Newstrack Special: हमें उदास गाने अच्छे क्यों लगते हैं? दुखी संगीत से खुशी क्यों मिलती है

Sad Music Psychology Explained in Hindi: उदास गाने सुनकर हमें सुकून और खुशी क्यों मिलती है? जानिए संगीत, दिमाग, डोपामिन, यादों, भावनाओं और आनंददायक उदासी के पीछे का विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 23 Aug 2026 5:38 PM IST
Sad Music Psychology Explained in Hindi
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Sad Music Psychology Explained in Hindi

Sad Music Psychology Explained in Hindi: यह मनुष्य के भावनात्मक जीवन के सबसे सुंदर विरोधाभासों में से एक है। वास्तविक जीवन में हम दुख, बिछोह और अकेलेपन से बचना चाहते हैं लेकिन वही दुख जब गीत, ग़ज़ल या संगीत के रूप में आता है तो हम उसे बार-बार सुनते हैं। कभी आँखें नम हो जाती हैं, फिर भी भीतर एक अजीब सा सुकून मिलता है। वैज्ञानिक इसे कभी-कभी ‘आनंददायक उदासी’ के विरोधाभास से समझाते हैं। शोध का निष्कर्ष यह नहीं है कि दिमाग को दुख ही पसंद है बल्कि संगीत हमें दुख को बिना वास्तविक खतरे के महसूस करने, समझने और नियंत्रित करने का सुरक्षित अवसर देता है। यही दुख धीरे-धीरे सांत्वना, स्मृति, आत्मचिंतन और सौंदर्य के अनुभव में बदल सकता है।

असली दुख और संगीत के दुख में क्या फर्क है?

मान लीजिए किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उस दुख के साथ वास्तविक नुकसान जुड़ा है; उसे आप बंद नहीं कर सकते। लेकिन यदि आप विरह का गीत सुन रहे हैं, तो गीत में दुख है, आपके सामने वास्तविक संकट नहीं। आप जानते हैं कि यह संगीत है। यदि भावनाएँ बहुत तीव्र हो जाएँ तो गाना बंद किया जा सकता है। यही सुरक्षा दिमाग को ऐसी भावना अनुभव करने देती है जिससे वास्तविक जीवन में वह बचना चाहता है। व्यवस्थित समीक्षाओं में दुखद संगीत से मिलने वाले सुख के लिए ‘दुख का सुरक्षित और गैर-खतरनाक संदर्भ’ एक प्रमुख व्याख्या पाया गया है।

यानी अंतर यह है कि जीवन का दुख हमें पकड़ लेता है।संगीत का दुख हम स्वयं चुनते हैं। और चुना हुआ दुख मनोवैज्ञानिक रूप से बिल्कुल अलग अनुभव है। मान लीजिए आपका दिल टूटा है। कोई खुशहाल नृत्य-गीत बज रहा है जिसमें सब कुछ सुंदर और उत्सवपूर्ण है। वह आपकी वर्तमान भावनात्मक स्थिति से मेल नहीं खाता। लेकिन तभी कोई गीत कहता है -‘मैं भी उसी अकेलेपन से गुजर रहा हूँ।’ अचानक आपको लगता है कि किसी ने आपके भीतर की बात कह दी। दुख खत्म नहीं हुआ, लेकिन अकेलापन थोड़ा कम हो गया।

उदास संगीत हमें भावनात्मक मान्यता क्यों देता है?

