Stockholm Syndrome Explained: जो जान का दुश्मन, उसी से लगाव क्यों? स्टॉकहोम सिंड्रोम का पूरा विज्ञान

Stockholm Syndrome Explained: स्टॉकहोम सिंड्रोम क्या है और बंधक को अपने किडनैपर से लगाव क्यों होने लगता है? जानिए 1973 की बैंक घटना, डर, मानसिक तनाव और इस अवधारणा के पीछे का विज्ञान।

Yogesh Mishra
Published on: 22 Oct 2026 4:12 PM IST
Stockholm Syndrome | Stockholm Syndrome Explained in Hindi | Newstrack Hindi
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Stockholm Syndrome | Stockholm Syndrome Explained in Hindi | Newstrack Hindi

Stockholm Syndrome Explained: किसी का अपहरण हो गया है। उसे बंद कमरे में रखा गया है, धमकियाँ मिल रही हैं और उसकी आज़ादी पूरी तरह छिन गई है। फिर भी कुछ समय बाद वही व्यक्ति अपहरणकर्ता के प्रति सहानुभूति दिखाने लगता है। उसके व्यवहार को सही ठहराता है, उसकी छोटी-सी मेहरबानी को बड़ा एहसान मानता है, और कभी-कभी पुलिस से ज़्यादा अपहरणकर्ता पर भरोसा करने लगता है। ऐसा क्यों होता है? क्या यह प्रेम है, डर है, मानसिक भ्रम है, या जान बचाने की दिमाग़ी रणनीति?

मनोविज्ञान में ऐसी कुछ स्थितियों को समझाने के लिए "स्टॉकहोम सिंड्रोम" शब्द इस्तेमाल होता है। पर इसके बारे में प्रचलित कई बातें अधूरी हैं। सबसे ज़रूरी तथ्य यह है कि इसे मानसिक रोगों की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सूचियों में अलग, औपचारिक बीमारी के रूप में मान्यता नहीं मिली है, और इसके लिए सर्वमान्य निदान मानदंड भी नहीं हैं। इसलिए किसी बंधक, हिंसा के शिकार व्यक्ति या शोषण भरे रिश्ते में रह रहे इंसान के व्यवहार को सिर्फ़ इस नाम से समझा देना ठीक नहीं। फिर भी यह अवधारणा एक अहम सवाल उठाती है: जब किसी की सुरक्षा और जान दूसरे के हाथ में हो, तो डर और लगाव एक साथ कैसे पैदा हो सकते हैं?

यह नाम कहाँ से आया?

शब्द की जड़ें अगस्त 1973 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुई बैंक डकैती में हैं। 23 अगस्त को जान-एरिक ओल्सन ने नॉर्माल्मस्टोर्ग इलाके के क्रेडिटबैंकन बैंक में घुसकर कर्मचारियों को बंधक बना लिया। उसकी माँग पर एक और अपराधी, क्लार्क ओलोफ़्सन, को भी बैंक लाया गया। चार कर्मचारी करीब छह दिन (23-28 अगस्त) तक बंधक रहे। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा। बंधकों के कुछ बयानों और व्यवहार से लगा कि वे अपहरणकर्ताओं के प्रति सहानुभूति रखते हैं और पुलिस की कार्रवाई से आशंकित हैं। इसकी व्याख्या के लिए स्वीडिश मनोचिकित्सक और अपराधविज्ञानी निल्स बेजेरोट से जुड़ा "नॉर्माल्मस्टोर्ग सिंड्रोम" का विचार आया, जो बाद में स्टॉकहोम सिंड्रोम कहलाया।

पर इसका दूसरा पक्ष भी है। पुलिस से बंधकों की आशंका का मतलब अपराधियों से प्रेम या अंधी निष्ठा नहीं था। वे अपनी जान बचाने के लिए पुलिस की संभावित कार्रवाई से भी डर सकते थे। बाद में कुछ बंधकों ने इस मनोवैज्ञानिक व्याख्या पर आपत्ति भी जताई। इसलिए आज इस घटना को सिर्फ़ अजीब लगाव की कहानी नहीं, बल्कि बंधकों के असली खतरे और पुलिस की रणनीति के संदर्भ में भी देखा जाता है।

दुश्मन के प्रति सहानुभूति कैसे पैदा होती है?

