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प्लास्टिक छोड़ केले के पत्तों को अपनाया, इस सुपरमार्केट की अनोखी पहल ने दुनिया का जीता दिल
Banana Leaf Packaging: केले के पत्तों से पैक हो रहे फल-सब्जियां, दुनिया भर में हो रही इस पहल की तारीफ
Banana Leaf Packaging
Banana Leaf Packaging: प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक बन चुका है। हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा नदियों, समुद्रों और जमीन में पहुंचकर प्रकृति और मानव स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाने का कारण बन गया है। ऐसे समय में थाईलैंड के कुछ सुपरमार्केट ने प्लास्टिक पैकेजिंग की जगह केले के पत्तों का इस्तेमाल शुरू कर एक नई मिसाल पेश की है। दूसरी ओर, भारत के इंदौर जिले का सिन्दौड़ा गांव पिछले कई वर्षों से सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूरी तरह रोक लगाकर पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण बना हुआ है। ये दोनों पहल दिखाती हैं कि छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े स्तर पर असर डाल सकते हैं।
केले के पत्तों में पैक हो रहा फल-सब्जियों का सामान
थाईलैंड के कई सुपरमार्केट ने प्लास्टिक रैप और पॉलीबैग की जगह केले के पत्तों का उपयोग शुरू किया है। फल, सब्जियां और कुछ अन्य खाद्य उत्पाद अब प्राकृतिक तरीके से केले के पत्तों में लपेटकर ग्राहकों को दिए जा रहे हैं। केले के पत्ते मजबूत, लचीले और पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं। इन्हें आसानी से साफ किया जा सकता है और उपयोग के बाद खाद में बदल दिया जाता है। यही वजह है कि यह प्लास्टिक का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बनकर सामने आया है।
क्यों सफल मानी जा रही है यह पहल?
थाईलैंड में केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है। फल की कटाई के बाद पौधों की पत्तियां और तने अक्सर बेकार चले जाते थे। अब इन्हीं पत्तों का उपयोग पैकेजिंग में किया जा रहा है। इससे दो बड़े फायदे हुए हैं। पहला, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हुआ और दूसरा, कृषि अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होने लगा। कई इलाकों में किसानों को भी इन पत्तों की बिक्री से अतिरिक्त आय मिलने लगी है। ग्राहकों का अनुभव भी सकारात्मक रहा है। उनका कहना है कि केले के पत्तों में पैक फल और सब्जियां अधिक ताजा महसूस होती हैं। केले के पत्तों में प्राकृतिक नमी बनाए रखने की क्षमता होती है, जिससे कुछ खाद्य पदार्थ जल्दी सूखते नहीं हैं।
पर्यावरण को कैसे मिलेगा फायदा?
प्लास्टिक को पूरी तरह नष्ट होने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं। इसका बड़ा हिस्सा माइक्रोप्लास्टिक के रूप में मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला तक पहुंच जाता है। समुद्री जीवों, पक्षियों और पशुओं के लिए भी प्लास्टिक गंभीर खतरा बन चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सुपरमार्केट, किराना स्टोर और स्थानीय बाजार प्राकृतिक पैकेजिंग को बड़े स्तर पर अपनाएं तो हर साल हजारों टन सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम किया जा सकता है। इससे कचरा प्रबंधन का दबाव भी घटेगा और कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलेगी।
भारत में भी नई नहीं है केले के पत्तों की परंपरा
भारत में केले के पत्तों का उपयोग कोई नई बात नहीं है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में आज भी भोजन केले के पत्ते पर परोसने की परंपरा है। कई धार्मिक आयोजनों, विवाह समारोहों और सामुदायिक भोज में भी इसका इस्तेमाल होता है। अब कुछ शहरों में छोटे व्यवसाय और ऑर्गेनिक स्टोर भी पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि बड़े पैमाने पर इसे लागू करने के लिए पर्याप्त उपलब्धता, सप्लाई चेन और भंडारण जैसी चुनौतियों का समाधान करना होगा।
इंदौर का सिन्दौड़ा गांव बना प्लास्टिक मुक्त गांव की मिसाल
जहां थाईलैंड के सुपरमार्केट प्राकृतिक पैकेजिंग को बढ़ावा दे रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश के इंदौर जिले का सिन्दौड़ा गांव कई वर्षों से सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ मजबूत अभियान चला रहा है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत वर्ष 2019 में गांव के लोगों ने सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करने की सामूहिक शपथ ली थी। ग्रामीणों ने इस संकल्प को आज तक कायम रखा है और गांव में प्लास्टिक के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा रखी है।
गलती से प्लास्टिक लाने वालों को भी मिलता है कपड़े का बैग
सिन्दौड़ा गांव की खास बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति गलती से पॉलीथिन लेकर गांव में आ जाता है तो उससे प्लास्टिक लेकर उसे कपड़े का बैग उपलब्ध कराया जाता है।
ग्राम पंचायत और सामाजिक संस्थाओं की मदद से कपड़े की थैलियां तैयार कर ग्रामीणों को 10 से 15 रुपये की कीमत पर उपलब्ध कराई जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है तो उसे समझाने के साथ जुर्माना भी लगाया जाता है।
स्वास्थ्य से जुड़ी घटनाओं ने बदली ग्रामीणों की सोच
ग्रामीणों के अनुसार गांव में कुछ लोगों की कैंसर से मौत और प्लास्टिक खाने से पशुओं की मौत की घटनाओं ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया। इसके बाद पूरे गांव ने मिलकर प्लास्टिक से दूरी बनाने का फैसला लिया। आज गांव में हर सप्ताह जागरूकता कार्यशाला आयोजित होती है। जहां लोगों को प्लास्टिक प्रदूषण, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के बारे में जानकारी दी जाती है। गांव को साफ-सुथरा रखने के लिए सामूहिक चर्चा के बाद निर्णय लिए जाते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन्हें लागू करते हैं।
सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ वैश्विक अभियान
दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से हर वर्ष 3 जुलाई को इंटरनेशनल प्लास्टिक बैग फ्री डे मनाया जाता है। इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2008 में बैग फ्री वर्ल्ड नेटवर्क ने की थी।
इसके बाद कई देशों ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने या इसके उपयोग को कम करने के लिए कानून बनाए। यूरोपीय संघ ने भी प्लास्टिक उपयोग कम करने के लिए महत्वपूर्ण नियम लागू किए।
भारत में भी प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए समय-समय पर विभिन्न राज्यों ने कदम उठाए। हिमाचल प्रदेश शुरुआती राज्यों में शामिल रहा जिसने प्लास्टिक बैग पर सख्ती दिखाई। बाद में केंद्र सरकार ने भी सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू करने की दिशा में बड़े फैसले लिए।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हर देश की जलवायु, कृषि और स्थानीय संसाधन अलग होते हैं, इसलिए हर जगह केले के पत्तों का उपयोग संभव नहीं है। लेकिन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री जैसे केले के पत्ते, सुपारी के पत्ते, बांस, जूट और कपड़े के बैग प्लास्टिक के बेहतर विकल्प बन सकते हैं। यदि सरकार, उद्योग और आम लोग मिलकर ऐसे विकल्प अपनाएं तो सिंगल यूज प्लास्टिक पर निर्भरता काफी हद तक कम की जा सकती है।


