Weather Modification: क्या इंसान अपनी मर्जी से बारिश करा सकता है? जानिए विज्ञान की हकीकत

Weather Modification Technology: क्या क्लाउड सीडिंग से बारिश बढ़ाई जा सकती है और जियोइंजीनियरिंग से धरती को ठंडा किया जा सकता है? जानिए भारत, चीन, UAE और अमेरिका में मौसम बदलने की तकनीक, इसके वैज्ञानिक प्रमाण और जोखिम।

Neel Mani Lal
Published on: 9 Oct 2026 5:33 PM IST
Weather Modification Technology Explained in Hindi | Newstrack Hindi News | Latest Hindi News
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Weather Modification Technology: अगर किसी शहर में सूखा पड़ रहा हो, खेती के लिए पानी कम हो रहा हो और आसमान में बादल तो हों लेकिन बारिश न हो रही हो, तो एक सवाल स्वाभाविक है। क्या इंसान बादलों को थोड़ा धक्का देकर बारिश करा सकता है? और अगर बारिश बढ़ाई जा सकती है, तो क्या एक दिन ऐसा भी आएगा जब इंसान गर्म होती धरती को ठंडा करने के लिए पूरे मौसम को ही बदल देगा?

इन सवालों का जवाब विज्ञान ने कुछ हद तक हां और बहुत हद तक अभी नहीं में दिया है। बादलों में कुछ खास पदार्थ डालकर बारिश या बर्फ बढ़ाने की कोशिश यानी क्लाउड सीडिंग आज दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में किसी न किसी रूप में हो रही है। लेकिन यह मौसम पर पूरी कमान हासिल करने जैसा नहीं है। इसके लिए पहले से मौजूद उपयुक्त बादल चाहिए और सही मौसम की स्थिति भी जरूरी है।

यहीं से मौसम में छोटे स्तर पर बदलाव और पूरी धरती की जलवायु को बदलने की कोशिश के बीच का फर्क समझना जरूरी हो जाता है। क्लाउड सीडिंग स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर पर बारिश बढ़ाने की कोशिश है, जबकि जियोइंजीनियरिंग का बड़ा हिस्सा धरती के तापमान और जलवायु को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने की बात करता है।

जियोइंजीनियरिंग आखिर है क्या?

जियोइंजीनियरिंग का सामान्य मतलब है धरती की प्राकृतिक प्रणालियों में बड़े पैमाने पर तकनीकी हस्तक्षेप करके जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने की कोशिश। इसके कई तरीके सुझाए गए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो तरह की तकनीकों की होती है। पहली है कार्बन डाइऑक्साइड को हवा से हटाना। इसमें पेड़ लगाना, मिट्टी में कार्बन जमा करना, हवा से सीधे कार्बन डाइऑक्साइड निकालना या समुद्र और दूसरी प्राकृतिक प्रणालियों की मदद से कार्बन को लंबे समय के लिए बांधना शामिल हो सकता है। इसका मकसद उस गैस को कम करना है जो धरती को गर्म कर रही है।

दूसरी और कहीं ज्यादा विवादित तकनीक है सोलर रेडिएशन मॉडिफिकेशन यानी सूरज की रोशनी का एक छोटा हिस्सा वापस अंतरिक्ष की ओर भेजकर धरती को ठंडा करने की कोशिश। इसके तहत वातावरण में बहुत छोटे कण फैलाने या समुद्र के ऊपर बादलों को ज्यादा चमकीला बनाने जैसी योजनाएं सामने आई हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार ऐसी तकनीकें फिलहाल काफी हद तक मॉडल, प्रयोग और सिद्धांत के स्तर पर हैं।

बादल में रसायन डालकर बारिश बढ़ाना कैसे काम करता है?

क्लाउड सीडिंग को समझना अपेक्षाकृत आसान है। बादल के अंदर पानी की बहुत छोटी बूंदें या बर्फ के कण मौजूद होते हैं। कुछ परिस्थितियों में इन बूंदों को बड़े कणों में बदलने या बर्फ के क्रिस्टल बनाने में मदद की जा सकती है। इसके लिए विमान, जमीन से चलने वाले उपकरण या दूसरे साधनों से कुछ पदार्थ बादल में पहुंचाए जाते हैं। ठंडे बादलों में सिल्वर आयोडाइड जैसे पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो बर्फ के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकते हैं। कुछ दूसरे प्रयोगों में ऐसे कण इस्तेमाल किए जाते हैं जो पानी की बूंदों के आपस में जुड़ने में मदद करते हैं।

क्लाउड सीडिंग आसमान में बारिश पैदा करने की मशीन नहीं है। अगर बादल ही नहीं है या वातावरण में पर्याप्त नमी नहीं है, तो विमान से कोई पदार्थ छोड़कर रेगिस्तान के ऊपर मनमर्जी की बारिश नहीं कराई जा सकती। विश्व मौसम संगठन के मुताबिक क्लाउड सीडिंग की सफलता बादल के प्रकार, तापमान, नमी और स्थानीय परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करती है। यही कारण है कि किसी एक जगह सफल हुआ प्रयोग दूसरी जगह उसी परिणाम की गारंटी नहीं देता।

चीन इस तकनीक को बड़े पैमाने पर क्यों इस्तेमाल कर रहा है?