इसीलिए उदास संगीत का एक बड़ा काम भावनात्मक मान्यता देना है। वह हमें बताता है कि जो तुम महसूस कर रहे हो, वह केवल तुम्हारे साथ नहीं हो रहा। कोई कवि, संगीतकार या गायक कभी इसी भाव से गुजरा और उसने उसे शब्द तथा सुर दे दिए।

2014 में 772 लोगों पर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में उदास संगीत से मिलने वाले चार प्रमुख लाभ सामने आए - कल्पना, भावनाओं का नियमन, सहानुभूति और यह सुरक्षा कि संगीत के दुख के वास्तविक जीवन जैसे परिणाम नहीं हैं। दिलचस्प रूप से प्रतिभागियों ने सबसे अधिक बार केवल ‘दुख’ नहीं बल्कि पुरानी यादों से जुड़ी भावुकता महसूस की। स्मृति भी दुखद संगीत के प्रभाव का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता निकली।

एक पुराना गाना पूरी जिंदगी को वापस कैसे ले आता है?

यही वजह है कि कई बार गीत स्वयं उतना दुखद नहीं होता जितना हमारी उससे जुड़ी कहानी दुखद होती है।

कॉलेज के दिनों का गीत। किसी पुराने प्रेम से जुड़ा गीत। माँ-पिता के साथ सुना हुआ गीत। किसी दोस्त के साथ लंबी यात्रा में सुना गीत।

वर्षों बाद वही धुन बजती है और कुछ ही सेकंड में पूरा समय लौट आता है। कमरा वही नहीं, लोग वही नहीं, उम्र वही नहीं लेकिन दिमाग भावनात्मक स्मृति के सहारे उस समय का कुछ हिस्सा फिर जीवित कर देता है।

संगीत और स्मृति के संबंध में हिप्पोकैम्पस सहित स्मृति से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका है। परिचित धुनें भावनात्मक स्मृतियों को विशेष रूप से शक्तिशाली ढंग से सक्रिय कर सकती हैं। इसीलिए उदास गाना कई बार एक तरह की समय-मशीन बन जाता है।

हम एक ही समय में दुखी और खुश कैसे हो सकते हैं?

अब सवाल आता है कि यदि गीत हमें वास्तव में उदास करता है, तो आनंद कहाँ से आता है?

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण शोध-परिणाम है। संगीत सुनते समय हम दो अलग बातें अनुभव कर सकते हैं। संगीत में कौन-सी भावना पहचान रहे हैं और स्वयं कौन-सी भावना महसूस कर रहे हैं।

कोई धुन स्पष्ट रूप से दुखद लग सकती है। लेकिन उसे सुनते हुए हमारे भीतर केवल पीड़ा नहीं बल्कि कोमलता, शांति, भावुकता, सौंदर्य और आनंद एक साथ पैदा हो सकते हैं। प्रयोगों में पाया गया है कि लोग जिस संगीत को “दुखद” पहचानते हैं, उसे सुनकर कई बार अपेक्षाकृत सुखद मिश्रित भावनाएँ भी अनुभव करते हैं।

यानी हम एक ही समय में दुखी और प्रसन्न हो सकते हैं।

यह विरोधाभास लगता है क्योंकि रोजमर्रा की भाषा भावनाओं को अलग-अलग डिब्बों में रखती है - खुशी या दुख। लेकिन मस्तिष्क ऐसा नहीं है। एक ही अनुभव में पुरानी याद, प्रेम, पीड़ा, राहत और सौंदर्य साथ मौजूद हो सकते हैं।

शायद आपने किसी पुराने व्यक्ति को याद करते हुए कभी मुस्कुराते हुए आँसू बहाए हों। यह न शुद्ध खुशी है, न शुद्ध दुख। यही मिश्रित भावना उदास संगीत में बहुत सामान्य है।

‘दिल को छू जाने’ में इतना आनंद क्यों मिलता है?

शोधकर्ता इस अनुभव को अक्सर ‘भीतर तक छू जाने’ या भाव-विह्वल होने से जोड़ते हैं। अध्ययनों में पाया गया कि उदास संगीत से मिलने वाला आनंद केवल इस कारण नहीं कि दुख के साथ कोई अलग खुशी जुड़ गई; बल्कि भाव-विह्वल होने का अनुभव स्वयं आनंद का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है।

यही कारण है कि हम कहते हैं कि ‘गाना बहुत दर्दनाक है, लेकिन कितना खूबसूरत है।’

दर्द और खूबसूरती एक-दूसरे को समाप्त नहीं कर रहे। दोनों मिलकर तीसरा अनुभव बना रहे हैं : भाव-विभोरता।

उदास संगीत सुनते समय दिमाग में क्या होता है?

