Rudraksha Ke Fayde: क्या रुद्राक्ष पहनने से ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ नियंत्रित होती है?

Rudraksha Ke Fayde: रुद्राक्ष क्या सच में ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और तनाव को नियंत्रित करता है? जानिए रुद्राक्ष की बनावट, शिव से जुड़ी मान्यता, औषधीय शोध और वैज्ञानिक प्रमाणों की सच्चाई।

Yogesh Mishra
Published on: 20 Oct 2026 7:46 PM IST
Rudraksha Ke Fayde in Hindi | Rudraksha and Blood Pressure | Newstrack Hindi News
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Rudraksha Ke Fayde in Hindi | Rudraksha and Blood Pressure | Newstrack Hindi News

Rudraksha Ke Fayde in Hindi: हज़ारों सालों से भारत की धार्मिक परंपराओं में रुद्राक्ष का खास स्थान है। साधु-संत इसे पहनते हैं, शिवभक्त इसकी माला धारण करते हैं, और बहुत-से लोग मानते हैं कि इससे मन शांत होता है, ब्लड प्रेशर काबू में रहता है, तनाव घटता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। बाज़ार में एकमुखी से लेकर कई मुखों वाले रुद्राक्ष अलग-अलग दामों पर बिकते हैं। किसी को पैसे से, किसी को सेहत से और किसी को मानसिक ताकत से जोड़कर बेचा जाता है। तो सवाल है: रुद्राक्ष असल में है क्या? क्या इसमें ऐसा कोई रासायनिक या बिजली जैसा गुण है जो शरीर पर असर डाले? क्या इस पर वैज्ञानिक शोध हुआ है? और एक पेड़ का बीज शिव से इतना गहरा कैसे जुड़ गया?

इसे समझने के लिए तीन बातें अलग-अलग रखनी होंगी: रुद्राक्ष की वनस्पति-संबंधी सच्चाई, उसके औषधीय असर के वैज्ञानिक सबूत, और उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यता। किसी चीज़ का धार्मिक महत्व होना इस बात का सबूत नहीं कि वह बीमारी ठीक करती है। उसी तरह, कोई मान्यता लैब में सिद्ध न हो पाए तो उसका सांस्कृतिक या आध्यात्मिक महत्व खत्म नहीं हो जाता।

रुद्राक्ष असल में क्या है?

रुद्राक्ष कोई पत्थर, धातु, चुंबक या रहस्यमय खनिज नहीं है। यह एक पेड़ के फल की कठोर गुठली है। इसका पेड़ Elaeocarpus ganitrus कहलाता है और यह भारतीय उपमहाद्वीप तथा दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ इलाकों में मिलता है। फल के ऊपर गूदा होता है और भीतर कठोर गुठली। इसी गुठली को साफ़ करके सुखाया जाता है और रुद्राक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। आम बोलचाल में इसे बीज कहते हैं, पर वनस्पति विज्ञान के हिसाब से माला का मनका मुख्य रूप से फल का कठोर खोल (एंडोकार्प) है, जिसके भीतर असली बीज हो सकते हैं।

2010 में इंडियन जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज़ में छपे एक अध्ययन में रुद्राक्ष की सूक्ष्म बनावट जाँची गई। इसमें पाया गया कि इसका कठोर खोल मज़बूत कोशिकाओं से बना है, इसलिए यह टिकाऊ होता है और छेदकर बरसों तक माला के रूप में चल सकता है। इससे रुद्राक्ष की पहचान और बनावट समझने में मदद मिलती है, पर शरीर पर किसी खास ऊर्जा या इलाज वाले असर की पुष्टि नहीं होती।

रुद्राक्ष को शिव से क्यों जोड़ा गया?

