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मोबाइल, घड़ी और जैकेट पर लिखे Waterproof दावे का असली मतलब क्या है?
Waterproof vs Water Resistant: वॉटरप्रूफ और वॉटर रेसिस्टेंट में क्या अंतर है? जानिए IP67, IP68 रेटिंग का मतलब, मोबाइल फोन की वाटरप्रूफ क्षमता, घड़ी और जैकेट को पानी से बचाने का विज्ञान।
Waterproof vs Water Resistant Explained in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News
Waterproof vs Water Resistant: मोबाइल फोन के विज्ञापन में लिखा होता है 'IP68', घड़ी पर लिखा मिलता है 'वॉटर रेसिस्टेंट 100 मीटर' और महँगी बरसाती जैकेट बनाने वाली कंपनी दावा करती है कि उसका कपड़ा '100 प्रतिशत वॉटरप्रूफ' है। लेकिन एक आश्चर्यजनक सच यह है कि दुनिया के सबसे उन्नत जलरोधक उपकरण भी हर परिस्थिति में पानी से पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते। छह मीटर पानी में तीस मिनट तक सुरक्षित रहने वाला फोन समुद्र के खारे पानी, तेज धार या पुराने हो चुके सील के कारण खराब हो सकता है। दो सौ मीटर के लिए बनाई गई घड़ी भी गलत उपयोग से रिस सकती है। और जिस कपड़े पर पानी की बूँदें मोतियों की तरह फिसल जाती हैं, वह लंबे समय तक भारी बारिश में भीग सकता है। आखिर 'वॉटरप्रूफ' और 'वॉटर रेसिस्टेंट' में वास्तविक वैज्ञानिक अंतर क्या है? क्या पानी को पूरी तरह रोकना संभव है या हर जलरोधक वस्तु की कोई न कोई सीमा होती है?
मनुष्य का पानी के साथ संघर्ष सभ्यता जितना पुराना है। जब उसने पहली बार वर्षा से बचने के लिए किसी पेड़ की छाल, पशु की खाल या पत्तियों का उपयोग किया होगा, तभी से वह ऐसी वस्तु खोज रहा है जो पानी को अपने भीतर प्रवेश न करने दे। मकानों की छतें, नावों के ढाँचे, चमड़े के जूते, सैनिकों के तंबू, समुद्री जहाज, भूमिगत सुरंगें और आज के मोबाइल फोन—इन सबके निर्माण में एक ही समस्या किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। समस्या यह है कि पानी उन छोटे रास्तों को भी खोज सकता है जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देते। किसी दीवार में सूक्ष्म दरार हो, कपड़े की सिलाई में सुई से बने छेद हों, घड़ी के ढक्कन के आसपास सील कमजोर हो या मोबाइल फोन के भीतर किसी जोड़ पर मामूली अंतर रह गया हो, पानी उस रास्ते से प्रवेश कर सकता है। इंजीनियरिंग की चुनौती इसलिए केवल पानी को रोकने वाली सामग्री खोजने की नहीं है। ऐसी पूरी संरचना विकसित करने की है जो निर्धारित दबाव, तापमान, समय और उपयोग की परिस्थितियों में पानी को प्रवेश करने से रोक सके।
वॉटरप्रूफ और वॉटर रेसिस्टेंट के बीच मूल अंतर यहीं से शुरू होता है। सामान्य भाषा में 'वॉटरप्रूफ' का अर्थ है ऐसी वस्तु जो निर्धारित परिस्थितियों में पानी को भीतर प्रवेश नहीं करने देती। दूसरी ओर 'वॉटर रेसिस्टेंट' का अर्थ है ऐसी वस्तु जो पानी के संपर्क का कुछ सीमा तक प्रतिरोध कर सकती है। लेकिन इन शब्दों का कोई एक सार्वभौमिक अर्थ नहीं है जो मोबाइल फोन, कपड़े, घड़ी, जूते और भवन निर्माण की सभी सामग्रियों पर समान रूप से लागू हो जाए। वास्तविक तकनीकी अर्थ उस वस्तु के लिए अपनाए गए परीक्षण मानक और उसकी निर्धारित उपयोग सीमाओं से तय होता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक और इंजीनियर अक्सर केवल 'वॉटरप्रूफ' लिखने के बजाय बताते हैं कि कोई उपकरण कितने दबाव, कितनी गहराई या कितनी अवधि तक पानी का प्रतिरोध कर सकता है। ऐसा विवरण सामान्य विज्ञापन की तुलना में अधिक विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है।
इस विषय को समझने के लिए पानी के एक ऐसे गुण से शुरुआत करनी होगी जिसे हम सामान्य जीवन में अनुभव तो करते हैं, लेकिन उसके वैज्ञानिक महत्त्व पर कम ध्यान देते हैं। पानी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में नीचे की ओर बहता है, लेकिन उसका व्यवहार केवल इसी नियम से निर्धारित नहीं होता। पानी की सतह पर मौजूद अणुओं के बीच आकर्षण के कारण 'सतही तनाव' पैदा होता है। इसी से बूँदें अपना गोलाकार आकार बनाए रखने की प्रवृत्ति दिखाती हैं। दूसरी ओर जब पानी किसी ठोस पदार्थ के संपर्क में आता है, तो पानी के अणुओं और उस पदार्थ की सतह के बीच आकर्षण भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यदि पानी सतह पर फैलने की प्रवृत्ति दिखाता है, तो उस पदार्थ को अपेक्षाकृत 'हाइड्रोफिलिक' कहा जा सकता है। यदि पानी बूँदों के रूप में बना रहता है और आसानी से फैलता नहीं, तो सतह को 'हाइड्रोफोबिक' कहा जाता है। लेकिन किसी सतह का हाइड्रोफोबिक होना अपने आप उस वस्तु को हर परिस्थिति में पूरी तरह जलरोधक नहीं बना देता। यह अंतर आधुनिक वॉटरप्रूफ तकनीक की सबसे बुनियादी बातों में शामिल है।
