Dhanteras Gold Buying: धनतेरस पर महंगी खरीदारी जरूरी नहीं, जानिए इस परंपरा के पीछे छिपा असली संदेश

Dhanteras Gold Buying: धनतेरस पर सोना, चाँदी, तांबा और पीतल खरीदने की परंपरा क्यों है? जानिए भगवान धन्वंतरि, समुद्र मंथन, अर्थव्यवस्था और धातुओं के वैज्ञानिक गुणों का पूरा सच।

Yogesh Mishra
Published on: 31 Oct 2026 12:04 PM IST
Dhanteras Gold Buying | Why Buy Gold on Dhanteras | Dhanteras Silver Buying | Newstrack Hindi
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Dhanteras Gold Buying: दीपावली से पहले आने वाली धनतेरस पर करोड़ों भारतीय परिवार कुछ न कुछ नया खरीदते हैं। कहीं सोने का सिक्का आता है, कहीं चाँदी का बर्तन, तो कहीं पीतल, ताँबे या स्टील की छोटी-सी कटोरी। मान्यता है कि इस दिन धातु खरीदने से घर में लक्ष्मी का आगमन होता है और समृद्धि बढ़ती है।

लेकिन सवाल है कि धनतेरस पर धातु ही क्यों खरीदी जाती है? अनाज, वस्त्र या दूसरी उपयोगी वस्तुओं के बजाय सोना, चाँदी, ताँबा और पीतल को इतना महत्त्व क्यों मिला? क्या इसके पीछे विज्ञान है, अर्थशास्त्र है या केवल धार्मिक विश्वास?

दरअसल, इस परंपरा की कई परतें हैं। इसमें समुद्र मंथन से प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि और उनके अमृतकलश की पौराणिक कथा है, यमदीपदान की लोकमान्यता है, धातुओं को संपत्ति के रूप में संचित करने की आर्थिक परंपरा है और कुछ धातुओं के वास्तविक वैज्ञानिक गुण भी हैं। हालाँकि इनमें से कोई तथ्य यह साबित नहीं करता कि किसी खास दिन धातु खरीदने से धन अपने आप बढ़ता है या बीमारियाँ दूर होती हैं।

धनतेरस का धन्वंतरि और अमृतकलश से क्या संबंध है?

धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। 'तेरस' का अर्थ चंद्र मास की तेरहवीं तिथि है। इस पर्व का संबंध भगवान धन्वंतरि से है, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपरा में देवताओं का वैद्य और आयुर्वेद का अधिष्ठाता माना जाता है।

समुद्र मंथन की पौराणिक कथा में धन्वंतरि के अमृतकलश लेकर प्रकट होने का वर्णन मिलता है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में समुद्र मंथन तथा धन्वंतरि से जुड़ी कथाएँ हैं। धनतेरस पर उनके प्राकट्य का स्मरण किया जाता है। इसलिए यह पर्व केवल धन-संपत्ति ही नहीं, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से भी जुड़ा है।

धन्वंतरि के हाथ में अमृतकलश और धनतेरस पर धातु के बर्तन खरीदने की परंपरा के बीच प्रतीकात्मक संबंध दिखाई देता है। कलश भारतीय धार्मिक जीवन में पूर्णता, जीवन, जल और समृद्धि का प्रतीक रहा है।

हालाँकि यह प्रमाणित नहीं है कि आज की तरह बाजार से धातु के बर्तन खरीदने की प्रथा उसी समय शुरू हुई थी, जब समुद्र मंथन की कथा प्रचलित हुई। अमृतकलश इस परंपरा का धार्मिक प्रतीक जरूर है, लेकिन उसकी ऐतिहासिक शुरुआत का निश्चित समय उपलब्ध प्रमाणों से स्थापित नहीं होता।

यमराज और सोने-चाँदी से जुड़ी लोककथा

धनतेरस से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा राजा हिमा के पुत्र की है। कहा जाता है कि राजकुमार की मृत्यु विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से होनी तय थी। यह जानकर उसकी पत्नी ने उस रात उसे सोने नहीं दिया।

उसने घर के प्रवेश द्वार पर सोने-चाँदी के आभूषण और सिक्के रख दिए, चारों ओर दीप जलाए और रातभर अपने पति को कहानियाँ सुनाती रही। लोककथा के अनुसार, जब यमराज साँप के रूप में वहाँ पहुँचे, तो दीपों और आभूषणों की चमक से उनका ध्यान भटक गया। सुबह होने तक राजकुमार की मृत्यु का समय निकल गया।

