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Why Do We Dream: हमें सपने क्यों आते हैं? सपने क्यों भूल जाते हैं? जानिए विज्ञान का रहस्य
Why Do We Dream: हमें सपने क्यों आते हैं और सुबह उठते ही कुछ सपने क्यों भूल जाते हैं? जानिए REM नींद, दिमाग, याददाश्त, डरावने सपनों और सपनों के रहस्य के पीछे छिपा विज्ञान।
Why Do We Dream
Why Do We Dream: रात में आप बिस्तर पर जाते हैं। आँखें बंद होती हैं, शरीर आराम कर रहा होता है और बाहर की दुनिया से संपर्क काफी कम हो जाता है। फिर अचानक आप खुद को किसी ऐसी जगह पाते हैं, जहाँ आप शायद कभी गए ही नहीं। सामने कोई पुराना दोस्त खड़ा है। कभी कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई देता है जो वर्षों पहले गुजर चुका है। कभी आप हवा में उड़ रहे होते हैं, कभी बहुत तेज भाग रहे होते हैं लेकिन पैर आगे नहीं बढ़ रहे होते। कभी परीक्षा छूट जाती है, कभी आप किसी अनजान शहर में रास्ता भूल जाते हैं।
फिर अचानक नींद खुलती है। कुछ सेकंड तक सपना बिल्कुल साफ याद रहता है। लेकिन जैसे-जैसे आप जागते हैं, चेहरे धुंधले पड़ने लगते हैं, जगह याद नहीं रहती और कुछ ही मिनटों में पूरी कहानी गायब हो जाती है।
आखिर ऐसा क्यों होता है?
हम सपने क्यों देखते हैं? सपना बनता कहाँ है? क्या हर सपना हमारी किसी छिपी हुई इच्छा या डर का संकेत होता है? क्या सपने भविष्य की कोई झलक दिखा सकते हैं? और सबसे बड़ा सवाल, जब हम सो रहे होते हैं और आँखें बंद होती हैं, तब हमारा दिमाग इतनी वास्तविक दुनिया आखिर बनाता कैसे है? आधुनिक विज्ञान ने इन सवालों के कई जवाब खोजे हैं, लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह अनसुलझा है, हम सपने देखते ही क्यों हैं?
नींद में दिमाग बंद नहीं होता, बल्कि उसका काम करने का तरीका बदल जाता है
सोने का मतलब यह नहीं कि दिमाग भी बंद हो गया। नींद के दौरान दिमाग कई महत्वपूर्ण काम करता रहता है। दिनभर मिली सूचनाओं को व्यवस्थित करना, कुछ यादों को मजबूत करना, भावनात्मक अनुभवों को संसाधित करना और शरीर की कई जैविक प्रक्रियाओं को संतुलित करना नींद का हिस्सा है। इसी दौरान सपने भी आते हैं। लेकिन सपना बाहर की दुनिया से आने वाला कोई वास्तविक दृश्य नहीं है। जब आप सपने में अपने सामने किसी व्यक्ति को देखते हैं, तो आपकी आँख उस व्यक्ति की तस्वीर नहीं देख रही होती। वह व्यक्ति आपके दिमाग में बन रहा होता है। यानी सपने को समझने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि सपना आँखों से नहीं, सोते हुए दिमाग से बनता है। और यही बात सपनों को इतना रहस्यमय बनाती है।
सपनों की वैज्ञानिक कहानी कहाँ से शुरू हुई?
