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Sitar vs Guitar: सितार और गिटार में क्या अंतर है? सात सुरों से कैसे बन जाते हैं सैकड़ों राग?
Sitar vs Guitar: सितार और गिटार में क्या अंतर है? भारतीय शास्त्रीय संगीत में सात सुरों से सैकड़ों राग कैसे बनते हैं? जानिए 22 श्रुतियों, मींड, अनुनाद और रागों के पीछे का विज्ञान।
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Sitar vs Guitar: सितार और गिटार दोनों तारों से संगीत पैदा करते हैं। दोनों में तारों को छेड़ने से कंपन होता है। दोनों के लंबे हिस्से पर उँगलियाँ रखकर सुर बदले जाते हैं। फिर भी सितार सुनते ही भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक अलग संसार सामने आ जाता है, जबकि गिटार की पहचान पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से लेकर रॉक, जैज़, ब्लूज़ और आधुनिक लोकप्रिय संगीत तक फैली हुई है। सितार की ध्वनि में एक विशेष गूँज, तारों की झंकार और एक स्वर से दूसरे स्वर तक धीरे-धीरे पहुँचने की क्षमता होती है। गिटार में सुरों के साथ कई तारों को मिलाकर कॉर्ड बजाना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन अंतर केवल वाद्ययंत्र की बनावट का नहीं है। इसके पीछे संगीत को समझने के दो अलग ऐतिहासिक दृष्टिकोण भी हैं। पश्चिमी संगीत की अनेक शैलियों में कॉर्ड, हार्मनी और निर्धारित स्वरांतर महत्त्वपूर्ण हैं, जबकि भारतीय रागदारी संगीत में किसी स्वर का स्थान, उससे पहले और बाद में आने वाला स्वर, उस पर ठहराव, उसका आंदोलन और उसकी अभिव्यक्ति राग की पहचान बनाते हैं। सबसे रोचक प्रश्न यह है कि जब भारतीय संगीत में केवल सात मूल सुर हैं, तो उनसे सैकड़ों राग कैसे बन जाते हैं? क्या राग बदलने पर 'सा, रे, ग, म, प, ध, नि' की वास्तविक आवृत्ति बदल जाती है? क्या भैरव का 'रे' और यमन का 'रे' एक जैसा होता है? और 22 श्रुतियों का वह प्राचीन सिद्धांत क्या है जिसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि भारतीय संगीत पश्चिमी संगीत से अधिक सूक्ष्म है? इस प्रश्न का उत्तर भौतिक विज्ञान, संगीतशास्त्र, मानव श्रवण और सदियों से विकसित कलात्मक परंपरा के बीच छिपा है।
सितार और गिटार में बुनियादी अंतर क्या है?
सितार और गिटार दोनों 'तत वाद्य' अर्थात तार वाले वाद्ययंत्रों की व्यापक श्रेणी में आते हैं। लेकिन उनकी संरचना और सामान्य वादन-पद्धति अलग होती है। आधुनिक सामान्य गिटार में छह तार होते हैं। उसके लंबे हिस्से को नेक और तारों के नीचे उँगलियों से दबाने वाले भाग को फ्रेटबोर्ड कहा जाता है। फ्रेटबोर्ड पर धातु के फ्रेट निर्धारित स्थानों पर लगे होते हैं। तारों को उँगलियों या पिक से बजाया जाता है।
सितार में सामान्यतः छह या सात मुख्य बजाए जाने वाले तार होते हैं। इसके अतिरिक्त कई ऐसे महीन तार होते हैं जिन्हें कलाकार सीधे नहीं बजाता। लेकिन वे दूसरे तारों के कंपन से गूँजते हैं। इन्हें 'तरब' या सहानुभूतिक अनुनादी तार कहा जाता है। अलग-अलग सितारों में कुल तारों की संख्या लगभग 18 से 21 या उससे कुछ अलग हो सकती है।
सितार में एक बड़ा गुंजन पात्र होता है, जो परंपरागत रूप से सूखी लौकी से बनाया जाता है। उसका लंबा दंड लकड़ी का होता है और उसमें ऊँचे, घुमावदार तथा सामान्यतः खिसकाए जा सकने वाले धातु के पर्दे या फ्रेट लगे होते हैं। भारत के राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद से संबंधित संगीत सामग्री तथा विश्वविद्यालय स्तर के संगीत अध्ययनों में सितार की मुख्य संरचना, अनुनादी तारों और चल पर्दों का उल्लेख किया गया है।
सबसे बड़ा अंतर यह है कि सामान्य गिटार को एक साथ अनेक सुरों के कॉर्ड बजाने के लिए बहुत अनुकूल बनाया गया है, जबकि सितार की प्रमुख परंपराएँ राग के स्वर-विस्तार, मींड, गमक और एकल स्वर की सूक्ष्म अभिव्यक्ति पर विशेष जोर देती हैं।
लेकिन यह कहना गलत होगा कि गिटार पर राग नहीं बजाया जा सकता या सितार पर एक साथ अनेक सुर पैदा नहीं हो सकते। कलाकार विभिन्न तकनीकों से दोनों वाद्यों की क्षमताओं का विस्तार करते रहे हैं।
सितार में इतने अधिक तार क्यों होते हैं?