संस्कृत में "रुद्र" शिव का प्राचीन नाम है और "अक्ष" का मतलब आँख है। धार्मिक मान्यता में रुद्राक्ष को रुद्र की आँखों या आँसुओं से उत्पन्न माना गया है। रुद्राक्षजाबाल उपनिषद में ऋषि भुशुण्डि और कालाग्निरुद्र के संवाद के ज़रिए यह कथा मिलती है कि शिव की आँखों से गिरे आँसुओं से रुद्राक्ष के पेड़ उगे। अलग-अलग शैव ग्रंथों में इसके हालात का वर्णन अलग-अलग मिलता है।

इस कथा के दो स्तर हैं। धार्मिक रूप से रुद्राक्ष शिव की करुणा, तपस्या और साधना का प्रतीक है। वैज्ञानिक रूप से पेड़ का जन्म और विकास प्राकृतिक प्रक्रियाओं से हुआ है। धार्मिक कथा का मकसद वनस्पति का इतिहास बताना नहीं, बल्कि किसी चीज़ को आध्यात्मिक अर्थ देना है। दोनों के सवाल अलग हैं, इसलिए एक को दूसरे की जगह नहीं रखना चाहिए।

जपमाला और साधना में रुद्राक्ष

भारतीय परंपरा में माला सिर्फ़ गहना नहीं है, बल्कि जप गिनने और ध्यान टिकाए रखने का साधन भी है। रुद्राक्ष की माला खास तौर पर शिव के मंत्रों और शैव साधना से जुड़ी है। मंत्र बोलते हुए उँगलियों से मनके सरकाने से गिनती रखना आसान होता है और ध्यान बार-बार मंत्र पर लौट आता है। भक्त के लिए यह भक्ति और अनुशासन है। मनोविज्ञान की नज़र से देखें तो तय स्पर्श, दोहराव और एकाग्रता की नियमित क्रिया मन को स्थिर कर सकती है।

पर इसका श्रेय सिर्फ़ रुद्राक्ष की सामग्री को देना ठीक नहीं। तुलसी, चंदन या लकड़ी की माला से भी जप होता है। रुद्राक्ष की माला फेरते हुए जो शांति मिलती है, उसमें मंत्र, धीमी साँस, रोज़ का अभ्यास, आस्था और स्पर्श का अनुभव सब शामिल हो सकते हैं। यह एक संभावित मनोवैज्ञानिक व्याख्या है, इससे यह साबित नहीं होता कि मनकों से कोई खास बिजली जैसी ऊर्जा निकलकर दिमाग को शांत करती है।

क्या रुद्राक्ष पहनने से ब्लड प्रेशर कम होता है?

सबसे प्रचलित दावों में से एक यह है कि गले में रुद्राक्ष पहनने से हाई ब्लड प्रेशर काबू में आ जाता है। इसे परखने के लिए रुद्राक्ष पहनने और उसके अर्क (निचोड़) का सेवन करने में फ़र्क करना ज़रूरी है। रुद्राक्ष के अर्क पर कुछ जानवरों पर अध्ययन हुए हैं। 2014 के एक अध्ययन में हाई ब्लड प्रेशर वाले चूहों को रुद्राक्ष का पानी वाला अर्क दिया गया, और कुछ खुराकों पर ब्लड प्रेशर घटा। शोधकर्ताओं ने ताँबे के बर्तन और काँच के बर्तन में बने अर्क की तुलना भी की।

यह नतीजा आगे शोध के लायक है, पर इससे यह साबित नहीं होता कि रुद्राक्ष पहनने से इंसान का ब्लड प्रेशर घटता है। चूहों को रुद्राक्ष से निकला पदार्थ दिया गया था, उन्होंने माला नहीं पहनी थी। साथ ही, जानवरों में मिला असर इंसानों में वैसा ही होगा, इसकी गारंटी नहीं होती। किसी चीज़ को ब्लड प्रेशर की दवा मानने के लिए इंसानों पर नियंत्रित परीक्षण, सुरक्षित खुराक, साइड इफ़ेक्ट और लंबे समय के असर के सबूत चाहिए। अभी के सबूतों के आधार पर रुद्राक्ष की माला को हाई ब्लड प्रेशर का प्रमाणित इलाज नहीं माना जा सकता।

इसलिए जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर है, वे सिर्फ़ रुद्राक्ष के भरोसे अपनी दवा बंद न करें। ब्लड प्रेशर कई बार बिना लक्षण के भी दिल, दिमाग और गुर्दों को नुकसान पहुँचाता है। आस्था अपनी जगह है, पर बीपी को लेकर फ़ैसला नियमित जाँच और डॉक्टर की सलाह से होना चाहिए।

क्या रुद्राक्ष में औषधीय रसायन होते हैं?

