क्या दिमाग पहले से तय करता है कि हम क्या देखेंगे? जानिए Predictive Coding का रहस्य

Brain Predictive Coding: क्या हमारा दिमाग पहले से अनुमान लगा लेता है कि वह क्या देखने वाला है? जानिए Predictive Coding और Predictive Processing के जरिए मस्तिष्क आंखों से मिलने वाली जानकारी की तुलना कैसे करता है और हमारी दृष्टि, भ्रम और अनुभव को कैसे प्रभावित करता है।

Yogesh Mishra
Published on: 19 Aug 2026 7:54 PM IST
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Brain Predictive Coding: सही बात यह है कि हमारा मस्तिष्क लगातार अनुमान लगाता रहता है कि अगले क्षण उसे क्या दिखाई देने वाला है। और फिर वह आँखों से आने वाली वास्तविक जानकारी से उस अनुमान की तुलना करता है। आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान (neuro science) में इसे अक्सर प्रेडिक्टिव प्रोसेसिंग या प्रेडिक्टिव कोडिंग (Predictive coding) कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार मस्तिष्क दुनिया को केवल निष्क्रिय कैमरे की तरह रिकॉर्ड नहीं करता। बल्कि वह अपने पिछले अनुभव, वर्तमान संदर्भ और अपेक्षाओं के आधार पर पहले से एक ‘मॉडल’ बनाता है और आने वाली संवेदनात्मक सूचना (Sensory Information) से उसकी तुलना करता है।

मान लीजिए आप रात में कमरे में प्रवेश करते हैं और कोने में कुर्सी पर कोई कपड़ा पड़ा है। एक क्षण के लिए आपको वह व्यक्ति जैसा दिखाई दे सकता है। क्यों? क्योंकि आँख तक जो दृश्य पहुँचा वह अस्पष्ट था। मस्तिष्क के पास अधूरी सूचना आई, ऊँचाई लगभग इंसान जैसी, आकृति सिर और शरीर जैसी। मस्तिष्क ने पिछले अनुभव के आधार पर तत्काल अनुमान लगाया कि ‘शायद कोई व्यक्ति है।’ जैसे ही आप ध्यान से देखते हैं और अधिक विज़ुअल सूचना मिलती है। अनुमान गलत साबित होता है और मस्तिष्क मॉडल बदल देता है, ‘नहीं, यह कपड़ा है।’

इस घटना में आंख ने झूठ नहीं बोला। दिमाग ने अधूरी दृश्य सूचना को सबसे संभावित अर्थ देकर पूरा किया था। यही हमारी सामान्य दृष्टि में हर समय होता रहता है। हम जो देखते हैं उसका एक हिस्सा वास्तव में आंख से मिलने वाला संकेत है और एक हिस्सा मस्तिष्क द्वारा उस संकेत की व्याख्या। इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया कल्पना है। बल्कि यह कि दृष्टि हमेशा वास्तविक संकेत और मस्तिष्कीय अनुमान का मिश्रण है।

आंख से मस्तिष्क को सूचना का प्रवाह

आँख वास्तव में कैमरे जैसी पूरी तस्वीर दिमाग को नहीं भेजती। प्रकाश रेटिना पर पड़ता है। वहाँ की कोशिकाएँ प्रकाश, रंग, किनारों और दूसरे संकेतों को विद्युत संदेशों में बदलती हैं। ये संकेत थैलेमस (Thalamus) के लैटरल जेनिकुलेट न्यूक्लियस (Lateral Geniculate Nucleus - LGN) से होकर मुख्य दृश्य प्रांतस्था (Primary Visual Cortex), यानी V1, तक पहुँचते हैं और फिर अलग-अलग दृश्य नेटवर्क में फैलते हैं। एक प्रमुख मार्ग वस्तु और चेहरे जैसी पहचान में अधिक योगदान करता है, जबकि दूसरा गति, स्थान और क्रिया से जुड़े पहलुओं में।

