Diya Jalane Ke Fayde: पूजा में तिल, घी और सरसों के तेल का महत्व, जानिए धार्मिक मान्यताएं

Diya Jalane Ke Fayde Kya Hai: पूजा में घी, तिल और सरसों के तेल का दीपक क्यों जलाया जाता है? जानिए अग्नि पुराण, स्कंद पुराण और महाभारत में दीपदान का महत्व और धार्मिक मान्यताएं।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Nov 2026 12:26 PM IST
Diya Jalane Ke Fayde Kya Hai | Sarson Tel Ghee  DiyaJalane Ka Mahatva | Newstrack Special Hindi
X

Diya Jalane Ke Fayde Kya Hai | Sarson Tel Ghee DiyaJalane Ka Mahatva | Newstrack Special Hindi

Diya Benefits in Hindi: भारत में पूजा-पाठ की परंपराओं में दीपक का विशेष स्थान है। घर की रोजाना पूजा हो, मंदिर की आरती, नवरात्र की अखंड ज्योति, दीपावली का लक्ष्मी पूजन या कार्तिक मास का दीपदान। हर जगह दीपक दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कहीं घी, कहीं तिल का तेल तो कहीं सरसों का तेल क्यों इस्तेमाल किया जाता है?

उत्तर भारत में शनि, हनुमान और भैरव की पूजा में सरसों के तेल का दीपक आम है। दक्षिण भारत के कई मंदिरों में तिल के तेल से दीप जलाने की पुरानी परंपरा है, जबकि केरल में नारियल का तेल भी इस्तेमाल होता है। वहीं, सामान्य देवपूजा और आरती में घी के दीपक को विशेष महत्व दिया जाता है।

इन परंपराओं के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ कृषि, स्थानीय उपलब्धता और अलग-अलग पूजा-पद्धतियों का इतिहास भी जुड़ा है। खास बात यह है कि सभी हिंदू धर्मग्रंथ तिल के तेल को घी से श्रेष्ठ नहीं बताते। महाभारत में घी के दीपक को सर्वोत्तम कहा गया है, जबकि अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में विशेष अनुष्ठानों के लिए तिल के तेल का उल्लेख मिलता है।

इसलिए यह समझना जरूरी है कि किस पूजा में कौन-सा तेल महत्वपूर्ण माना गया और इन परंपराओं का आधार क्या है।

दीपक जलाने का धार्मिक अर्थ क्या है?

भारतीय परंपरा में प्रकाश को ज्ञान, शुभता और चेतना का प्रतीक माना गया है। अंधकार को अज्ञान और प्रकाश को ज्ञान से जोड़ने का भाव उपनिषदों में भी मिलता है।

बृहदारण्यक उपनिषद की प्रसिद्ध प्रार्थना है:

“असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।”

अर्थात हमें असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।

इस मंत्र में किसी खास तेल का दीपक जलाने का निर्देश नहीं है, लेकिन यह प्रकाश के प्रतीकात्मक महत्व को जरूर बताता है। आगे चलकर देवपूजा की विधियों में दीपक को महत्वपूर्ण स्थान मिला। षोडशोपचार पूजा में धूप और दीप भी देवता को अर्पित किए जाने वाले उपचारों में शामिल हैं। इस तरह दीपक केवल रोशनी देने का साधन नहीं रहा, बल्कि श्रद्धा, शुभता और पूजा का प्रतीक बन गया।

तिल के तेल को इतना महत्व क्यों मिला?

तिल का धार्मिक महत्व केवल दीपक तक सीमित नहीं है। भारतीय परंपरा में तिल का इस्तेमाल स्नान, दान, हवन, तर्पण और श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों में भी होता रहा है। खासकर काले तिल का संबंध पितृकर्म और कुछ ग्रहशांति संबंधी विधियों से जोड़ा जाता है। तिल भारत की प्राचीन तिलहनी फसलों में शामिल है। इससे तेल निकालने की परंपरा भी पुरानी है। तिल का तेल भोजन, शरीर की मालिश और रोशनी के लिए इस्तेमाल होता था। धार्मिक अनुष्ठानों में तिल के महत्व के कारण इससे जलने वाले दीपक को भी विशेष स्थान मिला। लेकिन यह मानना सही नहीं होगा कि हर तरह की पूजा में तिल का तेल ही सबसे श्रेष्ठ है। इसका महत्व कुछ खास अनुष्ठानों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

