Violent Behavior Brain: इंसान हिंसक क्यों हो जाता है? दिमाग के इन हिस्सों में छिपा गुस्से का विज्ञान

Violent Behavior Brain Science: गुस्सा और हिंसक व्यवहार कैसे पैदा होते हैं? जानें एमिग्डाला, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, सेरोटोनिन, जीन और बचपन के अनुभवों का दिमाग पर असर।

Neel Mani Lal
Published on: 15 Oct 2026 1:41 PM IST
Violent Behavior Brain Science Explained in Hindi | Newstrack Hindi News
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Violent Behavior Brain Science Explained in Hindi | Newstrack Hindi News

Violent Behavior Brain Science: 1848 में अमेरिका के वरमॉन्ट प्रान्त में फ़ीनियास गेज नाम का रेलवे फ़ोरमैन चट्टान उड़ाने के लिए बारूद दबा रहा था कि अचानक धमाका हुआ। करीब एक मीटर लंबी लोहे की छड़ उसके बायें गाल से घुसी और खोपड़ी के ऊपर से निकल गई। गेज बच गया और बोलता-चलता रहा। लेकिन उसके दोस्तों के मुताबिक़ वह अब वह पहले जैसा आदमी रहा ही नहीं था। पहले संयमी और भरोसेमंद था लेकिन अब चिड़चिड़ा, आवेगी और बदज़ुबान हो गया था। छड़ उसके दिमाग के अगले हिस्से, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, को चीर गई थी। यह पहला बड़ा संकेत था कि हमारा व्यवहार और चरित्र दिमाग के किसी ख़ास हिस्से पर टिका है।

पौने दो सौ साल बाद न्यूरोसाइंस ने इस सवाल पर काफ़ी कुछ पता लगाया है। दिमाग में कोई एक हिंसा का बटन नहीं मिला, बल्कि कई हिस्सों, रसायनों, जीन और जीवन के अनुभवों का एक जटिल जाल मिला है।

गुस्से का इंजन और ब्रेक

दिमाग में आक्रामकता का तंत्र मोटे तौर पर एक गाड़ी जैसा है, जिसमें इंजन भी है और ब्रेक भी। इंजन का काम निचले, पुराने हिस्से करते हैं: एमिग्डाला और हाइपोथैलेमस। एमिग्डाला बादाम के आकार का छोटा-सा ढाँचा है जो ख़तरे को पहचानकर शरीर में अलार्म बजाता है। हाइपोथैलेमस उस अलार्म को हमले या भागने की शारीरिक तैयारी में बदल देता है। 1920-30 के दशक में प्रयोगों में पाया गया कि बिल्लियों के हाइपोथैलेमस के कुछ हिस्सों को उत्तेजित करने पर वे बिना किसी कारण अचानक भयानक गुस्से में आ जाती थीं। 2011 में चूहों पर हुए शोध ने इसे और साफ़ किया। हाइपोथैलेमस के एक ख़ास हिस्से की न्यूरॉन्स को रोशनी से सक्रिय करने पर चूहा सामने जो भी हो, उस पर हमला कर देता था, और रोशनी बंद करते ही शांत हो जाता था।

ब्रेक का काम माथे के पीछे बैठा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स करता है, ख़ासकर उसका निचला और भीतरी हिस्सा। यह आवेग को रोकता है, परिणाम सोचता है और भावनाओं को क़ाबू में रखता है। स्वस्थ दिमाग में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स एमिग्डाला के अलार्म पर नियंत्रण रखता है। हिंसा तब आसान हो जाती है जब इंजन ज़्यादा तेज़ चले, ब्रेक कमज़ोर हो, या दोनों हों।

जब ब्रेक कमज़ोर पड़ता है

1990 के दशक में एड्रियन रेन और उनके साथियों ने PET स्कैन से उन लोगों के दिमाग की जाँच की जिन पर हत्या का आरोप था और जिन्होंने मानसिक अस्वस्थता की दलील दी थी। नतीजे में उनके प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में गतिविधि स्वस्थ लोगों की तुलना में कम पाई गई। बाद के कई शोधों में भी, ख़ासकर आवेग में किए गए आक्रामक व्यवहार वाले लोगों में, प्रीफ्रंटल हिस्से की कमज़ोर सक्रियता और कमज़ोर संपर्क दिखा।