कमल के पत्ते का उदाहरण इस विज्ञान को समझने का अत्यंत रोचक तरीका है। कमल की पत्ती पर पानी की बूँदें अक्सर मोतियों की तरह दिखाई देती हैं और पत्ती के थोड़ा झुकते ही फिसल जाती हैं। ऐसा केवल इसलिए नहीं है कि पत्ती चिकनी है। वास्तव में उसकी सतह पर सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म स्तर की संरचनाएँ तथा पानी को कम आकर्षित करने वाले प्राकृतिक पदार्थ मौजूद होते हैं। इनसे पानी की बूँद और पत्ती के बीच संपर्क का वास्तविक क्षेत्र सीमित हो सकता है। फलस्वरूप पानी सतह पर फैलने के बजाय गोलाकार बूँद बनाए रखता है और आसानी से लुढ़क जाता है। वैज्ञानिक इस घटना को 'लोटस इफेक्ट' कहते हैं। इसी प्रभाव से प्रेरित होकर ऐसे आधुनिक पदार्थ और सतही कोटिंग विकसित की गई हैं जिन पर पानी टिकने के बजाय फिसल जाता है। लेकिन कमल के पत्ते की विशेषता समझकर एक गलती नहीं करनी चाहिए। सतह पर पानी का फिसलना और किसी संरचना से पानी का बिल्कुल भी पार न होना दो अलग गुण हैं। यदि किसी जल-विकर्षी सतह के नीचे छेद मौजूद हो या उस पर पर्याप्त दबाव पड़े, तो पानी भीतर प्रवेश कर सकता है।
इसके विपरीत काँच का उदाहरण देखिए। सामान्य साफ काँच की सतह को कमल के पत्ते जैसी अत्यधिक जल-विकर्षी सतह नहीं माना जाता। पानी उस पर फैल सकता है और उसके ऊपर चिपका रह सकता है। लेकिन एक बिना दरार वाला ठोस काँच का पात्र सामान्य परिस्थितियों में पानी को अपनी दीवार के पार नहीं जाने देता। इससे स्पष्ट होता है कि किसी वस्तु को वॉटरप्रूफ बनाने के लिए उसका अत्यधिक हाइड्रोफोबिक होना आवश्यक नहीं है। पानी को रोकने के दो अलग उपाय हो सकते हैं। पहला, सतह ऐसी बनाई जाए कि पानी उससे दूर रहने की प्रवृत्ति दिखाए। दूसरा, सामग्री और उसकी संरचना में पानी के पार जाने का कोई प्रभावी रास्ता न हो। कई आधुनिक उत्पादों में इन दोनों सिद्धांतों को साथ इस्तेमाल किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा से बचाने वाली अच्छी जैकेट में ऊपर की सतह पर पानी को फिसलाने वाली परत हो सकती है और उसके भीतर ऐसी झिल्ली मौजूद हो सकती है जो पानी को कपड़े के पार जाने से रोकती है।
वॉटरप्रूफ तकनीक की असली परीक्षा तब शुरू होती है जब पानी केवल किसी वस्तु पर गिर नहीं रहा होता, बल्कि उस पर दबाव डाल रहा होता है। पानी में गहराई बढ़ने के साथ दबाव बढ़ता है। समुद्र या किसी बड़े जलाशय में लगभग हर दस मीटर नीचे जाने पर पानी के कारण दबाव करीब एक अतिरिक्त वायुमंडल बढ़ जाता है। दस मीटर की गहराई पर वस्तु के आसपास कुल दबाव लगभग दो वायुमंडल, जबकि बीस मीटर पर लगभग तीन वायुमंडल होता है। यह अंतर इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि किसी वस्तु की सतह पर हल्की बारिश का पानी पड़ना और उसी वस्तु को कई मीटर गहरे पानी में डुबो देना बिल्कुल अलग परीक्षण हैं। बारिश में पानी की बूँदें सतह से टकराकर बह सकती हैं, लेकिन गहरे पानी में लगातार दबाव किसी कमजोर जोड़, सील या सूक्ष्म रास्ते से पानी को भीतर धकेल सकता है। इसी कारण एक उपकरण तेज बारिश में सुरक्षित रह सकता है, लेकिन लंबे समय तक पानी में डुबोए जाने पर खराब हो सकता है।
यहाँ आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की दुनिया में उपयोग होने वाला 'आईपी रेटिंग' का विज्ञान अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच, कैमरा, वायरलेस ईयरबड, बिजली के स्विच, औद्योगिक उपकरण और अनेक दूसरे उत्पादों पर 'IP67', 'IP68' या दूसरी रेटिंग दिखाई देती हैं। 'आईपी' का अर्थ 'इंग्रेस प्रोटेक्शन' है। यह उपकरण के बाहरी आवरण द्वारा धूल और पानी जैसी वस्तुओं के प्रवेश के विरुद्ध दिए जाने वाले संरक्षण का मानकीकृत वर्गीकरण है। इसका प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आधार 'आईईसी 60529' मानक है। भारत में भारतीय मानक ब्यूरो ने 'आईएस/आईईसी 60529' को संबंधित भारतीय मानक के रूप में अपनाया है। इसलिए आईपी रेटिंग केवल मोबाइल कंपनियों द्वारा प्रचार के लिए बनाया गया शब्द नहीं है। यह परीक्षण की निर्धारित पद्धतियों से जुड़ी तकनीकी व्यवस्था है। हालांकि केवल किसी विज्ञापन पर रेटिंग लिख देने और विश्वसनीय रूप से उस मानक का परीक्षण पूरा करने के बीच अंतर हो सकता है।