सितार के सारे तारों का काम समान नहीं होता। कुछ तारों पर मुख्य धुन बजाई जाती है। कुछ तार निरंतर स्वराधार और तालबद्ध झंकार प्रदान करते हैं। इन्हें 'चिकारी' कहा जाता है। इनके अतिरिक्त तरब के तार होते हैं। तरब के तारों की विशेषता यह है कि वे मुख्यतः अनुनाद के कारण बजते हैं। मान लीजिए सितार कलाकार मुख्य तार पर कोई निश्चित सुर बजाता है। इससे वाद्ययंत्र और उसके आसपास की हवा में कंपन पैदा होता है। यदि तरब का कोई तार उसी या उससे संबंधित अनुनादी आवृत्ति पर स्वरबद्ध है, तो वह भी कंपन करने लगता है।
यह घटना भौतिक विज्ञान में 'अनुनाद' अर्थात रेज़ोनेंस कहलाती है। इसी अनुनाद के कारण सितार की ध्वनि में एक अतिरिक्त गूँज और चमक महसूस होती है। तरब के तारों को बजाए जा रहे राग के स्वर-संग्रह के अनुसार मिलाया जाता है। इसलिए किसी नए राग की प्रस्तुति से पहले कलाकार को कुछ तारों का स्वर बदलना पड़ सकता है।
यहीं सितार और सामान्य गिटार के बीच एक उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। गिटार में भी प्राकृतिक अनुनाद होता है, लेकिन सामान्य छह-तार वाले गिटार में सितार जैसी अलग तरब व्यवस्था नहीं होती। स्मिथसोनियन फोकवेज़ की भारतीय संगीत शिक्षण सामग्री में सितार की अनुनादी तार व्यवस्था और विभिन्न स्वर संबंधी विशेषताओं का वर्णन है।
सितार की आवाज़ में झनझनाहट क्यों होती है?
सितार का एक विशेष ध्वनिक गुण उसकी झंकारयुक्त, कुछ हद तक भनभनाती हुई आवाज़ है। इसका कारण केवल अधिक तार होना नहीं है। उसके पुल अर्थात 'ब्रिज' की बनावट भी महत्त्वपूर्ण है। सितार का पुल विशेष ढंग से घुमावदार बनाया जाता है।
जब तार कंपन करता है, तो उसका संबंध पुल की सतह से सामान्य गिटार के तार की तुलना में अलग प्रकार से होता है। इससे कंपन में अतिरिक्त उच्च आवृत्ति वाले घटक उत्पन्न हो सकते हैं।
इस विशिष्ट ध्वनिक प्रभाव को 'जवारी' कहा जाता है। जवारी की सही बनावट और समायोजन सितार की आवाज़ पर बहुत प्रभाव डालते हैं। यदि पुल की सतह घिस जाए या ठीक तरह से तैयार न हो, तो वाद्ययंत्र की ध्वनि बदल सकती है। इसीलिए सितार बनाने और उसकी मरम्मत करने वाले कुशल कारीगरों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है।भारतीय संगीत और वाद्य निर्माण संबंधी अध्ययनों में जवारी को सितार की विशिष्ट ध्वनि के प्रमुख कारणों में गिना गया है।
सितार में 'मींड' क्या है और गिटार में उससे क्या अंतर होता है?
सितार की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में एक है 'मींड'। मींड का अर्थ है एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना अचानक टूटे या छलाँग लगाए धीरे-धीरे पहुँचना। मान लीजिए कलाकार 'रे' से 'ग' तक जाना चाहता है। वह दोनों स्वर अलग-अलग बजाने के बजाय तार को खींचकर बीच की निरंतर बदलती आवृत्तियों से गुजर सकता है। इससे ऐसा अनुभव होता है जैसे स्वर एक-दूसरे के भीतर से निकल रहा हो। यह मनुष्य की गायकी से मिलता-जुलता प्रभाव पैदा करता है।
सितार के पर्दे ऊँचे और घुमावदार होते हैं। कलाकार तार को पार्श्व दिशा में खींचकर उसका तनाव बढ़ा सकता है। तनाव बदलने से तार की कंपन आवृत्ति और उसका सुर बदलता है। गिटार में भी 'बेंडिंग', 'स्लाइड' और 'वाइब्रेटो' जैसी तकनीकें उपलब्ध हैं। विशेष रूप से ब्लूज़ और रॉक गिटार में तार खींचकर सुर बदलना बहुत महत्त्वपूर्ण है।
लेकिन सितार की परंपरागत रागदारी शैली में लंबी मींड और सूक्ष्म स्वर-संचालन को अत्यंत विकसित रूप में इस्तेमाल किया जाता है। सितार के आकार और तारों की व्यवस्था को भी इस उद्देश्य के अनुसार विकसित किया गया है। भारतीय वाद्यों के ऐतिहासिक अध्ययन में सितार के तार को एक ही पर्दे से खींचकर अनेक स्वर निकालने की विशेषता का उल्लेख मिलता है।
गिटार के पर्दे स्थिर और सितार के पर्दे चलायमान क्यों होते हैं?