इस कथा को धनतेरस पर दीपदान और सोने-चाँदी की शुभता से जोड़ा जाता है। इसके अलग-अलग क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। लेकिन यह धार्मिक लोककथा है, ऐतिहासिक घटना या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं। इसका सांस्कृतिक संदेश प्रकाश, सतर्कता और जीवन की रक्षा से जुड़ा है।

धातु ही क्यों? इसके पीछे अर्थव्यवस्था की भूमिका

धनतेरस पर धातु खरीदने की परंपरा को समझने में धातुओं के आर्थिक गुण भी महत्त्वपूर्ण हैं। मिट्टी के बर्तन टूट सकते हैं और लकड़ी समय के साथ खराब हो सकती है, लेकिन कई धातुएँ लंबे समय तक टिकती हैं। उन्हें पिघलाकर नई वस्तुएँ बनाई जा सकती हैं और उनका मूल्य भी बना रह सकता है।

सोना इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। वह सामान्य परिस्थितियों में आसानी से जंग नहीं खाता, दुर्लभ है और उसे नए आभूषणों या दूसरी वस्तुओं में ढाला जा सकता है। इसी कारण दुनिया की अनेक सभ्यताओं में वह मुद्रा, आभूषण और संपत्ति के रूप में इस्तेमाल हुआ।

चाँदी का उपयोग भी सिक्कों, आभूषणों और पात्रों में होता रहा है। ताँबा और पीतल घरेलू बर्तनों तथा उपकरणों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

भारतीय परिवारों में सोना-चाँदी पीढ़ियों तक सुरक्षित रखी जाने वाली संपत्ति रहे हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें बेचा या गिरवी रखा जा सकता है। इसलिए त्योहार पर धातु खरीदने की परंपरा के पीछे संपत्ति-संचय की व्यावहारिक मानसिकता भी हो सकती है। यह एक संभावित सामाजिक-आर्थिक व्याख्या है। उपलब्ध प्रमाण यह निश्चित नहीं करते कि धनतेरस पर धातु खरीदने की प्रथा केवल इसी कारण शुरू हुई थी।

सोना हजारों वर्षों से संपत्ति का प्रतीक क्यों है?

सोने की उपयोगिता उसकी चमक तक सीमित नहीं है। यह सामान्य परिस्थितियों में हवा और पानी से आसानी से खराब नहीं होता। यह अत्यंत आघातवर्धनीय और तन्य धातु है मतलब ये कि इसे पीटकर पतली चादर और खींचकर महीन तार बनाया जा सकता है। इसकी दुर्लभता, टिकाऊपन और उपयोगिता ने इसे आर्थिक महत्त्व दिया। भारत में सोने के आभूषण पारिवारिक संपत्ति का हिस्सा भी रहे हैं। बैंकिंग सेवाओं की सीमित पहुँच वाले दौर में इन्हें जरूरत पड़ने पर बेचने या गिरवी रखने का विकल्प मिलता था।

लेकिन सोना हमेशा लाभदायक निवेश होगा, इसकी गारंटी नहीं है। इसकी कीमत बाजार के अनुसार बदलती रहती है। आभूषणों पर मेकिंग चार्ज और दूसरे खर्च भी लगते हैं, जिनकी पूरी वसूली दोबारा बेचने पर नहीं हो सकती। इसलिए धनतेरस पर सोना खरीदने से समृद्धि निश्चित रूप से बढ़ेगी, यह धार्मिक विश्वास हो सकता है; आर्थिक लाभ का निर्धारण कीमत, शुद्धता, लागत और बाजार की परिस्थितियाँ करती हैं।

चाँदी और ताँबे के पीछे कितना विज्ञान है?

चाँदी के कुछ आयन और यौगिक सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी गुण के कारण आधुनिक चिकित्सा में कुछ विशेष चाँदी-युक्त ड्रेसिंग और उत्पादों का नियंत्रित उपयोग होता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि घर में रखी चाँदी की कटोरी में भोजन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है या बीमारियाँ दूर होती हैं। चिकित्सकीय उत्पादों और सामान्य चाँदी के बर्तनों के उपयोग तथा प्रभाव में अंतर है।

ताँबा भी वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगी धातु है। यह ऊष्मा और विद्युत का अच्छा चालक है। कुछ परिस्थितियों में इसकी सतह पर जीवाणुओं की संख्या घट सकती है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने परीक्षण किए गए कुछ ताँबा-मिश्रधातु सतह उत्पादों के जीवाणुरोधी दावों को मान्यता दी है।

लेकिन ताँबे की सतह सामान्य सफाई और संक्रमण नियंत्रण का विकल्प नहीं है। इसी तरह ताँबे के पात्र में रखा पानी हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त नहीं हो जाता। ताँबा आर्सेनिक, फ्लोराइड और कीटनाशकों जैसे सभी प्रदूषकों को हटाने वाला जलशोधक नहीं है।