आम हालात में इंसान उससे दूर रहना चाहता है जो उसे नुकसान पहुँचाए। पर जब किसी की आज़ादी छिन जाए और जान पर किसी और का लगभग पूरा नियंत्रण हो, तो हालात असामान्य हो जाते हैं। तब दिमाग़ का सबसे बड़ा लक्ष्य बस ज़िंदा रहना हो सकता है।

मान लीजिए अपहरणकर्ता ने बंधक को घंटों भूखा रखा और फिर वही खाना-पानी देता है। सामान्य जीवन में यह मामूली बात है, पर भारी डर और बेबसी में यह बहुत बड़ी राहत लग सकती है। जो खतरे का स्रोत है, वही राहत का स्रोत भी लगने लगता है।

यही विरोधाभास इस विषय का केंद्र है। जिससे डर है, उसी के मूड पर सुरक्षा भी टिकी है। इसलिए बंधक उसके चेहरे के भाव, आवाज़ और व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों पर बहुत ध्यान देने लगता है, ताकि समझ सके कि क्या बात उसे भड़काएगी और क्या करने से हिंसा का खतरा घटेगा। इस तरह पैदा हुए सहयोग या लगाव को हमेशा अपनी मर्ज़ी से बना रिश्ता नहीं मान सकते। कई बार यह खतरे से बचने का तरीका होता है, जिसे बाहर से देखने वाला प्रेम या वफ़ादारी समझ बैठता है।

क्या दिमाग़ खुद को बचाने के लिए अत्याचारी का पक्ष लेने लगता है?

भारी खतरे में दिमाग़ की तनाव-प्रणाली सक्रिय हो जाती है। एमिग्डाला, हाइपोथैलेमस और दूसरे नेटवर्क खतरा पहचानने और शरीर की प्रतिक्रिया तय करने में लगते हैं। एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन बदलते हैं, धड़कन बढ़ती है, ध्यान खतरे पर टिक जाता है।

पर खतरे में इंसान हमेशा लड़ता या भागता नहीं। कभी वह निष्क्रिय हो जाता है, बहुत आज्ञाकारी बन जाता है या धमकाने वाले को शांत रखने की कोशिश करता है। लोकप्रिय मनोविज्ञान में इसे कभी-कभी "फ़ॉन रिस्पॉन्स" कहा जाता है, हालाँकि यह कोई सर्वमान्य चिकित्सकीय निदान नहीं है। बंधक के लिए विरोध करना हमेशा सुरक्षित नहीं होता। अगर उसे लगे कि विरोध पर जान जाएगी, तो वह बात मानेगा, तारीफ़ करेगा या नाराज़गी से बचेगा। ऐसा व्यवहार उसकी सहमति का सबूत नहीं है।

एक सीमा भी याद रखें: ऐसा कोई सिद्ध जैविक रास्ता अभी स्थापित नहीं है जिससे कहा जा सके कि फलाँ हार्मोन या दिमाग़ी हिस्से की गतिविधि से स्टॉकहोम सिंड्रोम बनता है। मौजूदा मनोवैज्ञानिक व्याख्याएँ संभावित प्रक्रियाएँ बताती हैं, अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।

क्या डर और राहत मिलकर लगाव पैदा कर सकते हैं?

कुछ व्याख्याओं के अनुसार लगातार धमकी और बीच-बीच में मिलती राहत का क्रम व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। अगर अत्याचारी कभी हिंसक हो और कभी अचानक मेहरबान, तो पीड़ित उस मेहरबानी को बहुत ज़्यादा अहमियत देने लगता है। व्यवहार विज्ञान की "इंटरमिटेंट रिइन्फ़ोर्समेंट" (अनियमित समय पर मिलने वाला इनाम) की अवधारणा इसे समझने में काम आती है: जब राहत अनिश्चित समय पर मिलती है, तो इंसान उसकी प्रतीक्षा और उम्मीद से बँधा रहता है।

पर इसे स्टॉकहोम सिंड्रोम का सिद्ध और सार्वभौमिक कारण नहीं कह सकते। हर बंधक या हिंसा के शिकार में ऐसा लगाव नहीं बनता। कुछ लोग अत्याचारी से लगातार नफ़रत या डर महसूस करते हैं, कुछ सिर्फ़ सहयोग का दिखावा करते हैं, और कुछ में उलझी, परस्पर विरोधी भावनाएँ बनती हैं। इसलिए यह कहना गलत है कि डर और दयालुता का क्रम हमेशा प्रेम पैदा कर देता है।

क्या पीड़ित अपने अत्याचारी को सही मानने लगता है?

कुछ हालात में हो सकता है, पर इसका मतलब समझना ज़रूरी है। जब खाना, सुरक्षा, नींद, संपर्क और जान, सब किसी और के नियंत्रण में हों, तो विकल्प बहुत सीमित हो जाते हैं। ऐसे में पीड़ित अत्याचारी के व्यवहार की सफ़ाई ढूँढ सकता है: "यह असल में बुरा आदमी नहीं है, हालात ने इसे मजबूर किया है" या "पुलिस न आई तो यह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाएगा।" कभी ऐसे विचार डर को संभालने और हालात को समझने की कोशिश होते हैं। सामने के खतरे को कम भयानक मानकर इंसान उसे सहने की कोशिश करता है।

लेकिन पीड़ित का अपराधी के बारे में कोई अच्छी बात कह देना हमेशा इसका सबूत नहीं कि वह मानसिक रूप से उसके काबू में आ गया है। वह उसकी असली राय हो सकती है, तुरंत की सुरक्षा की रणनीति हो सकती है, या बचाव अभियान को लेकर जायज़ चिंता भी।

क्या यह प्रेम संबंधों और घरेलू हिंसा में भी दिखता है?