सामान्य आधुनिक गिटार में फ्रेट निश्चित स्थानों पर लगे होते हैं। उनका स्थान इस तरह निर्धारित किया जाता है कि प्रत्येक अगले फ्रेट पर तार की कंपन आवृत्ति लगभग एक निश्चित अनुपात में बढ़े। आधुनिक गिटार सामान्यतः 'ट्वेल्व-टोन इक्वल टेम्परामेंट' अर्थात सप्तक को बारह बराबर लघुगणकीय स्वरांतरों में बाँटने वाली प्रणाली के अनुकूल बनाया जाता है। इसके विपरीत सितार के पर्दे सामान्यतः धागों या विशेष बंधनों की सहायता से लगाए जाते हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर उनकी स्थिति बदली जा सकती है। सितार के ऊँचे पर्दे तार को खींचकर सुर बदलने की भी पर्याप्त गुंजाइश देते हैं।
इस व्यवस्था से कलाकार अलग-अलग रागों के स्वर-विन्यास और अपनी वादन-पद्धति के अनुसार वाद्ययंत्र को तैयार कर सकता है। हालाँकि हर राग बदलते ही सभी पर्दे खिसकाना आवश्यक नहीं होता। कई रागों को एक ही सामान्य पर्दा-व्यवस्था पर बजाया जा सकता है। एक और महत्त्वपूर्ण बात है। स्थिर फ्रेट वाला गिटार भी पूरी तरह निश्चित आवृत्तियों तक सीमित नहीं है। तार को खींचने, स्लाइड करने या दूसरे तरीकों से कलाकार मध्यवर्ती स्वर पैदा कर सकता है। इसलिए गिटार और सितार का अंतर पूरी तरह स्थिर बनाम परिवर्तनशील सुरों का नहीं बल्कि उनके डिजाइन और प्रमुख वादन-परंपराओं का है।
वर्ष 2024 में जर्नल ऑफ द एकॉस्टिकल सोसायटी ऑफ अमेरिका में प्रकाशित अध्ययन ने आधुनिक क्लासिकल गिटार के फ्रेटों को बारह-स्वर समान तापक्रम प्रणाली से जोड़ा है और यह भी समझाया है कि वास्तविक तारों की कठोरता और तनाव के कारण आदर्श सुर से छोटे अंतर पैदा हो सकते हैं। इसकी सहायता से मुख्य तारों को छेड़ा जाता है। सितार वादन में अलग-अलग आघात और उनके क्रम से विशेष लयात्मक तथा स्वरात्मक प्रभाव तैयार होते हैं।
गिटार को उँगलियों, नाखूनों या छोटे पिक से बजाया जा सकता है। क्लासिकल गिटार में उँगलियों से अलग-अलग तार बजाने की विकसित परंपरा है। दूसरी ओर रॉक और लोकप्रिय संगीत में पिक का उपयोग व्यापक है। सितार में मिज़राब की तकनीक राग की प्रस्तुति, तानों और झाला जैसी शैलियों से जुड़ी है। यह अंतर केवल उपकरण का नहीं है। हाथ की गति, तार पर प्रहार, स्वर की शुरुआत और उसके बाद पैदा होने वाले अनुनाद का संबंध पूरे संगीत के रूप से है।
एक तार में आवाज पैदा कैसे होती है?
सितार और गिटार दोनों के पीछे भौतिक विज्ञान का एक ही मूल सिद्धांत है—कंपन।
जब किसी तने हुए तार को छेड़ा जाता है, तो उसमें कंपन उत्पन्न होता है। उसके कंपन की मूल आवृत्ति तार की लंबाई, तनाव और प्रति इकाई लंबाई के द्रव्यमान पर निर्भर करती है। एक आदर्श तार के लिए मूल आवृत्ति का संबंध इस प्रकार समझा जा सकता है— यहाँ कंपन आवृत्ति, तार की प्रभावी लंबाई, तनाव और प्रति इकाई लंबाई का द्रव्यमान है।
इसका सरल अर्थ है कि यदि बाकी परिस्थितियाँ समान रहें और तार की प्रभावी लंबाई आधी कर दी जाए, तो उसकी मूल कंपन आवृत्ति लगभग दोगुनी हो जाएगी। संगीत में इसे एक सप्तक ऊपर जाना कहा जाता है। इसी तरह तार का तनाव बढ़ाने से स्वर ऊँचा हो सकता है। सितार में मींड के दौरान तार को खींचने से तनाव बढ़ता है। गिटार में फ्रेट पर तार दबाने से उसकी कंपन करने वाली प्रभावी लंबाई घट जाती है। लेकिन वास्तविक वाद्यों में तार की कठोरता, पुल की बनावट और दूसरे कारकों के कारण ध्वनि आदर्श गणितीय मॉडल से कुछ अलग हो सकती है।
सात सुर होने पर भी सैकड़ों राग कैसे बनते हैं?
