Airplane Facts: हवाई जहाज 35,000 फीट के आसपास ही क्यों उड़ते हैं? क्या यह कोई तय वैश्विक मानक है?

Airplane Intresting Facts: हवाई जहाज 35,000 फीट के आसपास क्यों उड़ते हैं? जानिए हवा, ईंधन बचत, इंजन, मौसम, वजन, केबिन प्रेशर और ATC के कारणों के साथ पूरी कहानी।

Yogesh Mishra
Published on: 14 Aug 2026 6:34 PM IST
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Airplane Intresting Facts: ये कहना कि हर हवाई जहाज ठीक 35,000 फीट पर ही उड़ता है, पूरी तरह ठीक नहीं है। 35,000 फीट सिर्फ एक बहुत सामान्य क्रूज़ ऊँचाई है। आधुनिक यात्री विमान मार्ग, वजन, मौसम, हवा की दिशा, वायु यातायात, विमान के प्रकार और उसकी अधिकतम परिचालन सीमा के अनुसार लगभग 30,000 से 42,000 फीट या उसके आसपास अलग-अलग ऊँचाइयों पर उड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी उड़ान को 31,000 फीट, 33,000 फीट, 35,000 फीट, 37,000 फीट या 39,000 फीट पर रखा जा सकता है। इसलिए 35,000 फीट कोई ऐसा जादुई स्तर नहीं है, जिसे किसी एक वैज्ञानिक ने खोजा और दुनिया ने स्थायी नियम बना लिया। यह उस ऊँचाई क्षेत्र का हिस्सा है, जहाँ आधुनिक जेट विमान के लिए ईंधन की बचत, वायुगतिकीय दक्षता, इंजन का प्रदर्शन, मौसम से दूरी और वायु यातायात व्यवस्था का अच्छा संतुलन मिलता है। FAA के प्रशिक्षण साहित्य में भी 35,000 फीट को सामान्य ऊँचे जेट संचालन के संदर्भ में लिया जाता है, जबकि वास्तविक क्रूज़ स्तर विमान और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है।

हवा पर है सब निर्भर

हवाई जहाज़ इतनी ऊँचाई पर क्यों जाते हैं, इसे समझने के लिए सबसे पहले हवा को समझना होगा। समुद्र तल पर हवा घनी होती है। विमान जब आगे बढ़ता है तो उसे इस हवा को चीरते हुए जाना पड़ता है। इससे वायुगतिकीय प्रतिरोध पैदा होता है। ऊँचाई बढ़ने के साथ हवा पतली होती जाती है। पतली हवा में विमान को कम प्रतिरोध मिलता है। जेट विमान अधिक दक्षता से तेज गति से लंबी दूरी तय कर सकता है। लेकिन यदि विमान बहुत ज्यादा ऊपर चला जाए तो हवा इतनी पतली हो जाती है कि पंखों को पर्याप्त उठान पैदा करने और इंजनों को पर्याप्त वायु प्राप्त करने में कठिनाई होने लगती है। इसलिए एक ऐसा क्षेत्र चाहिए, जहाँ हवा समुद्र तल की तुलना में काफी पतली हो। लेकिन विमान के पंख और इंजन अभी भी प्रभावी ढंग से काम कर सकें। आधुनिक यात्री जेट के लिए लगभग 30,000 से 40,000 फीट का क्षेत्र इसी संतुलन के कारण अत्यंत उपयोगी है।

यहाँ एक रोचक विरोधाभास है। विमान को उड़ने के लिए हवा चाहिए। लेकिन वही हवा उसे रोकती भी है। यदि हवा बहुत घनी है तो पंख को उठान आसानी से मिलता है। लेकिन प्रतिरोध अधिक होता है। यदि हवा बहुत पतली है तो प्रतिरोध कम होता है। लेकिन उठान और इंजन के लिए उपलब्ध वायु भी कम होती है। इसलिए विमान को उस ऊँचाई पर उड़ाना सबसे लाभकारी है, जहाँ इन दोनों के बीच सर्वोत्तम समझौता हो। यही कारण है कि आधुनिक जेट समुद्र तल से कुछ हजार फीट पर पूरी लंबी यात्रा नहीं करते और न 60,000 या 70,000 फीट पर सामान्य यात्री विमान उड़ते हैं।