अग्नि पुराण में तिल के तेल के दीपक का उल्लेख

तिल के तेल के धार्मिक महत्व का एक स्पष्ट उल्लेख अग्नि पुराण के अध्याय 188 में मिलता है। इसके आठवें श्लोक में तिल से स्नान, तिल से हवन, तिल के मोदक का नैवेद्य, तिल के तेल का दीपक और तिलोदक देने की विधि बताई गई है।

श्लोक है :

“तिलैः स्नानन्तिलैर्होमो नैवेद्यन्तिलमोदकं।

दीपश्च तिलतैलेन तथा देयं तिलोदकम्॥”

यहाँ ‘तिलतैलेन’ का अर्थ है - तिल के तेल से। इससे पता चलता है कि तिल के तेल का दीपक पुराणिक धार्मिक साहित्य में भी जगह रखता है। यह केवल आधुनिक ज्योतिषीय सलाह या लोकविश्वास की देन नहीं है।

हालाँकि इस श्लोक में एक विशेष तिल-प्रधान अनुष्ठान का वर्णन है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर पूजा में तिल का तेल अनिवार्य है या घी से श्रेष्ठ है।

कार्तिक मास में तिल के तेल से दीपदान का विधान

स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में कार्तिक मास के दीपदान का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके दीपदान माहात्म्य से जुड़े अध्याय 104 के श्लोक 98 में तिल के तेल से आकाशदीप जलाने का उल्लेख है।

श्लोक का आरंभ है:

“तुलायां तिलतैलेन सायं संध्यासमागमे।”

इसका आशय है कि सूर्य के तुला राशि में रहने के दौरान संध्याकाल में तिल के तेल से आकाशदीप जलाया जाए। इस अध्याय में पूरे कार्तिक मास दीपदान करने की महिमा भी बताई गई है।

यहाँ एक खास बात ध्यान देने योग्य है। तिल के तेल का यह उपयोग केवल शनि या पितरों की पूजा तक सीमित नहीं है। कार्तिक मास में भगवान दामोदर यानी विष्णु-कृष्ण की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले दीपदान में भी इसका महत्व बताया गया है। इससे स्पष्ट है कि तिल के तेल का स्थान वैष्णव परंपरा के कुछ विशेष अनुष्ठानों में भी रहा है।

क्या महाभारत में घी के दीपक को सर्वोत्तम कहा गया है?

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद के दौरान दीपदान की महिमा बताई गई है। इस प्रसंग में घी से जलने वाले दीपक को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। इसके बाद वनस्पति स्रोतों से मिलने वाले तेलों के दीपकों का उल्लेख आता है।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। जहाँ अग्नि पुराण और स्कंद पुराण में विशेष अनुष्ठानों के लिए तिल के तेल का विधान मिलता है, वहीं महाभारत के इस प्रसंग में घी के दीपक को प्राथमिकता दी गई है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सभी शास्त्रों में तिल के तेल को घी से श्रेष्ठ बताया गया है। अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग पूजा और अनुष्ठानों के अनुसार सामग्री का महत्व बताया गया है।

घी के दीपक को इतना शुभ क्यों माना जाता है?

भारतीय धार्मिक परंपरा में शुद्ध घी को पवित्रता, शुभता और सात्त्विकता से जोड़ा जाता है। सामान्य देवपूजा, आरती और कई धार्मिक संस्कारों में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। भगवान विष्णु, लक्ष्मी, गणेश, राम, कृष्ण और देवी-देवताओं की पूजा में घी का दीपक जलाने की परंपरा मिलती है। दीपावली के लक्ष्मी-गणेश पूजन और नवरात्र की अखंड ज्योति में भी अनेक परिवार घी का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि कुछ परंपराओं में तेल की अखंड ज्योति भी जलाई जाती है।

घी की धार्मिक प्रतिष्ठा का एक कारण वैदिक यज्ञों में घृत आहुति का महत्व भी है। हालांकि यज्ञ में घी की आहुति देना और दीपक में घी जलाना दो अलग अनुष्ठान हैं। यहाँ सात्त्विकता का अर्थ धार्मिक और दार्शनिक मान्यता से है। घी के दीपक से विशेष आध्यात्मिक तरंगें निकलने या उसका धुआँ किसी खास ऊर्जा का संचार करने जैसे दावों को वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

सरसों के तेल का दीपक किन देवताओं के सामने जलता है?

