Thuggee History: ठग कौन थे और विलियम स्लीमन ने उन्हें कैसे पकड़ा? ब्रिटिश भारत की एक रहस्यमय कहानी

Thuggee History: ब्रिटिश भारत में ठग कौन थे? जानिए विलियम हेनरी स्लीमन ने मुखबिरों, स्वीकारोक्तियों और अपराधी नेटवर्क की मदद से ठगों को कैसे पकड़ा और ठगी का रहस्य क्या था।

Yogesh Mishra
Published on: 25 Aug 2026 6:06 PM IST
Thuggee History: ठग कौन थे और विलियम स्लीमन ने उन्हें कैसे पकड़ा? ब्रिटिश भारत की एक रहस्यमय कहानी
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Thuggee History: ‘ठग’ शब्द आज सामान्य अपराधी या गुंडे के अर्थ में इस्तेमाल होता है। लेकिन इसका इतिहास कहीं अधिक पुराना और विचित्र है। हिंदी का ‘ठग’ मूलतः छल करने वाले, धोखे से धन हड़पने वाले व्यक्ति के अर्थ में था। अंग्रेज़ी का ‘thug’ भी इसी भारतीय शब्द से गया। शब्द की जड़ संस्कृत के उस रूप से जोड़ी जाती है जिसका अर्थ छिपाना या छल करना था। लेकिन उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश भारत में ‘ठग’ एक बहुत विशिष्ट छवि बन गया। ऐसे घूमंतू गिरोह, जो यात्रियों से दोस्ती करते, उनके साथ कई दिनों तक चलते, सही स्थान की प्रतीक्षा करते, फिर अचानक गला घोंटकर हत्या कर देते, शव छिपाते और सामान लूट लेते। इन्हें कई क्षेत्रों में ‘फाँसीगर’ भी कहा जाता था, क्योंकि हत्या का सामान्य तरीका गले में कपड़ा या फंदा कसना बताया गया।

लंबे समय तक ब्रिटिश विवरणों ने ठगों को भारत भर में फैले एक अत्यंत प्राचीन, सुव्यवस्थित, देवी काली के नाम पर मनुष्य की बलि देने वाले रहस्यमय संप्रदाय के रूप में प्रस्तुत किया। आधुनिक इतिहासकार इस तस्वीर के बड़े हिस्से पर सवाल उठाते हैं। आज अपेक्षाकृत संतुलित निष्कर्ष यह है कि यात्रियों को धोखे से लूटने और कुछ मामलों में हत्या करने वाले संगठित गिरोह वास्तव में मौजूद थे, लेकिन ब्रिटिश शासन ने संभवतः उनकी एकता, संख्या, प्राचीनता और धार्मिक स्वरूप को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। हाल के इतिहासलेखन में इसे न पूरी तरह काल्पनिक मानना उचित माना जाता है, न औपनिवेशिक विवरण को अक्षरशः सत्य।

ठग सड़क पर डाकू की तरह हमला नहीं करते थे



ठगों की कथित कार्यपद्धति ही उन्हें सामान्य डकैतों से अलग करती थी। डकैत अचानक हमला कर सकता था, हथियार दिखा सकता था या गाँव-घर पर धावा बोल सकता था। ठगों की सबसे बड़ी ताकत विश्वास जीतना थी। वे खुद को व्यापारी, सैनिक, तीर्थयात्री, मजदूर या सामान्य मुसाफिर के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे। रास्ते में किसी अकेले या छोटे समूह के यात्री से परिचय करते, उससे बातें करते और फिर उसके साथ यात्रा करने लगते।

