइड (सड़े अंडे जैसी गंध वाली गैस) झिल्ली से आसानी से गुज़र जाती हैं। इसलिए RO पानी हल्का अम्लीय हो सकता है, क्योंकि घुली कार्बन डाइऑक्साइड पानी में कार्बोनिक अम्ल बनाती है।
दूसरी श्रेणी बहुत छोटे आकार वाले कार्बनिक रसायनों की है। कुछ कीटनाशक, फ़ार्मास्युटिकल अवशेष, और क्लोरोफ़ॉर्म जैसे वाष्पशील कार्बनिक यौगिक जिनका अणुभार बहुत कम होता है, वे RO से आंशिक रूप से ही रुकते हैं। इन्हें हटाने का काम मुख्य रूप से सक्रिय कार्बन फ़िल्टर करता है, इसलिए प्यूरीफायर में दोनों का होना ज़रूरी है।
तीसरी बात आर्सेनिक की है। पानी में आर्सेनिक दो रूपों में मिलता है, As(V) और As(III)। RO As(V) को तो अच्छे से रोकता है, लेकिन बिना आवेश वाला As(III) काफ़ी हद तक निकल सकता है। भूजल में, जहाँ ऑक्सीजन कम होती है, As(III) ही ज़्यादा मिलता है। इसलिए आर्सेनिक वाले इलाकों में पानी को पहले ऑक्सीकृत करने वाला चरण ज़रूरी हो सकता है।
चौथी बात यह है कि RO एक वक़्त पर एक ही स्तर तक काम करता है। अगर झिल्ली पुरानी हो चुकी हो, फ़िल्टर समय पर न बदले गए हों, या क्लोरीन से झिल्ली खराब हो गई हो, तो उसकी दक्षता गिर जाती है और आपको पता भी नहीं चलता, क्योंकि पानी देखने में उतना ही साफ़ रहता है। TDS मीटर इसे पकड़ने में मदद करता है, लेकिन वह सिर्फ़ कुल घुले ठोस बताता है, किसी ख़ास ज़हरीले तत्व के बारे में नहीं।
सबसे बड़ा ऐब: नुकसान पहुँचाने वाला भी, फ़ायदेमंद भी
RO का सबसे बड़ा तकनीकी पहलू यह है कि वह चुनकर नहीं हटाता। जिस झिल्ली से फ्लोराइड या आर्सेनिक रुकता है, उसी से कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे उपयोगी खनिज भी रुक जाते हैं। वैज्ञानिक रूप से यह बहस का विषय है कि इसका सेहत पर कितना असर पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2005 और 2011 की अपनी रिपोर्टों में चेतावनी दी थी कि लंबे समय तक पूरी तरह खनिज-रहित पानी पीना सावधानी का विषय है। इसके दो कारण बताए गए। एक, बहुत कम खनिज वाला पानी शरीर के ऊतकों से खनिज खींचने की प्रवृत्ति रखता है, ऐसा प्रयोगशाला के स्तर पर माना जाता है। दो, कुछ अध्ययनों में पीने के पानी में मैग्नीशियम की कमी और हृदय रोग के जोखिम के बीच संबंध दिखा। हालाँकि WHO ने यह भी माना कि सबूत निर्णायक नहीं हैं।
दूसरी तरफ़ संतुलित नज़रिया यह कहता है कि हमारे शरीर को ज़्यादातर खनिज भोजन से मिलते हैं, पानी से नहीं। दूध, दालें, सब्ज़ियाँ और अनाज कैल्शियम और मैग्नीशियम के कहीं बड़े स्रोत हैं। जिनका खान-पान संतुलित है, उनके लिए RO पानी से होने वाली कमी आमतौर पर चिंता की बात नहीं मानी जाती। जिनका खान-पान बहुत सीमित है, जैसे कम दूध-सब्ज़ी वाले परिवार, उनके लिए यह मुद्दा ज़्यादा गंभीर हो सकता है।
इसी वजह से आज के बहुत से प्यूरीफायरों में मिनरल कार्ट्रिज या TDS कंट्रोलर लगे होते हैं। ये RO से निकले साफ़ पानी में थोड़ा कच्चा पानी वापस मिलाते हैं ताकि TDS एक मध्यम स्तर पर बना रहे। भारतीय मानक ब्यूरो के हिसाब से पीने के पानी में TDS की वांछित सीमा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर है, और विकल्प न होने पर 2000 तक स्वीकार्य है। स्वाद के हिसाब से भी देखें तो बहुत कम TDS वाला पानी सपाट और बेस्वाद लगता है।
सबसे ज़्यादा RO कहाँ इस्तेमाल होता है?