संगीत सुनना केवल कान का काम नहीं है। आवाज सबसे पहले श्रवण क्षेत्रों में संसाधित होती है, लेकिन भावनात्मक संगीत जल्दी ही मस्तिष्क के कई बड़े नेटवर्कों को साथ जोड़ देता है।

इनमें अमिग्डाला, जो भावनात्मक महत्व पहचानने में भूमिका निभाता है; हिप्पोकैम्पस, जो स्मृतियों से जुड़ा है; इंसुला, जो शरीर और भावनात्मक अनुभव से जुड़ी है; अग्र सिंगुलेट क्षेत्र, जो भावना और ध्यान में भूमिका निभाता है; और स्ट्रायटम तथा न्यूक्लियस अकम्बेंस, जो पुरस्कार और प्रेरणा तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, शामिल हैं।

2025 की 40 मस्तिष्क-चित्रण अध्ययनों की संयुक्त समीक्षा में भावनात्मक संगीत के दौरान इन्हीं प्रकार के कॉर्टिकल और गहरे मस्तिष्क क्षेत्रों की सक्रियता सामने आई।

यानी उदास संगीत केवल दुख केंद्र नहीं चालू करता। वह स्मृति, भावना, पुरस्कार, ध्यान और शरीर की प्रतिक्रिया को एक साथ जोड़ सकता है। इसीलिए एक तीन मिनट का गीत कभी-कभी किसी लंबे संवाद से अधिक असर कर जाता है।

क्या उदास गाना सुनकर डोपामिन भी निकलता है?

आनंददायक संगीत मस्तिष्क के पुरस्कार तंत्र को सक्रिय कर सकता है और डोपामिन संबंधी प्रक्रियाएँ इसमें शामिल होती हैं। पुराने लेकिन महत्वपूर्ण मस्तिष्क-चित्रण अध्ययनों में वह संगीत, जिससे लोगों को तीव्र आनंद या शरीर में सिहरन हुई, उसने वेंट्रल स्ट्रायटम, मध्य-मस्तिष्क और पुरस्कार से जुड़े दूसरे क्षेत्रों को सक्रिय किया।

ये वही व्यापक तंत्र हैं जो भोजन, यौन पुरस्कार और दूसरे सुखद अनुभवों में भी भूमिका निभाते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ‘उदास गाना सुनते ही डोपामिन की बाढ़ आ जाती है।’ लोकप्रिय इंटरनेट भाषा अक्सर इसे बहुत सरल बना देती है।

संगीत से मिलने वाला आनंद कई मस्तिष्कीय प्रणालियों का संयुक्त परिणाम है। डोपामिन उसका एक हिस्सा है, पूरी कहानी नहीं।

और खासकर उदास संगीत से मिलने वाले सुख का जैविक तंत्र अभी पूरी तरह निश्चित नहीं है। इस विषय की व्यापक समीक्षा ने पाया कि जैविक स्तर पर कई आकर्षक सिद्धांत हैं, लेकिन सबसे मजबूत प्रमाण अभी मनोवैज्ञानिक स्तर जैसे स्मृति, भावना-नियमन, सहानुभूति और भाव-विह्वलता पर हैं।

गाना सुनकर रोंगटे क्यों खड़े हो जाते हैं?

