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Singapore District Cooling System: ग्लोबल वॉर्मिंग का काट बना यह सिस्टम, AC से ज्यादा असरदार निकली 19वीं सदी की तकनीक
Singapore District Cooling System: सिंगापुर ने 140 साल पुरानी तकनीक से खोजा गर्मी का समाधान, AC से कम खर्च में ठंडी हो रही हैं पूरी इमारतें
Singapore District Cooling System
Singapore District Cooling System: दुनिया भर में बढ़ती गर्मी ने लोगों को घरों तक सीमित रहने को मजबूर कर दिया है। ऐसे में ऊर्जा संकट भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस समस्या से निपटने के लिए सिंगापुर ने इमारतों को ठंडा रखने का एक ऐसा तरीका अपनाया है, जो सुनने में भले ही पुराना लगे, लेकिन आज के दौर में बेहद आधुनिक और कारगर साबित हो रहा है। ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम’ नाम की यह तकनीक एयर कंडीशनर की जगह ठंडे पानी के नेटवर्क का इस्तेमाल करती है। इससे न केवल बिजली की खपत कम होती है, बल्कि शहरों में बढ़ती गर्मी और कार्बन उत्सर्जन को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे देशों के लिए भी यह मॉडल भविष्य में बड़ा समाधान बन सकता है।
25 मीटर नीचे बिछा है ठंडे पानी का विशाल नेटवर्क
सिंगापुर के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पुंगगोल में जमीन से करीब 25 मीटर नीचे ठंडे पानी की पाइपलाइन का विशाल नेटवर्क बनाया गया है। लगभग 5 किलोमीटर लंबे इस नेटवर्क में लगातार ठंडा पानी प्रवाहित किया जाता है। यही पानी ऊपर स्थित कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य भवनों को ठंडा रखने का काम करता है। इस व्यवस्था में हर इमारत में अलग-अलग बड़े एयर कंडीशनर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। केंद्रीय स्तर पर तैयार किया गया ठंडा पानी पाइपों के जरिए विभिन्न भवनों तक पहुंचाया जाता है, जिससे ऊर्जा की बचत होती है।
1889 में अमेरिका से शुरू हुई थी यह तकनीक
डिस्ट्रिक्ट कूलिंग कोई नई खोज नहीं है। इसकी शुरुआत 1889 में अमेरिका के डेनवर शहर में हुई थी। उस समय बड़े भवनों को एक केंद्रीकृत प्रणाली से ठंडा रखने का विचार सामने आया था। हालांकि आधुनिक तकनीक और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ सिंगापुर ने इसे नए स्तर पर पहुंचा दिया है। आज यह प्रणाली सिर्फ भवनों को ठंडा रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरों की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
मरीना बे बना दुनिया का सबसे बड़ा उदाहरण
सिंगापुर का मरीना बे डिस्ट्रिक्ट कूलिंग नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े भूमिगत कूलिंग सिस्टम में गिना जाता है। यहां केवल 18 बड़े चिलर मिलकर 27 गगनचुंबी इमारतों को ठंडा रखते हैं। इस नेटवर्क की खासियत यह है कि इसमें हर इमारत के लिए अलग-अलग कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं होती। एक ही केंद्रीय संयंत्र पूरे इलाके की कूलिंग जरूरतों को पूरा करता है। आने वाले वर्षों में इस नेटवर्क से और इमारतों को जोड़ने की योजना भी बनाई गई है।
बिजली की खपत घटती है, पर्यावरण को भी राहत
विशेषज्ञों के अनुसार डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम पारंपरिक एयर कंडीशनिंग की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा दक्ष है। इससे बिजली की क्षमता में 30 से 50 प्रतिशत तक सुधार संभव है, जबकि कुल बिजली खपत में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी देखी गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सामान्य AC की तरह यह तकनीक बाहरी वातावरण में अतिरिक्त गर्म हवा नहीं छोड़ती। यही कारण है कि यह शहरी क्षेत्रों में बढ़ते ‘हीट आइलैंड इफेक्ट’ को कम करने में भी मददगार मानी जाती है।
मिडिल ईस्ट में तेजी से बढ़ रही लोकप्रियता
सिंगापुर के अलावा संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और बहरीन जैसे देशों में भी डिस्ट्रिक्ट कूलिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इन देशों में अत्यधिक गर्म मौसम और बड़े शहरी विकास प्रोजेक्ट्स के कारण यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हुई है। मिडिल ईस्ट के कई नए शहरों और बिजनेस जिलों में अब शुरुआत से ही डिस्ट्रिक्ट कूलिंग नेटवर्क को इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बनाया जा रहा है। इससे दीर्घकालिक ऊर्जा लागत में बड़ी बचत हो रही है।
बढ़ती गर्मी के दौर में क्यों जरूरी हो रही है यह तकनीक?
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती आय और बढ़ते तापमान के कारण कूलिंग की मांग लगातार बढ़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुमान बताते हैं कि आने वाले दशकों में एयर कंडीशनिंग की मांग दुनिया भर में कई गुना बढ़ सकती है। ऐसे में यदि पारंपरिक AC पर निर्भरता बनी रही तो बिजली की मांग और कार्बन उत्सर्जन दोनों तेजी से बढ़ेंगे। डिस्ट्रिक्ट कूलिंग इस चुनौती का एक व्यवहारिक समाधान माना जा रहा है।
भारत के लिए भी बन सकता है भविष्य का विकल्प
भारत में हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ रही है। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे शहरों में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। ऐसे में बड़े आवासीय परिसरों, आईटी पार्क, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक केंद्रों में डिस्ट्रिक्ट कूलिंग सिस्टम एक प्रभावी विकल्प बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नई स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और बड़े शहरी विकास क्षेत्रों में यदि शुरुआत से ही इस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाए तो बिजली बचत के साथ-साथ पर्यावरणीय लाभ भी मिल सकते हैं।
सिंगापुर ने 8 से ज्यादा इलाकों में लागू किया मॉडल
सिंगापुर अब तक कम से कम आठ क्षेत्रों में इस तरह के चिल्ड वाटर नेटवर्क विकसित कर चुका है। सरकार और निजी कंपनियां मिलकर शहर के अन्य हिस्सों में भी इस तकनीक का विस्तार कर रही हैं। बढ़ती गर्मी, ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच सिंगापुर का यह 140 साल पुराना मॉडल एक बार फिर चर्चा में आ चुका है।