सपनों के बारे में इंसान हजारों साल से सोचता रहा है। लेकिन वैज्ञानिक तरीके से नींद और सपनों का अध्ययन अपेक्षाकृत नया है। 1950 के दशक में नींद के अध्ययन में एक बड़ा बदलाव आया। 1953 में यूजीन एसेरिंस्की और नाथेनियल क्लाइटमैन ने नींद के दौरान आँखों की तेज गति वाले एक खास चरण की पहचान की। इसे बाद में आरईएम यानी तीव्र नेत्र-गति वाली नींद कहा गया। इस अवस्था में बंद पलकों के पीछे आँखें तेजी से हिलती हैं। दिमाग की विद्युत गतिविधि भी कुछ हद तक जागने जैसी दिखाई दे सकती है, जबकि शरीर की अधिकांश बड़ी मांसपेशियाँ बहुत कम सक्रिय रहती हैं। बाद के प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने लोगों को नींद के अलग-अलग चरणों से जगाया और उनसे पूछा कि वे क्या अनुभव कर रहे थे। इससे पता चला कि आरईएम नींद से जगाए गए लोगों में सपने याद होने की संभावना काफी अधिक होती है।
पहले माना जाता था कि सपना केवल आरईएम नींद में आता है। अब वैज्ञानिक जानते हैं कि ऐसा नहीं है। गैर-आरईएम नींद में भी सपने या सपने जैसे मानसिक अनुभव हो सकते हैं। अंतर यह है कि आरईएम अवस्था में सपने आम तौर पर ज्यादा जीवंत, भावनात्मक, दृश्य और कहानी जैसे होते हैं। इसलिए यह कहना ज्यादा सही है कि हम पूरी रात अलग-अलग तरह के सपने या मानसिक अनुभव कर सकते हैं, लेकिन रात के कुछ चरणों में सपने अधिक स्पष्ट और जटिल हो जाते हैं।
सपना बनता कहाँ है? दिमाग में कोई ‘सपना केंद्र’ नहीं है
अगर पूछा जाए कि दिमाग में सपना कहाँ बनता है, तो इसका आसान लेकिन गलत जवाब होगा – ‘दिमाग के इस हिस्से में।‘ वास्तव में ऐसा कोई एक ‘सपना केंद्र’ नहीं है जो रात में चालू होकर आपके लिए कहानी बनाना शुरू कर देता हो। सपना कई मस्तिष्क क्षेत्रों की संयुक्त गतिविधि का परिणाम होता है। आरईएम नींद के दौरान भावनाओं और स्मृतियों से जुड़े क्षेत्र सक्रिय रह सकते हैं। दृश्य अनुभव से जुड़े मस्तिष्क के पिछले हिस्से भी सक्रिय होते हैं। दूसरी ओर, जागते समय तर्क, योजना और गलत बात को पहचानने में मदद करने वाले मस्तिष्क के कुछ अग्र भाग आरईएम के दौरान अपेक्षाकृत कम सक्रिय हो सकते हैं। यही कारण है कि सपनों में अजीब चीजें हमें अजीब नहीं लगतीं। मान लीजिए सपने में आपका बचपन का घर अचानक आपका कार्यालय बन गया। कमरे में आपका स्कूल का शिक्षक बैठा है और बाहर आप ऐसी सड़क पर हैं जो आपके शहर में है ही नहीं।
जागते समय दिमाग तुरंत पूछेगा, “यह कैसे संभव है?” सपने में ऐसा सवाल अक्सर आता ही नहीं। आप बस उस दुनिया को स्वीकार कर लेते हैं।
सपने में असंभव चीजें सामान्य क्यों लगती हैं?
सपने में आप उड़ सकते हैं। किसी मृत व्यक्ति से बात कर सकते हैं। किसी अजनबी को अपना बहुत पुराना दोस्त समझ सकते हैं। एक जगह अचानक दूसरी जगह बदल सकती है। उम्र, समय और पहचान तक बदल सकती है। फिर भी सपने के भीतर हमें यह सब सामान्य लगता है। इसका एक कारण यह माना जाता है कि सपने के दौरान मस्तिष्क की भावनात्मक और दृश्य प्रणालियाँ काफी सक्रिय रहती हैं, जबकि तर्क और आत्म-निगरानी से जुड़े कुछ क्षेत्र जागने की अवस्था की तरह सक्रिय नहीं होते। इसलिए सपना हमें यह नहीं बताता कि यह असंभव है। वह बस अनुभव पैदा करता है। यही कारण है कि सपने में हम कई बार ऐसी कहानी को भी सच मान लेते हैं जिसे जागते हुए पांच सेकंड में बेतुका बता दें।
आखिर सपना बनता कैसे है?
