Sabse Kam Sone Wala Desh: भारत कम सोता है, लेकिन जापान सबसे कम, दुनिया का चौंकाने वाला सच उजागर

Sabse Kam Sone Wala Desh: दुनिया भर में लोग कितनी नींद लेते हैं, यह केवल व्यक्तिगत आदत का विषय नहीं रह गया है।

Neel Mani Lal
Published on: 15 May 2026 5:48 PM IST
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Sabse Kam Sone Wala Desh: दुनिया भर में लोग कितनी नींद लेते हैं, यह केवल व्यक्तिगत आदत का विषय नहीं रह गया है। अब यह आधुनिक जीवनशैली, मानसिक स्वास्थ्य, कार्य संस्कृति और सामाजिक ढाँचे का आईना बन चुका है। एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने दुनिया की नींद से जुड़ी ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों दोनों को चिंतित कर दिया है।

इस अध्ययन के अनुसार जापान दुनिया का वह देश बनकर सामने आया है जहाँ लोग सबसे कम नींद लेते हैं। जापानी नागरिक औसतन केवल 6.23 घंटे प्रतिदिन सो रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से सात से आठ घंटे की नींद को स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक मानते रहे हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि इस सूची में भारत भी दुनिया के सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल पाया गया है। यह अध्ययन फिनलैंड की हेल्थ टेक कंपनी Oura द्वारा किया गया, जिसने स्मार्ट हेल्थ ट्रैकिंग रिंग पहनने वाले हजारों लोगों के नींद संबंधी आँकड़ों का विश्लेषण किया। इन आँकड़ों की तुलना दुनिया के लगभग एक दर्जन देशों से की गई। अध्ययन के अनुसार अमेरिका में लोग औसतन 7.05 घंटे सोते हैं, जबकि न्यूजीलैंड इस सूची में सबसे ऊपर रहा, जहाँ लोग हर रात लगभग 7.11 घंटे की नींद लेते हैं।

दूसरी ओर भारत और संयुक्त अरब अमीरात भी उन देशों में शामिल पाए गए जहाँ लोग अपेक्षाकृत कम नींद लेते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि सामाजिक परंपराएँ, जलवायु और कार्य संस्कृति आज भी दुनिया भर में लोगों की नींद की आदतों को गहराई से प्रभावित कर रही हैं।

जापान की ‘नींद संकट’ वाली जिंदगी

विशेषज्ञों के अनुसार जापान में बेहद कम नींद लेने की सबसे बड़ी वजह वहाँ की कठोर कार्य संस्कृति है। लंबे काम के घंटे, भीड़भाड़ वाले शहरों में घंटों का सफर, देर रात तक काम और सामाजिक दबाव — ये सब मिलकर जापानी समाज को लगातार “नींद की कमी” की ओर धकेल रहे हैं। ओउरा कंपनी में “हेड ऑफ फ्यूचर फिज़ियोलॉजी” के पद पर कार्यरत नींद वैज्ञानिक हेलि कोस्किमाकी के अनुसार, जापान में लंबी कार्य अवधि और अत्यधिक व्यस्त दिनचर्या लोगों के सोने के समय को लगातार पीछे धकेल देती है।

उन्होंने बताया कि भारत में देर रात होने वाले पारिवारिक भोजन और सामाजिक मेलजोल भी लोगों की नींद देर से शुरू होने का बड़ा कारण हैं। वहीं संयुक्त अरब अमीरात में दिन के समय अत्यधिक गर्मी होने के कारण लोग देर रात तक बाहर निकलते हैं, व्यायाम करते हैं या सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते हैं। जापान लंबे समय से “ओवरवर्क” यानी अत्यधिक काम से जुड़ी थकान की समस्या से जूझ रहा है। वहाँ सरकारी सर्वेक्षणों में बार-बार यह चिंता सामने आई है कि विशेष रूप से युवा कर्मचारी और शहरी पेशेवर लगातार नींद की कमी का सामना कर रहे हैं।

नींद का विज्ञान क्या कहता है?