कल्पना कीजिए 1820 के दशक का भारत। आज की तरह न ट्रेन, न सड़क, न मोटर, न मोबाइल फोन नहीं और न कोई पहचान पत्र। एक शहर से दूसरे शहर जाना कई दिनों या हफ्तों की यात्रा थी। रास्ते में सराय, जंगल और लंबे सुनसान इलाके आते थे। ऐसे में अजनबी यात्रियों का समूह बनाकर चलना सुरक्षित भी माना जाता था। यही भरोसा अपराध का हथियार बन सकता था। ब्रिटिशकालीन विवरणों के अनुसार ठगों का गिरोह अपने शिकार के साथ कभी-कभी कई दिनों तक चलता था। वे साथ खाना खाते, बातचीत करते, भरोसा जीतते और इन्तजार करते कि कोई ऐसा सुनसान स्थान मिले जहाँ हत्या के बाद शव आसानी से छिपाया जा सके। फिर तय संकेत पर कुछ ठग यात्री को पकड़ते और एक व्यक्ति कपड़े, रूमाल या फंदे से उसका गला घोंट देता। शव को पहले से देखी गई या जल्दी खोदी गई जगह में दबा दिया जाता और सामान बाँट लिया जाता। पुराने ब्रिटिश स्रोतों में ऐसे गिरोहों के भीतर अलग-अलग भूमिकाओं का भी वर्णन मिलता है।

लेकिन एक चीज महत्वपूर्ण है। ठगों की इन प्रक्रियाओं का अधिकांश विस्तृत ज्ञान उन्हीं कबूलनामों और विवरणों से आता है जिन्हें बाद में ब्रिटिश अधिकारियों, विशेष रूप से विलियम स्लीमन, ने जमा किया। यानी जिन दस्तावेजों से हम ‘ठगों की दुनिया’ जानते हैं, वे खुद पुलिस-जाँच और उस समय के प्रशासन के उत्पाद हैं।

क्या ठग देवी काली के उपासक हत्यारे थे?

ब्रिटिश विवरणों में ठगों को देवी काली या भवानी की पूजा करने वाला ऐसा गुप्त समूह बताया गया जो हत्या को धार्मिक कर्तव्य समझता था। कुछ अनुष्ठान, शकुन, विशेष औजार और हत्या के नियम भी दर्ज किए गए। धीरे-धीरे विक्टोरियन ब्रिटेन में यह धारणा बहुत लोकप्रिय हो गई कि भारत में एक रहस्यमय ‘मर्डर कल्ट’ सदियों से हजारों यात्रियों की बलि चढ़ा रहा है। लेकिन आधुनिक इतिहासलेखन ने इस तस्वीर को काफी संशोधित किया है। गिरोहों में केवल हिंदू नहीं, मुसलमान सदस्य भी थे। अपराध में धार्मिक विश्वासों और अनुष्ठानों की भूमिका कुछ समूहों में रही हो सकती है, लेकिन पूरे ठगी तंत्र को केवल ‘काली की पूजा के लिए हत्या’ के रूप में समझना पूरी तरह ठीक नहीं है। आर्थिक लाभ, घूमंतू अपराध, अवसर, पारिवारिक संबंध और उस समय की राजनीतिक अस्थिरता भी महत्वपूर्ण थे। कुछ आधुनिक अध्ययनों का निष्कर्ष है कि ब्रिटिश अधिकारियों ने अलग-अलग किस्म के अपराधी समूहों को एक व्यापक धार्मिक “ठगी व्यवस्था” के भीतर व्यवस्थित करने की कोशिश की। यानी यह कहना सही नहीं होगा कि काली-पूजा की बात पूरी तरह गढ़ी हुई थी; लेकिन यह कहना भी सुरक्षित नहीं कि हजारों ठग पूरे भारत में एक ही धार्मिक आदेश के तहत काम करते थे।

क्या ठग ब्रिटिश आने से पहले भी थे?