यहाँ दिमाग किसी फिल्म निर्देशक की तरह काम करता हुआ दिखाई देता है, लेकिन वह बहुत अनुशासित निर्देशक नहीं है। हमारी दिनभर की गतिविधियाँ, पुरानी यादें, चेहरे, जगहें, डर, इच्छाएँ, चिंताएँ और भावनाएँ नींद के दौरान दोबारा सक्रिय हो सकती हैं। लेकिन दिमाग उन्हें वैसे ही नहीं चलाता जैसे कोई वीडियो दोबारा चलाया जाता है। वह अलग-अलग यादों के टुकड़ों को जोड़ सकता है। इसलिए सपना किसी पुराने स्कूल के दोस्त से शुरू होकर वर्तमान कार्यालय में पहुँच सकता है। आपके बचपन का घर किसी नए शहर में दिखाई दे सकता है। किसी वर्तमान चिंता में किसी पुरानी याद का चेहरा जुड़ सकता है। दूसरे शब्दों में, सपना अक्सर हमारी जिंदगी से जुड़ा होता है, लेकिन वह हमारी जिंदगी की हूबहू प्रति नहीं होता। यही वजह है कि सपने इतने अजीब लगते हैं।
क्या दिनभर की घटनाएँ हमारे सपनों में आती हैं?
सपनों के अध्ययन में एक विचार है जिसे जागृत जीवन की निरंतरता की धारणा कहा जा सकता है। इसका सामान्य अर्थ यह है कि सपनों की सामग्री हमारे जागते जीवन की चिंताओं, अनुभवों, रिश्तों और भावनाओं से किसी न किसी रूप में जुड़ी रहती है। अगर किसी व्यक्ति का दिन बहुत तनावपूर्ण रहा है, तो उसके सपने में तनाव दिखाई दे सकता है। परीक्षा की तैयारी कर रहा छात्र परीक्षा देने या देर हो जाने का सपना देख सकता है। किसी रिश्ते में परेशानी चल रही है तो उससे जुड़ी भावनाएँ सपने में किसी दूसरे दृश्य के रूप में आ सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सपने का एक सीधा अर्थ है। परीक्षा का सपना केवल परीक्षा की चिंता नहीं हो सकता। वह असफल होने, अपेक्षाओं पर खरा न उतरने या किसी बड़े दबाव की भावना से भी जुड़ा हो सकता है। यही कारण है कि सपनों के लिए एक सार्वभौमिक ‘शब्दकोश’ बनाना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
क्या सपने हमारी यादों को मजबूत करते हैं?
यह सवाल अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। नींद और स्मृति के बीच मजबूत संबंध है। नींद के दौरान दिनभर सीखी गई चीजों को व्यवस्थित और स्थिर करने की प्रक्रिया होती है। सपनों में भी हाल की घटनाओं और पुरानी यादों के टुकड़े दिखाई दे सकते हैं। इससे वैज्ञानिकों ने यह संभावना मानी है कि सपना स्मृति को व्यवस्थित करने वाली प्रक्रियाओं से जुड़ा हो सकता है। लेकिन एक सावधानी जरूरी है। यह कहना अभी सही नहीं होगा कि “सपने इसलिए आते हैं ताकि हमारी याददाश्त मजबूत हो।” हो सकता है सपने स्मृति से जुड़ी दूसरी प्रक्रियाओं के साथ-साथ पैदा होने वाला अनुभव हों। यह भी संभव है कि कुछ सपने कुछ तरह की स्मृति या भावनात्मक प्रसंस्करण में भूमिका निभाएँ, जबकि दूसरे सपनों का कोई अलग कारण हो। इसलिए विज्ञान फिलहाल सपनों को स्मृति से जोड़ता है, लेकिन उन्हें स्मृति मजबूत करने का एकमात्र कारण नहीं मानता।
क्या सपने हमारी भावनाओं को संभालने में मदद करते हैं?
यह भी एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संभावना है। आरईएम नींद में भावनाओं से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्र सक्रिय रह सकते हैं। इसलिए सपनों में डर, खुशी, शर्म, गुस्सा, प्रेम, चिंता और दुख जैसी भावनाएँ बहुत तीव्र महसूस हो सकती हैं। कुछ शोधों ने नींद, सपनों और भावनात्मक अनुभवों के बीच संबंध दिखाया है। इससे यह विचार सामने आया कि सपने शायद भावनात्मक अनुभवों को संसाधित करने में मदद करते हों। लेकिन इसे अभी अंतिम वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता। यानी सपना तनाव कम करने वाला कोई निश्चित ‘रात का उपचार’ नहीं है। बल्कि संभव है कि नींद और सपना भावनाओं से जुड़ी कई प्रक्रियाओं का हिस्सा हों।
हम गिरने, भागने या पीछा किए जाने के सपने क्यों देखते हैं?