लेकिन यह सूचना केवल नीचे से ऊपर नहीं जाती। मस्तिष्क के ऊपरी स्तर भी नीचे के दृश्य क्षेत्रों को लगातार संकेत भेजते हैं - “मेरे हिसाब से यहाँ क्या होना चाहिए।” प्रेडिक्टिव कोडिंग की मूल अवधारणा यही है कि उच्च स्तर के मस्तिष्क क्षेत्र (higher brain areas) अनुमान भेजते हैं और निचले संवेदी क्षेत्र वास्तविक सूचना से उसकी तुलना करते हैं। यदि दोनों मेल खाते हैं तो बहुत कम अतिरिक्त काम करना पड़ता है। यदि मेल नहीं खाते तो प्रेडिक्शन एरर, यानी भविष्यवाणी-त्रुटि पैदा होती है, और मस्तिष्क अपना मॉडल सुधारता है।

इसे रोजमर्रा की भाषा में समझें। आप रोज अपने घर का मुख्य दरवाजा देखते हैं। मस्तिष्क को हर सुबह उसके प्रत्येक किनारे, हैंडल, रंग और आकार की नई गणना शून्य से नहीं करनी पड़ती। उसके पास पहले से मॉडल है कि “यह मेरा दरवाजा है।” आंख से आने वाली सूचना उस मॉडल की पुष्टि कर देती है। इसलिए पहचान बहुत तेज होती है। लेकिन एक दिन हैंडल गायब हो जाए तो आपका ध्यान तुरंत वहाँ जाएगा। कारण यह नहीं कि हैंडल पहली बार दिखाई दिया; बल्कि जो आपने देखने की अपेक्षा की थी वह दिखाई नहीं दिया। भविष्यवाणी और वास्तविकता में अंतर पैदा हुआ।

यही कारण है कि अचानक परिवर्तन हमारा ध्यान इतनी तेजी से खींचता है। किसी शांत कमरे में अचानक आवाज, परिचित चेहरे पर असामान्य भाव या रोज देखी सड़क पर अचानक गड्ढा—मस्तिष्क ऐसे विचलनों को प्राथमिकता देता है क्योंकि वे उसके मॉडल से मेल नहीं खाते।यह व्यवस्था विकास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है। यदि हमारे पूर्वज झाड़ियों में कुछ हलचल देखते थे तो उनके पास हर बार शांत होकर पूरा दृश्य विश्लेषण करने का समय नहीं था। मस्तिष्क को तत्काल अनुमान लगाना पड़ता था—हवा है, शिकार है या शिकारी? कभी-कभी गलत खतरा मान लेना महँगा नहीं था; वास्तविक शिकारी को “शायद कुछ नहीं” समझ लेना घातक हो सकता था। इसलिए हमारा मस्तिष्क कई परिस्थितियों में अधूरी जानकारी से तेजी से अर्थ निकालने में बहुत दक्ष है।

अनुमान लगाने की क्षमता

यही अनुमान लगाने वाली क्षमता हमारी दृष्टि को असाधारण रूप से तेज बनाती है, लेकिन यही दृष्टिभ्रम भी पैदा कर सकती है।ऑप्टिकल इल्यूजन इसलिए काम करते हैं क्योंकि दृश्य व्यवस्था कुछ नियमितताओं को मानकर चलती है—प्रकाश आम तौर पर ऊपर से आता है, दूर की वस्तुएँ छोटी दिखाई देती हैं, छाया गहराई का संकेत हो सकती है, निरंतर रेखा एक ही वस्तु का हिस्सा होती है। कलाकार या भ्रम-चित्र इन मान्यताओं को जानबूझकर उलझा देते हैं। आंख वही प्रकाश देखती है, लेकिन दिमाग उसका ऐसा अर्थ निकालता है जो वास्तविक चित्र से अलग हो सकता है।