जेट इंजन भी ऊँचाई पर अच्छे ढंग से काम करने के लिए बनाए जाते हैं। ठंडी और पतली हवा में लंबी दूरी की क्रूज़ उड़ान के दौरान आधुनिक टर्बोफैन इंजन ईंधन की दृष्टि से अधिक दक्ष हो सकते हैं। ऊँचाई पर विमान बहुत तेज वास्तविक गति से चल सकता है, जबकि उसे महसूस होने वाला वायुगतिकीय प्रतिरोध नीचे की तुलना में कम रहता है। यही कारण है कि लंबी दूरी के विमान जितनी जल्दी संभव हो अपनी अनुकूल क्रूज़ ऊँचाई तक चढ़ना चाहते हैं। लेकिन केवल उतनी ही ऊँचाई तक जहाँ उस समय उनका वजन और परिस्थितियाँ अनुमति दें।

विमान का वजन रखता है मायने

विमान का वजन यह तय करने में बहुत महत्वपूर्ण है कि वह शुरुआत में कितनी ऊँचाई तक जा सकता है। लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ान के आरंभ में विमान में बहुत अधिक ईंधन होता है और वह भारी होता है। इसलिए वह संभव है कि पहले 31,000 या 33,000 फीट पर क्रूज़ करे। कई घंटे बाद ईंधन जल चुका होता है और विमान हल्का हो जाता है। तब वह 35,000, फिर 37,000 और कभी 39,000 फीट तक ऊपर जा सकता है। इसे step climb कहा जाता है। यानी विमान पूरी यात्रा एक ही ऊँचाई पर रहना आवश्यक नहीं समझता।जैसे-जैसे वजन घटता है। अधिक अनुकूल ऊँचाई अपनाई जा सकती है। यही कारण है कि यदि आप किसी लंबी उड़ान की जानकारी देखें तो कभी पाएँगे कि वह पहले 33,000 फीट पर थी। कुछ समय बाद 35,000 या 37,000 फीट पर पहुँच गई। यह कोई गड़बड़ी नहीं। बल्कि ईंधन दक्षता की सोची-समझी रणनीति हो सकती है। 35,000 फीट के आसपास एक और बड़ा लाभ मौसम से मिलता है। पृथ्वी का अधिकांश रोजमर्रा का मौसम यानी बादल, वर्षा, कई प्रकार की अशांति और तूफानी गतिविधि, वायुमंडल की निचली परत क्षोभमंडल में होती है। बड़े गरज वाले बादल जरूर बहुत ऊँचाई तक पहुँच सकते हैं, इसलिए विमान उनसे बचकर उड़ते हैं। लेकिन ऊँची क्रूज़ ऊँचाई पर कई सामान्य मौसम व्यवधान नीचे रह जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि 35,000 फीट पर टर्बुलेंस (turbulence) नहीं होती। जेट स्ट्रीम और साफ आकाश की अशांति वहाँ गंभीर हो सकती है। लेकिन सामान्यतः लंबी दूरी की उड़ान के लिए ऊँचा वातावरण सुविधाजनक होता है।

तापमान भी ऊँचाई के साथ तेजी से घटता है। मानक वायुमंडल में लगभग 36,000 फीट तक तापमान औसतन लगभग 2 डिग्री सेल्सियस प्रति 1,000 फीट घटता है। इस क्षेत्र में बाहरी तापमान लगभग माइनस 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी नीचे हो सकता है। ठंडी हवा इंजन और वायुगतिकीय प्रदर्शन के कुछ पहलुओं के लिए उपयोगी है।लेकिन इसके कारण विमान को ताप, ईंधन और उपकरणों के लिए विशेष अभियांत्रिकी भी चाहिए।

तो फिर 50 हजार फीट क्यों नहीं?