सपनों में खतरे से जुड़े दृश्य बहुत सामान्य हैं। किसी से भागना, पीछा किया जाना, गिरना, हमला होना, रास्ता भटकना, परीक्षा में फँस जाना या किसी संकट से निकलने की कोशिश करना, ये अनुभव बहुत से लोगों को सपनों में होते हैं। इसी आधार पर ‘खतरे का अभ्यास’ नाम की एक वैज्ञानिक परिकल्पना सामने आई। इसके अनुसार सपने संभवतः दिमाग को संभावित खतरों की परिस्थितियों का मानसिक अभ्यास करने का मौका देते हैं। अगर मानव विकास के इतिहास को देखें तो खतरे को पहचानना और उससे बचने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण रही होगी। इसलिए यह संभव है कि सपनों में खतरे की स्थितियाँ किसी पुराने जैविक तंत्र से जुड़ी हों। लेकिन यह अभी सपनों का अंतिम उत्तर नहीं है। यह कई वैज्ञानिक सिद्धांतों में से एक है।
क्या सपना सिर्फ दिमाग का शोर है?
1970 के दशक में एलन हॉब्सन और रॉबर्ट मैककार्ली ने एक प्रसिद्ध सिद्धांत दिया जिसे सक्रियण-निर्माण सिद्धांत कहा गया। सरल भाषा में इसका विचार था कि आरईएम नींद में दिमाग के भीतर से कुछ संकेत सक्रिय होते हैं और मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा उन बिखरे संकेतों को अर्थ देने की कोशिश करता है। इससे सपने की कहानी बन सकती है। बाद के शोधों ने इस विचार को काफी बदल दिया। अब यह मानना मुश्किल है कि सपना केवल बेतरतीब तंत्रिका शोर है। सपनों में हमारी यादें, भावनाएँ और दिनभर के अनुभव व्यवस्थित रूप से दिखाई देते हैं। फिर भी इस सिद्धांत ने एक महत्वपूर्ण काम किया, इसने सपनों को अलौकिक संदेश की जगह दिमाग की जैविक गतिविधि के रूप में समझने की दिशा मजबूत की।
सुबह उठते ही सपना क्यों भूल जाते हैं?
यही शायद सपनों की सबसे बड़ी पहेली है। कई बार सपना इतना स्पष्ट होता है कि जागते ही लगता है कि पूरी फिल्म याद है। लेकिन दस मिनट बाद आधी कहानी गायब हो जाती है। और कुछ घंटे बाद शायद केवल इतना याद रहता है कि ‘आज कोई अजीब सपना आया था।‘ इसका एक कारण यह है कि नींद के दौरान दिमाग की रासायनिक और तंत्रिका गतिविधि जागने की अवस्था से अलग होती है। विशेष रूप से आरईएम नींद में कुछ ऐसी रासायनिक स्थितियाँ होती हैं जो सामान्य जागृत अवस्था जैसी स्थायी स्मृति बनाने के लिए आदर्श नहीं हैं। दूसरी वजह यह है कि सपना खत्म होने के तुरंत बाद हम जागते नहीं हैं। अगर सपना देखने के बाद आप नींद के अगले चरण में चले गए, तो उसकी स्मृति तेजी से कमजोर हो सकती है। इसके विपरीत अगर सपना देखते-देखते आपकी नींद खुल गई, तो उसके याद रहने की संभावना काफी बढ़ जाती है। यही कारण है कि सुबह का सपना कई बार रात के शुरुआती सपने से ज्यादा याद रहता है।
सुबह के सपने ज्यादा याद क्यों रहते हैं?
नींद पूरी होने के करीब आरईएम अवधि आम तौर पर लंबी होती जाती है। इसलिए रात के अंतिम हिस्से में आने वाले सपने अपेक्षाकृत लंबे और जटिल हो सकते हैं। अगर उसी दौरान आपकी आँख खुल जाए तो सपना सीधे जागृत चेतना में आ जाता है। इसीलिए कई लोगों को सुबह उठते ही सपना बहुत स्पष्ट याद रहता है। लेकिन थोड़ी देर बाद वह गायब हो जाता है। अगर आप सपना याद रखना चाहते हैं तो जागते ही कुछ क्षण उसी स्थिति में पड़े रहना, सपने को मन में दोहराना और तुरंत लिख लेना मदद कर सकता है। सपनों की डायरी रखने से भी सपना याद रखने की क्षमता बढ़ सकती है। इसका कारण कोई रहस्यमय शक्ति नहीं है। आप जिस अनुभव पर जागते ही ध्यान देते हैं, उसे स्मृति में रखने की संभावना बढ़ जाती है।
क्या कुछ लोगों को ज्यादा सपने आते हैं?