भारतीय संगीत का मूल स्वर-संग्रह सात स्वरों पर आधारित है—सा, रे, ग, म, प, ध और नि।इन्हें क्रमशः षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद कहा जाता है।
लेकिन केवल सात नामों से संगीत की सारी विविधता निर्धारित नहीं होती। इन सात स्वरों में पाँच ऐसे हैं जिनके स्वर-रूपों में परिवर्तन होता है। ऋषभ, गांधार, धैवत और निषाद के शुद्ध तथा कोमल रूप होते हैं। मध्यम का शुद्ध और तीव्र रूप होता है। षड्ज और पंचम अपने निर्धारित संबंध में अचल स्वर माने जाते हैं।
इस प्रकार सामान्य हिंदुस्तानी संगीत पद्धति में एक सप्तक के भीतर बारह प्रचलित स्वर-स्थान प्राप्त होते हैं। एनसीईआरटी की संगीत सामग्री भी सात स्वरों, बारह स्वर-स्थानों तथा रागों के वर्गीकरण की यही बुनियादी व्यवस्था समझाती है। लेकिन राग का निर्माण केवल इन बारह स्वर-स्थानों में से कुछ चुन लेने से नहीं हो जाता। हर राग की अपनी चलन, स्वर-संगति और अभिव्यक्ति होती है। यही बात सैकड़ों रागों की संभावना पैदा करती है।
क्या राग बदलने पर 'सा' भी बदल जाता है?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए 'सा' की भूमिका जाननी चाहिए। भारतीय संगीत में 'सा' एक आधार स्वर या टॉनिक है। गायन और वादन में कलाकार अपनी आवाज़ या वाद्ययंत्र की सुविधा के अनुसार उसका वास्तविक आवृत्ति-स्थान निर्धारित कर सकता है। मान लीजिए एक कलाकार का 'सा' 240 हर्ट्ज़ पर है और दूसरे कलाकार का 'सा' 260 हर्ट्ज़ पर। दोनों एक ही राग गा सकते हैं। लेकिन उनके सभी स्वर वास्तविक आवृत्ति में अलग होंगे।
इसलिए 'सा' पश्चिमी पियानो के किसी एक निश्चित बटन का नाम नहीं है। वह अन्य स्वरों के लिए संदर्भ बिंदु है। जब कलाकार अपना आधार 'सा' निर्धारित कर लेता है, तब बाकी स्वरों के स्थान उसी के संबंध में समझे जाते हैं। इसीलिए भारतीय संगीत में तानपुरा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसकी लगातार गूँज से कलाकार को स्वराधार सुनाई देता रहता है। लेकिन राग बदलने का अर्थ अपने आप यह नहीं कि कलाकार ने 'सा' की वास्तविक आवृत्ति भी बदल दी है। एक ही 'सा' पर यमन, भैरव, भूपाली और दूसरे अनेक राग गाए जा सकते हैं।यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर है—गायक के अनुसार आधार सुर बदलना एक बात है और राग के अनुसार स्वरों का चयन तथा प्रयोग बदलना दूसरी।
भैरव और यमन के सुर अलग क्यों सुनाई देते हैं?
इसे दो रागों के उदाहरण से समझ सकते हैं। राग भैरव में सामान्यतः कोमल रे और कोमल ध का उपयोग होता है। इसके बाकी प्रमुख स्वर शुद्ध होते हैं। लेकिन केवल इतना कह देने से भैरव की पहचान पूरी नहीं हो जाती। कोमल रे और कोमल ध पर किया जाने वाला विशिष्ट आंदोलन इसकी अभिव्यक्ति में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
राग यमन में सामान्यतः तीव्र मध्यम का उपयोग होता है और दूसरे प्रमुख स्वर शुद्ध होते हैं। यमन की अपनी विशिष्ट स्वर-संगतियाँ और चलन हैं। इसलिए एक ही कलाकार यदि एक ही आधार 'सा' पर पहले भैरव और फिर यमन गाता है, तो दोनों की ध्वनि अलग महसूस होती है।
इसका एक कारण स्वर-स्थान है। भैरव में जहाँ कोमल रे और कोमल ध आते हैं, वहीं यमन में शुद्ध रे और शुद्ध ध का प्रयोग होता है। दूसरी ओर यमन में तीव्र मध्यम है।
लेकिन इससे भी बड़ा अंतर उन स्वरों का व्यवहार है। राग का स्वर केवल एक स्थिर बिंदु नहीं है। उसे कैसे छुआ जाए, कितनी देर रखा जाए, किस स्वर से उसकी ओर आया जाए और वहाँ से किस स्वर की ओर जाया जाए—ये सब राग की पहचान बनाते हैं।
इसी कारण केवल हारमोनियम पर किसी राग के स्वरों को क्रम से बजा देना उसकी पूरी प्रस्तुति नहीं है।
क्या किसी राग में पाँच सुर भी हो सकते हैं?
हाँ। भारतीय शास्त्रीय संगीत में सभी राग सातों स्वरों का उपयोग नहीं करते। जिन रागों के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सामान्यतः औडव जाति के राग कहा जाता है। छह स्वरों वाले रूपों को षाडव और सात स्वरों वाले रूपों को संपूर्ण कहा जाता है। लेकिन यह वर्गीकरण आरोह और अवरोह के लिए अलग-अलग भी लागू हो सकता है। कोई राग आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर इस्तेमाल कर सकता है।
राग भूपाली इसका सरल उदाहरण है। इसके प्रचलित स्वर हैं—सा, रे, ग, प और ध। इसमें मध्यम और निषाद नहीं लिए जाते। इसका सामान्य आरोह है—सा, रे, ग, प, ध, सां। अवरोह है—सां, ध, प, ग, रे, सा। लेकिन केवल इन पाँच स्वरों के उपयोग से बजाई गई हर धुन राग भूपाली नहीं बन जाती। उसके विशिष्ट स्वर-विन्यास, ठहराव और पकड़ का पालन भी आवश्यक है। सीबीएसई और एनसीईआरटी की संगीत शिक्षण सामग्री में रागों के पाँच, छह और सात स्वरों पर आधारित वर्गीकरण का उल्लेख है।
राग की 'पकड़' क्या होती है?