हाँ, रुद्राक्ष के पेड़ की प्रजाति में कई रासायनिक तत्वों की पहचान हुई है। वैज्ञानिक लेखों में एलीओकार्पस प्रजातियों के कुछ अर्कों में एल्कलॉइड, फ़ीनॉलिक यौगिक, फ़्लेवोनॉइड और दूसरे पौधों के रसायनों का ज़िक्र मिलता है। इनमें से कुछ लैब में कोशिकाओं पर असर दिखा सकते हैं। पर किसी पौधे में सक्रिय रसायन मिलना एक बात है, और उससे सुरक्षित व असरदार दवा बनना बिल्कुल दूसरी बात। लैब में कोशिकाओं पर असर होने का मतलब यह नहीं कि उसे पहनने, पानी में भिगोने या खाने से इंसान की बीमारी ठीक हो जाएगी।

2022 में Phytomedicine Plus में छपी एक समीक्षा ने एलीओकार्पस प्रजातियों के रसायनों और संभावित औषधीय गुणों का विश्लेषण किया। इसमें कई जैविक असर बताए गए, पर ऐसे शुरुआती नतीजों को इंसानों में प्रमाणित इलाज के बराबर नहीं रखा जा सकता। दवा बनाने में यह भी देखना होता है कि सक्रिय पदार्थ शरीर में कितनी मात्रा में पहुँचता है, कैसे सोखा जाता है, किन अंगों तक जाता है और क्या उसकी असरदार मात्रा सुरक्षित भी है।

क्या रुद्राक्ष से डायबिटीज़ का इलाज हो सकता है?

रुद्राक्ष के अर्क के संभावित शुगर घटाने वाले असर पर भी जानवरों पर अध्ययन हुए हैं। 2011 के एक अध्ययन में चूहों को रुद्राक्ष का जलीय अर्क दिया गया और कुछ खुराकों पर खून में ग्लूकोज़ कम हुआ। इससे आगे शोध की संभावना बनी, पर यह इंसानों में रुद्राक्ष के इलाज के असर का सबूत नहीं था।

यह फ़र्क यहाँ खास तौर पर ज़रूरी है, क्योंकि डायबिटीज़ में गलत इलाज से गंभीर जटिलताएँ हो सकती हैं। अगर कोई यह सोचकर दवा छोड़ दे कि रुद्राक्ष पहनने या रुद्राक्ष का पानी पीने से शुगर काबू में आ जाएगी, तो यह नुकसानदेह हो सकता है। मौजूदा जानकारी रुद्राक्ष को डायबिटीज़ की प्रमाणित दवा नहीं बताती। और रुद्राक्ष का कोई घरेलू अर्क रोज़ पीना सुरक्षित है, यह भी सिर्फ़ जानवरों के अध्ययनों से तय नहीं हो सकता।

क्या रुद्राक्ष में चुंबकीय या बिजली वाली ताकत होती है?

रुद्राक्ष के प्रचार में अक्सर कहा जाता है कि इसमें खास विद्युत-चुंबकीय गुण हैं जो शरीर की ऊर्जा को संतुलित करते हैं। कुछ विज्ञापन इसे शरीर की "बायोइलेक्ट्रिसिटी" संभालने वाला प्राकृतिक यंत्र तक बताते हैं। इसे समझने के लिए एक बुनियादी बात जाननी ज़रूरी है। शरीर में सचमुच बिजली जैसी गतिविधियाँ होती हैं: दिल की धड़कन की ईसीजी में और दिमाग की कुछ गतिविधियाँ ईईजी में दर्ज होती हैं। पर शरीर में विद्युत संकेत होने से यह साबित नहीं होता कि गले में पहनी कोई भी चीज़ उन्हें फ़ायदेमंद तरीके से नियंत्रित कर सकती है।