अगर दुनिया में मौसम बदलने के कार्यक्रमों की बात करें तो चीन सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है। वहां कृत्रिम बारिश और बर्फ बढ़ाने तथा ओलावृष्टि कम करने के लिए लंबे समय से मौसम संशोधन कार्यक्रम चल रहे हैं। चीन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच उसके मौसम संशोधन कार्यक्रमों से कृत्रिम बारिश और बर्फ बढ़ाने के जरिए कुल 167.7 अरब टन अतिरिक्त वर्षा होने का दावा किया गया। चीन ने यह भी बताया कि इन अभियानों का इस्तेमाल कृषि, सूखे से निपटने, पारिस्थितिकी सुधार और ओलावृष्टि से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए किया गया। 2026 से 2030 के दौरान चीन इन कार्यक्रमों को और बेहतर करने की योजना पर काम कर रहा है। हालांकि यहां भी आंकड़े को इस अर्थ में नहीं समझना चाहिए कि चीन जब चाहे तब कहीं भी बारिश करा सकता है। ऐसे कार्यक्रमों में सबसे मुश्किल काम यह साबित करना होता है कि हुई अतिरिक्त बारिश वास्तव में सीडिंग के कारण हुई या वैसे भी होने वाली थी। मौसम में प्राकृतिक उतार-चढ़ाव बहुत बड़ा होता है।

संयुक्त अरब अमीरात का मॉडल अलग क्यों है?

रेगिस्तानी देश संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के लिए बारिश बढ़ाना सीधे पानी की जरूरत से जुड़ा विषय है। वहां बादलों में सीडिंग के लिए विमान और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल लंबे समय से हो रहा है। यूएई ने इस क्षेत्र में सिर्फ ऑपरेशन ही नहीं चलाए, बल्कि शोध पर भी पैसा लगाया है। UAE Research Program for Rain Enhancement Science के छठे चरण में 2026 में चुने गए शोधकर्ताओं को तीन साल तक प्रति परियोजना 15 लाख डॉलर तक का अनुदान देने की घोषणा की गई। इसमें बेहतर सीडिंग पदार्थ, नए तरीके, बिना पायलट वाले विमान, सीमित क्षेत्र में जलवायु हस्तक्षेप और बेहतर कंप्यूटर मॉडल जैसे विषय शामिल हैं। यूएई और कजाकिस्तान के बीच कजाकिस्तान के तुर्किस्तान क्षेत्र में क्लाउड सीडिंग परियोजना पर सहयोग भी चल रहा है। यूएई का उदाहरण दिखाता है कि मौसम संशोधन अब केवल वैज्ञानिक प्रयोग नहीं रहा। कुछ देशों में इसे पानी की रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। फिर भी इसका असर बादल मिलने और सही वातावरण बनने पर निर्भर रहता है।

भारत भी इस दिशा में कितना आगे है?

भारत में क्लाउड सीडिंग पर शोध कई वर्षों से चल रहा है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान यानी आईआईटीएम ने 2018 और 2019 में CAIPEEX नाम का बड़ा प्रयोग किया था। इसमें शोधकर्ताओं ने विमान की मदद से बादलों में सीडिंग की और बारिश बढ़ने की संभावना का अध्ययन किया। सरकार के अनुसार इस अध्ययन में कुछ स्थानों पर बारिश में करीब 46 प्रतिशत तक की वृद्धि के संकेत मिले, जबकि लगभग 100 वर्ग किलोमीटर के नीचे की दिशा वाले क्षेत्र में औसत वृद्धि करीब 18 प्रतिशत बताई गई। लेकिन इन आंकड़ों को किसी भी जगह बारिश की गारंटी नहीं माना जा सकता, क्योंकि परिणाम बादल और स्थानीय मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। भारत अब क्लाउड सीडिंग के लिए विमान, ड्रोन, सीडिंग सामग्री और बादलों की प्रयोगशाला में जांच जैसी क्षमताओं को विकसित कर रहा है। दिल्ली में प्रदूषण के दौरान बारिश कराने के संभावित इस्तेमाल को लेकर आईआईटी कानपुर के साथ एक पायलट परियोजना भी शुरू की गई थी। फरवरी 2026 तक सरकार ने इसे परीक्षण के चरण में बताया था। इसका मकसद ऐसे समय में एक अतिरिक्त विकल्प तलाशना था जब प्रदूषण ज्यादा हो और बादलों की स्थिति सीडिंग के अनुकूल हो। लेकिन दिल्ली जैसी जगह पर एक और मुश्किल है। अगर बादल ही कम हों या मौसम की स्थिति अनुकूल न हो, तो सीडिंग की क्षमता बहुत सीमित हो जाती है। इसलिए इसे प्रदूषण का स्थायी समाधान कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