लोकप्रिय मीडिया में यह शब्द अक्सर उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है जो हिंसक या शोषण भरा रिश्ता छोड़ नहीं पाते। इसमें सावधानी ज़रूरी है। रिश्ते में बने रहने के कई कारण हो सकते हैं: आर्थिक निर्भरता, बच्चों की सुरक्षा, समाज का दबाव, धमकियाँ, रहने की जगह न होना, परिवार से कटाव, और छोड़ने पर हिंसा बढ़ने का खतरा। कई बार अलग होने की कोशिश खुद जोखिम भरी होती है।

ऐसे रिश्तों के लिए "ट्रॉमा बॉन्डिंग" की अवधारणा पर भी चर्चा होती है, यानी ताक़त के असंतुलन, डर, नियंत्रण और कभी-कभार मिलने वाली अच्छी प्रतिक्रिया के बीच बना भावनात्मक जुड़ाव। पर ट्रॉमा बॉन्डिंग और स्टॉकहोम सिंड्रोम एक नहीं हैं, और ट्रॉमा बॉन्डिंग भी कोई औपचारिक मानसिक रोग निदान नहीं है। किसी के हिंसक रिश्ते में रहने को सिर्फ़ भावनात्मक लगाव से समझाना उसके सामने खड़ी असली आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा की बाधाओं को अनदेखा करना है। और सबसे अहम बात: अत्याचारी के साथ बने रहना अत्याचार के प्रति सहमति का सबूत नहीं है।

क्या बच्चों और किशोरों में भी ऐसा जुड़ाव बन सकता है?

बच्चों की स्थिति खास तौर पर नाज़ुक है। वे खाने, आसरे, सुरक्षा और भावनात्मक देखभाल के लिए बड़ों पर निर्भर होते हैं। अगर वही बड़ा बच्चे के साथ हिंसा या दुर्व्यवहार करे, तो बच्चे के भीतर डर और लगाव दोनों मौजूद रह सकते हैं। विकासात्मक मनोविज्ञान में देखा गया है कि बच्चा अपने देखभालकर्ता से जुड़ा रह सकता है, भले ही उसके व्यवहार से नुकसान हो रहा हो। असंगत या डराने वाली देखभाल से "अव्यवस्थित लगाव" जैसे व्यवहार भी दिख सकते हैं।

क्या अपहरणकर्ता से लगाव होना मानसिक बीमारी है?

यह सबसे अहम वैज्ञानिक सवाल है। अमेरिकी मनोचिकित्सक संघ की सूची में स्टॉकहोम सिंड्रोम स्वतंत्र मानसिक विकार के रूप में शामिल नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में भी यह अलग निदान नहीं है। एक कारण यह है कि इसके लिए साफ़ और सर्वमान्य मानदंड नहीं हैं, और यह तय करने का कोई मानकीकृत परीक्षण भी नहीं कि किसी में यह मौजूद है या नहीं।

2008 में Acta Psychiatrica Scandinavica में छपी एक व्यवस्थित समीक्षा ने इस पर उपलब्ध चिकित्सा साहित्य को परखा। पाया गया कि शोध सीमित है और ज़्यादातर अलग-अलग मामलों के ब्योरों पर टिका है। शोधकर्ताओं ने इसके निदान मानदंडों और वैज्ञानिक आधार की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाया।

क्या स्टॉकहोम सिंड्रोम और पीटीएसडी एक ही चीज़ हैं?

पीटीएसडी (पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) मान्यता प्राप्त मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जो बहुत भयावह घटना के बाद कुछ लोगों में विकसित हो सकता है। इसमें घटना की परेशान करने वाली यादें, बुरे सपने, खतरे के प्रति अति-सतर्कता, कुछ जगहों या हालात से बचना, नकारात्मक मनोदशा और रोज़मर्रा की दिक्कतें हो सकती हैं।

बंधक बने व्यक्ति में पीटीएसडी हो सकता है, पर हर बंधक में नहीं होता। और अत्याचारी के प्रति सहानुभूति या उलझी भावनाएँ होने से अपने आप पीटीएसडी का निदान नहीं बन जाता। असल अंतर यह है कि पीटीएसडी के लिए स्थापित मानदंड और व्यापक शोध हैं, जबकि स्टॉकहोम सिंड्रोम का वैज्ञानिक आधार सीमित और विवादित है।

क्या इसके मशहूर उदाहरण सचमुच प्रमाणित हैं?

