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Self Fulfilling Prophecy क्या है? सोच कैसे बदलती है भविष्य
Self Fulfilling Prophecy क्या है और नकारात्मक सोच हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है? जानिए Manifestation, Law of Attraction और सकारात्मक सोच के पीछे का विज्ञान।
Self Fulfilling Prophecy Meaning in Hindi | Newstrack Hindi News
Self Fulfilling Prophecy: दो लोग एक ही नौकरी के इंटरव्यू के लिए जा रहे हैं। दोनों की योग्यता लगभग बराबर है, दोनों ने एक जैसी तैयारी की है। लेकिन पहले व्यक्ति के मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा है, "मुझसे नहीं होगा। मैं इंटरव्यू में जरूर गड़बड़ करूंगा।" दूसरा सोचता है, "मैं पूरी कोशिश करूंगा। हो सकता है कि मेरा चयन हो जाए।"
इंटरव्यू शुरू होता है। पहले व्यक्ति का आत्मविश्वास डगमगाता है। वह सवालों के जवाब जानते हुए भी घबराने लगता है, अपनी बात ठीक से नहीं रख पाता और छोटी-छोटी गलतियां करने लगता है। दूसरा व्यक्ति शांत रहने की कोशिश करता है, सवाल ध्यान से सुनता है और आत्मविश्वास के साथ जवाब देता है। कुछ दिनों बाद नतीजा आता है। पहले व्यक्ति का चयन नहीं हुआ, जबकि दूसरे को नौकरी मिल गई।
अब सवाल है, क्या पहले व्यक्ति ने पहले ही सोच लिया था कि वह असफल होगा, इसलिए उसकी असफलता तय हो गई? क्या दूसरे व्यक्ति की सकारात्मक सोच ने उसकी सफलता को सच कर दिया? ऐसा लग सकता है कि हमारे विचारों ने भविष्य की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन मनोविज्ञान में इससे जुड़ी एक दिलचस्प अवधारणा है, जिसे सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी यानी स्वयंसिद्ध होती भविष्यवाणी कहा जाता है।
इसके साथ ही एक और लोकप्रिय शब्द है, मेनिफेस्टेशन। सोशल मीडिया पर इसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि अगर आप किसी चीज को पूरे विश्वास के साथ सोचें, उसकी कल्पना करें और उसे अपने जीवन में पाने की इच्छा रखें, तो ब्रह्मांड उसे आपकी जिंदगी में ले आता है।
लेकिन क्या ये दोनों एक ही चीज हैं? क्या केवल सोचने से नौकरी, पैसा, सफलता या मनचाहा रिश्ता मिल सकता है? या इसके पीछे दिमाग, व्यवहार और फैसलों का कोई ऐसा खेल है, जिसे हम अक्सर समझ नहीं पाते?
जवाब दिलचस्प है। क्योंकि हमारे विचार भविष्य को जादुई तरीके से नहीं बदलते, लेकिन वे हमारे फैसलों और व्यवहार को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं कि भविष्य सचमुच बदलने लगे।
सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी: जब आपकी धारणा ही आपके भविष्य को प्रभावित करने लगती है
सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी को समझने के लिए एक आसान उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए, एक छात्र को लगता है कि वह गणित में कमजोर है। परीक्षा नजदीक आती है, लेकिन वह मन ही मन मान चुका है कि वह अच्छे नंबर नहीं ला सकता। इसलिए वह मुश्किल सवालों से बचने लगता है, पढ़ाई कम करता है और जहां सवाल समझ नहीं आता, वहां कोशिश करने के बजाय किताब बंद कर देता है।
परीक्षा में उसके नंबर कम आते हैं। अब वह खुद से कहता है, "देखा, मुझे पहले से पता था कि मैं गणित में अच्छा नहीं कर सकता।" लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। क्या वह सचमुच गणित में कमजोर होने के कारण कम नंबर लाया, या कम नंबर आने की उसकी आशंका ने उसे इस तरह व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया कि असफलता की संभावना बढ़ गई?