बहुत शक्तिशाली संगीत के दौरान कुछ लोगों को अचानक सिहरन होती है, त्वचा पर रोंगटे खड़े होते हैं या रीढ़ में ठंडक-सी दौड़ती है। इसे संगीतजनित ‘सिहरन’ कहा जाता है।

यह अक्सर तब होता है जब संगीत में अचानक सुर बदलता है, आवाज चरम पर पहुँचती है, लंबे तनाव के बाद समाधान आता है या कोई अपेक्षित धुन अप्रत्याशित रूप से सुंदर ढंग से लौटती है।

ऐसे क्षणों में शरीर की स्वायत्त तंत्रिका प्रणाली भी सक्रिय होती है। हृदय गति, श्वास और त्वचा की विद्युत प्रतिक्रिया बदल सकती है। अध्ययन बताते हैं कि ये चरम संगीतिक अनुभव पुरस्कार तंत्र से जुड़े होते हैं।

उदास गाने सुनकर आँसू क्यों आते हैं?

लेकिन दुखद संगीत में एक दूसरी प्रतिक्रिया भी होती है। आँसू के रूप में।

दिलचस्प बात यह है कि संगीत से आए आँसू हमेशा पीड़ा की जैविक स्थिति नहीं बनाते। एक प्रयोग में पाया गया कि दुखद संगीत से आँसू आने पर श्वास धीमी हुई, जबकि आनंद भी बना रहा।

शोधकर्ताओं ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि आँसू वाला दुखद संगीत अनुभव एक साथ भावनात्मक रूप से तीव्र और शरीर के स्तर पर शांत करने वाला हो सकता है।

यानी हम रो रहे हैं लेकिन संभव है शरीर उसी समय कुछ हद तक शांत भी हो रहा हो। इसीलिए अच्छी ग़ज़ल सुनकर रो लेने के बाद कई लोग कहते हैं मन हल्का हो गया।

क्या उदास संगीत सुनना भावनाओं की ‘सफाई’ जैसा है?

अरस्तू से जुड़ी पुरानी धारणा है कि कला दुख और भय जैसी भावनाओं को सुरक्षित तरीके से अनुभव कराकर एक प्रकार की भावनात्मक शुद्धि या राहत देती है। आधुनिक मनोविज्ञान में “भावना बाहर निकाल दी और खत्म हो गई” जैसा सरल मॉडल पूरी तरह स्वीकार नहीं है।

फिर भी संगीत भावनाओं को पहचानने और नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

मान लें आप परेशान हैं लेकिन आपको ठीक पता नहीं कि क्यों। उदास गीत सुनते-सुनते भावनाओं को शब्द और आकार मिल जाता है। आप सोचते हैं - हाँ, मैं अकेला महसूस कर रहा हूँ या मैं उस व्यक्ति को याद कर रहा हूँ।

अस्पष्ट बेचैनी एक पहचानी हुई भावना बन गई।

और पहचानी हुई भावना को संभालना अक्सर आसान होता है। इस अर्थ में उदास संगीत एक भावनात्मक दर्पण बन सकता है।

जब हम दुखी हों तो उदास गाने ज्यादा अच्छे क्यों लगते हैं?

क्योंकि हमारी वर्तमान मनःस्थिति और संगीत का भाव मेल खा सकता है। इसे मनोदशा-संगति की प्रवृत्ति कहा जा सकता है।

772 लोगों वाले अध्ययन में दुखद संगीत पसंद करना व्यक्ति की तत्काल मनोदशा से भी जुड़ा पाया गया। यदि आप दुखी हैं और कोई बहुत उत्साही गीत सुना दिया जाए तो वह लगभग भावनात्मक असत्य जैसा महसूस कर सकता है।

लेकिन दुखद गीत कहता है कि हाँ, यह समय कठिन है।”

पहले वह आपकी वर्तमान भावना से जुड़ता है। फिर कई बार संगीत उस भावना को धीरे-धीरे व्यवस्थित करता है। यही कारण है कि भावनात्मक नियमन के लिए हम हमेशा अपनी भावना के ठीक विपरीत संगीत नहीं चुनते। कई बार पहले उसी भावना वाले संगीत में प्रवेश करते हैं और फिर उससे सांत्वना पाते हैं।

क्या उदास संगीत सुनने में सहानुभूति की भूमिका होती है?