अब स्वाभाविक प्रश्न है कि यदि ऊपर जाने से ईंधन बचता है तो विमान 50,000 फीट क्यों नहीं उड़ते? कारण यह है कि हर विमान की एक अधिकतम परिचालन ऊँचाई होती है। जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं, हवा इतनी पतली होती जाती है कि विमान को पर्याप्त उठान बनाए रखने के लिए अधिक वास्तविक गति चाहिए। उसी समय ध्वनि की गति और विमान की अधिकतम सुरक्षित मैक सीमा का प्रश्न आता है। एक बिंदु पर धीमा होने पर विमान उठान खो सकता है और बहुत तेज होने पर वायुगतिकीय सीमा के बहुत पास पहुँच सकता है। ऊँची ऊँचाई पर इन दोनों सीमाओं के बीच सुरक्षित गति का अंतर कम होता जाता है। आधुनिक विमान की प्रणालियाँ इससे बहुत पहले सुरक्षित परिचालन सीमा तय करती हैं।

केबिन प्रेशर और ऑक्सीजन

यानी ऊँचाई बढ़ने के साथ ईंधन दक्षता का लाभ अनंत नहीं बढ़ता। एक स्तर के बाद हवा इतनी पतली होती है कि विमान का प्रदर्शन, नियंत्रण और केबिन दबाव की समस्या अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। 35,000 फीट पर बाहर की हवा मनुष्य के लिए सीधे सांस लेने योग्य नहीं होती। वहाँ वायुदाब समुद्र तल की तुलना में बहुत कम है। पर्याप्त ऑक्सीजन दबाव नहीं मिलता। इसीलिए यात्री विमान का केबिन दबावयुक्त रखा जाता है। विमान 35,000 फीट पर हो सकता है। लेकिन अंदर यात्रियों को ऐसा वातावरण दिया जाता है जो सामान्यतः कई हजार फीट की ‘केबिन ऊँचाईँ’ के बराबर हो। 35,000 फीट से दबाव खोने की स्थिति को गंभीर आपातकाल बताया गया है, क्योंकि उस ऊँचाई पर बिना पूरक ऑक्सीजन के मनुष्य बहुत जल्दी कार्यक्षमता खो सकता है।

इसीलिए यदि अचानक केबिन दबाव कम हो जाए तो ऊपर से ऑक्सीजन मास्क गिरते हैं और पायलट विमान को तेजी से नीचे सुरक्षित ऊँचाई पर लाते हैं। मास्क इसलिए नहीं गिरता कि विमान में ‘ऑक्सीजन समाप्त’ हो गई। समस्या बाहर का अत्यंत कम वायुदाब है। ऊँची उड़ान की सीमा केवल मनुष्य के शरीर से नहीं, विमान की संरचना से भी तय होती है। हर बार जब विमान ऊपर जाता है और केबिन अंदर उच्च दबाव पर रखा जाता है, तो विमान के धड़ पर अंदर और बाहर के दबाव का अंतर बल डालता है। फिर उतरने पर यह अंतर घटता है। विमान का धड़ हजारों ऐसे दबाव चक्रों को सहने के लिए बनाया जाता है। जितनी अधिक ऊँचाई और जितना अधिक केबिन दबाव अंतर, संरचना पर उतना अधिक अभियांत्रिक भार। इसलिए केवल ‘ऊपर उड़ना सस्ता है’ देखकर असीम ऊँचाई चुनना संभव नहीं।

किसने तय किया 35 हजार का मानक?

अब उस सवाल पर आएँ कि 35,000 फीट का मानक किसने तय किया? इसका उत्तर है कि किसी एक व्यक्ति या संस्था ने 35,000 फीट को यात्री विमान की सार्वभौमिक ऊँचाई घोषित नहीं किया। विमान निर्माता अपने विमान की वायुगतिकी, इंजन, दबाव प्रणाली और संरचनात्मक क्षमता के अनुसार परिचालन ऊँचाइयाँ प्रमाणित करते हैं। दूसरी ओर ICAO, अलग-अलग देशों के नागरिक उड्डयन नियामक और वायु यातायात नियंत्रण संस्थाएँ यह तय करती हैं कि विमानों को अलग-अलग ऊँचाइयों पर सुरक्षित तरीके से कैसे व्यवस्थित किया जाए।

कई हवाई क्षेत्रों में सामान्य दिशा-आधारित नियम भी होते हैं ताकि विपरीत दिशाओं में जाने वाले विमान स्वाभाविक रूप से अलग-अलग स्तरों पर रहें। लेकिन यह नियम क्षेत्र और संचालन के अनुसार जटिल हो सकता है, इसलिए ‘पूर्व की ओर हमेशा विषम और पश्चिम की ओर हमेशा सम’ जैसी लोकप्रिय व्याख्या को सार्वभौमिक नियम की तरह नहीं लेना चाहिए। वास्तविक ऊँचाई एयर ट्रैफिक कंट्रोलर (ATC) की अनुमति से तय होती है। 35,000 फीट इतना आम इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यह FL350 है और आधुनिक जेट विमानों के आर्थिक क्रूज़ क्षेत्र के बीच में पड़ता है। यदि विमान, वजन, हवा और यातायात अनुकूल हों तो फ्लाइट लेवल 350 बहुत अच्छा स्तर हो सकता है। लेकिन अगले दिन वही विमान उसी मार्ग पर फ्लाइट लेवल 330 या फ्लाइट लेवल 370 पर उड़ सकता है।