आईपी रेटिंग में सामान्यतः दो अंक होते हैं। पहला अंक धूल तथा ठोस वस्तुओं के प्रवेश से सुरक्षा का स्तर बताता है, जबकि दूसरा अंक पानी से सुरक्षा का स्तर दर्शाता है। उदाहरण के लिए 'IP67' में पहला अंक 6 इस बात का संकेत है कि उपकरण का आवरण संबंधित मानक के अनुसार धूल के प्रवेश से पूरी तरह सुरक्षित श्रेणी में है। दूसरा अंक 7 बताता है कि उपकरण ने अस्थायी रूप से पानी में डुबोए जाने के निर्धारित परीक्षण को पूरा किया है। सामान्यतः इस परीक्षण को लगभग एक मीटर तक पानी में तीस मिनट की अवधि के संदर्भ में समझाया जाता है, हालांकि परीक्षण की सटीक व्यवस्था उपकरण और मानक की शर्तों पर निर्भर करती है। इसके विपरीत 'IP68' में दूसरा अंक 8 लगातार या अधिक कठोर जलमग्न परिस्थितियों के लिए निर्धारित परीक्षण को दर्शाता है। लेकिन यहाँ एक ऐसी बात है जिसे अधिकांश खरीदार नहीं जानते। IP68 का अर्थ प्रत्येक उत्पाद के लिए एक निश्चित छह मीटर या दस मीटर गहराई नहीं है। संबंधित परीक्षण की गहराई और अवधि निर्माता द्वारा घोषित शर्तों तथा मानक की आवश्यकताओं पर निर्भर करती है।
उदाहरण के लिए Apple के कुछ आईफोन मॉडलों को IP68 रेटिंग प्राप्त है। कंपनी की प्रकाशित जानकारी के अनुसार कुछ मॉडलों का नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में अधिकतम छह मीटर की गहराई और तीस मिनट तक परीक्षण किया गया है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर IP68 फोन छह मीटर पानी में तीस मिनट सुरक्षित रहेगा। दूसरी कंपनी का IP68 उपकरण किसी अलग निर्धारित गहराई और अवधि के परीक्षण पर आधारित हो सकता है। इसके अतिरिक्त प्रयोगशाला में किया गया परीक्षण वास्तविक जीवन की प्रत्येक परिस्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करता। समुद्र का खारा पानी, स्विमिंग पूल में मौजूद रसायन, गिरने से हुए सूक्ष्म नुकसान, उपकरण का पुराना हो जाना और मरम्मत के बाद सील की स्थिति, सभी वास्तविक जल प्रतिरोध को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए IP68 को पानी से बिना किसी सीमा के सुरक्षा देने वाला प्रमाणपत्र मान लेना तकनीकी रूप से गलत है।
इस संदर्भ में आईपी रेटिंग का एक और कम चर्चित पक्ष है। यदि किसी उपकरण को IPX7 या IPX8 जैसे जलमग्न परीक्षण के लिए तैयार किया गया है, तो इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि वह तेज पानी की धार के हर परीक्षण को भी पूरा करता है। आईपी मानक में पानी की अलग-अलग परिस्थितियों के लिए अलग परीक्षण निर्धारित हैं। उदाहरण के लिए IPX4 सामान्य छींटों का प्रतिरोध दर्शाता है, IPX5 पानी की धार और IPX6 अधिक शक्तिशाली धार से संबंधित है। IPX7 अस्थायी जलमग्न स्थिति से संबंधित है, जबकि IPX8 अधिक कठोर या निरंतर जलमग्न परिस्थितियों के लिए निर्धारित होता है। पानी में कुछ समय डूबे रहने का दबाव सहना और तेज धार के सीधे प्रहार को सहना हमेशा एक जैसी चुनौती नहीं हैं। इसी कारण औद्योगिक उपकरणों में कभी-कभी एक से अधिक प्रकार के परीक्षणों का उल्लेख किया जाता है। IPX9 जैसी श्रेणी उच्च दबाव और उच्च तापमान वाले पानी की विशेष सफाई परिस्थितियों से जुड़ी है। इसका अर्थ भी यह नहीं कि ऐसी रेटिंग वाला उपकरण बिना सीमा के समुद्र की गहराई में सुरक्षित रहेगा।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि किसी फोन को पानी में डूबने से सुरक्षा देने के लिए तैयार किया गया है, तो क्या उसे केवल बाहरी खोल मजबूत बनाकर सुरक्षित किया जाता है? वास्तविकता में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जलरोधक संरचना कई स्तरों पर काम करती है। उपकरण के बाहरी आवरण के जोड़, स्क्रीन और फ्रेम के बीच का संपर्क, बटन, स्पीकर, माइक्रोफोन, चार्जिंग पोर्ट और अन्य खुले हिस्से इंजीनियरों के लिए चुनौती होते हैं। कुछ स्थानों पर रबर या दूसरे पदार्थों की सील उपयोग की जाती है। कहीं विशेष चिपकने वाले पदार्थों का उपयोग किया जाता है। स्पीकर और माइक्रोफोन जैसे हिस्सों में ऐसी झिल्लियाँ इस्तेमाल की जा सकती हैं जो ध्वनि या हवा के आवश्यक संचार में सहायता करते हुए पानी के प्रवेश का प्रतिरोध करें। इन सभी व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह है कि उपकरण सामान्य उपयोग की निर्धारित परिस्थितियों में काम करता रहे और पानी उसके संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक हिस्सों तक न पहुँचे। लेकिन जैसे-जैसे उपकरण पुराना होता है, उसकी सील की स्थिति बदल सकती है। गिरने, मुड़ने, अत्यधिक तापमान, मरम्मत या सामान्य घिसावट से जल प्रतिरोध कमजोर पड़ सकता है।
यही कारण है कि मोबाइल कंपनियाँ अक्सर स्पष्ट करती हैं कि पानी से सुरक्षा स्थायी नहीं होती। एप्पल अपनी आधिकारिक जानकारी में कहता है कि धूल, छींटों और पानी से प्रतिरोध सामान्य उपयोग तथा घिसावट के कारण समय के साथ कम हो सकता है। कंपनी तरल पदार्थ से होने वाली क्षति को अपनी सामान्य सीमित वारंटी में शामिल नहीं करती, हालांकि संबंधित देश के उपभोक्ता कानून के अंतर्गत अलग अधिकार मौजूद हो सकते हैं। यह बात उपभोक्ताओं के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। किसी फोन के विज्ञापन में IP68 लिखा होना और पानी से हुई हर खराबी के लिए कंपनी की बिना शर्त जिम्मेदारी होना, दोनों अलग बातें हैं। उत्पाद की तकनीकी क्षमता प्रयोगशाला परीक्षण से संबंधित हो सकती है, जबकि वारंटी की शर्तें वाणिज्यिक और कानूनी अनुबंध के अंतर्गत निर्धारित होती हैं। इसलिए यदि कोई उपभोक्ता यह मानकर फोन को बार-बार स्विमिंग पूल में ले जाए कि उसकी वारंटी हर परिस्थिति में जल क्षति को कवर करेगी, तो वह गलतफहमी में हो सकता है।