यह सवाल दो हिस्सों में सोचना चाहिए, क्योंकि RO के दो बड़े इस्तेमाल हैं: घरेलू प्यूरीफायर और बड़े पैमाने पर समुद्री पानी का विलवणीकरण।
घरेलू प्यूरीफायर के मामले में भारत दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में गिना जाता है, जहाँ शहरी मध्यवर्गीय घरों में RO लगभग मानक उपकरण बन चुका है। इसकी वजह साफ़ है: भूजल में खारापन, फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसी समस्याएँ, और नगरपालिका की आपूर्ति पर घटता भरोसा। चीन में भी घरेलू वॉटर प्यूरीफायरों का विशाल बाज़ार है, और दक्षिण कोरिया, ताइवान तथा जापान में भी इनका चलन अच्छा है। अमेरिका और यूरोप में सीधे नल का पानी पीने के लायक होने के कारण RO का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम है, हालाँकि वहाँ रसोई के सिंक के नीचे लगने वाले RO सिस्टम काफ़ी बिकते हैं।
विलवणीकरण (समुद्र के पानी से नमक हटाने का प्रोसेस) की तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहाँ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बाकी खाड़ी देश आगे हैं, क्योंकि उनके पास मीठे पानी के प्राकृतिक स्रोत लगभग नहीं हैं। इज़राइल इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहाँ घरेलू पीने के पानी का बहुत बड़ा हिस्सा, अनुमानों के अनुसार आधे से ज़्यादा, समुद्री पानी के RO संयंत्रों से आता है, जिनमें सोरेक जैसे संयंत्र दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सस्ते में गिने जाते हैं। स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, अल्जीरिया और अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया तथा फ़्लोरिडा में भी बड़े संयंत्र हैं। चीन भी इस क्षेत्र में तेज़ी से क्षमता बढ़ा रहा है। दुनिया भर के विलवणीकरण में अब थर्मल (भाप आधारित) तरीकों की जगह RO ने ले ली है, और वैश्विक क्षमता का लगभग दो-तिहाई हिस्सा RO पर चलता है, क्योंकि यह कम ऊर्जा खाता है।
RO की पर्यावरणीय कीमत
अब तक की कहानी में RO एक वरदान लगता है, लेकिन इसकी एक बड़ी क़ीमत है, और वह है बर्बाद होने वाला पानी। RO में हर दिशा से पानी झिल्ली के पार नहीं जाता। जो पानी झिल्ली की सतह के साथ बहता रहता है, वही जमा हुए नमक को बहाकर ले जाता है, और यही रिजेक्ट वॉटर बनकर नाली में चला जाता है। पुराने घरेलू मॉडलों में एक लीटर साफ़ पानी के साथ तीन से चार लीटर, और कुछ में उससे भी ज़्यादा पानी बहा दिया जाता था। यानी रोज़ की पीने की ज़रूरत पूरी करने के लिए घर चुपचाप सैकड़ों लीटर पानी नाली में बहा सकता है।
भारत में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2019 में इस पर सख़्त रुख अपनाया। उसने निर्देश दिए कि जहाँ पानी में TDS 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, वहाँ RO प्यूरीफायर के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए, और RO प्यूरीफायरों में कम से कम 60 प्रतिशत पानी की रिकवरी का मानक रखा जाए, यानी नाली में कम पानी जाए। साथ ही बेकार पानी को बर्तन धोने, पोछे, पौधों और कपड़े धोने जैसे कामों में दोबारा इस्तेमाल करने की सलाह दी गई। नए मॉडलों में रिजेक्ट वॉटर को वापस घुमाने वाली तकनीक आने से यह अनुपात सुधरा है।
बिजली की खपत भी एक मुद्दा है। घरेलू RO में पंप और UV बल्ब चलते हैं, और कई मॉडल टैंक भरने के बाद भी बिजली खींचते रहते हैं। बड़े पैमाने पर, समुद्री पानी के संयंत्रों से निकलने वाला अत्यधिक खारा पानी (ब्राइन) जब वापस समुद्र में छोड़ा जाता है, तो वह स्थानीय समुद्री जीवों के लिए ख़तरा बन सकता है, क्योंकि उसका खारापन समुद्र के सामान्य पानी से कहीं ज़्यादा होता है और वह तली में बैठ जाता है।
इसके अलावा झिल्ली और फ़िल्टर हर एक से तीन साल में बदलने पड़ते हैं, जिससे प्लास्टिक कचरा बढ़ता है। और रखरखाव की लागत अक्सर लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जबकि समय पर सर्विस न होना ही बीमार प्यूरीफायर की सबसे आम वजह है।
तो RO चाहिए या नहीं?
इस सवाल का जवाब आपके घर के पानी की गुणवत्ता में छिपा है, किसी विज्ञापन में नहीं। अगर आपके इलाके का पानी खारा है, यानी TDS ऊँचा है, या उसमें फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट जैसी समस्याएँ हैं, तो RO बहुत काम की चीज़ है। लेकिन अगर आपका पानी पहले से कम TDS का है, जैसे कि पहाड़ी इलाकों या नदी के पानी की आपूर्ति वाले शहरों में अक्सर होता है, तो वहाँ RO की ज़रूरत कम है और वह पानी की बर्बादी और ज़रूरी खनिजों की क्षति ही कराएगा। वहाँ UV या UF जैसी तकनीकें, जो जीवाणु हटाती हैं पर खनिज बरकरार रखती हैं, ज़्यादा समझदारी वाली पसंद हैं।
सबसे सही तरीका यह है कि पहले अपने पानी की लैब जाँच करवाएँ। इससे साफ़ पता चलता है कि आपके पानी में असल समस्या क्या है, और फिर उसी के हिसाब से प्यूरीफायर चुना जा सकता है। TDS मीटर एक आसान शुरुआती संकेत देता है, पर वह पूरी कहानी नहीं बताता। जैसे हर तकनीक के साथ होता है, इसका सही इस्तेमाल वही है जो ज़रूरत के हिसाब से हो, फ़ैशन के हिसाब से नहीं।