ताँबा शरीर के लिए आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा नुकसान पहुँचा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के पेयजल दिशानिर्देशों में ताँबे की सीमा 2 मिलीग्राम प्रति लीटर निर्धारित है। इसलिए ताँबे और चाँदी के कुछ वास्तविक वैज्ञानिक गुणों को स्वीकार करना चाहिए, लेकिन उनसे जुड़े अतिरंजित स्वास्थ्य दावों को नहीं।

ताँबे और पीतल के बर्तनों में क्या सावधानी जरूरी है?

धनतेरस पर ताँबे या पीतल के बर्तन खरीदते समय यह जानना जरूरी है कि उनमें हर तरह का भोजन नहीं रखा जा सकता। नींबू, सिरका, टमाटर और दूसरे अम्लीय खाद्य पदार्थों के संपर्क में ताँबे और पीतल से धातु के घटक भोजन में घुल सकते हैं। इसी कारण परंपरागत रूप से कई बर्तनों के भीतर टिन की परत यानी कलई की जाती रही है।

अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन के फूड कोड में भी ताँबे और पीतल जैसी धातुओं का अम्लीय खाद्य पदार्थों के सीधे संपर्क में उपयोग सीमित किया गया है।

इसलिए ऐसे बर्तन खरीदते समय उनकी बनावट, आंतरिक परत और उपयोग की जानकारी लेना जरूरी है। पूजा के पात्र और खाना पकाने के बर्तन की आवश्यकताएँ अलग हो सकती हैं।

पीतल मुख्यतः ताँबे और जस्ते की मिश्रधातु है। इसकी सुनहरी चमक, टिकाऊपन और ढालने की सुविधा ने इसे भारतीय घरों में लोकप्रिय बनाया। इससे लोटे, थालियाँ, कलश, दीपक और पूजा-पात्र बनाए जाते रहे हैं। लेकिन इसकी चमक को सोने के गुणों के समान नहीं समझना चाहिए। खाद्य उपयोग के लिए इसकी संरचना और सतह की स्थिति महत्त्वपूर्ण है।

लोहे और स्टील का क्या महत्त्व है?

धनतेरस पर अलग-अलग धातुओं को लेकर क्षेत्रीय मान्यताएँ अलग हैं। कुछ परिवार लोहा खरीदने से परहेज करते हैं, जबकि कहीं लोहे के औजार और दूसरे उपयोगी सामान भी खरीदे जाते हैं। स्टील के बर्तन भी अनेक परिवारों में सामान्य विकल्प हैं।

स्टेनलेस स्टील मुख्यतः लोहे पर आधारित मिश्रधातु है, जिसमें क्रोमियम और कभी-कभी निकेल जैसे तत्व होते हैं। क्रोमियम की वजह से इसकी सतह पर सुरक्षात्मक परत बनती है, जो जंग का प्रतिरोध बढ़ाती है।

खाद्य उपयोग के लिए उपयुक्त ग्रेड का स्टेनलेस स्टील टिकाऊ, साफ करने में आसान और रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए व्यावहारिक है। आर्थिक क्षमता के अनुसार स्टील का छोटा बर्तन खरीदना भी इस परंपरा का हिस्सा हो सकता है। धनतेरस का अर्थ महँगी खरीदारी या धन का प्रदर्शन होना जरूरी नहीं है।

क्या धातु खरीदने से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है?

धार्मिक मान्यता में धातुओं को शुभता और समृद्धि से जोड़ा जाता है। लेकिन विज्ञान में ऊर्जा का अर्थ निश्चित है। उसे मापा जा सकता है और वह ऊष्मा, प्रकाश, गति या विद्युत जैसे रूपों में मौजूद होती है। धनतेरस पर धातु खरीदने से घर में कोई अदृश्य सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जो धन या स्वास्थ्य बढ़ा देती है, इसका विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि त्योहार से जुड़ी आस्था का कोई महत्त्व नहीं। परिवार के साथ खरीदारी, पूजा और उत्सव की खुशी सांस्कृतिक तथा भावनात्मक अनुभव हैं। उन्हें वैज्ञानिक नियम साबित करने की जरूरत नहीं है।