हवा कि दिशा भी महत्वपूर्ण

हवा की दिशा भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऊँचाई पर जेट स्ट्रीम नाम की बहुत तेज हवाएँ मिलती हैं। यदि हवा पीछे से धक्का दे रही है तो पायलट और एयरलाइन ऐसी ऊँचाई चुन सकते हैं, जहाँ अनुकूल हवा से समय और ईंधन दोनों बचें। यदि सामने से बहुत तेज हवा है तो किसी दूसरी ऊँचाई पर जाना लाभकारी हो सकता है। इसलिए ‘सबसे कम प्रतिरोध वाली ऊँचाई’ और ‘सबसे कम यात्रा लागत वाली ऊँचाई’ हमेशा एक ही नहीं होती।

मौसम रडार से दिखने वाला गरज वाला बादल भी योजना बदल सकता है। गंभीर तूफानी बादल 35,000 फीट से भी ऊपर उठ सकते हैं। ऐसे बादल के ऊपर से निकलना सामान्य नीति नहीं है। विमान उससे पर्याप्त दूरी बनाकर दाएँ-बाएँ रास्ता बदलता है। इसलिए क्रूज़ ऊँचाई चाहे कितनी भी अनुकूल हो, मौसम सुरक्षा उससे पहले आती है। वायु यातायात भी ऊँचाई बदल सकता है। संभव है आपका विमान ईंधन की दृष्टि से FL370 चाहता हो लेकिन वहाँ पहले से दूसरा विमान हो या उस मार्ग पर यातायात अधिक हो। ATC उसे कुछ समय FL350 पर रख सकता है और बाद में ऊपर जाने की अनुमति दे सकता है। इसलिए विमान की कंप्यूटर प्रणाली ‘सर्वोत्तम’ ऊँचाई निकाल सकती है। लेकिन अंतिम संचालन वास्तविक आकाश की यातायात व्यवस्था से जुड़ा है।

छोटा रास्ता यानी कम ऊँचाई

छोटी दूरी की उड़ानें हर बार 35,000 फीट तक नहीं जातीं। यदि दिल्ली से बहुत निकट के शहर की उड़ान है, तो विमान को ऊपर चढ़ने और फिर लगभग तुरंत उतरना शुरू करने का कोई अर्थ नहीं हो सकता। चढ़ाई में समय और ईंधन लगता है। इसलिए मार्ग छोटा होने पर कम क्रूज़ ऊँचाई अधिक व्यावहारिक हो सकती है। इसके उलट लंबी अंतरमहाद्वीपीय उड़ान में ऊँचा और धीरे-धीरे बढ़ता क्रूज़ स्तर काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि कई घंटे ईंधन बचत का लाभ मिलता रहता है।

विमान का मॉडल भी रखता है मायने

विमान का प्रकार भी फर्क पैदा करता है। सामान्य संकीर्ण-धड़ वाले Boeing 737 या Airbus A320 परिवार और लंबी दूरी वाले Boeing 787 या Airbus A350 की अधिकतम परिचालन ऊँचाइयाँ और सबसे अनुकूल क्रूज़ व्यवहार समान नहीं होते। व्यावसायिक जेट प्रायः मध्य-30 हजार फीट क्षेत्र में मिलेंगे। लेकिन कुछ मॉडल 40,000 फीट से ऊपर भी प्रमाणित हैं। छोटे पिस्टन विमान इतनी ऊँचाई पर सामान्यतः नहीं जाते क्योंकि उनके इंजन, केबिन दबाव और वायुगतिकीय डिजाइन अलग हैं।