हो सकता है कि उसके नंबर कम आने के पीछे दूसरे कारण भी हों। लेकिन अगर उसकी धारणा ने उसकी तैयारी और प्रयास को प्रभावित किया, तो यह सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी का उदाहरण हो सकता है।
मनोविज्ञान में इस अवधारणा का संबंध समाजशास्त्री रॉबर्ट के. मर्टन से जोड़ा जाता है, जिन्होंने 1948 में इसे विस्तार से समझाया था। इसका मूल विचार यह है कि किसी स्थिति के बारे में हमारी धारणा हमारे व्यवहार को बदल सकती है और वह बदला हुआ व्यवहार अंततः उसी नतीजे को जन्म दे सकता है, जिसकी हमने पहले से कल्पना कर रखी थी। इसे एक चक्र के रूप में समझिए
आप किसी नतीजे की उम्मीद करते हैं। उस उम्मीद के आधार पर आपके फैसले बदलते हैं। फैसलों के कारण आपका व्यवहार बदलता है। और आपका व्यवहार उस नतीजे की संभावना को प्रभावित करता है।
नकारात्मक सोच कैसे अपने ही डर को सच कर सकती है?
मान लीजिए, आपको लगता है कि कोई व्यक्ति आपको पसंद नहीं करता। अगली बार जब आप उससे मिलते हैं, तो आप सहज होकर बात नहीं करते। आप उसकी आंखों में देखने से बचते हैं, उसके सामान्य सवालों का भी छोटा-सा जवाब देते हैं और बातचीत जल्दी खत्म करने की कोशिश करते हैं। आपका यह व्यवहार देखकर सामने वाला भी असहज हो सकता है। वह सोच सकता है कि शायद आप उससे बात नहीं करना चाहते। धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
कुछ समय बाद आप निष्कर्ष निकालते हैं, "मुझे पहले से पता था कि वह मुझे पसंद नहीं करता।"
लेकिन क्या शुरुआत में ऐसा सचमुच था? संभव है कि सामने वाले के मन में आपके लिए कोई नकारात्मक भावना रही ही न हो। हो सकता है कि आपकी आशंका ने आपके व्यवहार को बदला और फिर उसी व्यवहार ने रिश्ते में दूरी पैदा कर दी। यही सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी का एक दिलचस्प पहलू है। कई बार हम केवल भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर रहे होते, बल्कि अनजाने में उसे आकार देने में भी भूमिका निभा रहे होते हैं।
क्या सकारात्मक सोच भी इसी तरह काम करती है?
कुछ परिस्थितियों में सकारात्मक उम्मीदें भी हमारे व्यवहार को बदल सकती हैं। मान लीजिए, एक व्यक्ति नौकरी बदलना चाहता है। वह सोचता है कि उसे बेहतर नौकरी मिल सकती है। इस उम्मीद के कारण वह नई स्किल सीखना शुरू करता है, अपना रिज्यूमे सुधारता है, लोगों से संपर्क करता है और नियमित रूप से नौकरियों के लिए आवेदन करता है।
दूसरी ओर, कोई व्यक्ति यह मानकर बैठा है कि उसे कहीं बेहतर अवसर नहीं मिलेगा। वह आवेदन करने से पहले ही हार मान लेता है और अपनी मौजूदा स्थिति बदलने के लिए बहुत कम कोशिश करता है। कुछ महीनों बाद पहले व्यक्ति को बेहतर नौकरी मिल जाती है।
क्या उसकी सकारात्मक सोच ने उसे नौकरी दिलाई?
सीधे तौर पर नहीं। नौकरी मिलने में उसकी योग्यता, तैयारी, बाजार की स्थिति, उपलब्ध अवसर और नियोक्ता का निर्णय भी शामिल थे। लेकिन उसकी सकारात्मक उम्मीद ने उसे वे कदम उठाने के लिए प्रेरित किया हो सकता है, जिन्होंने नौकरी मिलने की संभावना बढ़ाई।
सकारात्मक सोच का सबसे व्यावहारिक फायदा यह है कि वह हमें कोशिश करने, अवसर पहचानने और असफलता के बाद दोबारा उठने के लिए प्रेरित कर सकती है।
मेनिफेस्टेशन क्या है? क्या ब्रह्मांड हमारी इच्छाएं पूरी करता है?
