Calendar History: कैलेंडर में फरवरी में ही 28-29 दिन क्यों होते हैं? क्या है इसकी कहानी?

Calendar History in Hindi: रोमन परंपरा के मुताबिक शुरुआती कैलेंडर में सिर्फ दस महीने थे, और साल मार्च से शुरू होकर दिसंबर पर खत्म होता था।

Yogesh Mishra
Published on: 5 Aug 2026 3:29 PM IST
Why Does February Have 28 or 29 Days The Real History Explained
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Why Does February Have 28 or 29 Days The Real History Explained

Calendar History in Hindi: जनवरी में 31 दिन, मार्च में 31, अप्रैल में 30 , पर फरवरी को सिर्फ 28 दिन क्यों मिले, और हर चार साल में एक दिन जोड़कर उसे 29 क्यों करना पड़ता है? इसका जवाब किसी खगोलीय नियम में नहीं, बल्कि प्राचीन रोम की धार्मिक मान्यताओं, राजनीति और सदियों के सुधारों में छिपा है। आज का फरवरी किसी शुरू से सोच-समझकर बनाए गए कैलेंडर का नतीजा नहीं, बल्कि अलग-अलग दौर में हुए समझौतों की विरासत है।

कैलेंडर असल में इंसान का बनाया एक तरीका है, जिससे वह प्रकृति के समय को दिनों-महीनों में बाँट सके। पृथ्वी को सूरज का एक चक्कर पूरा करने में करीब 365.2422 दिन लगते हैं, यानी 365 दिन के अलावा करीब साढ़े पाँच घंटे और। वहीं चाँद का एक चक्र करीब साढ़े 29 दिन का होता है, और 12 चंद्र महीने मिलाकर सिर्फ 354 दिन बनते हैं, जो सूरज के हिसाब वाले साल से करीब 11 दिन कम है। यही फर्क रोमन कैलेंडर की उलझन की जड़ है, अगर कैलेंडर चाँद के हिसाब से बने तो वह मौसमों से खिसकता जाएगा।

रोम का सबसे पुराना कैलेंडर

रोमन परंपरा के मुताबिक शुरुआती कैलेंडर में सिर्फ दस महीने थे, और साल मार्च से शुरू होकर दिसंबर पर खत्म होता था। आज के आखिरी चार महीनों के नाम सितंबर, अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर, असल में लैटिन में सात, आठ, नौ, दस के लिए हैं। पर आज ये नौवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने हैं, क्योंकि बाद में जनवरी और फरवरी को साल की शुरुआत में जोड़ा गया, पर पुराने नाम नहीं बदले गए।


इस दस-महीने वाले साल में सिर्फ करीब 304 दिन गिने जाते थे, और सर्दियों का एक बड़ा हिस्सा किसी महीने में गिना ही नहीं जाता था। खेती-प्रधान समाज में साल का असली महत्व वसंत से पतझड़ तक था, युद्ध, खेती, बुवाई-कटाई इसी दौरान होती थी। सर्दी की सुस्त अवधि को शायद उतना महत्व नहीं दिया गया। हालाँकि इतिहासकारों में इसकी सटीक बनावट को लेकर मतभेद हैं, क्योंकि इस दौर का कोई असली कैलेंडर आज मौजूद नहीं है। पर इतना साफ है कि रोमन गणराज्य तक पहुँचते-पहुँचते साल में बारह महीने हो चुके थे, और फरवरी पहले से ही सबसे छोटा और धार्मिक रूप से खास महीना बन चुका था।

फरवरी को 28 दिन ही क्यों मिले

परंपरा के अनुसार दूसरे राजा नूमा पोम्पिलियस ने जनवरी और फरवरी जोड़कर कैलेंडर को चाँद के करीब लाने की कोशिश की। बारह चंद्र महीनों का साल करीब 354 दिन का होता है, पर रोमन मान्यता में विषम संख्या को शुभ माना जाता था। इसलिए साल को 355 दिन का बनाया गया और ज़्यादातर महीनों को 29 या 31 दिन दिए गए ताकि वे विषम संख्या के हों। पर बारह विषम संख्याओं को जोड़ें तो जवाब हमेशा सम आता है इसलिए कुल 355 (विषम) तक पहुँचने के लिए किसी एक महीने को सम संख्या देना ही पड़ता। यह अपवाद फरवरी बना, जिसे 28 दिन मिले।