जैसे किसी व्यक्ति की आवाज़ का एक विशेष अंदाज़ होता है, वैसे ही राग की पहचान में भी कुछ विशिष्ट स्वर-वाक्यांश होते हैं। इन्हें राग की 'पकड़' कहा जाता है।उदाहरण के लिए यमन, भूपाली, भैरव या दरबारी कान्हड़ा की पहचान केवल उनके स्वरों की सूची से नहीं होती। उनके विशिष्ट स्वर-समूह और चलन से भी होती है।कोई अनुभवी श्रोता यदि राग की पहचान करने वाली स्वर-संगति सुन ले, तो वह राग को पहचान सकता है।
पकड़ को समझने के लिए भाषा की तुलना उपयोगी है। हिंदी में एक ही शब्द-संग्रह से अलग-अलग वाक्य बनाए जा सकते हैं। शब्द समान हों, तब भी उनके क्रम और प्रयोग से अर्थ बदल जाता है। संगीत में भी कुछ ऐसा ही होता है। राग के स्वर उसकी शब्द-संपदा जैसे हैं। लेकिन उसकी चलन और पकड़ उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति बनाती हैं।
इसीलिए राग को केवल 'स्केल' कह देना पर्याप्त नहीं है। स्केल स्वरों का क्रम या संग्रह बताता है। राग उन स्वरों के प्रयोग का विस्तृत संगीत-व्याकरण भी निर्धारित करता है। भारतीय संगीत पर आधारित शिक्षण सामग्री में आरोह, अवरोह, पकड़, वादी और संवादी को राग की पहचान के प्रमुख तत्वों में गिना गया है।
राग में वादी और संवादी सुर क्यों होते हैं?
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ रागों के स्वरों को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
प्रचलित संगीतशास्त्रीय परंपरा में 'वादी' राग का अत्यंत प्रमुख स्वर माना जाता है। 'संवादी' उसका दूसरा महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। इन स्वरों पर विशेष ठहराव, विस्तार और अभिव्यक्ति की जा सकती है। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वादी स्वर हर प्रस्तुति में सबसे अधिक बार ही बजाया जाए। उसका महत्त्व राग की समग्र अभिव्यक्ति में समझना चाहिए।
उदाहरण के लिए राग यमन की अनेक प्रचलित शिक्षण परंपराओं में गांधार को वादी और निषाद को संवादी बताया जाता है।हालाँकि कुछ रागों में वादी-संवादी के निर्धारण को लेकर अलग घरानों या संगीतशास्त्रियों के बीच मतभेद मिल सकते हैं। इसलिए इन्हें राग की पहचान का एक उपयोगी पारंपरिक आधार मानना चाहिए, न कि हर व्याख्या में पूर्णतः अपरिवर्तनीय नियम।
वादक केवल स्वरों की सही ऊँचाई नहीं चुनता। वह यह भी तय करता है कि किन स्वरों पर विस्तार करे, किन्हें जल्दी पार करे और कहाँ ठहरे। यही प्रक्रिया संगीत में विशेष स्वरात्मक तनाव और समाधान का अनुभव पैदा कर सकती है।
एक ही सुर हर राग में थोड़ा अलग क्यों सुनाई देता है?
यही भारतीय रागदारी संगीत का सबसे सूक्ष्म पक्ष है। किसी स्वर का नाम और उसका वास्तविक संगीतात्मक प्रयोग हमेशा एक ही बात नहीं होते। मान लीजिए दो रागों में कोमल गांधार का उपयोग होता है। फिर भी दोनों में उसका व्यवहार अलग हो सकता है। किसी राग में उस पर ठहराव किया जाए, दूसरे में उसे अगले स्वर की ओर जाते हुए छुआ जाए और तीसरे में उस पर आंदोलन किया जाए।
इसके अलावा गायकी की परंपरा, स्वर-संगति तथा विभिन्न स्वरों के साथ संबंध के कारण स्वर की वास्तविक अभिव्यक्ति में सूक्ष्म अंतर हो सकता है।यहाँ दो बातों को अलग रखना जरूरी है। पहली, स्वर की वास्तविक मूल आवृत्ति। दूसरी, स्वर को प्रस्तुत करने का तरीका—जैसे उसे खींचना, हिलाना, धीरे-धीरे किसी स्वर तक ले जाना या क्षण भर के लिए छूना।
कई बार श्रोता को स्वर बदला हुआ इसलिए लगता है क्योंकि उसमें मींड या आंदोलन है, भले ही उसका मुख्य स्वर-स्थान वही हो।कुछ रागदारी परंपराओं में सूक्ष्म स्वर-स्थान की भिन्नताएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन यह दावा करना कि प्रत्येक राग के प्रत्येक स्वर की एक अनिवार्य, सार्वभौमिक और मिलीहर्ट्ज़ तक निश्चित आवृत्ति है, गलत होगा।भारतीय शास्त्रीय संगीत में जीवंत प्रदर्शन और घरानों की परंपराएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।
भारतीय संगीत में 22 श्रुतियों का क्या रहस्य है?