यही कारण है कि दो बिल्कुल समान लंबाई की रेखाएँ आसपास के तीरों या परिप्रेक्ष्य के कारण अलग लंबाई की दिखाई दे सकती हैं। दिमाग केवल पिक्सेल नहीं माप रहा; वह तीन-आयामी दुनिया का अनुमान लगा रहा है।चेहरे के साथ यह प्रभाव और भी मजबूत है। मानव मस्तिष्क चेहरे खोजने में इतना दक्ष है कि कभी बादलों, चाँद, दीवार के दाग या कार के आगे के हिस्से में भी चेहरा दिखाई देने लगता है। इसे पैरीडोलिया कहा जाता है। वास्तव में वहाँ मानव चेहरा नहीं है, लेकिन कुछ बिंदु आँखों जैसे और एक आकृति मुंह जैसी दिखाई देती है तो मस्तिष्क अपना पहले से सीखा “चेहरा मॉडल” लागू कर देता है।यह गलती हमारे मस्तिष्क की कमजोरी कम और उसकी प्राथमिकता ज्यादा बताती है। मानव समाज में चेहरे अत्यंत महत्वपूर्ण रहे हैं—कौन मित्र है, कौन शत्रु, कौन नाराज है, कौन परिचित। इसलिए चेहरे पहचानने वाली प्रणाली बहुत संवेदनशील बनी।

क्या हम वही देखते हैं जिसे देखने की उम्मीद करते हैं?

कई बार हाँ, विशेष रूप से जब दृश्य अस्पष्ट हो। 2024 के एक अध्ययन में जब लोगों को अस्पष्ट चेहरे दिखाए गए और पहले किसी विशेष चेहरे की अपेक्षा पैदा की गई, तो अपेक्षित चेहरों की पहचान अधिक तेजी से हुई और अस्पष्ट चेहरे की पहचान भी पहले से बनी अपेक्षा की ओर झुक गई। यानी अपेक्षा वास्तव में दृश्य निर्णय को प्रभावित कर सकती है।

मान लीजिए आपको पहले कहा जाए कि अंधेरी तस्वीर में एक बिल्ली है। अब आप उसी दिशा में आकृतियाँ ढूँढ़ने लगेंगे। यदि कहा जाए कि उसमें किसी आदमी का चेहरा है तो संभव है कि वही धब्बे आपको चेहरा लगने लगें। मस्तिष्क की प्रारंभिक धारणा बदल गई।

इसीलिए संदर्भ बहुत शक्तिशाली है। यदि किसी अस्पष्ट अक्षर को ‘THE CAT’ जैसे अंग्रेजी वाक्यांशों के बीच रखा जाए तो एक ही आकृति को मस्तिष्क कभी H और कभी A की तरह पढ़ सकता है, क्योंकि आसपास के अक्षर बताते हैं कि यहाँ कौन-सा अर्थ ज्यादा संभावित है।

यह भाषा में भी होता है। भीड़भरी जगह में किसी व्यक्ति ने अधूरा वाक्य बोला—‘चाय में ची…’। शोर के कारण अंतिम हिस्सा साफ न सुनाई दे, फिर भी आपका दिमाग ‘चीनी’ भर सकता है। श्रवण प्रणाली भी केवल आवाज रिकॉर्ड नहीं करती, संदर्भ के आधार पर अनुमान लगाती है। भविष्यवाणी-आधारित प्रसंस्करण के प्रमाण श्रवण प्रणाली में भी पाए गए हैं। यानी हमारा अनुभव हमेशा ‘बाहर से अंदर’ नहीं आता; ‘अंदर से बाहर’ भी लगातार संकेत जा रहे हैं।

क्या मस्तिष्क भविष्यवाणी करता है?