कुछ लोगों को गीत के पात्र या गायक की पीड़ा लगभग अपनी लगती है। अत्यधिक सहानुभूतिशील लोगों में उदास संगीत से आनंद और भाव-विह्वलता का संबंध अधिक मजबूत पाया गया है।

बड़े सर्वेक्षण में भी सहानुभूति, यानी दूसरे की भावना महसूस करने की प्रवृत्ति, उदास संगीत की पसंद से जुड़ी थी। यही कारण है कि किसी प्रेम-विरह के गीत का आनंद लेने के लिए आपका स्वयं प्रेम-विच्छेद से गुजरना जरूरी नहीं। आप कहानी के भीतर भावनात्मक रूप से प्रवेश कर सकते हैं। एक अर्थ में संगीत हमें किसी दूसरे का दुख उधार लेकर महसूस करने देता है। बिना उस वास्तविक नुकसान को भोगे। और यह मनुष्य की सामाजिक क्षमता का अभ्यास भी हो सकता है।

क्या उदास संगीत अकेलेपन को भी कम कर सकता है?

जब मनुष्य दुखी होता है तो उसे केवल समाधान नहीं चाहिए; कभी-कभी उसे साथ चाहिए। गीत वह साथ दे सकता है। आप कमरे में अकेले हैं। लेकिन आवाज कह रही है कि किसी और ने भी खोया है, इंतजार किया है, टूटकर प्रेम किया है या बिछोह सहा है।

मनोवैज्ञानिक शोध में इसे कभी-कभी सामाजिक प्रतिस्थापन की संभावना से जोड़ा गया है। कला या संगीत किसी वास्तविक व्यक्ति की जगह नहीं लेता, लेकिन वह अस्थायी रूप से भावनात्मक साथी जैसा अनुभव दे सकता है।

उदास संगीत के आनंद पर व्यापक समीक्षा में इस प्रकार के सामाजिक और सांत्वनात्मक कार्यों को महत्वपूर्ण संभावित तंत्र माना गया है। इसीलिए अकेलेपन में सुनी गई ग़ज़ल कई बार खुशी के गीत से ज्यादा सांत्वना देती है। वह कहती है कि तुम्हारा दुख भाषा में मौजूद है। और जिस दुख की भाषा मिल जाए, वह थोड़ा कम अकेला हो जाता है।

कविता और ग़ज़ल वाले उदास गीत ज्यादा गहरे क्यों लगते हैं?

क्योंकि वहाँ संगीत के साथ भाषा भी काम कर रही है।

धुन शरीर और भावना को छूती है। शब्द अर्थ देते हैं। आवाज मानवीय उपस्थिति देती है। और आपकी अपनी स्मृति चौथी परत जोड़ती है।

मान लीजिए केवल वायलिन की उदास धुन सुनते हैं। वह आपको भावुक कर सकती है। लेकिन वही संगीत किसी ऐसी पंक्ति के साथ जुड़ जाए जो आपके जीवन की घटना से मेल खाती हो तो प्रभाव कई गुना हो सकता है।

इसलिए ग़ज़ल, विरह-गीत और शोक-गीत हजारों वर्षों से मानव संस्कृति में मौजूद हैं। यह केवल मनोरंजन नहीं; भावनात्मक अनुभव को सामूहिक भाषा देने का सांस्कृतिक साधन भी है।

क्या हर व्यक्ति को उदास संगीत पसंद आता है?