स्टॉकहोम बैंक संकट के अलावा कुछ और चर्चित अपहरणों को भी इससे जोड़ा गया है, जिनमें अमेरिका की पैटी हर्स्ट का मामला सबसे जाना-माना है। 1974 में अख़बार कारोबार वाले हर्स्ट परिवार की सदस्य पैटी का "सिम्बायोनीज़ लिबरेशन आर्मी" नाम के संगठन ने अपहरण किया था। बाद में वे संगठन की गतिविधियों में शामिल दिखीं और एक बैंक डकैती में भी उनकी भूमिका सामने आई। तब इस पर बड़ी बहस हुई कि उनका व्यवहार अपनी मर्ज़ी से था या अपहरण, धमकी और दबाव से प्रभावित था। इसे अक्सर स्टॉकहोम सिंड्रोम का उदाहरण बताया जाता है, पर किसी घटना को इस अवधारणा से जोड़ देना उसका चिकित्सकीय निदान साबित नहीं करता।

पुलिस और बचाव दल को इसका ध्यान रखना पड़ता है?

बंधक संकट में पुलिस और वार्ताकारों का पहला मकसद जान बचाना होता है। वे अपराधी के व्यवहार, उसकी माँगों, हिंसा के खतरे और बंधकों के हालात का आकलन करते हैं। बंधक का अपहरणकर्ता से सहयोग करना हमेशा विश्वासघात नहीं होता, कई बार वह अपने बचने की संभावना बढ़ा रहा होता है। उसी तरह पुलिस की किसी कार्रवाई से डरना भी अपने आप अपराधी के प्रति निष्ठा का सबूत नहीं है। इसलिए मूल्यांकन में व्यक्ति की तुरंत की सुरक्षा, उसके असली विकल्प और दबाव के हालात को सबसे ऊपर रखना चाहिए।

क्या अत्याचारी से लगाव खत्म हो सकता है?

अगर हिंसा या नियंत्रण वाले रिश्ते में जटिल भावनात्मक निर्भरता बन गई है, तो सुरक्षित माहौल, सामाजिक सहारे और सही मनोवैज्ञानिक मदद से हालत सुधर सकती है। पर सिर्फ़ यह कह देना कि "उसे भूल जाओ" या "रिश्ता तोड़ दो" काफ़ी नहीं। व्यक्ति की सुरक्षा, आर्थिक हालत, रहने की जगह, बच्चों की ज़िम्मेदारी और मानसिक सेहत, सब मायने रखते हैं।

आघात से प्रभावित कुछ लोगों को मनोवैज्ञानिक इलाज की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर पीटीएसडी हुआ है, तो ट्रॉमा-केंद्रित संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (सीबीटी) और ईएमडीआर जैसे प्रमाण-आधारित इलाज उपयोगी हो सकते हैं। इलाज का चुनाव असली लक्षणों और डॉक्टरी आकलन के अनुसार होना चाहिए। स्टॉकहोम सिंड्रोम के लिए कोई एक सिद्ध इलाज-प्रोटोकॉल नहीं है। इसलिए मदद का मकसद किसी विवादित लेबल को हटाना नहीं, बल्कि व्यक्ति की सुरक्षा, आज़ादी और मानसिक सेहत बेहतर करना होना चाहिए।

स्टॉकहोम सिंड्रोम इंसानी व्यवहार के एक असाधारण विरोधाभास को समझाने की कोशिश है: जिससे जान को खतरा है, उसी के प्रति कुछ हालात में सहानुभूति, भरोसा या लगाव दिख सकता है। इसके पीछे डर, निर्भरता, सीमित विकल्प, बीच-बीच में मिलती राहत और खतरे को काबू में रखने की कोशिश जैसी प्रक्रियाएँ हो सकती हैं। पर आधुनिक मनोविज्ञान यह भी साफ़ कहता है कि यह स्वतंत्र रूप से मान्यता प्राप्त मानसिक रोग नहीं है।

सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि भारी डर और नियंत्रण में इंसान का व्यवहार सामान्य हालात से अलग हो सकता है। बाहर से जो अत्याचारी के प्रति प्रेम या निष्ठा दिखता है, वह कई बार अपनी जान बचाने, हिंसा घटाने या असहनीय हालात में मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश होती है। इसलिए इसे किसी रहस्यमयी प्रेम कहानी की तरह देखने के बजाय डर, ताक़त के असंतुलन, मनोवैज्ञानिक ढलाव और आघात के संदर्भ में समझना ज़्यादा वैज्ञानिक नज़रिया है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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