लेकिन जलरोधक तकनीक की कहानी केवल मोबाइल फोन तक सीमित नहीं है। घड़ियों के मामले में तो इसकी शब्दावली और भी अधिक भ्रम पैदा करती है। अनेक घड़ियों के पीछे '30M', '50M', '100M' या '200M' लिखा होता है। सामान्य खरीदार स्वाभाविक रूप से समझ सकता है कि 30 मीटर लिखी घड़ी को पहनकर वह तीस मीटर गहरे पानी में उतर सकता है। लेकिन घड़ी उद्योग में ये अंक प्रायः एक निर्धारित दबाव परीक्षण और उत्पाद के डिजाइन से जुड़े होते हैं। इनका अर्थ यह नहीं है कि हर घड़ी वास्तविक जीवन में उतनी गहराई तक गोताखोरी के लिए उपयुक्त है। किसी घड़ी की जलरोधक क्षमता को जाँचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन ने 'आईएसओ 22810' मानक विकसित किया है। वर्ष 2010 में प्रकाशित इस मानक में जल प्रतिरोध से संबंधित आवश्यकताएँ, परीक्षण विधियाँ और घड़ियों पर उपयोग किए जाने वाले चिह्नों के नियम निर्धारित किए गए। इस मानक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि वह पानी के दबाव के साथ तापमान परिवर्तन और घड़ी के भीतर नमी प्रवेश करने जैसी समस्याओं पर भी ध्यान देता है।
व्यवहार में अनेक घड़ी निर्माता 30 मीटर या 3 एटीएम रेटिंग वाली सामान्य घड़ी को हाथ धोते समय पड़ने वाले छींटों और हल्के पानी के संपर्क के लिए उपयुक्त मानते हैं, लेकिन तैराकी के लिए नहीं। 50 मीटर या 5 एटीएम रेटिंग वाली कुछ घड़ियाँ सामान्य तैराकी के लिए उपयुक्त हो सकती हैं। 100 मीटर या 10 एटीएम रेटिंग वाली कई घड़ियों का उपयोग तैराकी और कुछ दूसरे जल संबंधी कार्यों के लिए किया जा सकता है। फिर भी इन सीमाओं को हर कंपनी और हर मॉडल के लिए निश्चित सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता। किसी विशेष घड़ी में वास्तविक उपयोग की अनुमति उसके निर्माता के निर्देशों और लागू तकनीकी मानक पर निर्भर करती है। घड़ी के बटन, समय ठीक करने वाली 'क्राउन', पीछे का ढक्कन और काँच के आसपास की सील कमजोर स्थान हो सकते हैं। यदि निर्माता ने अनुमति नहीं दी है तो पानी के भीतर बटन दबाना या क्राउन खोलना जल प्रतिरोध को प्रभावित कर सकता है।
पेशेवर गोताखोरों की घड़ियों के लिए एक अलग और अधिक विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय मानक है, जिसे 'आईएसओ 6425' कहा जाता है। इसका 2018 संस्करण गोताखोरी के लिए निर्मित घड़ियों तथा अत्यधिक गहराई में काम करने वाले सैचुरेशन गोताखोरों की घड़ियों से संबंधित है। इस मानक के अंतर्गत आने वाली डाइवर्स वॉच को कम से कम 100 मीटर की निर्धारित जलरोधक क्षमता सहित अतिरिक्त आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं। इसमें गोताखोरी का समय दिखाने की सुरक्षित व्यवस्था, अंधेरे में पठनीयता और अन्य उपयुक्त मजबूती संबंधी परीक्षण शामिल होते हैं। इसलिए केवल किसी सामान्य घड़ी पर '200M' लिखा होना और उसका प्रमाणित डाइवर्स वॉच होना हमेशा एक ही बात नहीं है। यही कारण है कि पानी में गंभीर तकनीकी कार्य करने वाले पेशेवर उपयोगकर्ता केवल घड़ी के विज्ञापन पर नहीं, बल्कि उसके निर्धारित परीक्षण, विश्वसनीयता और उपयोग संबंधी शर्तों पर ध्यान देते हैं।
घड़ियों और मोबाइल फोन के उदाहरण से अब मूल वैज्ञानिक प्रश्न अधिक स्पष्ट होता है। क्या कोई ऐसी वस्तु बनाई जा सकती है जिसमें किसी भी परिस्थिति में, किसी भी दबाव पर और किसी भी समय तक पानी प्रवेश नहीं कर सके? व्यवहारिक इंजीनियरिंग के संदर्भ में इसका उत्तर है कि ऐसी असीमित गारंटी नहीं दी जा सकती। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जलरोधक वस्तुएँ वास्तव में पानी रोकती ही नहीं हैं। एक सही ढंग से निर्मित और बंद धातु या काँच का पात्र सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक पानी को भीतर प्रवेश करने से रोक सकता है। पनडुब्बियों के मजबूत ढाँचे, औद्योगिक पाइपलाइनें और जलमग्न उपकरणों के विशेष आवरण इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। समस्या 'पूरी तरह' शब्द की असीमित व्याख्या में छिपी है। किसी भी वस्तु की सामग्री, जोड़, सील और संरचनात्मक मजबूती की सीमाएँ होती हैं। यदि दबाव बहुत अधिक बढ़ जाए, तापमान का अंतर अत्यधिक हो, रासायनिक क्षरण हो अथवा संरचना में दरार पड़ जाए, तो पानी प्रवेश कर सकता है। इसलिए वैज्ञानिक रूप से सही दावा यह होगा कि कोई वस्तु निश्चित परिस्थितियों में जलरोधक है। बिना किसी सीमा के हमेशा जलरोधक होने का दावा करना अलग और बहुत व्यापक बात है।