उत्तर भारत में सरसों के तेल का दीपक खासतौर पर शनि देव, हनुमान और कालभैरव की पूजा से जुड़ा है। शनिवार को शनि मंदिरों में सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा लोकप्रिय है। मंगलवार और शनिवार को कई हनुमान मंदिरों में भी इसका इस्तेमाल होता है। कुछ भैरव मंदिरों में भी सरसों के तेल का दीपक जलाया जाता है।

हालाँकि ये संबंध मुख्य रूप से क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं और मंदिरों की पूजा-पद्धतियों पर आधारित हैं। ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है कि शनि को केवल सरसों का तेल और दूसरे देवताओं को केवल घी ही चढ़ाया जा सकता है। दक्षिण भारत में शनि पूजा के लिए तिल के तेल का इस्तेमाल भी बहुत प्रचलित है। इससे पता चलता है कि एक ही देवता की पूजा में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तेल इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

शनि पूजा में तिल और सरसों दोनों का इस्तेमाल

ज्योतिषीय और धार्मिक परंपराओं में शनि का संबंध कर्मफल, ग्रहशांति और कष्ट निवारण जैसी मान्यताओं से जोड़ा जाता है। काले तिल, उड़द और तेल जैसे पदार्थ शनि से संबंधित पूजा में इस्तेमाल होते हैं।

दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में तिल के तेल से दीपाराधना की जाती है। तमिल में तिल के तेल को ‘नल्लेण्णै’ कहा जाता है। इसके उलट उत्तर भारत में शनिवार को सरसों के तेल का दीपक अधिक लोकप्रिय है।कुछ जगह पीपल के नीचे भी दीपक जलाया जाता है, लेकिन इसे सभी हिंदू समुदायों के लिए अनिवार्य नियम नहीं माना जा सकता। ये क्षेत्रीय परंपराएँ हैं। इसी तरह तेल चढ़ाने या दीपक जलाने से ग्रहों का प्रभाव वैज्ञानिक रूप से बदलता है, इसका प्रमाण नहीं है। इसका महत्व धार्मिक आस्था के दायरे में आता है।

हनुमान और भैरव पूजा में तेल का महत्व

हनुमान पूजा में सिंदूर और तेल से जुड़ी परंपराएँ उत्तर भारत के अनेक मंदिरों में दिखाई देती हैं। कहीं सरसों का तेल तो कहीं चमेली का तेल इस्तेमाल होता है। मंगलवार और शनिवार को ऐसी पूजा अधिक देखने को मिलती है।

सिंदूर और हनुमान जी के संबंध को लेकर कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। इनके अलग-अलग क्षेत्रीय रूप मिलते हैं, इसलिए किसी एक कथा को ऐतिहासिक घटना मानना ठीक नहीं होगा। कुछ परंपराओं में हनुमान जी के सामने घी का दीपक भी जलाया जाता है। इसी तरह कालभैरव की पूजा में भी तेल का इस्तेमाल मंदिर और संप्रदाय के अनुसार बदलता है। उत्तर भारत के कुछ भैरव मंदिरों में सरसों का तेल, तो कहीं तिल का तेल या घी इस्तेमाल होता है।

तिल का तेल पितरों की पूजा से कैसे जुड़ा?

तिल का संबंध भारतीय पितृकर्म की परंपरा से बहुत पुराना है। श्राद्ध और तर्पण में तिल तथा जल का उपयोग अनेक धार्मिक विधियों में किया जाता है। खासकर काले तिल को पितरों से जुड़े अनुष्ठानों में महत्व दिया गया है।

महाभारत के अनुशासन पर्व में तिलदान और दीपदान की महिमा से जुड़े प्रसंग मिलते हैं। प्रचलित अंग्रेजी अनुवाद के अध्याय 68 में तिलदान के महत्व के साथ अंधकार वाले स्थानों पर दीपदान को पितरों के कल्याण से जोड़ा गया है। कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में ऐसा किया जाता है, लेकिन पितृकर्म में तिल का सबसे व्यापक उपयोग तर्पण और दान के रूप में मिलता है।

दक्षिण भारत में तिल और केरल में नारियल का तेल क्यों लोकप्रिय है?