ठगी जैसी गतिविधियों का उल्लेख ब्रिटिश शासन से पहले के स्रोतों में भी मिलता है। कुछ मध्यकालीन विवरणों में ‘ठग’ कहे जाने वाले लोगों का उल्लेख है, और सत्रहवीं सदी के यूरोपीय यात्रियों ने भी ऐसे लुटेरों का वर्णन किया जो यात्रियों से मेल-जोल बढ़ाकर हत्या करते थे। एक आधुनिक शोध में चौदहवीं सदी के विवरण से लेकर सत्रहवीं सदी के यात्रियों तक ऐसे उल्लेखों की चर्चा की गई है।

विलियम हेनरी स्लीमन कौन था?

विलियम हेनरी स्लीमन का जन्म 1788 में ब्रिटेन में हुआ। वह ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल सेना में आया और नेपाल युद्ध में सेवा करने के बाद मध्य भारत में प्रशासनिक पदों पर काम करने लगा। 1820 के दशक में वह सागर और नर्मदा क्षेत्र के प्रशासन से जुड़ा। आगे चलकर वही ब्रिटिश अधिकारी ठगी-विरोधी अभियान का सबसे प्रसिद्ध चेहरा बना। 1835 में उसे ठगी के दमन की कार्रवाइयों का प्रमुख बनाया गया और कुछ वर्ष बाद उसके अधिकार में डकैती-विरोधी अभियान भी शामिल कर दिया गया। स्लीमन की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं थी कि उसने बड़ी सेना लेकर जंगलों में ठगों का पीछा किया।

उसकी वास्तविक ताकत थी - सूचना। स्लीमन ने समझ लिया था कि ऐसे अपराधियों को सामान्य पुलिस पद्धति से पकड़ना बहुत कठिन है। अगर कोई यात्री मध्य प्रदेश या उत्तर भारत के किसी निर्जन मार्ग पर गायब हो गया, शव जमीन में दबा दिया गया और अपराधी अगले महीने सैकड़ों किलोमीटर दूर चले गए, तो किसी स्थानीय थाने के पास दोनों घटनाओं को जोड़ने का कोई तरीका नहीं था। स्लीमन ने इन्हीं अलग-अलग घटनाओं के बीच संबंध बनाना शुरू किया। उसका सबसे बड़ा हथियार था - गिरफ्तार ठग को सरकारी गवाह बना देना।

यही अभियान का निर्णायक मोड़ था। कुछ गिरफ्तार आरोपियों को फाँसी या कठोर दंड से बचने के बदले अपने साथियों के खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार किया गया। उस समय ऐसे सरकारी गवाहों को ‘अप्रूवर’ अर्थात सरकारी मुखबिर या सहयोगी गवाह कहा जाता था। आधुनिक इतिहासकारों ने दिखाया है कि ठगी के मुकदमों में इन गवाहों की भूमिका केंद्रीय थी।

एक आरोपी गिरोह के पाँच लोगों के नाम बताता। उन पाँच में से कोई दूसरा पकड़ा जाता और बीस नए नाम देता। कोई तीसरा पुराने हत्या-स्थलों की पहचान कराता। वहाँ खुदाई होती और मानव अवशेष मिलने पर पुराने बयान की पुष्टि का दावा किया जाता। फिर किसी दूसरे प्रांत में अधिकारी को सूचना भेजी जाती। इस तरह स्लीमन ने एक प्रकार का अपराधी संबंध-जाल तैयार करना शुरू किया। आज इसे हम अपराध-विश्लेषण या संबंध-मानचित्रण कह सकते हैं। उस दौर में जब कोई आधुनिक केंद्रीय अपराध अभिलेख व्यवस्था नहीं थी, यह बड़ी प्रशासनिक नवीनता थी।

फ़िरंगिया की गिरफ्तारी क्यों महत्वपूर्ण थी?