दिमाग दृश्य पहले बना देता है और आंख केवल उसकी पुष्टि करती है? इसका जवाब इतना सरल नहीं है। इस सिद्धांत को लेकर तंत्रिका-विज्ञान (neuroscience) में अभी बहस जारी है। 2026 की एक प्रमुख समीक्षा ने रेखांकित किया है कि भविष्यवाणी और भविष्यवाणी-त्रुटि जैसी अवधारणाओं के समर्थन में बहुत प्रयोगात्मक प्रमाण हैं, लेकिन यह अभी पूरी तरह तय नहीं है कि मस्तिष्क के सभी संवेदी क्षेत्र ठीक उसी गणितीय ढाँचे में काम करते हैं जैसा शास्त्रीय predictive coding मॉडल प्रस्तावित करता है।

इसलिए ‘मस्तिष्क एक prediction machine है’ बहुत उपयोगी रूपक है। लेकिन इसे अंतिम सिद्ध वैज्ञानिक कानून नहीं समझना चाहिए। हमारी दृष्टि में एक और अद्भुत उदाहरण है - ब्लाइंड स्पॉट, यानी दृष्टि का अंध बिंदु। रेटिना में जहाँ से ऑप्टिक नर्व बाहर निकलती है वहाँ प्रकाश ग्रहण करने वाली कोशिकाएँ नहीं होतीं। तकनीकी रूप से हमारे दृश्य क्षेत्र में वहाँ सूचना का एक छोटा हिस्सा गायब है। फिर भी हमें सामान्यतः कोई काला छेद दिखाई नहीं देता। मस्तिष्क आसपास के दृश्य के आधार पर उस हिस्से को भर देता है।

अर्थात आपकी सामान्य दृष्टि में भी एक ऐसा स्थान मौजूद है जहाँ आप सचमुच ‘जो आया है’ नहीं देखते बल्कि मस्तिष्क की बनाई हुई सबसे उचित निरंतरता देखते हैं।

लगातार अनुमान लगाता रहता है मस्तिष्क

हमारी आँखें भी लगातार स्थिर नहीं रहतीं। वे प्रति सेकंड कई बार बहुत तेज छोटे-छोटे आंदोलन करती हैं जिन्हें सैकैड्स कहा जाता है। इन तेज हरकतों के बावजूद दुनिया हमें उछलती हुई नहीं दिखाई देती। मस्तिष्क यह अनुमान लगाता है कि आंख कहाँ जा रही है और अगले क्षण दृश्य कहाँ होगा, जिससे अनुभव लगातार और स्थिर बना रहता है। सक्रिय दृष्टि पर शोध में इस पूर्वानुमान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह तथ्य अपने-आप में बहुत चौंकाने वाला है—हमारी आंखें लगातार दृश्य बदल रही हैं, फिर भी हमारा सचेत अनुभव एक स्थिर फिल्म जैसा है।

अब कल्पना करें कि आप गेंद पकड़ रहे हैं। यदि दिमाग केवल यह देखे कि गेंद अभी कहाँ है और फिर हाथ चलाए, तो तब तक गेंद आगे निकल चुकी होगी। उसे अनुमान लगाना पड़ता है कि गेंद अगले कुछ मिलीसेकंड में कहाँ होगी। खेल में अच्छा खिलाड़ी केवल तेज आंख वाला नहीं होता; उसका मस्तिष्क भविष्यवाणी में बहुत कुशल होता है।

क्रिकेट में बल्लेबाज तेज गेंद को बल्ले तक पहुँचने के बाद देखकर निर्णय नहीं करता। गेंद की गति, गेंदबाज के हाथ, रिलीज़ का कोण और पिछले अनुभव से दिमाग पहले ही संभावित रास्ते का अनुमान लगा रहा होता है।कार चलाते समय भी यही है। आप केवल सामने वाली कार की वर्तमान स्थिति नहीं देखते; आपका मस्तिष्क लगातार अनुमान करता है, वह ब्रेक लगाएगी? पैदल यात्री सड़क पार करेगा? सामने की बाइक मुड़ेगी? अर्थात भविष्यवाणी केवल ‘देखने’ में नहीं, जीवित रहने और सही समय पर काम करने की बुनियादी प्रक्रिया है।