अमेरिका क्या कर रहा है?

अमेरिका में तस्वीर थोड़ी अलग है। वहां क्लाउड सीडिंग और मौसम संबंधी शोध होते हैं, लेकिन जिस तकनीक को आमतौर पर “सोलर जियोइंजीनियरिंग” कहा जाता है, उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) साफ कहता है कि अमेरिका सरकार किसी तरह का सोलर जियोइंजीनियरिंग आउटडोर परीक्षण या बड़े पैमाने का प्रयोग नहीं कर रही है। ये संस्थान वातावरण के ऊपरी हिस्से और समुद्र के ऊपर की हवा का अध्ययन जरूर करता है ताकि इस तकनीक के संभावित फायदे और जोखिम समझे जा सकें। अमेरिका में वैज्ञानिकों ने इस विषय पर शोध करने की जरूरत पर जरूर जोर दिया है। अमेरिकी नेशनल अकादमी की 2021 की रिपोर्ट ने कहा था कि सोलर जियोइंजीनियरिंग के संभावित असर को समझने के लिए सावधानीपूर्वक शोध किया जाना चाहिए, लेकिन शोध को सीधे भविष्य में बड़े पैमाने पर इसे लागू करने के लिए डिजाइन नहीं किया जाना चाहिए।

सबसे विवादित तरीका है आसमान में एरोसोल फैलाना

अब आते हैं जियोइंजीनियरिंग के उस विचार पर जिसने वैज्ञानिकों और नीति बनाने वालों के बीच सबसे ज्यादा बहस पैदा की है। इसका नाम है स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन। सिद्धांत यह है कि धरती के ऊपर वायुमंडल की एक ऊंची परत में बहुत छोटे कण पहुंचाए जाएं। ये कण सूरज की थोड़ी सी रोशनी वापस अंतरिक्ष की ओर भेज सकते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट के बाद प्रकृति में ऐसा प्रभाव देखा जा चुका है। बड़े ज्वालामुखी विस्फोट से वातावरण में सल्फर युक्त कण पहुंच सकते हैं और कुछ समय के लिए वैश्विक तापमान में कमी आ सकती है। वैज्ञानिक इसी प्राकृतिक घटना को समझकर पूछ रहे हैं कि क्या इसी तरह का प्रभाव जानबूझकर पैदा किया जा सकता है। सैद्धांतिक रूप से यह धरती को अपेक्षाकृत जल्दी ठंडा कर सकता है। लेकिन असली समस्या इसके बाद शुरू होती है।

अगर धरती ठंडी हो गई तो क्या सब ठीक हो जाएगा?

धरती के अलग-अलग हिस्से एक ही तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। किसी क्षेत्र में तापमान कम होना राहत दे सकता है, लेकिन बारिश का पैटर्न बदल सकता है। किसी जगह मानसून कमजोर हो सकता है, कहीं ज्यादा बारिश हो सकती है। समुद्री और स्थलीय पारिस्थितिकी पर अलग असर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड ने चेतावनी दी है कि सोलर जियोइंजीनियरिंग से असमान ठंडक, जलवायु में बदलाव, ऊपरी वायुमंडल में असर, अम्लीय वर्षा और दूसरे अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि इसका फैसला करेगा कौन? अगर कोई एक देश अपनी तरफ से वातावरण में बड़े पैमाने पर कण फैलाकर धरती को ठंडा करने लगे और दूसरे देश के मानसून या कृषि पर उसका असर पड़े तो जिम्मेदारी किसकी होगी? यही कारण है कि जियोइंजीनियरिंग केवल विज्ञान का विषय नहीं है। यह राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कानून, पर्यावरण, सुरक्षा और नैतिकता का भी विषय बन जाता है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब होगी जब प्रयोग बंद करना पड़े