फरवरी उस वक़्त साल का आखिरी महीना माना जाता था और शुद्धिकरण व मृतकों से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों का समय था उसका नाम भी लैटिन के "फेब्रुआ" (शुद्धिकरण) से आया है। शायद इसी वजह से इस "अशुभ" सम संख्या को फरवरी पर छोड़ना बाकी महीनों की तुलना में ज़्यादा स्वीकार्य लगा। यह व्याख्या बाद के रोमन लेखकों पर आधारित है, इसलिए इसे पूरी तरह पक्का ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि पुरानी परंपरा की व्याख्या मानना चाहिए।

अतिरिक्त महीना क्यों जोड़ा जाता था

355 दिन का यह साल चाँद के तो करीब था, पर मौसम वाले साल से करीब दस दिन छोटा था। अगर कुछ न किया जाता तो कुछ ही सालों में वसंत के त्योहार सर्दी में पहुँच जाते। इसका हल निकाला गया एक अतिरिक्त महीना जोड़कर, जिसे "मर्सेडोनियस" कहा जाता था। यह फरवरी के 23वें दिन के बाद, एक धार्मिक पर्व के आसपास जोड़ा जाता था, और उसके बाद फरवरी के बचे दिन आते थे। यानी फरवरी शुरू से ही कैलेंडर सुधार का "समायोजन क्षेत्र" बन चुका था जब भी अतिरिक्त समय जोड़ना होता, वह फरवरी के आसपास ही डाला जाता, क्योंकि फरवरी पुराने साल का आखिरी महीना था।

आज हम नया साल 1 जनवरी से शुरू करते हैं, इसलिए लगता है कि अतिरिक्त दिन दिसंबर के अंत में जुड़ना चाहिए। पर प्राचीन रोमन याद में फरवरी साल का आखिरी हिस्सा था, इसलिए वहाँ अतिरिक्त दिन जोड़ना वैसा ही था जैसे आज साल के अंत में सुधार करना। फरवरी का छोटा होना और लीप-समायोजन का उसी से जुड़ना संयोग नहीं था, दोनों बातें उसके "आखिरी महीने" वाले पुराने स्थान से निकलीं।

जब कैलेंडर पूरी तरह बिगड़ गया


अतिरिक्त महीना कब जोड़ा जाए, यह धार्मिक अधिकारियों (पोंटिफों) के हाथ में था। चूँकि राजनीतिक पद, कर्ज़ और कार्यकाल कैलेंडर से जुड़े थे, इसलिए यह फैसला सिर्फ खगोलीय नहीं रहा, अधिकारी अपने फायदे के लिए इसमें हेरफेर कर सकते थे। कभी युद्ध या लापरवाही की वजह से ज़रूरी महीना जोड़ा ही नहीं जाता। नतीजा यह हुआ कि रोमन कैलेंडर मौसमों से बुरी तरह भटक गया, जूलियस सीज़र के समय तक यह असली मौसम से करीब तीन महीने पीछे हो चुका था।

जूलियस सीज़र का बड़ा सुधार

46 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र ने बड़ा सुधार किया। मिस्र की यात्रा से प्रभावित सीज़र ने वहाँ के 365-दिन वाले सौर कैलेंडर के आधार पर नई व्यवस्था बनाई, सामान्य साल 365 दिन का और हर चौथा साल 366 दिन का, क्योंकि माना गया कि असली साल 365 दिन और छह घंटे का है, और चार साल के छह-छह घंटे मिलकर एक पूरा दिन बनाते हैं। यही लीप वर्ष का गणित है। कैलेंडर को मौसम के साथ फिर से मिलाने के लिए 46 ईसा पूर्व को असाधारण रूप से लंबा करना पड़ा, इसमें करीब 445 दिन हुए, और इसे "भ्रम का आखिरी साल" कहा गया। इसके बाद 45 ईसा पूर्व से नया कैलेंडर लागू हुआ, जिसमें महीनों की लंबाई करीब वैसी ही तय हुई जैसी आज हम जानते हैं। पर फरवरी फिर भी छोटा रहा, क्योंकि सुधारकों ने पुराना कैलेंडर पूरी तरह मिटाकर नया नहीं बनाया, उन्होंने पुरानी धार्मिक तारीखों और फरवरी की परंपरा को बचाते हुए ही बाकी दिन बाँटे।