किसी मनके के विद्युत गुण नापे जा सकते हैं, लेकिन सिर्फ़ मापने लायक गुण होने से उसका इलाज वाला असर सिद्ध नहीं होता। शरीर पर किसी खास विद्युत-चुंबकीय असर का दावा करने के लिए यह दिखाना पड़ेगा कि रुद्राक्ष से कैसा क्षेत्र बनता है, उसकी तीव्रता कितनी है, वह शरीर के किस ऊतक तक पहुँचता है और उससे सेहत में कौन-सा नापा जा सकने वाला बदलाव आता है। फिर इंसानों पर नियंत्रित परीक्षणों में इसकी पुष्टि भी चाहिए।

अभी तक के भरोसेमंद क्लिनिकल सबूत रुद्राक्ष की माला को ऐसा प्रमाणित उपकरण नहीं बताते जो ब्लड प्रेशर, धड़कन, दिमागी गतिविधि या हार्मोन संतुलन को नियंत्रित करे। इसलिए पॉज़िटिव एनर्जी, कॉस्मिक एनर्जी या बायोइलेक्ट्रिक बैलेंस जैसे शब्दों को वैज्ञानिक सबूत का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

क्या रुद्राक्ष पहनने से तनाव और चिंता कम होती है?

रुद्राक्ष पहनकर किसी को सचमुच मन की शांति मिल सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि रुद्राक्ष में कोई खास दवा जैसी ताकत साबित हो गई। इंसानी दिमाग विश्वास, यादों, धार्मिक प्रतीकों और रोज़ की आदतों से प्रभावित होता है। अगर कोई रुद्राक्ष को शिव का पवित्र प्रतीक मानता है, तो उसे पहनने से उसे सुरक्षा, आस्था और भावनात्मक स्थिरता महसूस हो सकती है। यह अनुभव उस व्यक्ति के लिए असली और अहम हो सकता है।

मनोविज्ञान में यह भी पढ़ा जाता है कि उम्मीद, अर्थ और माहौल से कैसे असर पैदा होता है। किसी चीज़ पर सकारात्मक विश्वास तनाव के अनुभव को बदल सकता है। अगर रुद्राक्ष पहनना ध्यान, प्रार्थना या साँस के अभ्यास के साथ जुड़ा है, तो इनका भी योगदान हो सकता है। पर इसे रुद्राक्ष के रसायन या किसी अदृश्य ऊर्जा का असर बताने के लिए अलग से वैज्ञानिक सबूत चाहिए। खास तौर पर ऐसे नियंत्रित अध्ययन चाहिए जिनमें रुद्राक्ष पहनने वालों की तुलना ठीक वैसी दिखने वाली दूसरी माला पहनने वालों से हो और नतीजे निष्पक्ष ढंग से परखे जाएँ।

इसलिए दो बातें साथ-साथ मानी जा सकती हैं। एक, रुद्राक्ष किसी के धार्मिक और मानसिक अनुभव में अहम भूमिका निभा सकता है। दो, रुद्राक्ष की सामग्री से किसी खास इलाज वाले असर के पर्याप्त भरोसेमंद इंसानी सबूत अभी नहीं हैं।

एकमुखी, पंचमुखी और चौदहमुखी रुद्राक्ष में फ़र्क

रुद्राक्ष की ऊपरी कठोर सतह पर प्राकृतिक रेखाएँ या खाँचे होते हैं। धार्मिक और व्यापारिक परंपरा में इन्हें 'मुख' कहा जाता है, और इन्हीं के आधार पर एकमुखी, द्विमुखी, पंचमुखी जैसे प्रकार बनते हैं। आमतौर पर पंचमुखी सबसे आम है, जबकि कुछ खास मुखों वाले रुद्राक्ष दुर्लभ माने जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मुखों को अलग देवताओं, आध्यात्मिक गुणों या प्रतीकों से जोड़ा गया है। रुद्राक्षजाबाल उपनिषद में भी अलग-अलग मुखों के धार्मिक महत्व का वर्णन है।

पर यह दावा कि पाँच मुख वाला रुद्राक्ष ब्लड प्रेशर काबू करेगा या सात मुख वाला पैसा लाएगा, इसके लिए कोई भरोसेमंद वैज्ञानिक सबूत नहीं है। मुखों की संख्या प्राकृतिक बनावट की बात है, उससे किसी बीमारी के इलाज या किसी के भाग्य पर असर की पुष्टि नहीं होती। इसी तरह ज़्यादा दाम या दुर्लभता का मतलब यह नहीं कि उसमें इलाज की ताकत ज़्यादा है। कोई रुद्राक्ष सांस्कृतिक या संग्रह की नज़र से कीमती हो सकता है, पर उसकी कीमत और उसका औषधीय असर दो अलग सवाल हैं।

क्या बाज़ार में नकली रुद्राक्ष भी मिलते हैं?