एक सामाजिक पहलू भी है

लेकिन इसी व्यवस्था का एक सामाजिक पहलू भी है। हमारी पूर्व धारणाएँ कभी-कभी इस बात को प्रभावित कर सकती हैं कि हम लोगों के चेहरे, व्यवहार या अस्पष्ट परिस्थितियों की व्याख्या कैसे करते हैं। यदि हम पहले से किसी व्यक्ति से डरते हैं तो उसका तटस्थ चेहरा भी अधिक धमकीपूर्ण लग सकता है। यदि किसी से बहुत लगाव है तो उसी अस्पष्ट व्यवहार को सकारात्मक अर्थ दिया जा सकता है। यानी मस्तिष्क का ‘पूर्वानुमान’ केवल दृश्य आकृतियों तक सीमित नहीं। स्मृति, भावना और परिस्थिति भी उसे प्रभावित कर सकती हैं।इसी कारण प्रत्यक्षदर्शी की गवाही हमेशा कैमरा रिकॉर्डिंग जैसी नहीं होती। व्यक्ति वास्तव में जो देखता है, वह उस समय के ध्यान, डर, अपेक्षा और बाद की स्मृति से प्रभावित हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह जानबूझकर झूठ बोल रहा है। उसकी अनुभूति स्वयं एक व्याख्यायित अनुभव थी।

सपनों और मतिभ्रम में क्या होता है?

सपनों और मतिभ्रम में यही समीकरण और रोचक हो जाता है। सामान्य दृष्टि में बाहर से आने वाली वास्तविक संवेदनात्मक सूचना बहुत शक्तिशाली होती है और गलत अनुमान को सुधारती रहती है। यदि मस्तिष्क के आंतरिक मॉडल का प्रभाव अत्यधिक हो जाए या संवेदनात्मक प्रमाण का वजन कम हो जाए, तो व्यक्ति ऐसी चीज का अनुभव कर सकता है जो बाहर मौजूद नहीं है। Predictive processing का इस्तेमाल मनोविकृति और मतिभ्रम के कुछ पहलुओं को समझने के लिए भी किया जा रहा है, हालांकि यह उनका अकेला कारण नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया को एक बहुत सरल सूत्र में समझें:

मस्तिष्क कहता है: “मुझे लगता है कि सामने यह है।” आँख कहती है: “यह रही वास्तविक सूचना।” फिर मस्तिष्क दोनों का अंतर देखता है। यदि दोनों मिल गए तो अनुभव सहज चलता है। अगर थोड़ा अंतर है तो मस्तिष्क धारणा सुधारता है। अगर बहुत बड़ा अंतर है तो ध्यान तुरंत वहाँ जाता है और नया मॉडल बनता है।

इसीलिए वैज्ञानिक दृष्टि से हम दुनिया को केवल ‘देखते’ नहीं हैं। हम उसे लगातार अनुमान लगाकर, जाँचकर और सुधारकर अनुभव करते हैं।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यही है कि यह प्रक्रिया वास्तविकता को मनमाने ढंग से बनाने की अनुमति नहीं देती। यदि सामने लाल कार है तो सामान्य परिस्थितियों में केवल यह उम्मीद करने से कि वह नीली है, वह नीली दिखाई नहीं देगी। बाहरी संवेदनात्मक प्रमाण मजबूत होने पर वह हमारे अनुमान को पराजित कर देता है। अपेक्षाओं का प्रभाव सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सूचना कमजोर, अस्पष्ट, बहुत तेज या अधूरी हो।

इसीलिए प्रश्न का सबसे सटीक उत्तर यह होगा कि हमारा दिमाग पहले से यह अंतिम निर्णय नहीं करता कि वह क्या देखने वाला है; वह पहले एक संभावना तैयार करता है। फिर आंखों से आने वाले प्रमाण के आधार पर उस संभावना को स्वीकार, संशोधित या अस्वीकार करता है।और शायद इसी कारण हमारी दृष्टि इतनी तेज है। यदि मस्तिष्क को हर क्षण दुनिया को शून्य से बनाना पड़ता, तो हम बहुत धीमे होते। वह पुराने अनुभव से भविष्य का छोटा-सा अनुमान बनाकर हमेशा वास्तविकता से कुछ मिलीसेकंड आगे रहने की कोशिश करता है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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