भारतीय संगीत के बारे में अक्सर कहा जाता है कि पश्चिमी संगीत में बारह स्वर हैं, जबकि भारतीय संगीत में 22 श्रुतियाँ हैं। यह बात एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सिद्धांत की ओर संकेत करती है।लेकिन अक्सर इसे गलत तरीके से समझाया जाता है।
भारतीय संगीतशास्त्र में 'श्रुति' अत्यंत पुरानी अवधारणा है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में सप्तक के भीतर 22 श्रुतियों का वर्णन मिलता है। बाद की संगीतशास्त्रीय परंपराओं में भी श्रुति के स्वरूप और स्वरांतरों पर विचार हुआ। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय संगीत में हारमोनियम के बारह बटनों के स्थान पर ठीक 22 समान दूरी वाले बटन होते हैं।
श्रुतियों को प्राचीन भारतीय संगीत की सूक्ष्म स्वरांतर संबंधी अवधारणा के रूप में समझना अधिक उचित है। अलग-अलग ऐतिहासिक ग्रंथों तथा आधुनिक विद्वानों ने उनकी व्याख्या विभिन्न प्रकार से की है। कुछ आधुनिक व्याख्याएँ 22 श्रुतियों को निश्चित आवृत्ति अनुपातों में व्यक्त करने का प्रयास करती हैं। लेकिन पूरे हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक श्रुति के लिए एक ही सार्वभौमिक, समान दूरी वाली प्रणाली लागू हो, ऐसा नहीं है।
एक और सावधानी जरूरी है। पश्चिमी संगीत को भी केवल बारह स्थिर स्वरों तक सीमित मानना गलत होगा। पश्चिमी गायकी, वायलिन, ब्लूज़ और अनेक दूसरी संगीत परंपराओं में बारह बराबर स्वर-स्थानों के बीच की आवृत्तियों का उपयोग होता है।
इसलिए भारतीय संगीत की सूक्ष्मता का वास्तविक आधार केवल 22 की संख्या नहीं है। उसका बड़ा महत्त्व स्वर के संदर्भ, आंदोलन, मींड और राग की परंपरा में भी है।
क्या भारतीय और पश्चिमी संगीत में सुरों का गणित अलग है?
ध्वनि का भौतिक विज्ञान दोनों में समान है। हर सुर किसी कंपन से पैदा होता है। यदि एक ध्वनि की मूल आवृत्ति 200 हर्ट्ज़ है और दूसरी की 400 हर्ट्ज़, तो दोनों में एक सप्तक का संबंध है। लेकिन इन आवृत्तियों के बीच संगीतात्मक स्वरों को किस तरह व्यवस्थित किया जाए, इसकी कई प्रणालियाँ संभव हैं।
आधुनिक पश्चिमी पियानो और सामान्य गिटार प्रायः ऐसे स्वर-विन्यास का उपयोग करते हैं जिसमें एक सप्तक को बारह बराबर लघुगणकीय भागों में बाँटा जाता है। इससे अलग-अलग सुरों और कॉर्डों को एक ही वाद्य पर आसानी से बजाना संभव होता है। भारतीय रागदारी संगीत में तानपुरे का आधार स्वर, दूसरे स्वरों से उसका संबंध और राग की विशिष्ट चलन अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है।
यहाँ एक स्वर से दूसरे स्वर तक धीरे-धीरे जाते समय बीच की अनेक आवृत्तियाँ सुनाई दे सकती हैं। लेकिन दोनों परंपराएँ एक-दूसरे से पूरी तरह अलग वैज्ञानिक संसार नहीं हैं। पश्चिमी संगीत में भी शुद्ध स्वरानुपात, असमान तापक्रम और सूक्ष्म स्वर प्रयोग की परंपराएँ हैं। भारतीय संगीत में भी स्थिर स्वर-स्थान और आधुनिक बारह-स्वर प्रणालियों का उपयोग होता है। इसलिए एक पद्धति को पूरी तरह वैज्ञानिक और दूसरी को कम वैज्ञानिक बताना उचित नहीं है। दोनों ध्वनि के समान भौतिक नियमों पर आधारित हैं।लेकिन उनके कलात्मक संगठन अलग विकसित हुए हैं।
क्या एक ही राग गिटार और सितार दोनों पर बजाया जा सकता है?
हाँ। सिद्धांततः किसी भी उपयुक्त वाद्य पर राग की प्रस्तुति संभव हो सकती है, बशर्ते कलाकार उसकी संगीतात्मक पहचान को व्यक्त कर सके। लेकिन दोनों वाद्यों पर एक राग का अनुभव अलग हो सकता है। सितार में मींड, तरब के तारों की गूँज और जवारी राग को विशेष ध्वनिक रूप देते हैं। सामान्य गिटार पर उसी राग के स्वरों को बजाया जा सकता है। लेकिन उसकी ध्वनि और स्वर-प्रस्तुति अलग होगी।
गिटारवादक तारों को खींचने, स्लाइड करने और विशिष्ट फिंगरिंग की सहायता से राग की अभिव्यक्ति के निकट पहुँच सकता है। भारतीय संगीत में स्लाइड गिटार की विकसित परंपरा इसका उदाहरण है। कुछ भारतीय कलाकारों ने पश्चिमी गिटार में परिवर्तन करके भारतीय रागदारी संगीत के लिए नए वाद्य रूप भी विकसित किए हैं।
यहाँ संगीत का एक व्यापक सिद्धांत सामने आता है। राग केवल सितार का गुण नहीं है। वह संगीत की एक संरचना और अभिव्यक्ति-पद्धति है। इसीलिए राग को सितार, सरोद, बाँसुरी, वायलिन, वीणा, गायन और दूसरे वाद्यों पर प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रत्येक माध्यम उसकी अभिव्यक्ति में अपनी विशेषता जोड़ता है।
क्या पश्चिमी संगीत केवल कॉर्ड और भारतीय संगीत केवल एकल सुरों पर आधारित है?