निजी व्यावसायिक जेट कभी-कभी यात्री विमानों से भी ऊपर, 40,000 से 50,000 फीट के आसपास उड़ सकते हैं। उनके लिए ऊँचा उड़ना व्यस्त वाणिज्यिक यातायात और मौसम के कुछ हिस्सों से ऊपर जाने तथा लंबी दूरी की दक्षता में लाभ दे सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए विमान को उसी प्रकार प्रमाणित और निर्मित होना पड़ता है।

दूसरी ओर Concorde जैसे सुपरसोनिक यात्री विमान लगभग 50,000 से 60,000 फीट के क्षेत्र में उड़ते थे क्योंकि उनकी गति और वायुगतिकीय आवश्यकताएँ पूरी तरह अलग थीं। इसलिए 35,000 फीट प्रकृति द्वारा सभी विमानों के लिए बनाई गई कोई सीमा नहीं है। वह आज के सामान्य उपध्वनिक यात्री जेट की अभियांत्रिकी और अर्थशास्त्र से निकला सुविधाजनक क्षेत्र है।

ऊँचाई पर पक्षी होते हैं?

एक और रोचक प्रश्न है कि पक्षी सामान्यतः इतनी ऊँचाई पर क्यों नहीं दिखाई देते? अधिकांश पक्षी नीचे उड़ते हैं। लेकिन कुछ प्रवासी पक्षी अत्यंत ऊँचाई तक पहुँच सकते हैं। फिर भी 30,000–40,000 फीट क्षेत्र में पक्षियों से टकराने का जोखिम हवाई अड्डों और कम ऊँचाइयों की तुलना में बहुत कम होता है। विमान के लिए ऊँचा क्रूज़ इस दृष्टि से भी अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण है। इसके अलावा, क्या 35,000 फीट पर बादल नहीं होते? यह भी गलत है। ऊँचे सिरस बादल और बड़े तूफानी बादल वहाँ मौजूद हो सकते हैं। लेकिन पृथ्वी के बहुत से निचले मौसम तंत्र उस स्तर के नीचे होते हैं। इसीलिए खिड़की से कई बार नीचे बादलों की विशाल चादर दिखाई देती है और विमान उसके ऊपर साफ धूप में उड़ रहा होता है।

विमान इतनी ऊँचाई पर तेज क्यों लगता है जबकि नीचे जमीन धीरे चलती दिखाई देती है? सामान्य यात्री जेट लगभग 800–950 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास वास्तविक गति से उड़ सकता है। लेकिन जमीन 10 किलोमीटर से अधिक नीचे होने के कारण दृष्टि का कोण बहुत धीमे बदलता है। उसी विमान को हवाई अड्डे के पास 1,000 फीट पर देखें तो वह बहुत तेजी से गुजरता हुआ दिखाई देगा।

35,000 फीट के आसपास ध्वनि की गति भी समुद्र तल से अलग होती है क्योंकि वह मुख्यतः तापमान पर निर्भर करती है। जेट विमान इसलिए अपनी ऊँची क्रूज़ गति को अक्सर केवल किलोमीटर प्रति घंटा में नहीं बल्कि Mach संख्या में भी देखते हैं। उदाहरण के लिए Mach 0.78 या 0.85 का अर्थ स्थानीय ध्वनि गति का 78 या 85 प्रतिशत है। विमान को अपनी अधिकतम सुरक्षित Mach सीमा के भीतर रहना होता है। इसीलिए क्रूज़ ऊँचाई का चुनाव एक साथ अनेक गणनाओं का परिणाम है—विमान कितना भारी है, किस गति पर उड़ना है, बाहर का तापमान क्या है, हवा कैसी है, किस ऊँचाई पर turbulence है, ऊपर कौन-सा विमान है, इंजन कितना जोर दे सकता है और यात्रा में कितना ईंधन बच सकता है।