कुछ लोग बहुत सपने याद रखते हैं और कुछ लगभग कुछ भी याद नहीं रखते। इसका अर्थ यह नहीं कि कम सपने याद रखने वाला व्यक्ति सपने नहीं देखता। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि सपने याद रखने की क्षमता व्यक्ति की नींद की संरचना, जागने के समय, सपनों में रुचि और सामान्य मानसिक गतिविधियों जैसे कई कारकों से प्रभावित हो सकती है।
इसलिए ‘मुझे कभी सपना नहीं आता” का मतलब अक्सर यह होता है – ‘मुझे अपने सपने याद नहीं रहते।‘
बार-बार एक ही सपना क्यों आता है?
बहुत से लोग बार-बार परीक्षा छूटने, गिरने, भागने, दाँत टूटने या किसी पुराने व्यक्ति से मिलने जैसे सपने देखते हैं। इनके लिए कोई सार्वभौमिक वैज्ञानिक अर्थ तय नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के जीवन में कोई चिंता बार-बार बनी हुई है, तो वह अलग-अलग रूपों में सपनों में दिखाई दे सकती है। उदाहरण के लिए, परीक्षा का सपना केवल पढ़ाई से जुड़ा नहीं हो सकता। वह असफलता, सामाजिक दबाव या किसी काम में अपेक्षा पूरी न कर पाने की चिंता से भी जुड़ा हो सकता है। लेकिन यह कहना कि ‘दाँत टूटने का मतलब हमेशा पैसा जाना है’ या ‘साँप दिखने का मतलब निश्चित रूप से अमुक घटना होगी’ - वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। सपने को समझने में व्यक्ति की वास्तविक जिंदगी किसी भी कथित सार्वभौमिक प्रतीक से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
डरावने सपने क्यों आते हैं?
कभी-कभार दुःस्वप्न आना सामान्य है। तनाव, नींद की कमी, बहुत भावनात्मक घटनाएँ, आघात और कुछ दवाएँ दुःस्वप्न की संभावना बढ़ा सकती हैं। दुःस्वप्न तब समस्या बन सकते हैं जब वे बार-बार हों, नींद खराब करें या दिनभर के कामकाज पर असर डालें। ऐसे मामलों में चिकित्सकीय मदद ली जा सकती है। एक उपयोगी उपचार पद्धति है जिसमें बार-बार आने वाले दुःस्वप्न की कहानी को जागते समय एक कम डरावने अंत के साथ दोबारा लिखा जाता है और उसका अभ्यास किया जाता है। इसे कल्पना आधारित पुनराभ्यास चिकित्सा कहा जाता है। इसका उद्देश्य सपने को जादुई तरीके से रोकना नहीं, बल्कि मस्तिष्क को उस डरावने दृश्य के लिए एक नया मानसिक रास्ता देना है।
सपने में पता चल जाए कि सपना चल रहा है, यह कैसे संभव है?
इसे स्पष्ट स्वप्न कहा जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति सपना देखते हुए ही समझ जाता है कि ‘मैं सपना देख रहा हूँ।‘ कुछ लोग इसके बाद सपने की कहानी को कुछ हद तक बदल भी सकते हैं। यह केवल लोगों का दावा नहीं है। नींद प्रयोगशालाओं में प्रशिक्षित स्पष्ट स्वप्न देखने वाले लोगों ने आरईएम नींद के दौरान पहले से तय आँखों की गतिविधियों के जरिए शोधकर्ताओं को संकेत दिया है कि उन्हें सपना होने का बोध है। इससे पता चलता है कि स्पष्ट स्वप्न वास्तविक और वैज्ञानिक रूप से अध्ययन की जा सकने वाली घटना है। हालाँकि हर व्यक्ति इसे आसानी से नहीं कर सकता और सपने को पूरी तरह अपनी इच्छा से नियंत्रित करना भी संभव नहीं है।
नींद में शरीर बंद, लेकिन सपना चल रहा होता है