मान लीजिए किसी तकनीक से धरती का तापमान कुछ समय के लिए कम कर दिया गया। लेकिन इसी दौरान वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड लगातार बढ़ती रही। कुछ साल बाद अगर वह तकनीक अचानक बंद करनी पड़े तो तापमान तेजी से ऊपर जा सकता है। इसे एक तरह से ऐसे समझ सकते हैं जैसे कमरे में लगातार गर्मी पैदा हो रही हो और आपने केवल पंखा चला दिया हो। पंखा गर्मी का स्रोत खत्म नहीं करता। वह सिर्फ कुछ समय के लिए उसका असर कम करता है। यही सोलर जियोइंजीनियरिंग की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक है। यह कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से हटाती नहीं है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की मूल वजह बनी रहती है। UNEP की 2026 की रिपोर्ट का निष्कर्ष भी यही है कि मौजूदा वैज्ञानिक जानकारी सोलर रेडिएशन मॉडिफिकेशन को जलवायु परिवर्तन का व्यावहारिक समाधान मानने के लिए पर्याप्त नहीं

क्या मौसम को इंजीनियर करना बेकार है?

क्लाउड सीडिंग और सोलर जियोइंजीनियरिंग को एक ही चीज मानना सबसे बड़ी गलती होगी। क्लाउड सीडिंग में कुछ परिस्थितियों में स्थानीय स्तर पर बारिश या बर्फ बढ़ाने के प्रमाण मिले हैं। विश्व मौसम संगठन के मुताबिक कुछ खास तरह के ठंडे पहाड़ी बादलों में बर्फ बनने की प्रक्रिया को बढ़ाने वाली सीडिंग के लिए कारण और परिणाम का वैज्ञानिक प्रमाण भी मजबूत हुआ है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बादल में सीडिंग काम करेगी।

दूसरी तरफ, पूरे ग्रह को ठंडा करने वाली सोलर जियोइंजीनियरिंग अभी काफी हद तक मॉडल, प्रयोगशाला और सीमित शोध तक ही है। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण एजेंसी (UNEP) इसे जोखिम और अनिश्चितता से भरी तकनीक मानता है और कहता है कि यह उत्सर्जन कम करने का विकल्प नहीं है। इसलिए आने वाले समय में शायद मौसम संशोधन का सबसे व्यावहारिक हिस्सा छोटे और स्पष्ट लक्ष्य होंगे, जैसे कुछ परिस्थितियों में बारिश बढ़ाना, ओलावृष्टि से नुकसान कम करना या कुछ खास तरह के कोहरे को हटाना। लेकिन “हम पूरे शहर का मौसम बदल देंगे” या “हम तूफान को अपनी मर्जी से मोड़ देंगे” जैसी बातें अभी विज्ञान से कहीं आगे की कल्पना हैं।

क्या इंसान एक दिन धरती का तापमान अपनी मर्जी से घटा सकेगा?

सैद्धांतिक संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी हमारे पास इसे सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से करने की तकनीक नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि सूरज की रोशनी को थोड़ा कम कैसे किया जाए। चुनौती यह है कि ऐसा करने पर दुनिया के हर हिस्से में क्या होगा।अगर किसी तकनीक से औसत वैश्विक तापमान घट भी गया, लेकिन भारत का मानसून बदल गया, अफ्रीका में सूखा बढ़ गया या किसी दूसरे क्षेत्र में बारिश का पैटर्न बिगड़ गया, तो केवल औसत तापमान कम होना सफलता नहीं कहलाएगा।

यही वजह है कि जियोइंजीनियरिंग की असली बहस “क्या हम इसके परिणामों को नियंत्रित कर सकते हैं?” पर आ गई है। और फिलहाल इसका जवाब है, पूरी तरह नहीं।

बारिश के बादल पर थोड़ा असर डालना आज संभव है, लेकिन पूरी धरती के मौसम की कमान इंसान के हाथ में अभी नहीं आई है। चीन, यूएई और भारत जैसे देश क्लाउड सीडिंग पर वास्तविक कार्यक्रम चला रहे हैं, जबकि अमेरिका समेत कई देशों में सोलर जियोइंजीनियरिंग पर शोध और मॉडलिंग हो रही है। लेकिन धरती को कृत्रिम रूप से ठंडा करने की बड़े पैमाने वाली तकनीक अभी प्रयोग और बहस के दौर में है। सबसे अहम बात यह है कि अगर भविष्य में जियोइंजीनियरिंग कभी इस्तेमाल भी होती है, तो उसे जलवायु परिवर्तन की जड़ यानी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती का विकल्प नहीं माना जा सकता। फिलहाल वैज्ञानिक दुनिया इसी बात पर सबसे ज्यादा जोर दे रही है कि पहले उत्सर्जन घटाया जाए, अनुकूलन बढ़ाया जाए और जियोइंजीनियरिंग के संभावित फायदे और नुकसान को बहुत सावधानी से समझा जाए।

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