इसमें व्यक्तित्व, परिस्थिति, संगीत प्रशिक्षण, संस्कृति, वर्तमान मनोदशा और व्यक्तिगत स्मृतियाँ सभी असर डालती हैं। कुछ लोगों को दुखद संगीत सुंदर और शांत लगता है। कुछ को वह और परेशान करता है।

अधिक सहानुभूति रखने वाले लोगों में इसकी पसंद अधिक पाई गई है। भावनात्मक स्थिरता में अंतर भी प्रभाव डाल सकता है। और यदि कोई गीत बहुत व्यक्तिगत आघात से जुड़ा हो तो ‘सुरक्षित कलात्मक दुख’ वाली दूरी समाप्त हो सकती है।

तब वह सुख देने की बजाय वास्तविक पीड़ा को बहुत तीव्र कर सकता है। इसलिए उदास संगीत का आनंद तभी संभव है जब किसी स्तर पर दिमाग कह सके कि मैं इस भावना को महसूस कर रहा हूँ, लेकिन मैं सुरक्षित हूँ।

क्या दुख अपने आप में भी आनंददायक हो सकता है?

एक पुरानी व्याख्या कहती है कि दुख स्वयं अप्रिय है। लेकिन उसके साथ पुरानी याद, सौंदर्य, सांत्वना या भाव-विह्वलता जैसी सकारात्मक चीजें जुड़ जाती हैं और कुल अनुभव सुखद बन जाता है।

दूसरी धारणा कहती है कि सुरक्षित कलात्मक संदर्भ में दुख की भावना स्वयं भी आनंददायक रूप ले सकती है।

2024 के एक प्रयोग में प्रतिभागियों से उनका पसंदीदा दुखद संगीत चुनवाया गया और उनसे कल्पना करने को कहा गया कि यदि उस संगीत से दुख वाला तत्व हटा दिया जाए तो क्या होगा। अधिकांश मामलों में लोगों ने माना कि दुख हट जाने पर संगीत कम पसंद आएगा।

इससे संकेत मिलता है कि कम-से-कम कुछ परिस्थितियों में दुख केवल सहन किया जाने वाला दुष्प्रभाव नहीं, बल्कि संगीत के आनंद का हिस्सा स्वयं हो सकता है।

हम उदास गीत को उसके दुख के बावजूद नहीं, कई बार उसके दुख के कारण भी पसंद कर सकते हैं।

असली दुख और गीत वाला दुख इतने अलग क्यों हैं?

क्योंकि वास्तविक दुख कार्रवाई माँगता है। यदि आपका बच्चा खो गया है, नौकरी चली गई है या किसी प्रिय की मृत्यु हुई है, तो मस्तिष्क उस भावना को वास्तविक समस्या से जोड़ता है। नियंत्रण कम है और परिणाम वास्तविक हैं। संगीत में दुख का प्रतिनिधित्व है। कोई वास्तविक खतरा नहीं। आपके पास नियंत्रण है। उसमें सौंदर्य और संरचना है। धुन शुरू होती है, विकसित होती है और समाप्त होती है।

वास्तविक जीवन का दुख अक्सर अव्यवस्थित होता है। संगीत दुख को रूप और क्रम दे देता है। यह भी उसके आनंद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

वास्तविक बिछोह में कोई ताल नहीं। लेकिन ग़ज़ल उस बिछोह को सुर, तुक, लय और अर्थ दे देती है। दुख अब केवल अराजक पीड़ा नहीं रहा, वह सुंदर संरचना बन गया।

संगीत का अगला सुर दिमाग को इतना रोमांचित क्यों करता है?

हाँ, और यही संगीत के आनंद का एक और बड़ा विज्ञान है। जब हम संगीत सुनते हैं तो दिमाग लगातार अनुमान लगाता रहता है कि अगला सुर क्या होगा, ताल कहाँ बदलेगी, मुखड़ा कब लौटेगा, स्वर कहाँ चढ़ेगा।

संगीतकार इन अपेक्षाओं से खेलता है। कभी ठीक वही देता है जिसकी आशा थी, कभी थोड़ा विलंब करता है, कभी अचानक मोड़ देता है।

अपेक्षा और उसका समाधान पुरस्कार तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। उदास संगीत अक्सर धीमी गति, सुरों के विशेष अंतराल, कोमल आवाज और अपेक्षा-समाधान का इस्तेमाल करके तनाव और राहत का चक्र बनाता है।

इसीलिए केवल गीत के शब्द हटाने पर भी वायलिन, सरंगी या पियानो हमें उदास कर सकते हैं। दिमाग शब्द नहीं सुन रहा, फिर भी संगीत की संरचना से भावनात्मक अर्थ निकाल रहा है।

क्या उदास गाने सुनना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है?