दुर्घटना, गिरने या खेल में लगी चोट से इस हिस्से को नुकसान पहुँचे तो भी यही होता है, जैसा गेज के साथ हुआ। ट्यूमर या स्ट्रोक भी यही कर सकते हैं। सबसे चर्चित मामला 1966 का है, जब टेक्सास यूनिवर्सिटी की मीनार से चार्ल्स व्हिटमैन ने गोलीबारी करके कई लोगों की जान ली। पोस्टमार्टम में उसके एमिग्डाला के पास एक ट्यूमर मिला। हालाँकि जाँच आयोग ने माना कि यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि ट्यूमर ही वजह थी, क्योंकि उसके जीवन में तनाव और मानसिक संघर्ष के और भी कारण थे। यह मामला दिखाता है कि मामला कितना उलझा हुआ है, और यह भी कि दिमाग का स्वास्थ्य और व्यवहार कितने जुड़े हैं।

शराब भी इसी ब्रेक पर वार करती है। नशे में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सबसे पहले ढीला पड़ता है, इसीलिए हिंसक अपराधों में शराब का दखल इतना आम है।

कुछ लोगों में अलार्म ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील

एक अध्ययन में, जिसमें आवेगी गुस्से वाले लोगों को ग़ुस्सैल या धमकी भरे चेहरों की तस्वीरें दिखाई गईं, उनके एमिग्डाला ने सामान्य लोगों से ज़्यादा तेज़ प्रतिक्रिया दी, और प्रीफ्रंटल हिस्से की प्रतिक्रिया उसे शांत करने में कमज़ोर रही। ऐसे लोग किसी तटस्थ या अस्पष्ट बात को भी दुश्मनी की तरह पढ़ लेते हैं। ताना, घूरना, किसी का धक्का लग जाना, सब हमले जैसा लगता है। इसे "शत्रुतापूर्ण पूर्वाग्रह" कहते हैं।

ठंडी हिंसा और गर्म हिंसा

यहाँ एक अहम अंतर है। वैज्ञानिक आक्रामकता को दो प्रकारों में बाँटते हैं। पहली "गर्म" या प्रतिक्रियात्मक हिंसा, जो अचानक भड़कती है, जैसे सड़क पर झगड़ा। यह आवेग-नियंत्रण की कमज़ोरी से जुड़ी है। दूसरी "ठंडी" या सोची-समझी हिंसा, जो योजना बनाकर, किसी लक्ष्य के लिए की जाती है।

दूसरी श्रेणी के कुछ लोगों में, ख़ासकर साइकोपैथी की प्रवृत्ति वाले लोगों में, तस्वीर उलट है। यहाँ एमिग्डाला कमज़ोर या कम प्रतिक्रियाशील दिखा है, और दूसरों के डर या दर्द को देखकर उनमें सामान्य भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं जगती। कैंट कील जैसे शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसे लोगों के भावना से जुड़े तंत्र, जिन्हें 'पैरालिम्बिक' क्षेत्र कहते हैं, में संरचना और गतिविधि के अंतर होते हैं। सहानुभूति की कमी का मतलब है कि दूसरे के दर्द से कोई रुकावट पैदा नहीं होती। इसलिए हिंसक लोग सब एक जैसे नहीं होते, और उनके दिमाग भी अलग तरह से काम करते हैं।

रसायन और जीन

दिमाग के रसायनों में सबसे ज़्यादा अध्ययन सेरोटोनिन का हुआ है। 1980 के दशक के अध्ययनों में पाया गया कि आवेगी और हिंसक व्यवहार वाले लोगों के मस्तिष्क-मेरुरज्जु द्रव (स्पाइनल फ्लूइड) में सेरोटोनिन का एक उप-उत्पाद (बाई प्रोडक्ट) कम था, जिससे लगा कि सेरोटोनिन आवेग पर लगाम लगाने में मदद करता है। टेस्टोस्टेरोन का रिश्ता भी चर्चा में रहता है, पर वह सीधा नहीं है। वह शायद आक्रामकता से ज़्यादा प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा के व्यवहार को बढ़ाता है, और उसका असर इस पर निर्भर करता है कि प्रीफ्रंटल हिस्सा उसे कितना संभाल पा रहा है। तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का असामान्य रूप से कम स्तर भी कुछ आक्रामक बच्चों और किशोरों में देखा गया है।