अगस्त वाली मशहूर कहानी सच नहीं है

एक लोकप्रिय कहानी है कि जूलियस सीज़र ने जुलाई को अपने नाम पर 31 दिन दिए, और बाद में सम्राट ऑगस्टस ने जलन में अगस्त (जो पहले 30 दिन का था) को भी 31 दिन का बनाने के लिए फरवरी से एक दिन छीन लिया। यह कहानी स्कूलों और सोशल मीडिया पर खूब चलती है, पर ऐतिहासिक प्रमाण इसे सही नहीं मानते। जूलियन सुधार से पहले भी फरवरी सामान्य साल में 28 दिन का ही था, यानी ऑगस्टस ने फरवरी को पहली बार 28 दिन का नहीं बनाया। अगस्त का नाम ज़रूर ऑगस्टस के सम्मान में रखा गया (पहले यह "सेक्सटिलिस" कहलाता था), पर फरवरी से दिन छीनने वाली कहानी का पुख्ता ऐतिहासिक सबूत नहीं मिलता।

असली गड़बड़ी कहीं और हुई। रोमन लोग गिनती में शुरू और आखिर, दोनों साल गिन लेते थे, जिस वजह से कुछ समय तक लीप दिन हर चार की बजाय हर तीन साल में जुड़ने लगा। इससे कैलेंडर में ज़रूरत से ज़्यादा दिन आ गए। सम्राट ऑगस्टस ने यही गलती सुधारी। कुछ सालों तक लीप-दिन जोड़ना रोककर कैलेंडर को वापस सही किया। ऑगस्टस का असली योगदान यही था, फरवरी से दिन "चुराना" नहीं।

बाइसेक्सटाइल शब्द कहाँ से आया

रोमन लोग सीधे 29 फरवरी नहीं जोड़ते थे। उनकी गिनती अलग तरीके से होती थी। जूलियन लीप साल में फरवरी 24 के आसपास एक दिन दोहराया जाता था, जिसे लैटिन में "छठा दिन दूसरी बार" कहा गया। यहीं से ‘बाइसेक्सटाइल ईयर’ जैसा शब्द बना। आज की तरह साफ "29 फरवरी" की तारीख बाद की गिनती व्यवस्था से आई, पर उसकी जगह फरवरी में ही रही क्योंकि रोमन हमेशा अतिरिक्त दिन फरवरी के आखिरी हिस्से में डालते थे।

इस व्यवस्था से जूलियन साल औसतन 365.25 दिन का बना। पुराने रोमन कैलेंडर से बहुत बेहतर सुधार, पर पूरी तरह सटीक नहीं। असली साल करीब 365.2422 दिन का है, यानी दोनों में करीब 11 मिनट 14 सेकंड का फर्क है। एक साल में यह मामूली लगता है, पर करीब 128 सालों में यह एक पूरे दिन के बराबर हो जाता है। सदियों में यह फर्क जमा होता गया और वसंत का असली दिन कैलेंडर में पीछे खिसकता गया।

पोप ग्रेगरी का सुधार

यह फर्क ईसाई यूरोप के लिए अहम था क्योंकि ईस्टर की तारीख वसंत के दिन से जुड़ी थी। सोलहवीं सदी तक असली खगोलीय वसंत करीब दस दिन पहले आने लगा था। पोप ग्रेगरी तेरहवें ने 1582 में सुधार किया और अक्टूबर 1582 की दस तारीखें हटा दी गईं (4 अक्टूबर के बाद सीधे 15 अक्टूबर आया), ताकि कैलेंडर मौसम से फिर मिल जाए। साथ ही नया नियम बना कि हर चार से बँटने वाला साल लीप होगा, पर सदी वाले साल (जैसे 1700, 1800, 1900) तभी लीप होंगे जब वे 400 से भी बँटें। इसीलिए 2000 लीप साल था, पर 1900 नहीं था और 2100 भी नहीं होगा।

इस नियम से 400 सालों में 97 लीप साल होते हैं, और औसत साल 365.2425 दिन का बनता है। फिर भी यह बिल्कुल सटीक नहीं है; करीब 3,300 सालों में एक दिन का फर्क जमा हो सकता है, पर रोज़मर्रा के लिए यह काफी अच्छी व्यवस्था है।