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के कई मंदिरों में तिल के तेल से दीपाराधना की परंपरा है। दक्षिण भारत में तिल का तेल भोजन, मालिश और धार्मिक अनुष्ठानों में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है। मंदिरों में पीतल के पारंपरिक दीपक जलाने की भी पुरानी परंपरा है। लेकिन दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में एक ही तेल का इस्तेमाल नहीं होता। केरल के अनेक मंदिरों में नारियल के तेल का भी महत्वपूर्ण स्थान है। कहीं घी का दीपक विशेष पूजा के लिए और तिल के तेल का दीपक नियमित आराधना के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

इस क्षेत्रीय अंतर के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ स्थानीय कृषि और तेलों की उपलब्धता की भूमिका भी रही होगी। उत्तर भारत में सरसों की खेती और तेल का घरेलू इस्तेमाल लंबे समय से अधिक रहा है, जबकि दक्षिण के कई क्षेत्रों में तिल और नारियल प्रमुख तेल स्रोत रहे हैं। हालाँकि पूजा की सामग्री केवल खेती से तय नहीं होती। मंदिरों की परंपरा, संप्रदाय और पारिवारिक रीति-रिवाज भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी वजह से एक ही क्षेत्र में अलग-अलग मंदिरों में घी, तिल, नारियल या दूसरे तेल इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

क्या तिल के तेल का दीपक ज्यादा देर तक जलता है?

यह दावा अक्सर किया जाता है कि तिल के तेल का दीपक दूसरे तेलों के मुकाबले ज्यादा देर तक जलता है और उसकी लौ अधिक स्थिर रहती है। लेकिन दीपक कितनी देर जलेगा, यह केवल तेल पर निर्भर नहीं करता।

बत्ती की मोटाई और लंबाई, तेल की मात्रा, दीपक के पात्र की बनावट और आसपास की हवा भी इसकी अवधि को प्रभावित करती है। तिल, सरसों और दूसरे वनस्पति तेलों के गुण अलग-अलग होते हैं, लेकिन समान परिस्थितियों में नियंत्रित प्रयोग किए बिना यह कहना सही नहीं होगा कि तिल का तेल हमेशा ज्यादा देर तक जलता है।

किसी तेल की लौ को वैज्ञानिक रूप से अधिक पवित्र या विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा देने वाली बताने का भी प्रमाण नहीं है। दीपक की स्थिर लौ धार्मिक एकाग्रता और ध्यान का प्रतीक जरूर हो सकती है।

क्या घी का दीपक हवा को शुद्ध करता है?

घी या तेल का दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध होने और हानिकारक सूक्ष्मजीव नष्ट होने के दावे किए जाते हैं। लेकिन आधुनिक विज्ञान में ऐसे दावों को स्थापित तथ्य नहीं माना गया है। घी और वनस्पति तेल दोनों कार्बनिक पदार्थ हैं। इनके जलने पर प्रकाश और ऊष्मा के साथ गैसें तथा छोटे कण भी बनते हैं। इनकी मात्रा बत्ती और जलने की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि दीपक जलाने से कमरे की हवा चिकित्सकीय अर्थ में शुद्ध हो जाती है। बंद कमरे में बहुत सारे दीपक जलाने से धुआँ और सूक्ष्म कण बढ़ सकते हैं। दमा या साँस की परेशानी वाले लोगों के लिए हवा आने-जाने की उचित व्यवस्था रखना जरूरी है।

दीपावली और नवरात्र में घी या तेल का दीपक?

दीपावली पर अनेक परिवार मुख्य पूजा-स्थान में घी का दीपक जलाते हैं और घर के दूसरे हिस्सों में तेल के दीपक रखते हैं। कुछ परिवार पूरी तरह घी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि कई क्षेत्रों में तिल या सरसों के तेल के दीपक अधिक प्रचलित हैं।

इसका संबंध धार्मिक परंपरा के साथ व्यावहारिक जरूरतों से भी है। घी आमतौर पर वनस्पति तेलों से महँगा होता है, इसलिए बड़ी संख्या में दीपक जलाने के लिए तेल सुविधाजनक हो सकता है। लेकिन यह कोई सार्वभौमिक शास्त्रीय आदेश नहीं है।

नवरात्र में भी अखंड ज्योति के लिए कई परिवार घी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में तिल या दूसरे तेलों का दीपक जलाया जाता है। इस मामले में परिवार की परंपरा और संबंधित मंदिर या संप्रदाय की पूजा-विधि का महत्व है।

क्या घी और अलग-अलग तेल मिलाकर दीपक जलाना चाहिए?