सामान्य परिस्थितियों में उदास संगीत भावनात्मक नियमन, आत्मचिंतन और सांत्वना का उपयोगी साधन हो सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अवसाद या अत्यधिक नकारात्मक विचारों में फँसा है और ऐसा संगीत उसे राहत देने के बजाय उसी विचार-चक्र में और गहरा धकेल रहा है, तो प्रभाव उलटा भी हो सकता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि गाना उदास है।

सवाल है कि उसे सुनने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं? यदि मन शांत, समझा हुआ और हल्का महसूस करता है, तो संगीत भावनात्मक नियमन में मदद कर रहा है। यदि बार-बार सुनने के बाद निराशा, आत्म-आलोचना या उसी नकारात्मक विचार में फँसना बढ़ रहा है, तो वह उस समय उपयोगी नहीं हो सकता।

उदास संगीत को अपने-आप ‘इलाज’ भी नहीं माना जाना चाहिए। संगीत और मानसिक स्वास्थ्य पर शोध आशाजनक है, लेकिन गंभीर अवसाद का स्थानापन्न उपचार नहीं।

दर्द वाले गीत सबसे ज्यादा याद क्यों रहते हैं?

क्योंकि वे केवल धुन नहीं रह जाते। वे स्मृति के निशान बन जाते हैं। जिस समय भावना बहुत तीव्र होती है, उस समय मौजूद संगीत उस घटना से मजबूती से जुड़ सकता है। वर्षों बाद वही गीत बजते ही केवल गीत नहीं लौटता।उस समय का कमरा, व्यक्ति, मौसम, उम्र और मनःस्थिति भी लौट सकती है। शायद यही कारण है कि युवावस्था के गीत जीवनभर इतने शक्तिशाली रहते हैं। वे केवल ‘संगीत’ के रूप में जमा नहीं होते। वे जीवन के अध्यायों के पते बन जाते हैं।

तो आखिर हमें उदास गाने अच्छे क्यों लगते हैं?

और अंततः इसी में हमारे प्रश्न का उत्तर छिपा है। हमें उदास गाने इसलिए अच्छे नहीं लगते कि हमारा मस्तिष्क दुख चाहता है। हमें वे इसलिए अच्छे लग सकते हैं क्योंकि संगीत दुख को ऐसी जगह ले जाता है जहाँ वह सुरक्षित है, सुंदर है, नियंत्रित है और अर्थपूर्ण है।

वह निजी पीड़ा को साझा मानवीय अनुभव में बदल देता है। वह पुरानी स्मृतियाँ खोलता है, हमें भावनाएँ पहचानने देता है, अकेलेपन में साथ देता है और कभी-कभी आँसुओं के साथ शरीर को शांत भी करता है। इसी दौरान पुरस्कार, भावना और स्मृति से जुड़े मस्तिष्कीय तंत्र एक साथ सक्रिय हो सकते हैं।

इसे सबसे सरल रूप में कहें तो वास्तविक दुख हमें घायल करता है। उदास संगीत हमें उस घाव को सुरक्षित दूरी से छूने देता है।

और जब कोई गीत हमारे भीतर के अनकहे दुख को सुर और शब्द दे देता है, तो दिमाग को केवल दुख नहीं मिलता। उसे एक और चीज मिलती है—यह अनुभूति कि मेरे दर्द का भी कोई अर्थ, कोई भाषा और कोई साथी है।

शायद इसी वजह से कभी-कभी सबसे ज्यादा सुकून हमें उस गीत से मिलता है, जिसे सुनते हुए हमारी आँखें भर आती हैं।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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