स्लीमन की सफलता में गिरफ्तार ठग नेताओं में से कुछ बहुत महत्वपूर्ण बने। सबसे प्रसिद्ध नामों में फ़िरंगिया था, जो पकड़े जाने के बाद स्लीमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मुखबिर बना। उसके जैसे लोगों से स्लीमन को गिरोहों के रिश्तों, मार्गों, ठिकानों और अपराधों के बारे में विशाल मात्रा में सूचना मिली। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1830 के आसपास से स्लीमन ने ऐसे मुखबिरों को सैनिक टुकड़ियों के साथ भेजना शुरू किया, जो रास्तों और संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान कराते थे।

यहीं ठगी-विरोधी अभियान एक स्थानीय पुलिस कार्रवाई से बदलकर बड़े सूचना-अभियान में बदल गया। स्लीमन गिरफ्तार व्यक्ति से केवल यह नहीं पूछता था कि ‘तुमने किसे मारा?’ वह जानना चाहता था कि तुम्हारा गिरोह किस परिवार से जुड़ा है? किस गाँव में कौन रहता है? कौन किस नाम से यात्रा करता है? कौन-से मार्ग इस्तेमाल होते हैं? कहाँ हत्या हुई? कहाँ शव दबे हैं? कौन-से जमींदार या स्थानीय व्यक्ति मदद करते हैं? किस गिरोह का दूसरे गिरोह से संबंध है? ऐसी सूचनाओं को बार-बार दूसरे मुखबिरों के बयानों से मिलाया जाता।यही वह बिंदु है जहाँ स्लीमन अपने समय के लिए असाधारण जाँचकर्ता दिखाई देता है।

ठगों की अपनी भाषा तक का शब्दकोश बना लिया

1836 में स्लीमन ने ‘रामसीआना’ नाम से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित किया, जिसमें उसने ठगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली विशिष्ट शब्दावली और उनके काम करने की पद्धति का विवरण दिया। ब्रिटिश लाइब्रेरी के भारत कार्यालय अभिलेखों में यह ग्रंथ आज भी ठगी से संबंधित मूल औपनिवेशिक दस्तावेजों के साथ सूचीबद्ध है। उसका उद्देश्य केवल भाषा समझना नहीं था। यदि अपराधी किसी सांकेतिक शब्द में हत्या, गड्ढा, शिकार या खतरे की बात करते थे, तो उस भाषा को समझना पुलिस के लिए महत्वपूर्ण था। धीरे-धीरे स्लीमन के पास नाम, उपनाम, परिवार, गाँव, रिश्ते, अपराध-स्थल और भाषा का एक विशाल अभिलेख बन गया। यही ‘ठगी अभिलेख’ बाद में स्वयं इतिहास का विवादित स्रोत बन गया।

शवों की खोज ने अभियान को सनसनीखेज बना दिया

गिरफ्तार मुखबिर कभी अधिकारियों को उन स्थानों तक ले जाते जहाँ उनके अनुसार वर्षों पहले यात्रियों को मारकर दफनाया गया था। खुदाई में मानव अवशेष मिलने पर ब्रिटिश अधिकारियों को विश्वास होता कि मुखबिर सच बोल रहा है। इसका दोहरा प्रभाव हुआ। पुलिस को ठोस भौतिक साक्ष्य मिलने लगे। ब्रिटेन और भारत के अंग्रेजी समाज में इस अभियान की भयावह प्रतिष्ठा तेजी से फैलने लगी।

उस समय भारत का बड़ा हिस्सा सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन था, लेकिन अनेक रियासतें भी थीं। अपराधी एक क्षेत्र में हत्या कर दूसरे राजनीतिक क्षेत्र में चले जाते तो सामान्य प्रशासन के लिए उन्हें पकड़ना कठिन हो जाता। स्लीमन की प्रणाली की सफलता का बड़ा कारण यह था कि ब्रिटिश शासन ने विभिन्न क्षेत्रों और रियासतों के बीच सूचना का आदान-प्रदान बढ़ाया और ठगी को एक ऐसा अपराध माना जिसे स्थानीय सीमा से परे पीछा किया जा सकता है। इसी प्रक्रिया में 1830 के दशक में एक केंद्रीय ठगी-विरोधी विभाग विकसित हुआ। ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख बताते हैं कि इस विभाग से जुड़े विस्तृत प्रतिवेदन अगले दशकों तक तैयार होते रहे।