पूजा सामग्री की दुकानों में ‘पंचदीप तेल’ और दूसरे नामों से मिश्रित तेल मिलते हैं। इनमें तिल, नारियल, अरंडी या दूसरे तेलों का मिश्रण होने का दावा किया जाता है।

कुछ परिवारों और स्थानीय परंपराओं में ऐसे मिश्रित तेलों का इस्तेमाल होता है, जबकि दूसरी परंपराओं में अलग-अलग पदार्थ मिलाने से बचा जाता है। इस बारे में सभी हिंदू समुदायों के लिए कोई एक सर्वमान्य नियम नहीं है।

बाजार में मिलने वाले इन उत्पादों की वास्तविक संरचना और गुणवत्ता भी अलग-अलग हो सकती है। इसलिए केवल धार्मिक नाम देखकर किसी तेल को विशेष आध्यात्मिक गुणों वाला मानना उचित नहीं है। किसी परिवार या संप्रदाय की निर्धारित पूजा-विधि हो तो उसी के अनुसार सामग्री चुनना बेहतर है।

दीपक की दिशा और बत्ती की संख्या का क्या महत्व है?

अलग-अलग पूजा-पद्धतियों में दीपक की दिशा, बत्ती की संख्या और पात्र के आकार को लेकर अलग नियम मिलते हैं। कुछ परिवार एक बत्ती का दीपक जलाते हैं, तो कुछ अवसरों पर पाँच या अधिक बत्तियों वाले दीपक का इस्तेमाल होता है। दक्षिण भारत में पीतल के लंबे खड़े दीपक और मंदिरों में अनेक बत्तियों वाली आरती की परंपरा भी है। कुछ विधियों में दीपक को देवता के दाएँ या बाएँ रखने का निर्देश मिलता है। लेकिन ये नियम संप्रदाय और स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। किसी एक पुस्तिका या इंटरनेट लेख में बताई गई दिशा को पूरे हिंदू धर्म का सार्वभौमिक नियम नहीं मानना चाहिए।

भारतीय दीपदान परंपरा का व्यापक अर्थ

भारत में दीपदान की परंपरा केवल देवमूर्तियों के सामने दीपक जलाने तक सीमित नहीं रही। महाभारत के अनुशासन पर्व में अंधकार वाले स्थानों पर दीपदान की प्रशंसा की गई है।

बिजली के आविष्कार से पहले दीपक घरों, मंदिरों और रास्तों में रोशनी का महत्वपूर्ण साधन था। सार्वजनिक स्थानों और अंधेरे रास्तों पर दीपक जलाने से यात्रियों और आसपास के लोगों को भी सुविधा मिल सकती थी। धार्मिक साहित्य ने इस उपयोगी काम को पुण्य और दान की भावना से जोड़ा। इस तरह दीपदान का एक अर्थ दूसरों के लिए भी प्रकाश उपलब्ध कराना रहा है। दीपक की रोशनी केवल पूजा करने वाले तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आसपास के लोगों को भी रास्ता दिखाती है।

घी, तिल और सरसों के तेल में कौन श्रेष्ठ है?

भारतीय धार्मिक परंपरा में घी, तिल और सरसों के तेल की अपनी-अपनी जगह है। घी को सामान्य देवपूजा, आरती और शुभ अनुष्ठानों में विशेष प्रतिष्ठा मिली है। महाभारत के अनुशासन पर्व में घी के दीपक को सर्वोत्तम बताया गया है।

तिल के तेल का महत्व अग्नि पुराण के विशेष अनुष्ठान और स्कंद पुराण के कार्तिक दीपदान जैसे प्रसंगों में स्पष्ट दिखाई देता है। पितृकर्म और दक्षिण भारतीय दीपाराधना की कुछ परंपराओं में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

सरसों का तेल उत्तर भारत में शनि, हनुमान और भैरव की कुछ पूजा-पद्धतियों तथा स्थानीय दीपदान परंपराओं से जुड़ा है। वहीं, केरल के अनेक मंदिरों में नारियल के तेल का उपयोग होता है।

इसलिए किसी एक तेल को हर पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ बताना सही नहीं होगा। शास्त्रों में जहाँ विशेष विधान है, उसे उसी अनुष्ठान के संदर्भ में समझना चाहिए। जहाँ क्षेत्रीय या पारिवारिक परंपरा है, उसे उसी रूप में देखना चाहिए।

दीपक का असली महत्व केवल उसमें इस्तेमाल होने वाले घी या तेल में नहीं, बल्कि उस भावना में भी है जिसके साथ उसे जलाया जाता है। घी, तिल और सरसों के तेल की अपनी धार्मिक प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। इन्हें एक-दूसरे का विकल्प या प्रतिद्वंद्वी मानने के बजाय भारतीय धार्मिक संस्कृति की विविध परंपराओं के रूप में समझना अधिक उचित है।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story