इस विचार को समुद्र के भीतर काम करने वाली पनडुब्बियों से समझा जा सकता है। पनडुब्बी का मजबूत बाहरी ढाँचा इस तरह बनाया जाता है कि उसके भीतर लोगों और उपकरणों के लिए नियंत्रित वातावरण बना रहे। सामान्य संचालन की निर्धारित गहराइयों पर पानी उसके संवेदनशील आंतरिक भागों तक नहीं पहुँचना चाहिए। लेकिन पनडुब्बी की भी डिजाइन सीमा होती है। समुद्र में गहराई बढ़ने के साथ उस पर पड़ने वाला बाहरी दबाव बढ़ता जाता है। यदि कोई संरचना अपनी निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक दबाव सहने को विवश हो, तो उसमें गंभीर विकृति या विफलता हो सकती है। इसी कारण गहरे समुद्र में उतरने वाले उपकरणों को उनकी विशिष्ट संचालन सीमा के लिए तैयार किया जाता है। यहाँ जलरोधकता केवल रबर की सील या चिपकने वाले पदार्थ की समस्या नहीं रहती। पूरी संरचना की यांत्रिक मजबूती आवश्यक होती है। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि किसी वस्तु में पानी का प्रवेश रोकना और पानी का भारी दबाव सुरक्षित रूप से सहना दो अलग लेकिन परस्पर जुड़े इंजीनियरिंग प्रश्न हैं।
कपड़ों के मामले में जलरोधकता का विज्ञान कुछ अलग रूप लेता है। सामान्य सूती कपड़ा पानी सोख लेता है क्योंकि उसके रेशों और उनके बीच मौजूद संरचना में पानी प्रवेश कर सकता है। कुछ कृत्रिम रेशों और विशेष उपचार किए गए कपड़ों में पानी के संपर्क का प्रतिरोध अधिक होता है। लेकिन कपड़े पर पानी की बूँदें फिसलने लगें, तो उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि कपड़ा लंबे समय तक बारिश रोक सकेगा। वर्षा से बचाने वाली पोशाकों में तीन शब्द महत्त्वपूर्ण हैं—'वॉटर रेसिस्टेंट', 'वॉटर रिपेलेंट' और 'वॉटरप्रूफ'। इनके बीच अंतर का आधार पानी के साथ वस्तु का व्यवहार है। सामान्य जल प्रतिरोध वाला कपड़ा हल्की नमी या कुछ छींटों का सामना कर सकता है। जल-विकर्षी कपड़े की सतह पानी की बूँदों को फैलने से रोकने में सहायता करती है। वास्तविक जलरोधक कपड़े में ऐसी परत, झिल्ली या कोटिंग मौजूद हो सकती है जो निर्धारित दबाव पर पानी के प्रवेश को रोकती है। लेकिन वस्त्र उद्योग में भी किसी उत्पाद के प्रदर्शन का मूल्यांकन उसके वास्तविक परीक्षण के आधार पर करना अधिक उपयोगी है, न कि केवल प्रचार में प्रयुक्त शब्दों से।
आधुनिक वॉटरप्रूफ कपड़ों की एक बड़ी उपलब्धि है कि कुछ विशेष सामग्रियाँ तरल पानी को रोकते हुए जलवाष्प को बाहर निकलने में सहायता कर सकती हैं। इसे 'वॉटरप्रूफ-ब्रीदेबल फैब्रिक' कहा जाता है। पहली नजर में यह तकनीक विरोधाभासी लगती है। यदि कपड़ा पानी को भीतर नहीं आने देता, तो शरीर से निकलने वाला पसीना बाहर कैसे जा सकता है? इसका उत्तर पानी की अलग-अलग भौतिक अवस्थाओं और झिल्लियों के व्यवहार में छिपा है। कुछ झिल्लियों में अत्यंत छोटे छिद्र होते हैं, जिनमें तरल पानी का प्रवेश सतही तनाव और दूसरी भौतिक परिस्थितियों के कारण कठिन हो सकता है, जबकि जलवाष्प का परिवहन संभव रहता है। कुछ दूसरी झिल्लियाँ बिना खुले सूक्ष्म छिद्रों के भी पदार्थ के भीतर से जलवाष्प का परिवहन कर सकती हैं। इसलिए सभी वॉटरप्रूफ-ब्रीदेबल कपड़ों को केवल छोटे छेद वाली एक ही तकनीक मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे विभिन्न प्रकार की सामग्री और उनके वैज्ञानिक गुण काम करते हैं।
इस तकनीक का एक प्रसिद्ध उदाहरण GORE-TEX है। इसकी विभिन्न उत्पाद प्रणालियों में विशेष झिल्लियों, वस्त्र की बाहरी और भीतरी परतों तथा सील किए गए जोड़ का उपयोग होता है। कंपनी स्वयं स्पष्ट करती है कि केवल अच्छी जलरोधक झिल्ली होना पर्याप्त नहीं है। यदि जैकेट की सिलाई के छेद खुले हों, जिप के आसपास पानी प्रवेश कर सके या डिजाइन में अन्य कमजोरियाँ हों, तो पूरी पोशाक की जलरोधकता प्रभावित होगी। इसलिए विशेष टेप की सहायता से सिलाई वाले हिस्सों को सील किया जाता है। पूरी पोशाक का बारिश संबंधी परीक्षण भी आवश्यक हो सकता है। इससे एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है। किसी वस्तु का एक भाग वॉटरप्रूफ होना और पूरी वस्तु का वॉटरप्रूफ होना अलग बातें हैं। कपड़े की मूल सामग्री पानी रोक सकती है, लेकिन उसके जोड़ या जिप में पानी प्रवेश कर सकता है। ठीक यही समस्या मोबाइल फोन और घड़ी के आवरण में भी दिखाई देती है।