आरईएम नींद में दिमाग काफी सक्रिय हो सकता है, लेकिन शरीर की बड़ी मांसपेशियों की गतिविधि बहुत कम हो जाती है। यह जरूरी भी है। अगर हम सपने में दौड़ रहे हैं तो हमारा शरीर वास्तव में बिस्तर पर दौड़ने नहीं लगे, इसलिए मस्तिष्क शरीर की मांसपेशियों की गतिविधि को अस्थायी रूप से दबा देता है। लेकिन कभी-कभी जागने और आरईएम नींद के बीच यह तालमेल कुछ सेकंड के लिए बिगड़ जाता है।तब व्यक्ति को लगता है कि वह जाग चुका है, लेकिन शरीर हिल नहीं रहा। इसे नींद का लकवा कहा जाता है। इस दौरान कमरे में किसी व्यक्ति या परछाईं की मौजूदगी महसूस होना, किसी के दबाव का अनुभव होना या डरावने दृश्य दिखाई देना भी संभव है। यही अनुभव कई संस्कृतियों में भूत-प्रेत या किसी बाहरी शक्ति से जोड़ा गया है। लेकिन विज्ञान इसे नींद और जागने के बीच की मिश्रित अवस्था से समझाता है।
एक अलग नींद विकार में आरईएम नींद के दौरान मांसपेशियों की सामान्य निष्क्रियता कमजोर पड़ जाती है। तब व्यक्ति अपने सपने के अनुसार हाथ-पैर चला सकता है, बोल सकता है, चिल्ला सकता है या बिस्तर से गिर सकता है। इसे आरईएम नींद व्यवहार विकार कहा जाता है। यह सामान्य सपना नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के साथ बार-बार ऐसा हो रहा है तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है, क्योंकि इससे खुद या साथ सोने वाले व्यक्ति को चोट लग सकती है।
क्या मृत व्यक्ति सपने में क्यों दिखाई देते हैं?
शोक के दौरान ऐसा सपना आना काफी सामान्य अनुभव हो सकता है। जब कोई करीबी व्यक्ति हमारे जीवन से चला जाता है तो उसके साथ जुड़ी यादें, आवाज, चेहरा, बातचीत और भावनाएँ अचानक खत्म नहीं हो जातीं। मस्तिष्क लंबे समय तक उस व्यक्ति से जुड़ी स्मृतियों को संसाधित करता रहता है। इसलिए मृत माता-पिता, जीवनसाथी, मित्र या किसी अन्य करीबी व्यक्ति का सपने में बेहद वास्तविक दिखाई देना समझ में आता है। किसी व्यक्ति के लिए इस अनुभव का धार्मिक या आध्यात्मिक अर्थ भी हो सकता है। विज्ञान इतना जरूर कह सकता है कि स्मृति और भावनात्मक प्रसंस्करण इस तरह के सपनों को समझाने में सक्षम हैं। लेकिन किसी व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव का अर्थ विज्ञान प्रयोगशाला में तय नहीं कर सकता।
क्या सपने भविष्य की घटना बता सकते हैं?
लोग अक्सर कहते हैं कि उन्होंने किसी घटना को पहले सपने में देखा और बाद में वही घटना सच हो गई। लेकिन भविष्य बताने वाले सपनों के लिए अब तक ऐसा विश्वसनीय और बार-बार दोहराया जा सकने वाला वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, जिसके आधार पर सपनों को भविष्यवाणी की क्षमता माना जा सके। फिर ऐसा अनुभव इतना सच्चा क्यों लगता है? क्योंकि हम जिंदगी में बहुत सारे सपने देखते हैं और उनमें से अधिकांश भूल जाते हैं। अगर हजारों सपनों में से एक किसी बाद की घटना से मिल जाए तो वही सपना अचानक बहुत महत्वपूर्ण लगने लगता है। दूसरे सपने, जो किसी घटना से नहीं मिले, हमारी याद में रहते ही नहीं। इसके अलावा सपने अक्सर अस्पष्ट होते हैं। बाद में हुई घटना के बाद हमारा दिमाग पुराने सपने और नई घटना के बीच समानता खोज सकता है। इसलिए किसी सपने का बाद की घटना से मिल जाना अपने आप में भविष्यवाणी का प्रमाण नहीं है।
फिर सपनों में भविष्य जैसी चीजें क्यों दिखाई देती हैं?