धनतेरस का मनोवैज्ञानिक और आर्थिक पक्ष

त्योहारों पर खरीदी जाने वाली वस्तुएँ केवल अपनी उपयोगिता या बाजार मूल्य के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं होतीं। कई बार वे परिवार की स्मृतियों और परंपराओं से जुड़ जाती हैं। धनतेरस पर खरीदा गया छोटा चाँदी का सिक्का, पूजा का पात्र या घरेलू बर्तन आने वाली पीढ़ियों के लिए पारिवारिक याद बन सकता है। साझा अनुष्ठान परिवार और समुदाय की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने में भी भूमिका निभाते हैं।

आर्थिक दृष्टि से सोना-चाँदी भारतीय परिवारों में बचत और संपत्ति-संचय के पारंपरिक साधन रहे हैं। लेकिन सोना नियमित ब्याज या लाभांश नहीं देता और उसकी कीमत घट-बढ़ सकती है। आभूषणों में मेकिंग चार्ज जैसे अतिरिक्त खर्च भी होते हैं। केवल धार्मिक दबाव या दुर्भाग्य के डर से महँगी खरीदारी करना समझदारी नहीं है। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खरीदारी करना ही बेहतर है।

क्या धनतेरस पर धातु खरीदना अनिवार्य है?

धनतेरस पर धन्वंतरि पूजा, लक्ष्मी-कुबेर पूजन और यमदीपदान जैसी परंपराएँ प्रचलित हैं। धातु के बर्तन, सिक्के, झाड़ू या दूसरी घरेलू वस्तुएँ खरीदना कई क्षेत्रों में लोकाचार का हिस्सा है। लेकिन ऐसा कोई सार्वभौमिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर व्यक्ति को इस दिन सोना या चाँदी खरीदना ही चाहिए। कुछ परिवार केवल पूजा और दीपदान करते हैं, तो कुछ अपनी सामर्थ्य के अनुसार छोटी घरेलू वस्तु खरीदते हैं। यह कहना कि धनतेरस पर सोना नहीं खरीदने से लक्ष्मी नाराज हो जाएँगी या दुर्भाग्य आएगा, भय पैदा करने वाली व्याख्या है। आस्था का पालन महँगी खरीदारी पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

धन्वंतरि और राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस का संबंध

धनतेरस का धन्वंतरि से संबंध इतना महत्त्वपूर्ण है कि भारत सरकार ने 2016 से राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस धन्वंतरि जयंती यानी धनतेरस पर मनाना शुरू किया था।

हालाँकि 2025 में इस व्यवस्था में बदलाव किया गया। आयुष मंत्रालय के अनुसार अब राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस प्रतिवर्ष 23 सितंबर को मनाया जाता है। इसका एक कारण धनतेरस की तारीख का चंद्र पंचांग के अनुसार हर वर्ष बदलना बताया गया, जिससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजन की योजना बनाना कठिन होता था।

इसलिए धन्वंतरि जयंती का पारंपरिक धार्मिक आयोजन धनतेरस से जुड़ा है, जबकि सरकारी राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस अब 23 सितंबर को मनाया जाता है।

धनतेरस पर सोना-चाँदी खरीदते समय क्या सावधानी रखें?

यदि आप धनतेरस पर सोना या चाँदी खरीद रहे हैं, तो शुद्धता और कीमत की पारदर्शिता पर ध्यान दें। भारत में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की हॉलमार्किंग व्यवस्था कीमती धातुओं की शुद्धता की जाँच में मदद करती है। हॉलमार्क वाले सोने के आभूषण पर BIS चिह्न, शुद्धता का विवरण और छह अंकों का अल्फान्यूमेरिक HUID नंबर होता है। इसे BIS Care ऐप की 'Verify HUID' सुविधा से जाँचा जा सकता है।

खरीदते समय बिल में वजन, शुद्धता और कीमत स्पष्ट होनी चाहिए। आभूषणों के मेकिंग चार्ज और अन्य शुल्क भी समझें। निवेश के लिए खरीदे जाने वाले सोने और पहनने के आभूषण की लागत तथा पुनर्बिक्री की शर्तें अलग हो सकती हैं। आस्था के साथ आर्थिक सावधानी रखना भी जरूरी है।

कुलमिलाकर, धनतेरस पर धातु खरीदने को न तो केवल अंधविश्वास कहकर खारिज करना उचित है और न ही उसे विज्ञान से प्रमाणित समृद्धि का उपाय बताना। इसे आस्था, सांस्कृतिक स्मृति और आर्थिक व्यवहार के मेल के रूप में समझना अधिक सही है।

आखिरकार, धनतेरस पर सोना खरीदना आस्था हो सकती है, ताँबे का पात्र लेना उपयोगिता का निर्णय और अपनी आय के अनुसार बचत करना आर्थिक विवेक। परंपरा का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसके साथ तथ्य और समझदारी भी बनी रहे।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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