यह धारणा भी अधूरी है। पश्चिमी संगीत में हार्मनी अर्थात एक साथ अलग-अलग स्वरों का संबंध अत्यंत विकसित है। कॉर्ड और उनके क्रम से संगीत में विशेष प्रभाव पैदा किए जाते हैं।दूसरी ओर भारतीय रागदारी संगीत में मेलोडी अर्थात स्वर की क्रमिक गति को प्रमुख स्थान मिलता है। तानपुरे की निरंतर गूँज के आधार पर कलाकार राग का विस्तार करता है।
लेकिन पश्चिमी संगीत में भी एकल स्वर-प्रधान रचनाएँ हैं। भारतीय संगीत में भी एक साथ बजने वाले स्वरों, तानपुरे के अनुनाद और दूसरे वाद्यों के पारस्परिक संबंधों का महत्त्व है। इसलिए अंतर प्रधानता का है, पूर्ण अनुपस्थिति का नहीं। भारतीय राग-संगीत में कलाकार अक्सर एक निश्चित स्वराधार के सापेक्ष राग की पहचान विकसित करता है। पश्चिमी संगीत की कई विधाओं में समय के साथ कॉर्ड और स्वर-केंद्र बदल सकते हैं।ये दो अलग रचनात्मक रास्ते हैं, जिनमें समृद्ध प्रयोग और विविधता मौजूद है।
राग सुबह और शाम के अनुसार क्यों बाँटे गए?
भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक अत्यंत रोचक परंपरा है रागों का समय से संबंध।
भैरव को प्रातःकालीन राग माना जाता है। यमन का संबंध प्रायः शाम के शुरुआती हिस्से से जोड़ा जाता है। दरबारी कान्हड़ा सामान्यतः रात के गहरे समय में प्रस्तुत किया जाता है। मल्हार परिवार के अनेक राग वर्षा ऋतु से जुड़े हैं। लेकिन प्रश्न है कि क्या किसी राग का समय केवल परंपरा है या विज्ञान ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि वह उसी समय सुनने पर मस्तिष्क में विशेष प्रभाव पैदा करेगा?
इस संबंध में सावधानी आवश्यक है। राग-समय सिद्धांत भारतीय संगीतशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और सौंदर्यात्मक परंपरा है। इसका संबंध स्वरों की प्रकृति, राग की अनुभूति और दिन के विभिन्न चरणों की सांस्कृतिक कल्पना से जोड़ा जाता है।
लेकिन यह सिद्ध नहीं है कि सुबह का राग शाम को सुनने से उसकी ध्वनि गलत हो जाएगी या उसमें उपयोग किए गए स्वरों की भौतिक आवृत्ति बदल जाएगी।
इसी तरह किसी राग को सुनने से निश्चित रूप से बारिश होने लगेगी या किसी रोग का इलाज हो जाएगा, ऐसे दावे वैज्ञानिक रूप से स्थापित नहीं हैं। संगीत मनुष्य के भाव, ध्यान और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। लेकिन विशेष रागों के लिए निश्चित चिकित्सकीय परिणाम सिद्ध करना एक अलग वैज्ञानिक प्रश्न है।
सीबीएसई की भारतीय ज्ञान परंपरा संबंधी अध्ययन सामग्री में रागों के समय, ऋतु और स्वर-विन्यास के बीच पारंपरिक संबंधों का उल्लेख है। इसलिए राग-समय को भारतीय संगीत की जीवित कलात्मक परंपरा के रूप में समझना चाहिए, न कि ऐसी सार्वभौमिक वैज्ञानिक बाध्यता के रूप में जिसे हर श्रोता और हर परिस्थिति में सिद्ध मान लिया जाए।
क्या राग का संबंध मनुष्य की भावनाओं से है?
'राग' शब्द का संबंध रंगने या अनुरंजित करने की अवधारणा से भी समझाया जाता है। संगीत में राग का उद्देश्य केवल निर्धारित स्वरों का सही क्रम प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि एक विशिष्ट भावात्मक और सौंदर्यात्मक अनुभव उत्पन्न करना भी है। लेकिन भावनाओं और संगीत के बीच संबंध जटिल है। किसी व्यक्ति को एक राग शांतिपूर्ण महसूस हो सकता है। दूसरे व्यक्ति के लिए वही राग स्मृतियों या प्रशिक्षण के कारण अलग भाव उत्पन्न कर सकता है।
राग का अनुभव कलाकार की प्रस्तुति, लय, गति, वाद्ययंत्र, सुनने के वातावरण और श्रोता के सांस्कृतिक अनुभव से भी प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए धीमी गति में प्रस्तुत कोई राग गंभीर लग सकता है, जबकि उसी राग की तेज लय वाली प्रस्तुति अलग ऊर्जा पैदा कर सकती है। इसलिए भैरव को केवल गंभीर और यमन को केवल शांत कहकर उनकी संपूर्ण संगीतात्मक पहचान समाप्त नहीं की जा सकती। राग में भाव महत्त्वपूर्ण है।लेकिन वह एक ही भाव में स्थिर नहीं होता।
क्या दो रागों में एक जैसे सुर होने पर भी दोनों अलग हो सकते हैं?