क्योंकि दिमाग जागते समय भी लगातार भविष्य का अनुमान लगाता है।अगर किसी व्यक्ति को नौकरी जाने की चिंता है तो वह नौकरी से जुड़े सपने देख सकता है।अगर परिवार में कोई बीमार है तो बीमारी से जुड़े सपने आ सकते हैं।अगर परीक्षा नजदीक है तो परीक्षा का सपना आ सकता है।बाद में अगर कुछ वैसा ही हो गया तो सपना भविष्यवाणी जैसा लग सकता है।लेकिन वास्तव में वह पहले से मौजूद चिंता और संभावित भविष्य के बारे में दिमाग की अपनी गतिविधि भी हो सकती है।
क्या सपने हमारे छिपे हुए राज बताते हैं?
यहाँ मनोविज्ञान के इतिहास में सिग्मंड फ्रायड का नाम आता है।फ्रायड ने सपनों को अचेतन इच्छाओं और संघर्षों को समझने का महत्वपूर्ण रास्ता माना। उनके अनुसार सपने की दिखाई देने वाली कहानी के पीछे छिपा हुआ अर्थ हो सकता है।बाद में कार्ल युंग ने सपनों को अलग तरीके से देखा और उन्हें मन के व्यापक संतुलन तथा कुछ साझा मानसिक प्रतीकों से जोड़ा। इन दोनों विचारकों ने सपनों को समझने के हमारे तरीके पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला। लेकिन आधुनिक तंत्रिका विज्ञान फ्रायड या युंग के हर विचार को वैज्ञानिक तथ्य नहीं मानता। आज ऐसा विश्वसनीय प्रमाण नहीं है कि हर सपने के पीछे कोई छिपी इच्छा जरूर होती है या किसी प्रतीक का हर व्यक्ति के लिए एक ही अर्थ होता है। इसलिए सपना-शब्दकोश में “यह दिखा तो इसका मतलब यही” जैसी व्याख्याओं से सावधान रहना चाहिए।
क्या सपना सिर्फ तस्वीरों का खेल है?
सपने में केवल दृश्य ही नहीं, आवाज, स्पर्श, गति और कभी-कभी स्वाद या गंध जैसे अनुभव भी हो सकते हैं। हालाँकि दृश्य और भावनात्मक अनुभव सबसे ज्यादा सामान्य दिखाई देते हैं। बाहरी दुनिया से आने वाली कुछ आवाजें भी कभी-कभी सपने की कहानी में शामिल हो सकती हैं। उदाहरण के लिए कमरे में बज रही आवाज सपने के भीतर किसी दूसरे स्रोत से आती हुई महसूस हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि बाहर की आवाज सपना बना रही है। बल्कि सोता हुआ मस्तिष्क उस बाहरी संकेत को अपनी बन रही कहानी में शामिल कर सकता है।
क्या हर इंसान हर रात सपने देखता है?
उपलब्ध नींद-अध्ययनों से संकेत मिलता है कि अधिकांश स्वस्थ लोग नियमित रूप से सपने देखते हैं।लेकिन हर सपने की याद नहीं रहती। यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। सपना देखना और सपना याद रखना दो अलग चीजें हैं। हम संभवतः जितने सपने याद रखते हैं, उससे कहीं अधिक सपने देखते हैं। सुबह जागते समय अगर सपना तुरंत याद आ गया तो वह चेतन स्मृति में आ सकता है। लेकिन अगर आप बिना जागे नींद के अगले चरण में चले गए तो वह अनुभव जल्दी गायब हो सकता है।
क्या सपना लिखने से ज्यादा सपने याद रहेंगे?
अगर आप जागते ही सपना याद करने की कोशिश करें, उसे मन में दोहराएँ और फिर लिख लें तो सपना याद रखने की संभावना बढ़ सकती है। इसका कारण यह नहीं कि आप किसी खास मानसिक शक्ति को विकसित कर रहे हैं। आप बस मस्तिष्क को संकेत दे रहे हैं कि यह अनुभव महत्वपूर्ण है। जितना अधिक आप किसी सपने पर जागने के तुरंत बाद ध्यान देते हैं, उतनी अधिक संभावना है कि उसकी स्मृति मजबूत हो। इसीलिए सपना-डायरी रखने वाले लोगों को समय के साथ अधिक सपने याद आने लग सकते हैं।
सपने और वास्तविकता के बीच सबसे बड़ा फर्क क्या है?