सोशल मीडिया पर मेनिफेस्टेशन की चर्चा अक्सर सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी से आगे बढ़कर की जाती है। इस विचार के अनुसार, अगर आप किसी चीज को बहुत स्पष्टता और विश्वास के साथ चाहते हैं, उसके बारे में बार-बार सोचते हैं, उसकी कल्पना करते हैं और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखते हैं, तो आप उस चीज को अपनी जिंदगी में आकर्षित कर सकते हैं। मसलन, कोई व्यक्ति हर दिन कल्पना करता है कि उसके पास बहुत पैसा है। वह खुद को एक सफल कारोबारी के रूप में देखता है, अपनी सफलता के बारे में सकारात्मक वाक्य दोहराता है और विश्वास करता है कि एक दिन वह अमीर बन जाएगा।
मेनिफेस्टेशन की लोकप्रिय अवधारणा में इसे कभी-कभी लॉ ऑफ अट्रैक्शन, यानी आकर्षण का नियम, कहा जाता है। इसके अनुसार समान तरह के विचार या ऊर्जा समान तरह के अनुभवों को आकर्षित करते हैं।
इस विचार की लोकप्रियता बढ़ाने में The Secret जैसी किताबों और उनसे जुड़े कार्यक्रमों की भूमिका रही है। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या किसी चीज के बारे में सोचने भर से वह वास्तविक दुनिया में घटित हो सकती है?
विज्ञान के पास इस दावे का भरोसेमंद प्रमाण नहीं है कि केवल विचारों या ब्रह्मांड से किसी इच्छा को मांगने से वह चीज अपने आप हमारी जिंदगी में आ जाती है।
हालांकि, मेनिफेस्टेशन से जुड़ी कुछ गतिविधियां, जैसे लक्ष्य की कल्पना करना, सकारात्मक आत्म-संवाद और अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करना, हमारे व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन यह अलग बात है कि वे ब्रह्मांड को हमारी इच्छाओं के अनुसार बदल देती हैं।
मेनिफेस्टेशन में विश्वास रखने वाले लोगों पर किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे लोग अपनी भविष्य की सफलता को लेकर अधिक आशावादी हो सकते हैं। लेकिन यह विश्वास जोखिम भरे वित्तीय निवेश और अपनी सफलता की संभावना को जरूरत से ज्यादा आंकने जैसी प्रवृत्तियों से भी जुड़ा मिला। अध्ययन ने यह प्रमाणित नहीं किया कि मेनिफेस्टेशन से इच्छित परिणाम जादुई तरीके से हासिल हो जाते हैं। इसलिए मेनिफेस्टेशन को समझते समय दो चीजों में अंतर करना जरूरी है: किसी लक्ष्य को हासिल करने की मानसिक तैयारी और केवल सोचने से बाहरी दुनिया बदल जाने का दावा।
फिर लोगों को क्यों लगता है कि मेनिफेस्टेशन सचमुच काम करता है?
इसके पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं हो सकती हैं।
पहली है, चयनात्मक ध्यान। मान लीजिए, आपने तय किया कि आपको नई नौकरी तलाशनी है। अब आप पहले की तुलना में नौकरी से जुड़ी खबरों, विज्ञापनों और अवसरों पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं। ऐसे अवसर पहले भी मौजूद हो सकते थे, लेकिन अब आपका ध्यान उन पर ज्यादा जा रहा है।
दूसरी है, अपने व्यवहार में बदलाव। जब आप किसी लक्ष्य के बारे में गंभीरता से सोचते हैं, तो आप उससे जुड़े काम करने लग सकते हैं। अगर आप लेखक बनना चाहते हैं, तो लिखने का अभ्यास शुरू कर सकते हैं। अगर आप फिट रहना चाहते हैं, तो नियमित व्यायाम करने लग सकते हैं। अगर आप बेहतर नौकरी चाहते हैं, तो नई स्किल सीख सकते हैं।
तीसरी है, कन्फर्मेशन बायस। इसका अर्थ है कि हम कई बार उन घटनाओं पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो हमारी पहले से मौजूद धारणा की पुष्टि करती हैं, जबकि उसके विपरीत जाने वाली घटनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं।
क्या नकारात्मक सोच से बुरी घटनाएं भी सच हो सकती हैं?
यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी की चर्चा कभी-कभी लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि उनके साथ कुछ बुरा हुआ, तो शायद उनकी सोच ही जिम्मेदार थी। लेकिन यह निष्कर्ष सही नहीं है।
मान लीजिए, कोई व्यक्ति लगातार चिंता करता है कि उसकी नौकरी चली जाएगी। चिंता के कारण उसकी नींद खराब हो सकती है, वह काम पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई महसूस कर सकता है या सहकर्मियों से चिड़चिड़े ढंग से पेश आ सकता है। कुछ परिस्थितियों में ये व्यवहार उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नौकरी जाने की हर घटना नकारात्मक सोच के कारण होती है। कंपनी की आर्थिक स्थिति, छंटनी, प्रबंधन के फैसले और कई दूसरे कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इसी तरह, किसी व्यक्ति की बीमारी, आर्थिक कठिनाई या रिश्ते का टूटना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने गलत विचार किए थे।
हमारी सोच कुछ परिस्थितियों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन दुनिया में होने वाली हर घटना हमारे नियंत्रण में नहीं होती।
अपनी सोच का इस्तेमाल बेहतर जिंदगी के लिए कैसे करें?
अगर आप मेनिफेस्टेशन से जुड़े विचारों को व्यवहारिक रूप में अपनाना चाहते हैं, तो शुरुआत अपने लक्ष्य को स्पष्ट करने से करें। मान लीजिए, आपका लक्ष्य है कि आप छह महीने में नई नौकरी हासिल करें। इसे केवल एक इच्छा की तरह मन में रखने के बजाय तय करें कि किस तरह की नौकरी चाहिए, किन कौशलों की जरूरत है और हर सप्ताह आप कौन-से काम करेंगे।
इसके बाद लक्ष्य हासिल करने की कल्पना करें, लेकिन केवल अंतिम नतीजे की नहीं। खुद को अभ्यास करते हुए, मुश्किल सवालों के जवाब ढूंढते हुए, गलतियों से सीखते हुए और असफलता के बाद दोबारा कोशिश करते हुए भी देखें।
फिर संभावित बाधाओं को पहचानें। अगर आपके पास समय कम है, तो पढ़ाई या तैयारी के लिए निश्चित समय तय करें। अगर इंटरव्यू में घबराहट होती है, तो किसी दोस्त के साथ मॉक इंटरव्यू करें। अगर कौशल की कमी है, तो सीखने की योजना बनाएं।
एक उपयोगी तरीका यह है कि अपने लक्ष्य के साथ एक स्पष्ट योजना भी जोड़ें। उदाहरण के लिए, “अगर शाम को काम के बाद थकान महसूस होगी, तो भी मैं कम से कम 20 मिनट इंटरव्यू की तैयारी करूंगा।”
इस तरह आप सिर्फ यह नहीं सोच रहे कि आपको क्या चाहिए, बल्कि यह भी तय कर रहे हैं कि वास्तविक जीवन में क्या करेंगे।
समय-समय पर अपनी प्रगति की समीक्षा करें। अगर आपकी योजना काम नहीं कर रही, तो उसे बदलें। अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध रहें, लेकिन यह मानकर न चलें कि केवल मजबूत विश्वास के कारण नतीजा जरूर आपकी इच्छा के मुताबिक होगा।
इसलिए अगली बार जब आप किसी बड़े लक्ष्य की कल्पना करें, तो सिर्फ यह मत सोचिए कि एक दिन आप वहां पहुंच जाएंगे। यह भी सोचिए कि आज आप कौन-सा छोटा कदम उठा सकते हैं।
क्योंकि भविष्य की कल्पना करना अच्छी शुरुआत हो सकती है, लेकिन उसे वास्तविकता के करीब लाने का काम आपके आज के फैसले और प्रयास करते हैं।