पहली ज्यादा ऊँचाई पर नहीं उड़ते थे विमान

आधुनिक विमान का उड़ान प्रबंधन कंप्यूटर इन चीजों को लगातार ध्यान में रख सकता है और चालक दल को अनुकूल ऊँचाई की जानकारी देता है। पायलट फिर ATC से नई ऊँचाई मांग सकता है। इसलिए एक लंबे मार्ग पर विमान का क्रूज़ स्तर स्थिर संख्या के बजाय लगातार अनुकूलित रणनीति भी हो सकता है। 35,000 फीट की कहानी में एक और ऐतिहासिक पहलू महत्वपूर्ण है। शुरुआती यात्री विमान इतने ऊपर नहीं उड़ते थे। पिस्टन इंजन वाले विमान सामान्यतः कम ऊँचाई पर उड़ते थे और यात्रियों के लिए दबावयुक्त केबिन का विकास धीरे-धीरे हुआ। जेट युग आने पर विमानों की गति और ऊँचाई दोनों बढ़ीं। दबावयुक्त धड़, अधिक शक्तिशाली जेट इंजन और बेहतर मौसम तथा वायु यातायात प्रणालियों ने 30–40 हजार फीट क्षेत्र को वाणिज्यिक उड़ान का सामान्य हिस्सा बना दिया।

इसके बाद ICAO और राष्ट्रीय नियामकों ने बढ़ते यातायात को व्यवस्थित करने के लिए मानक दबाव स्तर, ऊर्ध्व दूरी और हवाई मार्गों की प्रणाली विकसित की। बाद में ऊँचाई मापने वाले उपकरण अधिक सटीक हुए तो RVSM से FL290–FL410 के बीच 1,000 फीट का अंतर सुरक्षित रूप से संभव हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि उसी आकाश में अधिक विमान अपनी ईंधन-दक्ष ऊँचाइयों पर उड़ सकते हैं।

इसलिए यदि प्रश्न पूछा जाए कि ‘35,000 फीट किसने तय किया?’ तो सबसे सही उत्तर है -किसी ने भी इसे अकेली निर्धारित क्रूज़ ऊँचाई के रूप में तय नहीं किया। यह आधुनिक जेट विमान की वायुगतिकी, इंजन दक्षता, दबावयुक्त केबिन, संरचनात्मक सीमाओं और मौसम के संयुक्त प्रभाव से स्वाभाविक रूप से उपयोगी क्षेत्र बना। ICAO और राष्ट्रीय विमानन संस्थाओं ने इस क्षेत्र में कौन-से उड़ान स्तर इस्तेमाल होंगे और विमान आपस में कितनी दूरी रखेंगे, उसके नियम मानकीकृत किए।

अर्थात विज्ञान ने लगभग 35,000 फीट को ‘उपयोगी’ बनाया और विमानन नियमों ने FL350 जैसे स्तर को ‘व्यवस्थित’ बनाया।इसे एक सरल उदाहरण में समझिए। किसी कार के लिए 60–80 किलोमीटर प्रति घंटा बहुत परिस्थितियों में ईंधन की दृष्टि से अच्छा गति क्षेत्र हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी वैज्ञानिक ने घोषणा की कि हर कार ठीक 70 पर ही चलेगी। सड़क की सीमा, ट्रैफिक, इंजन और यात्रा तय करते हैं कि वास्तविक गति क्या होगी। उसी तरह 35,000 फीट आधुनिक यात्री जेट का लोकप्रिय ‘आरामदायक आर्थिक क्षेत्र’ है, सार्वभौमिक आदेश नहीं।

और शायद इसी कारण अगली बार उड़ान की स्क्रीन पर Altitude: 35,000 ft दिखाई दे तो उसे एक मनमानी संख्या समझने के बजाय हजारों इंजीनियरिंग समझौतों का परिणाम माना जा सकता है। नीचे की हवा बहुत घनी है तो ईंधन अधिक खर्च होगा। बहुत ऊपर की हवा अत्यधिक पतली है तो उठान, इंजन, दबाव और गति की सुरक्षित सीमा कठिन हो जाएगी। बीच का लगभग 30–40 हजार फीट क्षेत्र आधुनिक जेट के लिए उत्कृष्ट संतुलन बनाता है।

इसलिए विमान 35,000 फीट पर इसलिए नहीं उड़ता कि वहाँ कोई अदृश्य ‘आसमान की सड़क’ बनी है। वह वहाँ इसलिए उड़ता है क्योंकि उस ऊँचाई के आसपास हवा इतनी पतली है कि प्रतिरोध और ईंधन खर्च कम हो, फिर भी इतनी पर्याप्त है कि विमान सुरक्षित और कुशलता से उड़ सके। और FL350 जैसी ऊँचाइयों को अंतरराष्ट्रीय विमानन व्यवस्था ने मानकीकृत उड़ान स्तरों के रूप में संगठित कर दिया है। यही 35,000 फीट की असली कहानी है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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