यह ब्रिटिश भारत में आधुनिक केंद्रीकृत अपराध-जाँच की शुरुआती मिसालों में से एक माना जा सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी था - औपनिवेशिक राज्य को लोगों, जातियों, परिवारों और घूमंतू समुदायों पर पहले से कहीं अधिक निगरानी करने की शक्ति मिल गई। कुछ इतिहासकार ठगी-विरोधी अभियान को बाद की औपनिवेशिक पुलिस और “जन्मजात अपराधी समुदाय” जैसी खतरनाक धारणाओं की पूर्वपीठिका मानते हैं।

कानून भी बदला गया

साधारण हत्या के मुकदमे में किसी खास हत्या को किसी खास आरोपी से जोड़ना पड़ता था। लेकिन यदि ठगी को एक संगठित अपराध माना जाए और किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल इतना प्रमाण मिले कि वह गिरोह का हिस्सा था, तो सामान्य प्रमाण व्यवस्था में कठिनाई आती थी।ब्रिटिश प्रशासन ने धीरे-धीरे ऐसे विशेष कानूनी प्रावधान बनाए जिनसे “ठगी से संबद्ध होने” के आधार पर भी गिरफ्तारी और सजा का रास्ता आसान हुआ। यही अभियान का सबसे विवादित पहलू है। यहाँ न्यायिक प्रश्न पैदा हुआ - क्या किसी व्यक्ति को इसलिए दोषी माना जा सकता है कि दूसरे गिरफ्तार अपराधियों ने उसे ठग बताया?

स्लीमन के पूरे तंत्र का बड़ा हिस्सा मुखबिरों की गवाही पर निर्भर था। आधुनिक इतिहासकार इसी कारण इन मुकदमों और उनसे बने अभिलेखों को सावधानी से पढ़ते हैं।

स्लीमन के अभियान में कितने ठग पकड़े गए?



1835 तक के पुराने औपनिवेशिक आँकड़ों में लगभग 1,500 से अधिक संदिग्धों को न्यायिक प्रक्रिया में लाए जाने और सैकड़ों को फाँसी, आजीवन कारावास या निर्वासन की सजा दिए जाने का उल्लेख है। पुराने ब्रिटानिका विवरण में अक्टूबर 1835 तक 1,562 मामलों की बात कही गई है, जिनमें 382 को फाँसी और 986 को कारावास या निर्वासन दिया गया था। बाद के स्रोतों में संख्या और बड़ी दिखाई देती है। कुछ गिरफ्तार ठगों द्वारा सैकड़ों हत्याओं की स्वीकारोक्ति बहुत प्रसिद्ध हुई। यह कहना सुरक्षित है कि 1830 और 1840 के दशक में हजारों संदिग्धों की जाँच, गिरफ्तारी या सजा हुई और संगठित सड़क-लूट के कई नेटवर्क वास्तव में टूटे ।

ईस्ट इंडिया कंपनी उस समय भारत में अपना राजनीतिक नियंत्रण तेजी से बढ़ा रही थी। शासन को यह दिखाना भी जरूरी था कि उसकी उपस्थिति भारत में “कानून और व्यवस्था” ला रही है। यदि ब्रिटिश जनता के सामने यह तस्वीर रखी जाए कि भारत की सड़कों पर सदियों पुराना गुप्त हत्यारा संप्रदाय घूमता था और केवल अंग्रेजी शासन ने उसे खत्म किया, तो साम्राज्य स्वयं को सभ्यता और सुरक्षा का रक्षक साबित कर सकता था।

‘काली के नाम पर हत्या’ वाली छवि कैसे दुनिया भर में फैल गई?