कपड़ों की जलरोधक क्षमता को समझने के लिए एक विशेष परीक्षण का उपयोग किया जाता है जिसे 'हाइड्रोस्टैटिक हेड' कहते हैं। इसमें कपड़े के नमूने पर पानी का दबाव बढ़ाया जाता है और देखा जाता है कि किस दबाव पर पानी उसके पार जाने लगता है। परिणाम को पानी के स्तंभ की ऊँचाई के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी कपड़े की रेटिंग 5,000 मिलीमीटर लिखी हो, तो इसका आशय है कि निर्धारित परीक्षण में वह लगभग पाँच मीटर ऊँचे पानी के स्तंभ के बराबर दबाव का प्रतिरोध कर सकता है। 10,000 मिलीमीटर की रेटिंग उससे अधिक दबाव-सहन क्षमता का संकेत देती है। लेकिन यह किसी जैकेट को पाँच या दस मीटर गहरे पानी में डुबोने की सामान्य अनुमति नहीं है। यह कपड़े के एक विशेष नमूने पर किए गए दबाव परीक्षण की जानकारी है। पूरे कपड़े का वास्तविक प्रदर्शन सिलाई, जिप, घिसावट और उपयोग की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अंतरराष्ट्रीय वस्त्र परीक्षणों में 'आईएसओ 811' जैसे मानकों का उपयोग इस प्रकार के मूल्यांकन के लिए किया जाता है।
यहाँ एक साधारण लेकिन महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। यदि किसी जैकेट की जलरोधक क्षमता अच्छी है, तो क्या उसे पहनने वाला व्यक्ति तेज बारिश में कभी गीला नहीं होगा? ऐसा आवश्यक नहीं है। पानी केवल बाहर से कपड़े के पार आने के कारण ही व्यक्ति को गीला नहीं करता। शरीर से पसीना भी निकलता है। यदि पोशाक के भीतर उत्पन्न जलवाष्प पर्याप्त तेजी से बाहर नहीं निकल पाता, तो भीतर नमी जमा हो सकती है। व्यक्ति को ऐसा महसूस हो सकता है कि जैकेट से बारिश का पानी भीतर आ गया, जबकि कुछ परिस्थितियों में समस्या भीतर बने पसीने और संघनन की भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त बहुत अधिक आर्द्रता वाले मौसम में जलवाष्प को बाहर निकालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। यह भारत जैसे देश के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ मानसून के दौरान कई स्थानों पर गर्मी और आर्द्रता दोनों अधिक होती हैं। इसलिए किसी अच्छी बरसाती जैकेट का चयन केवल उसकी जलरोधक रेटिंग देखकर नहीं करना चाहिए। उसका वायु संचार, जलवाष्प परिवहन और शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
बरसाती कपड़ों के बारे में एक और कम चर्चित तथ्य है कि उनकी बाहरी सतह पर दिखाई देने वाली जल-विकर्षी क्षमता समय के साथ कम हो सकती है। इसके लिए कई उत्पादों में 'ड्यूरेबल वॉटर रिपेलेंट' अर्थात 'डीडब्ल्यूआर' उपचार का उपयोग किया जाता है। इस उपचार के कारण पानी की बूँदें कपड़े की सतह पर गोलाकार बनी रहती हैं और आसानी से फिसल सकती हैं। लेकिन लगातार उपयोग, गंदगी, धुलाई और घर्षण के कारण इसका प्रभाव घट सकता है। तब कपड़े की बाहरी परत पानी सोखने लग सकती है। इसे अक्सर 'वेटिंग आउट' कहा जाता है। इस अवस्था में पोशाक भारी, ठंडी या भीतर से असुविधाजनक महसूस हो सकती है। लेकिन यदि उसकी मूल जलरोधक झिल्ली सही है, तो आवश्यक नहीं कि बारिश का पानी वास्तव में पूरी पोशाक को पार कर गया हो। यही कारण है कि कुछ वॉटरप्रूफ कपड़ों में समय-समय पर निर्माता द्वारा अनुमोदित रखरखाव से बाहरी जल-विकर्षी क्षमता फिर बेहतर की जा सकती है।
पानी रोकने वाली तकनीकों में केवल दबाव और सामग्री ही महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। पानी का तापमान और उसकी रासायनिक संरचना भी निर्णायक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण प्रयोगशाला में सामान्य तापमान वाले साफ पानी में सुरक्षित पाया गया हो, तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह गर्म साबुन वाले पानी, समुद्र के खारे पानी या रासायनिक पदार्थों वाले स्विमिंग पूल में भी समान रूप से सुरक्षित रहेगा। साबुन और कुछ दूसरे पदार्थ पानी के सतही तनाव को प्रभावित कर सकते हैं। इससे पानी का बहुत छोटी जगहों में प्रवेश करने का व्यवहार बदल सकता है। गर्मी कुछ सील और चिपकने वाले पदार्थों को प्रभावित कर सकती है। खारा पानी धातुओं में क्षरण की संभावना बढ़ा सकता है। इसलिए स्वच्छ पानी में किए गए परीक्षण का परिणाम हर प्रकार के तरल पदार्थ पर लागू नहीं होता। यही कारण है कि कई मोबाइल निर्माता समुद्र, स्विमिंग पूल, गर्म पानी और रासायनिक पदार्थों से संबंधित विशेष सावधानियाँ बताते हैं।