हाँ, और यही भारतीय रागदारी संगीत की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में एक है।
मान लीजिए दो रागों में प्रयोग होने वाले स्वरों का संग्रह लगभग समान है। इसके बावजूद उनके आरोह, अवरोह, पकड़, विशिष्ट स्वर-संगति और ठहराव अलग हो सकते हैं।इससे उनकी पहचान अलग बन जाती है। किसी राग में कलाकार एक स्वर से दूसरे स्वर तक सीधे जाएगा। दूसरे राग में उसी यात्रा के बीच विशेष मींड करेगा। तीसरे में कोई स्वर आरोह में कम उपयोग होगा लेकिन अवरोह में महत्त्वपूर्ण बनेगा।इस तरह केवल सात या बारह स्वर-स्थानों का होना संगीत की संभावनाओं को सीमित नहीं करता।
यदि राग केवल स्वरों के समूह का नाम होता, तो उसकी संख्या सीमित हो सकती थी। लेकिन राग में स्वर के प्रयोग, क्रम, ठहराव, अलंकार और विशिष्ट वाक्यांश भी होते हैं। इन्हीं कारणों से बहुत बड़ी संख्या में राग और उनके प्रकार विकसित हुए। हालाँकि कितने राग हैं, इसकी कोई एक सर्वमान्य संख्या नहीं है। कई राग प्रचलन से बाहर हो गए, कुछ घरानों में विशेष रूप से सुरक्षित हैं और समय के साथ नए रागों की रचना भी हुई है।
क्या सितार का इतिहास भारत में ही शुरू हुआ था?
सितार की उत्पत्ति के संबंध में भी ऐतिहासिक मतभेद हैं। कुछ लोकप्रिय कथाएँ सितार के आविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को देती हैं। लेकिन आधुनिक संगीत इतिहासकार इस दावे को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करने में सावधानी बरतते हैं। सितार का विकास लंबे समय में विभिन्न तार वाले वाद्ययंत्रों और भारतीय तथा मध्य एशियाई संगीत परंपराओं के संपर्क से हुआ माना जाता है।
आधुनिक सितार का वर्तमान रूप अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विकसित हुआ और बाद में अलग-अलग घरानों की वादन-पद्धतियों ने उसकी संरचना तथा शैली पर प्रभाव डाला। बीसवीं शताब्दी में पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत ख़ाँ जैसे कलाकारों ने इस वाद्ययंत्र की अलग-अलग अभिव्यक्ति-पद्धतियों को प्रतिष्ठित किया।रविशंकर की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियों से सितार को दुनिया भर में बड़ी पहचान मिली। लेकिन भारतीय संगीत की विविध शैलियों को केवल एक कलाकार से जोड़कर देखना उचित नहीं है।संगीत इतिहास के विश्वकोशीय विवरणों में सितार के विकास को एक लंबी प्रक्रिया माना गया है, न कि किसी एक दिन हुए आविष्कार की घटना।
सितार और गिटार के तार समान विज्ञान से बजते हैं, लेकिन उनकी संगीत की भाषा अलग है
सितार और गिटार का अंतर समझने का सबसे सही तरीका यह है कि दोनों के पीछे के विज्ञान और संगीत की परंपरा को अलग-अलग पहचाना जाए। दोनों में ध्वनि तारों के कंपन से उत्पन्न होती है। तार की लंबाई, तनाव और द्रव्यमान उसके सुर को प्रभावित करते हैं। दोनों में अनुनाद, लय और अलग-अलग स्वर पैदा करने के लिए विशेष तकनीकें हैं।
लेकिन सितार का विकास विशेष रूप से भारतीय रागदारी संगीत के लिए हुआ है। उसके तरब के तार, चिकारी, जवारी और मींड की विकसित व्यवस्था राग के स्वर-विस्तार को विशिष्ट ध्वनि प्रदान करती है। गिटार की सामान्य संरचना अलग है। उसमें छह तार, स्थिर फ्रेट और कॉर्ड बजाने की सुविधा उसे पश्चिमी तथा आधुनिक लोकप्रिय संगीत की अनेक शैलियों के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है।
भारतीय संगीत में सात मूल स्वर और बारह प्रचलित स्वर-स्थान होते हैं। लेकिन राग केवल स्वर-स्थान का चुनाव नहीं है। उसमें आरोह, अवरोह, पकड़, वादी-संवादी, मींड, आंदोलन और स्वर-संगति की भूमिका होती है। इसीलिए एक ही स्वर का प्रयोग अलग-अलग रागों में अलग दिखाई दे सकता है। कभी उसका रूप कोमल या तीव्र होता है, कभी उसका मुख्य स्वर-स्थान समान रहते हुए भी उसकी प्रस्तुति बदल जाती है।
22 श्रुतियों का ऐतिहासिक सिद्धांत भारतीय संगीत की सूक्ष्म स्वर-संवेदना को समझने का महत्त्वपूर्ण आधार है। लेकिन इसे सप्तक के 22 अनिवार्य, समान दूरी वाले स्वरों की सरल व्यवस्था मानना सही नहीं है। इस पूरे विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि संगीत केवल आवृत्तियों का गणित नहीं है। वही सात स्वर अलग-अलग क्रम, ठहराव, गति और भाव के साथ एक बिल्कुल नया अनुभव पैदा कर सकते हैं। सितार उस अनुभव को अपनी झंकार और मींड से व्यक्त करता है। गिटार अपनी तार-रचना और कॉर्ड की क्षमताओं से दूसरी संभावनाएँ खोलता है। दोनों वाद्ययंत्र ध्वनि के समान वैज्ञानिक नियमों पर काम करते हैं, लेकिन संगीत को व्यक्त करने की उनकी ऐतिहासिक भाषाएँ अलग हैं।
संगीत की वास्तविक सुंदरता इसी में है कि सीमित मूल स्वरों से असीमित रचनात्मक संभावनाएँ विकसित की जा सकती हैं। और भारतीय रागदारी संगीत ने इस संभावना को अत्यंत सूक्ष्म, अनुशासित तथा कलात्मक रूप में विकसित किया है।