इसके लिए केवल पुलिस रिपोर्ट जिम्मेदार नहीं थीं। साहित्य ने इस कहानी को विस्फोटक लोकप्रियता दी। 1839 में फिलिप मीडोज टेलर का उपन्यास Confessions of a Thug प्रकाशित हुआ। उसने ठगों की भयावह, रहस्यमय दुनिया को ब्रिटिश पाठकों के सामने रोमांचक कथा के रूप में रखा। स्लीमन के काम और अभिलेखों का इस साहित्य पर प्रभाव था। इसके बाद ठग विक्टोरियन कल्पना का स्थायी चरित्र बन गया। यही वह दौर है जिसमें हिंदी का ‘ठग’ अंग्रेजी का ‘thug’ बनकर दुनिया में फैल गया।

आज अमेरिका या ब्रिटेन में कोई ‘thug’ कहे तो उसे अक्सर यह पता भी नहीं होता कि जिस अंग्रेजी शब्द का वह उपयोग कर रहा है, उसकी जड़ भारतीय ‘ठग’ में है। ऑक्सफर्ड शब्दकोश भी अंग्रेजी शब्द की उत्पत्ति हिंदी ‘ठग’ से बताता है। यह भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी में गए सबसे प्रसिद्ध अपराध-संबंधी शब्दों में से एक है।

क्या स्लीमन एक महान पुलिस अधिकारी था?

एक तरफ स्लीमन ने अपने समय से बहुत आगे की कई जाँच-पद्धतियाँ अपनाईं। उसने अलग-अलग मामलों के बीच संबंध खोजे, अपराधियों के पारिवारिक और सामाजिक नेटवर्क दर्ज किए, सूचना को विभिन्न प्रांतों में साझा किया, मुखबिर विकसित किए, पुराने अपराध-स्थल खोजे और केंद्रीकृत अभिलेख बनाए।

दूसरी तरफ उसने ठगों की ऐसी व्यापक छवि बनाने में भी बड़ी भूमिका निभाई जिसमें भारतीय समाज को रहस्यमय, हिंसक और अंधविश्वासी दिखाया गया। उसके अपने लेखन ने “ठगी” की ब्रिटिश परिभाषा गढ़ने में निर्णायक भूमिका निभाई। ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित उसके 1836 के Ramaseeana तथा बाद के प्रतिवेदन इसी औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माण के मूल दस्तावेज हैं। यानी स्लीमन केवल अपराध पकड़ नहीं रहा था। वह यह भी निर्धारित कर रहा था कि ‘ठग कौन है।’ और यह शक्ति बहुत बड़ी थी।

क्या ठगी वास्तव में खत्म हो गई?

1830 के दशक के अंत तक ब्रिटिश अधिकारियों ने दावा किया कि संगठित ठगी का बड़ा नेटवर्क लगभग तोड़ दिया गया है। स्लीमन की जिम्मेदारियों में बाद में डकैती भी जोड़ दी गई। यह संभव है कि लगातार गिरफ्तारी, मुखबिरों का जाल, लंबी सजाएँ और विभिन्न रियासतों के बीच पुलिस सहयोग ने इस प्रकार की घूमंतू संगठित हत्या-लूट को वास्तव में बहुत कठिन बना दिया हो। लेकिन सड़क-लूट, डकैती और दूसरे प्रकार के अपराध जारी रहे। बदला यह कि ब्रिटिश राज्य अब अपराधी समूहों को खोजने, दर्ज करने और नियंत्रित करने की अधिक केंद्रीकृत क्षमता विकसित कर चुका था।

यह विरासत आगे जाकर अधिक विवादित रूप भी लेती है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश शासन ने कुछ पूरे समुदायों को ही ‘आनुवंशिक’ या ‘जन्मजात’ अपराधी मानने वाली नीतियाँ विकसित कीं।

इस पूरी कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा क्या है?