जीनों में सबसे मशहूर है MAOA, जिसे मीडिया ने "योद्धा जीन" कह डाला। 1993 में नीदरलैंड के एक परिवार के कई पुरुषों में हिंसक व्यवहार पाया गया और उनमें इस जीन की ख़राबी मिली। बाद में न्यूज़ीलैंड के एक बड़े दीर्घकालिक अध्ययन में दिखा कि इस जीन का कम सक्रिय रूप तभी हिंसा का जोखिम बढ़ाता था जब बच्चे के साथ बचपन में बुरा बर्ताव या उपेक्षा हुई हो। जिन्हें बचपन में प्यार और सुरक्षा मिली, उनमें यह जीन ज़्यादा नुकसान नहीं करता था। यानी जीन भाग्य नहीं तय करता, वह माहौल के साथ मिलकर असर दिखाता है।

बचपन दिमाग को गढ़ता है

लगातार मारपीट, उपेक्षा या हिंसा के माहौल में बड़ा होता बच्चा हमेशा ख़तरे की हालत में रहता है। उसका तनाव तंत्र ज़्यादा सक्रिय हो जाता है और उसका एमिग्डाला बार-बार अलार्म बजाने के लिए "प्रशिक्षित" हो जाता है। शोधों में बचपन की प्रताड़ना का संबंध प्रीफ्रंटल हिस्से और भावना-तंत्र की संरचना में अंतर से जुड़ा पाया गया है। दिमाग किशोरावस्था के बाद, लगभग 25 साल की उम्र तक विकसित होता रहता है, और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सबसे आख़िर में परिपक्व होता है। इसीलिए किशोर और युवा ज़्यादा आवेगी होते हैं।

सिर की बार-बार लगने वाली चोटें, जैसे कुछ खेलों में, लंबे समय में मूड और आवेग पर असर डाल सकती हैं, और कुछ पूर्व खिलाड़ियों के दिमाग में बाद में क्रॉनिक ट्रॉमैटिक एन्सेफैलोपैथी नाम की अपक्षयी स्थिति मिली है।

ये सारे नतीजे आबादी के औसत के हैं, किसी एक इंसान की भविष्यवाणी के नहीं। बहुत से लोगों के दिमाग में ये अंतर होते हैं और वे कभी हिंसक नहीं होते, जबकि कुछ हिंसक अपराधियों के स्कैन सामान्य निकलते हैं। कोई ब्रेन स्कैन यह नहीं बता सकता कि कोई व्यक्ति हिंसा करेगा। ज़्यादातर मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोग हिंसक नहीं होते, बल्कि वे हिंसा का शिकार ज़्यादा बनते हैं। और दिमाग का कारण समझाना ज़िम्मेदारी से मुक्ति नहीं है, क्योंकि समझाने का मतलब माफ़ करना नहीं होता।

आशा की बात

दिमाग बदल सकता है। यह प्लास्टिसिटी नाम की उसकी ख़ूबी है। बच्चों के लिए शुरुआती देखभाल, हिंसा के चक्र को तोड़ने वाले कार्यक्रम, कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी जो आवेग रोकना और ग़लत अर्थ निकालने की आदत बदलना सिखाती है, नशे का इलाज, और ज़रूरत पर दवाएँ, ये सब कारगर पाए गए हैं। कुछ अध्ययनों में बचपन में अच्छा पोषण और शारीरिक गतिविधि जैसे हस्तक्षेपों ने भी आगे चलकर आक्रामकता घटाई।

फ़ीनियास गेज की कहानी हमें बताती है कि दिमाग व्यक्तित्व की नींव है। पर आधुनिक न्यूरोसाइंस उससे आगे जाकर कहती है कि हिंसा दिमाग, जीन, बचपन और माहौल के मेल से बनती है, और इसी वजह से उसे रोकने के रास्ते भी कई हैं।

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