सपना यह साबित करता है कि किसी अनुभव का बहुत वास्तविक महसूस होना और उसका बाहर वास्तव में होना एक ही बात नहीं है। सपने में आपको डर लग सकता है और दिल तेजी से धड़क सकता है। आप किसी व्यक्ति की आवाज सुन सकते हैं। किसी जगह का दृश्य बिल्कुल वास्तविक लग सकता है। लेकिन उस समय बाहर वह व्यक्ति या जगह मौजूद नहीं होती। दिमाग अपने भीतर से अनुभव बना रहा होता है। यही बात चेतना के विज्ञान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जागते समय हमारा अनुभव बाहरी दुनिया से लगातार मिलने वाली सूचनाओं से बनता है। सपने में बाहरी सूचना बहुत कम हो जाती है, फिर भी अनुभव बना रहता है। इससे पता चलता है कि हमारा दिमाग केवल दुनिया की जानकारी दर्ज नहीं करता। वह लगातार एक आंतरिक मॉडल भी बनाता है कि दुनिया कैसी है।
सपनों का सबसे बड़ा रहस्य अभी भी बाकी है
वैज्ञानिक यह अच्छी तरह समझने लगे हैं कि सपना किस तरह की मस्तिष्क गतिविधि से जुड़ा है। हम जानते हैं कि आरईएम नींद में सपने अधिक जीवंत होते हैं। हम जानते हैं कि गैर-आरईएम नींद में भी सपने आ सकते हैं। हम जानते हैं कि सपनों में स्मृतियाँ, भावनाएँ और दिनभर के अनुभव शामिल हो सकते हैं। हम यह भी जानते हैं कि दिमाग के कई हिस्से मिलकर सपने की अनुभूति बनाते हैं।
लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है - आखिर हमें सपना देखने की जरूरत क्यों है? क्या सपना स्मृति को व्यवस्थित करने का हिस्सा है? क्या यह भावनाओं को संसाधित करता है? क्या यह संभावित खतरों का मानसिक अभ्यास है? क्या यह दिमाग की कई रात वाली प्रक्रियाओं का उप-उत्पाद है? या अलग-अलग तरह के सपनों के अलग-अलग कारण हो सकते हैं? वर्तमान विज्ञान किसी एक उत्तर को अंतिम सत्य नहीं मानता।
संभव है कि सपने किसी एक काम के लिए बने ही न हों। हो सकता है कि नींद के दौरान स्मृति, भावना, सीखने और मस्तिष्क की स्वतः गतिविधियों से अलग-अलग तरह के सपने पैदा होते हों।
तो सपना आखिर है क्या?
सबसे सरल वैज्ञानिक उत्तर यह है - सपना सोते हुए मस्तिष्क द्वारा बनाया गया एक चेतन अनुभव है। यह बाहर की दुनिया की तस्वीर नहीं है। यह आँखों के सामने चलने वाली कोई फिल्म नहीं है। यह किसी एक मस्तिष्क केंद्र में बनने वाली कहानी भी नहीं है। यह स्मृति, भावना, दृश्य अनुभव, शरीर से आने वाले संकेत और मस्तिष्क की अलग-अलग गतिविधियों से मिलकर बनने वाला एक अस्थायी संसार है। इसीलिए सपने में हमारा बचपन और वर्तमान एक साथ आ सकते हैं। कोई जीवित व्यक्ति किसी पुराने स्थान पर दिखाई दे सकता है। समय टूट सकता है। जगह बदल सकती है। हम उड़ सकते हैं। फिर भी उस समय यह सब सच लगता है। और जागते ही वह दुनिया टूटने लगती है। कुछ सपने कुछ सेकंड में गायब हो जाते हैं। कुछ कई दिनों तक याद रहते हैं। कुछ इतने भावनात्मक होते हैं कि वर्षों बाद भी याद रहते हैं।
शायद सपनों की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है।
रात में जब हमारी आँखें बंद होती हैं, तब भी दिमाग हमें एक ऐसी दुनिया दिखा सकता है जिसमें कोई बाहर की सड़क नहीं, कोई वास्तविक चेहरा नहीं और कोई वास्तविक घटना नहीं—फिर भी हमें सब कुछ सच जैसा महसूस होता है। इस अर्थ में सपना केवल नींद की कहानी नहीं है। सपना यह दिखाता है कि हमारा दिमाग दुनिया को सिर्फ देखता नहीं, बल्कि लगातार बनाता भी है। और शायद यही वजह है कि सपनों को समझना केवल नींद को समझना नहीं है। यह उस सबसे बड़े सवाल को समझने की कोशिश है कि आखिर इंसान के भीतर ‘अनुभव’ पैदा होता कैसे है।