इस संदर्भ में Samsung की भारतीय वेबसाइट पर प्रकाशित जानकारी महत्त्वपूर्ण है। कंपनी बताती है कि कुछ IPX8 परीक्षणों में उपकरण को लगभग डेढ़ मीटर स्वच्छ पानी में तीस मिनट तक स्थिर अवस्था में रखकर जाँचा गया है। लेकिन उसी जानकारी में खारे पानी, पूल के पानी, साबुन, तेल, इत्र, अत्यधिक दबाव वाले पानी और भाप से बचने की चेतावनी भी दी गई है। कंपनी यह भी स्पष्ट करती है कि सामान्य घिसावट या उपयोग के कारण जल प्रतिरोध समय के साथ कमजोर हो सकता है। यह उदाहरण दिखाता है कि रेटिंग का अर्थ किसी निश्चित परीक्षण की सफलता है। उसका अर्थ यह नहीं कि उत्पाद को पानी के साथ हर प्रकार के प्रयोग के लिए सुरक्षित घोषित कर दिया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में जलरोधकता की एक और समस्या 'संघनन' से जुड़ी है। यदि किसी उपकरण के भीतर थोड़ी नमी पहले से मौजूद हो, तो तापमान बदलने पर वह सतह पर छोटी बूँदों के रूप में दिखाई दे सकती है। उदाहरण के लिए किसी घड़ी के काँच के भीतर धुंध दिखाई देना इस बात का संकेत हो सकता है कि उसके अंदर नमी मौजूद है या तापमान संबंधी परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ है। यह आवश्यक नहीं कि हर बार बड़ी मात्रा में पानी सीधे भीतर घुसा हो। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और घड़ियों के लिए ऐसी नमी चिंता का विषय हो सकती है, क्योंकि लंबे समय में वह धातु के हिस्सों, विद्युत संपर्कों या अन्य संवेदनशील अवयवों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए जलरोधक डिजाइन का उद्देश्य केवल पानी की बड़ी बूँदों को रोकना नहीं होता। कई उपकरणों में नमी, तापमान परिवर्तन और समय के साथ होने वाले क्षरण का भी ध्यान रखना पड़ता है।
यहाँ पानी के व्यवहार का एक और वैज्ञानिक पहलू समझना उपयोगी है। किसी पदार्थ का बाहरी हिस्सा जल-विकर्षी हो सकता है, लेकिन बहुत लंबे समय में पानी के अणुओं या जलवाष्प का कुछ स्तर पर प्रवेश अथवा परिवहन फिर भी संभव हो सकता है। विशेष रूप से कुछ पॉलिमर सामग्रियों में जलवाष्प के धीरे-धीरे पार जाने की क्षमता होती है। इसलिए जलरोधकता को हमेशा एक ही स्तर पर समझना उचित नहीं है। तरल पानी की बूँदों को रोकना, जलवाष्प को रोकना और लंबे समय तक नमी के संपर्क से किसी संरचना की रक्षा करना तीन अलग परीक्षण हो सकते हैं। किसी खाद्य पैकेज में नमी रोकने के लिए अपनाई गई तकनीक, मोबाइल फोन की सील और बरसाती कपड़े की झिल्ली का उद्देश्य अलग होता है। इसी कारण एक क्षेत्र में अत्यंत प्रभावी पदार्थ दूसरे उपयोग के लिए उपयुक्त न हो। वैज्ञानिक दृष्टि से किसी भी पदार्थ की सफलता इस प्रश्न पर निर्भर करती है कि उसे वास्तव में क्या रोकना है और कितनी अवधि तक रोकना है।
घरों और इमारतों के निर्माण में 'वॉटरप्रूफिंग' का अर्थ फिर बदल जाता है। मकान की छत पर पानी जम सकता है, दीवारों में नमी प्रवेश कर सकती है और भूमिगत हिस्सों पर मिट्टी तथा भूजल का दबाव पड़ सकता है। यहाँ जलरोधकता केवल किसी सामग्री की सतह पर पानी फिसलाने से प्राप्त नहीं होती। निर्माण में दरारों का नियंत्रण, जोड़ का सही उपचार, उचित ढलान, जल निकासी और जलरोधक परतों का सही उपयोग आवश्यक है। कई बार किसी भवन की छत पर महँगी जलरोधक सामग्री लगाने के बावजूद पानी भीतर प्रवेश करने लगता है। इसका कारण सामग्री का कमजोर होना ही नहीं, बल्कि पानी की निकासी रुकना, संरचना में दरार पैदा होना या जोड़ के आसपास की तकनीकी त्रुटि भी हो सकती है। यह समस्या बताती है कि किसी सामग्री की प्रयोगशाला क्षमता और पूरी संरचना का वास्तविक प्रदर्शन अलग हो सकते हैं।
समुद्री जहाजों और औद्योगिक उपकरणों के निर्माण में यह अंतर और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। किसी जहाज की बाहरी धातु पानी को पार नहीं जाने देती, लेकिन जहाज के ढाँचे में अनेक जोड़, पाइप, वाल्व और दूसरे आवश्यक मार्ग मौजूद होते हैं। यदि इनमें से किसी एक स्थान पर खराबी आ जाए, तो पानी के प्रवेश की समस्या पैदा हो सकती है। इसी तरह पानी के भीतर काम करने वाला कैमरा या वैज्ञानिक उपकरण केवल मजबूत बाहरी आवरण से सुरक्षित नहीं होता। उसके खुले हिस्सों, ऊर्जा आपूर्ति और अन्य संपर्कों को भी उसी स्तर की सुरक्षा देनी होती है। इंजीनियरिंग में इसलिए एक प्रसिद्ध विचार है कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता उसके सबसे कमजोर महत्त्वपूर्ण हिस्से से प्रभावित हो सकती है। यदि एक उपकरण के अधिकांश हिस्से अत्यंत मजबूत हों, लेकिन किसी छोटे जोड़ पर सील विफल हो जाए, तो पूरी जलरोधक व्यवस्था असफल हो सकती है।
वॉटरप्रूफ दावों का एक उपभोक्ता अधिकार संबंधी पक्ष भी है। अमेरिका में संघीय व्यापार आयोग ने घड़ी उद्योग से संबंधित अपने दिशानिर्देशों में इस बात पर विशेष ध्यान दिया था कि 'वॉटरप्रूफ' जैसे निरपेक्ष शब्द ग्राहकों को भ्रामक विश्वास दे सकते हैं। आयोग के दिशानिर्देशों में ऐसे दावों का विरोध किया गया जो उत्पाद की वास्तविक सुरक्षा क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हों। इसके पीछे वही वैज्ञानिक सिद्धांत है कि किसी घड़ी की जलरोधक क्षमता विशेष परिस्थितियों में निर्धारित होती है। यदि विज्ञापन यह आभास देता है कि वस्तु किसी भी पानी, दबाव या परिस्थिति में सुरक्षित रहेगी, जबकि उत्पाद की क्षमता सीमित है, तो उपभोक्ता को गलत जानकारी मिल सकती है। भारत में भी उपभोक्ता संरक्षण कानून और भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित सामान्य नियम ऐसे दावों के मूल्यांकन में प्रासंगिक हो सकते हैं। लेकिन किसी विशेष विज्ञापन को कानूनी रूप से भ्रामक सिद्ध करने के लिए उसके वास्तविक शब्द, उत्पाद के परीक्षण, शर्तें और लागू कानून का मूल्यांकन आवश्यक होगा।