रुद्राक्ष की धार्मिक मान्यता और कुछ दुर्लभ प्रकारों के ऊँचे दामों की वजह से असली-नकली का सवाल अहम हो जाता है। बाज़ार में असली रुद्राक्ष के साथ बनावटी मनके, दूसरे पेड़ों के कठोर बीज या सतह में बदलाव करके तैयार की गई चीज़ें भी बिक सकती हैं। कई बार प्राकृतिक खाँचों की संख्या बदलने या मनके की बनावट से छेड़छाड़ की आशंका भी रहती है। इसलिए सिर्फ़ विक्रेता का दावा या बहुत ऊँचा दाम असली होने की गारंटी नहीं है।

यह दावा भी भरोसेमंद नहीं कि पानी में डूबने या ताँबे के सिक्कों के बीच घूमने जैसे घरेलू टेस्ट से रुद्राक्ष का असली होना पक्का हो जाता है। कोई चीज़ पानी में डूबेगी या नहीं, यह उसके घनत्व और बनावट पर निर्भर करता है, उसकी धार्मिक असलियत पर नहीं। ज़रूरत हो तो पौधों की बनावट, सतह और भीतरी ढाँचे की विशेषज्ञ जाँच ज़्यादा काम की हो सकती है। और असली रुद्राक्ष होना एक बात है, उससे कोई चमत्कारी असर होना बिल्कुल दूसरी।

क्या वैज्ञानिक सबूत के बिना भी रुद्राक्ष का धार्मिक महत्व बना रह सकता है?

किसी धार्मिक प्रतीक का महत्व सिर्फ़ उसकी औषधीय ताकत से तय नहीं होता। भारतीय संस्कृति में कई चीज़ें प्रकृति, देवताओं, ऋतुओं और साधना से जुड़ी हैं। शैव परंपरा में रुद्राक्ष भक्ति, तप, वैराग्य और ध्यान का प्रतीक है। साधु-संतों के लिए यह उनके धार्मिक जीवन और पहचान का हिस्सा है। आम श्रद्धालु के लिए यह शिव में आस्था की निशानी है। किसी और के लिए यह बस एक प्राकृतिक बीज की माला हो सकती है।

दिक्कत धार्मिक विश्वास में नहीं है, बल्कि तब शुरू होती है जब किसी आध्यात्मिक प्रतीक को प्रमाणित इलाज का विकल्प बताकर पेश किया जाता है। अगर कोई श्रद्धा से रुद्राक्ष पहनता है और उससे मन को संतोष मिलता है, तो उसके अनुभव का सम्मान किया जा सकता है। लेकिन अगर उसे कहा जाए कि रुद्राक्ष पहनने से हृदय रोग, डायबिटीज़, हाई बीपी या डिप्रेशन बिना इलाज के ठीक हो जाएगा, तो यह दावा वैज्ञानिक सबूतों पर टिका नहीं है। आस्था का सम्मान और सेहत के दावों की जाँच, दोनों साथ-साथ हो सकते हैं।

निष्कर्ष ये है कि रुद्राक्ष का आध्यात्मिक महत्व स्थापित है, पर उसके चमत्कारी इलाज वाले असर साबित नहीं हैं। रुद्राक्ष को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि उसके धार्मिक महत्व को आस्था और संस्कृति के दायरे में देखा जाए, और उसके सेहत वाले दावों को वैज्ञानिक जाँच पर परखा जाए। रुद्राक्ष पहनना श्रद्धा की बात हो सकती है, पर उसे दवा मान लेना मौजूदा वैज्ञानिक सबूतों के हिसाब से ठीक नहीं है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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