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हर झगड़ा ‘Toxic’ और हर साथी ‘Red Flag’? 30 सेकंड की सोशल मीडिया रील कैसे रिश्तों में घोल रही जहर...
Social Media & Relationships: विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल मीडिया की अधूरी रिलेशनशिप एडवाइस कई बार रिश्तों को समझने के बजाय उनमें तनाव बढ़ा सकती है।
Social Media & Relationships
Social Media & Relationships: सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक सोशल मीडिया पर रील्स देखने की आदत आज आम हो चुकी है। कुछ सेकंड के वीडियो मनोरंजन के साथ-साथ लोगों को रिश्तों, प्यार और शादी को लेकर सलाह भी दे रहे हैं। ‘रेड फ्लैग’, ‘ग्रीन फ्लैग’ और ‘टॉक्सिक रिलेशनशिप’ जैसे शब्द अब सिर्फ सोशल मीडिया की भाषा नहीं रह गए हैं, बल्कि लोग इन्हें अपनी असल जिंदगी के रिश्तों पर भी लागू करने लगे हैं।
समस्या तब बढ़ती है जब किसी रिश्ते की पूरी कहानी जाने बिना महज 30 सेकंड की रील देखकर लोग अपने पार्टनर या परिवार के किसी सदस्य को जज करने लगते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल मीडिया की अधूरी रिलेशनशिप एडवाइस कई बार रिश्तों को समझने के बजाय उनमें तनाव बढ़ा सकती है।
क्या होता है रेड फ्लैग, ग्रीन फ्लैग और टॉक्सिक रिश्ता?
सोशल मीडिया की भाषा में ‘रेड फ्लैग’ ऐसे व्यवहार या रिश्ते को कहा जाता है, जिसमें आगे बढ़ना नुकसानदायक हो सकता है। वहीं ‘ग्रीन फ्लैग’ स्वस्थ रिश्ते और सकारात्मक व्यवहार की ओर इशारा करता है।
‘टॉक्सिक रिलेशनशिप’ उस रिश्ते को कहा जाता है जिसमें लगातार अपमान, भावनाओं की अनदेखी, कंट्रोलिंग व्यवहार या मानसिक दबाव जैसी समस्याएं मौजूद हों। लेकिन किसी एक घटना या एक बहस के आधार पर पूरे रिश्ते को टॉक्सिक मान लेना सही नहीं है।
हर लड़ाई टॉक्सिक नहीं होती
साइकॉलजिस्ट आशिमा श्रीवास्तव के मुताबिक, हेल्दी रिश्तों में भी असहमति, नाराजगी और गलतफहमियां होना सामान्य है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि विवाद के बाद दोनों लोग क्या करते हैं।
अगर दोनों एक-दूसरे की बात सुनते हैं, अपनी गलती स्वीकार करते हैं, माफी मांगते हैं और समस्या को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करते हैं तो इसे सामान्य रिलेशनशिप कॉन्फ्लिक्ट माना जा सकता है।
इसके विपरीत लगातार अपमान, मैनिपुलेशन, अत्यधिक कंट्रोल, बेवजह शक, बाउंड्री का उल्लंघन या मानसिक और शारीरिक नुकसान गंभीर संकेत हो सकते हैं। यानी किसी एक घटना के बजाय व्यवहार का लगातार दोहराया जाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
30 सेकंड की रील से रिश्ते का फैसला कितना सही?
समीर मल्होत्रा के मुताबिक, सोशल मीडिया पर मिलने वाली रिलेशनशिप एडवाइस लोगों के रिश्तों को देखने का नजरिया बदल रही है। छोटी वीडियो अक्सर पूरे संदर्भ के बिना किसी व्यवहार को ‘रेड फ्लैग’ बता देती हैं और लोग उसी पैमाने से अपने रिश्ते को देखने लगते हैं।
इसके अलावा सोशल मीडिया पर दिखने वाले परफेक्ट कपल्स वास्तविक रिश्तों को लेकर अवास्तविक उम्मीदें भी पैदा कर सकते हैं। हर रिश्ते में मतभेद और मुश्किल दौर आना सामान्य है।
एडजस्टमेंट जरूरी, लेकिन आत्मसम्मान भी
विशेषज्ञों के अनुसार, अलग आदतों और विचारों वाले दो लोगों के साथ रहने में समझौता और एडजस्टमेंट जरूरी होता है। लेकिन एडजस्टमेंट का मतलब लगातार अपमान, शोषण या चोट सहना नहीं है।
जब किसी रिश्ते में आत्मसम्मान, मानसिक शांति या सुरक्षा लगातार प्रभावित होने लगे और बदलाव की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति पर हो, तब इसे गंभीरता से लेना जरूरी है।
रिश्ते को रील नहीं, वास्तविकता से समझें
रिश्तों में समस्या होने पर सोशल मीडिया की 30 सेकंड की सलाह को अंतिम फैसला मानने के बजाय पूरे संदर्भ को समझना जरूरी है। कई बार रिश्ते का तनाव मानसिक स्वास्थ्य, नशे या अत्यधिक शक जैसी दूसरी समस्याओं से भी जुड़ा हो सकता है।
आखिरकार हर असहमति रेड फ्लैग नहीं होती और हर समझौता कमजोरी नहीं होता। किसी रिश्ते को समझने के लिए वायरल रील के कुछ लक्षणों से ज्यादा जरूरी है व्यवहार का पैटर्न, आपसी सम्मान, भरोसा, बातचीत और दोनों लोगों की रिश्ते को बेहतर बनाने की इच्छा।