असल रहस्य यह है कि हम आज भी पूरी तरह निश्चित नहीं हैं कि जिस ‘ठगी’ को हम जानते हैं, उसका कितना हिस्सा अपराधियों की वास्तविक दुनिया था और कितना हिस्सा औपनिवेशिक राज्य द्वारा व्यवस्थित की गई कहानी।

हमारे पास स्लीमन के अभिलेख हैं। गिरफ्तार लोगों के बयान हैं। कुछ शव और अपराध-स्थल मिले। पुराने यात्रियों के स्वतंत्र उल्लेख भी हैं। इसलिए वास्तविक अपराध को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन हमारे पास ठगों द्वारा स्वयं लिखी गई कोई विशाल स्वतंत्र सामग्री नहीं है। अधिकांश कथा हमें उन्हीं अधिकारियों के दस्तावेजों से मिलती है जो उन्हें पकड़ रहे थे। इसी कारण ‘ठगों’ की कहानी आज भी इतनी आकर्षक है।

अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि भारत में यात्रियों को छलकर लूटने और हत्या करने वाले वास्तविक संगठित गिरोह मौजूद थे। स्लीमन ने मुखबिरों, स्वीकारोक्तियों, नेटवर्क-जाँच, अपराध-स्थलों और अंतर-क्षेत्रीय सूचना व्यवस्था की मदद से उनके अनेक गिरोहों को प्रभावी रूप से तोड़ा। लेकिन उसी अभियान के दौरान ब्रिटिश शासन ने अलग-अलग अपराधी नेटवर्कों को एक विशाल, प्राचीन और धार्मिक “ठग संप्रदाय” के रूप में भी प्रस्तुत किया, जिसकी पूरी ऐतिहासिक सच्चाई आज भी विवादित है।

स्लीमन के नाम पर है रेलवे स्टेशन

इस कहानी में एक दिलचस्प कड़ी और जुड़ती है। मध्य प्रदेश के कटनी जिले में आज भी स्लीमनाबाद नाम का कस्बा मौजूद है। जिला प्रशासन के अनुसार इसका नाम कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन के नाम पर पड़ा था। यहां स्लीमन की पुरानी चौकी से जुड़ा भवन और एक स्मारक भी मौजूद है। स्लीमनाबाद मूल रूप से स्लीमन के नाम वाला कस्बा नहीं था। एक पुराने प्रशासनिक विवरण के अनुसार यहां पहले खोका नाम का गांव था। 1836-37 के आसपास स्लीमन इस इलाके में आए और उन्होंने करीब 96 एकड़ जमीन लेकर भूमिहीन किसानों को बसाया। 1839 में इस गांव का नाम स्लीमन के सम्मान में स्लीमनाबाद रखा गया। बाद में इसी नाम का रेलवे स्टेशन भी गांव के पास बना। यानी आज जिस स्लीमनाबाद रोड रेलवे स्टेशन का नाम सुनाई देता है, उसके पीछे केवल ठग-विरोधी अभियान नहीं, बल्कि स्लीमन की उस स्थानीय प्रशासनिक भूमिका की भी कहानी है जिसमें उन्होंने किसानों को जमीन दिलाकर बसाने में भूमिका निभाई थी।

स्लीमन की कब्र कहाँ है?

स्लीमन की तबीयत खराब थी। वे कलकत्ता से जहाज पर इंग्लैंड के लिए रवाना हुए, लेकिन 10 फरवरी 1856 को सीलोन यानी आज के श्रीलंका के पास समुद्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनके शरीर को समुद्र में ही दफनाया गया था। यही वजह है कि स्लीमनाबाद में मौजूद स्मारक को उनकी कब्र समझना सही नहीं होगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्लीमनाबाद के लोग लंबे समय तक स्लीमन की याद में एक मंदिर में मिट्टी का दीपक जलाते रहे। आज भी स्लीमनाबाद में स्लीमन से जुड़ी स्मृति मौजूद है। कटनी जिला प्रशासन के अनुसार उनके वंशज भी समय-समय पर इंग्लैंड से यहां आते रहे हैं।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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