दुनिया की प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाएँ, जिनमें अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन भी शामिल है, लगातार यह सलाह देती रही हैं कि वयस्कों को हर रात कम से कम सात घंटे की नींद लेनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त नींद केवल आराम का विषय नहीं, बल्कि शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत की प्रक्रिया है।

जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के शोध बताते हैं कि लगातार कम नींद लेने से हृदय रोग, मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, डिमेंशिया, अवसाद, मानसिक क्षमता में गिरावट और कुछ प्रकार के कैंसर तक का खतरा बढ़ सकता है। विशेष रूप से स्तन कैंसर और प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम को लेकर भी शोधकर्ताओं ने चिंता जताई है। नींद वैज्ञानिक अक्सर स्वास्थ्य को “यू-शेप्ड कर्व” से समझाते हैं। इसका अर्थ यह है कि बहुत कम नींद और बहुत अधिक नींद — दोनों ही स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति लगातार छह घंटे से कम सोता है, या दूसरी ओर नौ घंटे से अधिक सोता है, तो दोनों स्थितियों में बीमारी और समयपूर्व मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है।

केवल शरीर नहीं, दिमाग भी प्रभावित होता है

नींद का असर केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। कम नींद सीधे तौर पर एकाग्रता, याददाश्त, भावनात्मक संतुलन और कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया भर में सड़क दुर्घटनाओं और औद्योगिक हादसों का एक बड़ा कारण “थकान” और “नींद की कमी” भी है। जब लोग पर्याप्त नींद नहीं लेते, तो उनका मस्तिष्क प्रतिक्रिया देने में धीमा हो जाता है। कई बार यह स्थिति शराब पीकर वाहन चलाने जितनी खतरनाक मानी जाती है।

लेकिन कम नींद हमेशा खराब स्वास्थ्य का संकेत नहीं

इस अध्ययन की सबसे दिलचस्प बात यह रही कि कम नींद लेने वाले देशों में हमेशा खराब स्वास्थ्य परिणाम नहीं पाए गए। उदाहरण के लिए जापान दुनिया में सबसे कम सोने वाला देश होने के बावजूद आज भी दुनिया की सबसे अधिक औसत आयु वाले देशों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आँकड़ों के अनुसार जापान में औसत जीवन प्रत्याशा लगातार 84 वर्ष से अधिक बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका अर्थ यह है कि स्वास्थ्य केवल नींद पर निर्भर नहीं करता।

आहार, पोषण, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक संबंध, शराब और धूम्रपान की आदतें, तथा सबसे महत्वपूर्ण — तनाव प्रबंधन — ये सभी किसी समाज के समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। जापान का पारंपरिक भोजन, जिसमें मछली, सब्जियाँ और किण्वित खाद्य पदार्थों की भरपूर मात्रा होती है, संभवतः कम नींद से जुड़े कुछ स्वास्थ्य जोखिमों को संतुलित करने में मदद करता है।

दुनिया की बदलती नींद

यह अध्ययन एक और महत्वपूर्ण बात सामने लाता है — नींद केवल जैविक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संरचना का भी परिणाम है। जिन देशों में लोग कम सोते हैं, वहाँ अक्सर कुछ समान विशेषताएँ दिखाई देती हैं —

लंबे कार्य घंटे, अत्यधिक शहरी जीवन, देर रात तक सामाजिक गतिविधियाँ, स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग और तनाव से भरी जीवनशैली।

यानी आधुनिक दुनिया जितनी अधिक तेज़, डिजिटल और प्रतिस्पर्धी होती जा रही है, इंसानों की नींद उतनी ही छोटी होती जा रही है। और शायद यही 21वीं सदी की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है — तकनीक ने जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक बनाया, लेकिन इंसानों से उनकी सबसे प्राकृतिक और सबसे आवश्यक चीज़ — सुकून भरी नींद — धीरे-धीरे छीन ली।

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