आधुनिक उत्पादों में जलरोधकता से संबंधित विज्ञापनों को पढ़ने का सबसे उपयोगी तरीका यही है कि प्रचार में लिखे एक शब्द के बजाय उसके पीछे मौजूद परीक्षण को समझा जाए। मोबाइल फोन खरीदते समय आईपी रेटिंग के साथ निर्धारित गहराई, समय और निर्माता की सावधानियाँ देखनी चाहिए। घड़ी के मामले में एटीएम या मीटर रेटिंग के साथ यह समझना आवश्यक है कि वह सामान्य तैराकी, जल क्रीड़ा या पेशेवर गोताखोरी के लिए वास्तव में उपयुक्त है या नहीं। जैकेट और तंबू के मामले में पानी के दबाव को रोकने की क्षमता, सिलाई की जलरोधक व्यवस्था तथा जलवाष्प के बाहर निकलने की सुविधा महत्त्वपूर्ण हो सकती है। भवन निर्माण में सामग्री के साथ उसकी स्थापना और जल निकासी की व्यवस्था को भी देखना आवश्यक है। किसी भी वस्तु की जलरोधकता का सही प्रश्न यह नहीं है कि वह वॉटरप्रूफ है या नहीं, बल्कि यह है कि वह किन परिस्थितियों में, कितने समय तक और कितनी विश्वसनीयता के साथ पानी को रोक सकती है।
इस पूरे विषय में एक दिलचस्प भाषाई समस्या भी छिपी है। अंग्रेजी शब्द 'प्रूफ' सामान्य बोलचाल में पूर्ण सुरक्षा का आभास देता है। इसी कारण 'वॉटरप्रूफ' सुनकर व्यक्ति यह मान सकता है कि पानी उस वस्तु को कभी नुकसान नहीं पहुँचा सकता। लेकिन इंजीनियरिंग में अनेक शब्द निर्धारित परीक्षण और उपयोग संबंधी शर्तों के साथ समझे जाते हैं। उदाहरण के लिए किसी सामग्री को 'फायर रेसिस्टेंट' कहा जाए, तो उसका अर्थ यह नहीं कि वह अनंत समय तक आग में सुरक्षित रहेगी। इसी तरह 'शैटर रेसिस्टेंट' काँच भी पर्याप्त बल पड़ने पर टूट सकता है। जलरोधकता की तकनीकी समझ भी इसी सिद्धांत का अनुसरण करती है। पूर्ण सुरक्षा का दावा करना आसान है, लेकिन वैज्ञानिक परीक्षण किसी वस्तु की सीमाओं को पहचानने का काम करता है।
इस प्रश्न का सबसे सीधा उत्तर यह है कि हाँ, ऐसी वस्तुएँ बनाना संभव है जो अपनी निर्धारित परिस्थितियों में पानी को पूरी तरह भीतर प्रवेश करने से रोकें। सही ढंग से निर्मित बंद पात्र, विशेष जलरोधक कपड़े, समुद्री उपकरण और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक आवरण इसके उदाहरण हैं। लेकिन किसी भी वस्तु के लिए यह दावा करना कि पानी किसी भी दबाव, तापमान, अवधि या क्षति की स्थिति में कभी प्रवेश नहीं कर सकेगा, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। कुछ वस्तुएँ अपने सामान्य उपयोग की पूरी अवधि में प्रभावी रूप से जलरोधक रह सकती हैं। दूसरी ओर कुछ उत्पादों की सील और बाहरी उपचार समय के साथ कमजोर हो सकते हैं। इसलिए 'वॉटरप्रूफ' को व्यवहारिक रूप से निर्धारित परिस्थितियों में प्रभावी जलरोधकता के अर्थ में समझना चाहिए, न कि प्रकृति के सभी संभावित प्रभावों के विरुद्ध असीमित सुरक्षा के रूप में।
अंततः वॉटरप्रूफ और वॉटर रेसिस्टेंट के बीच का अंतर केवल अंग्रेजी के दो शब्दों का अंतर नहीं है। यह उस वैज्ञानिक सोच का अंतर है जिसमें किसी वस्तु की वास्तविक क्षमता को मापना आवश्यक माना जाता है। पानी की एक बूँद का सतह पर फिसलना, तेज बारिश को रोकना, गहरे पानी का दबाव सहना और वर्षों तक नमी से संरचना को सुरक्षित रखना अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। आधुनिक विज्ञान ने इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए अत्यंत प्रभावी तकनीकें विकसित की हैं। लेकिन हर तकनीक की एक सीमा है। उस सीमा को जानना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके सही उपयोग की बुनियाद है।
पानी को रोकना विज्ञान के लिए असंभव काम नहीं है। असंभव जैसी बात यह है कि बिना किसी सीमा के यह गारंटी दी जाए कि पानी कभी प्रवेश ही नहीं करेगा। इसलिए अगली बार जब किसी मोबाइल, घड़ी, जैकेट या दूसरे उत्पाद पर '100 प्रतिशत वॉटरप्रूफ' लिखा दिखाई दे, तो सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि दावा कितना आकर्षक है। प्रश्न होना चाहिए कि उसे किस दबाव, किस गहराई, किस अवधि और किस परिस्थिति में परखा गया है। विज्ञान की विश्वसनीयता पूर्ण सुरक्षा के वादे में नहीं, बल्कि किसी वस्तु की वास्तविक क्षमता और उसकी सीमाओं को स्पष्ट करने में है। यही वॉटरप्रूफ और वॉटर रेसिस्टेंट के बीच का सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर है।