ग्रेगोरियन सुधार ने साल और लीप-नियम का गणित बदला, पर महीनों की लंबाई नहीं बदली। फरवरी को 30 दिन दिया जा सकता था, पर इससे हज़ारों धार्मिक पर्वों, कानूनी तारीखों और परंपराओं में भारी उलटफेर करना पड़ता। कैलेंडर सिर्फ गणित नहीं, सभ्यता की याददाश्त भी होता है। इसलिए सिर्फ ज़रूरी सुधार किया गया, महीनों की पुरानी बनावट जस की तस रही। यही वजह है कि फरवरी की पुरानी विषमता आज भी बनी हुई है।

यह सुधार सभी देशों ने एक साथ नहीं अपनाया। कैथोलिक देशों ने 1582 में ही अपना लिया, पर ब्रिटेन ने 1752 में और रूस ने 1918 में जाकर अपनाया। कुछ पूर्वी चर्च आज भी धार्मिक पर्वों के लिए पुराना जूलियन कैलेंडर इस्तेमाल करते हैं।

असली जवाब क्या है

फरवरी में 28 दिन इसलिए नहीं हैं कि पृथ्वी या सूरज ऐसा चाहते हैं बल्कि यह पूरी तरह ऐतिहासिक फैसला है। फरवरी पुराने रोमन साल का आखिरी महीना था, शुद्धिकरण और मृतकों से जुड़े संस्कारों का महीना था। विषम संख्या को शुभ मानने वाली परंपरा में उसे 28 दिन का अपवाद बनाया गया। चाँद और सूरज वाले साल के बीच का अंतर पाटने के लिए अतिरिक्त समय जोड़ने की जगह भी वही बनी। जूलियस सीज़र ने साल को सौर बनाया, पर फरवरी की यह पुरानी भूमिका बनी रही। बाद में ग्रेगोरियन सुधार ने सिर्फ लीप-गणना को ज़्यादा सटीक बनाया, फरवरी की लंबाई नहीं बदली।

फरवरी को हर चार साल में 29वाँ दिन इसलिए मिलता है क्योंकि हमारा 365 दिन वाला साल असली मौसमी साल से करीब एक चौथाई दिन छोटा है, और चार साल में यह फर्क करीब एक पूरे दिन के बराबर हो जाता है। चूँकि असली फर्क ठीक छह घंटे नहीं बल्कि उससे थोड़ा कम है, इसलिए हर 400 साल में तीन लीप दिन हटाए जाते हैं, जैसे 2024 और 2028 लीप साल हैं, पर 2100 चार से बँटने के बावजूद लीप साल नहीं होगा।

क्या आज नए सिरे से बनाते तो ऐसा ही होता

शायद नहीं। आज अगर कोई कैलेंडर शुरू से बनाए तो महीनों को ज़्यादा बराबर बाँटा जा सकता है, या 13 महीनों के 28-28 दिन बनाकर एक-दो अतिरिक्त दिन जोड़े जा सकते हैं। इतिहास में ऐसे कई विकल्प सुझाए भी गए, जैसे फ्रांसीसी क्रांति के बाद दस दिन वाले हफ्ते और बराबर महीनों वाला कैलेंडर अपनाने की कोशिश हुई थी। पर कैलेंडर बदलना सिर्फ गणित का सवाल नहीं है बल्कि व्यापार, धर्म, जन्मदिन, त्योहार, कानून और सॉफ्टवेयर सब मौजूदा व्यवस्था से जुड़े हैं। थोड़ी असमानता बनाए रखना पूरी दुनिया की तारीख व्यवस्था बदलने से कहीं आसान है।

बहरहाल, फरवरी की कहानी दिखाती है कि हमारी सबसे आम चीज़ें भी इतिहास से कितनी गहराई से जुड़ी हैं। स्मार्टफोन और एआई के दौर में भी हम जिन महीनों का इस्तेमाल करते हैं, उनके नाम और लंबाई प्राचीन किसानों, पुजारियों और सम्राटों के फैसलों से चली आ रही है। सितंबर आज नौवाँ महीना होकर भी नाम से ‘सातवाँ’ है, और फरवरी आज भी उस दौर की याद ढोता है जब साल मार्च से शुरू होता था और समय की गाँठ फरवरी के अंत में बाँधी जाती थी। फरवरी के 28 या 29 दिनों का राज़ किसी एक सम्राट की मर्ज़ी में नहीं, बल्कि करीब ढाई हज़ार साल की कैलेंडर-यात्रा में छिपा है, जिसे कई बार सुधारा गया, पर कभी पूरी तरह दोबारा नहीं बनाया गया।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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