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Newstrack Special: नहाते समय उंगलियों पर पड़ जाती हैं झुर्रियां, क्या यह किसी बीमारी का संकेत है?
Why Fingers Wrinkle in Water: नहाते समय या पानी में रहने पर उंगलियों के पोरों पर झुर्रियां क्यों पड़ जाती हैं? जानिए इसके पीछे नर्वस सिस्टम की भूमिका, वैज्ञानिक कारण, संभावित फायदे और इससे होने वाले नुकसान।
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Why Fingers Wrinkle in Water: क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि नहाते समय, स्विमिंग पूल में या बर्तन धोने के बाद उंगलियों के पोरों पर छोटी-छोटी झुर्रियां पड़ जाती हैं? ऐसा लगता है जैसे त्वचा पानी सोखकर सिकुड़ गई हो। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव केवल त्वचा के फूलने या पानी सोखने की वजह से नहीं होता। इसके पीछे हमारे शरीर का नर्वस सिस्टम और रक्त वाहिकाओं की एक खास प्रक्रिया काम करती है।
उंगलियों पर झुर्रियां क्यों पड़ती हैं?
जब हमारी उंगलियां कुछ समय तक पानी में डूबी रहती हैं, तो त्वचा में मौजूद तंत्रिकाएं सक्रिय होकर रक्त वाहिकाओं को सिकुड़ने का संकेत देती हैं। खासतौर पर उंगलियों के पोरों की त्वचा के नीचे मौजूद छोटी रक्त वाहिकाएं संकुचित हो जाती हैं। इससे उस हिस्से में रक्त की मात्रा और त्वचा के नीचे का आयतन कुछ कम हो जाता है। नतीजतन, त्वचा की ऊपरी परत पर सिलवटें और झुर्रियां दिखाई देने लगती हैं।
इस प्रक्रिया में स्वायत्त तंत्रिका तंत्र यानी ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम की भूमिका होती है। यही तंत्र शरीर की ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करता है, जिन पर हमारा सीधा नियंत्रण नहीं होता, जैसे दिल की धड़कन, पसीना आना और रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना या फैलना। इसका एक प्रमाण यह भी है कि जिन लोगों की उंगलियों की कुछ खास तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, उनमें पानी में डुबोने पर सामान्य रूप से झुर्रियां नहीं पड़ सकतीं।
क्या यह शरीर की कोई उपयोगी प्रतिक्रिया है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि उंगलियों पर पड़ने वाली ये झुर्रियां गीली सतहों पर पकड़ बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। हमारी उंगलियों के पोरों पर बनने वाली सिलवटें कुछ हद तक गीली जमीन पर टायर के खांचों की तरह काम कर सकती हैं। ये पानी को किनारों की ओर हटाने में मदद करती हैं, जिससे उंगलियों और किसी गीली वस्तु के बीच संपर्क बेहतर हो सकता है।
इस विचार को जांचने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग किए हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि झुर्रियां पड़ने के बाद लोग गीली वस्तुओं को उठाने में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि, हर परिस्थिति में इससे पकड़ बेहतर होती है या नहीं, इस पर अभी भी शोध जारी है। इसलिए इसे शरीर का संभावित प्राकृतिक अनुकूलन माना जाता है, न कि पूरी तरह सिद्ध लाभ।
क्या उंगलियों के सिकुड़ने से कोई नुकसान होता है?
सामान्य परिस्थितियों में पानी में कुछ देर रहने से उंगलियों पर झुर्रियां पड़ना नुकसानदायक नहीं है। यह शरीर की अस्थायी और सामान्य प्रतिक्रिया है। पानी से बाहर आने के बाद रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे अपनी सामान्य स्थिति में लौटती हैं और त्वचा भी पहले जैसी दिखने लगती है।
हालांकि, बहुत देर तक पानी में रहने से त्वचा की बाहरी परत के प्राकृतिक तेल कम हो सकते हैं। इससे त्वचा रूखी, खुरदरी या संवेदनशील हो सकती है। खासकर गर्म पानी, साबुन और डिटर्जेंट के लगातार संपर्क में रहने से त्वचा की नमी और सुरक्षा परत प्रभावित हो सकती है। कुछ लोगों को खुजली, जलन या त्वचा फटने की समस्या भी हो सकती है।
क्या हर किसी की उंगलियों पर समान झुर्रियां पड़ती हैं?
यह प्रक्रिया हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती। पानी का तापमान, उसमें बिताया गया समय, त्वचा की स्थिति और तंत्रिकाओं की कार्यक्षमता जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभाते हैं। आमतौर पर कुछ मिनट पानी में रहने के बाद झुर्रियां दिखने लगती हैं, लेकिन इसका समय व्यक्ति और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।
यदि उंगलियों पर बिना पानी में डूबे ही लगातार झुर्रियां बनी रहती हैं, या उनके साथ दर्द, सूजन, रंग बदलना, सुन्नपन अथवा घाव जैसी समस्या हो, तो इसे सामान्य प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।
क्या झुर्रियां पड़ना सिर्फ इंसानों में होता है?
पानी में रहने पर उंगलियों की त्वचा में झुर्रियां पड़ना इंसानों में अच्छी तरह देखा गया है। यह प्रतिक्रिया तंत्रिका तंत्र से जुड़ी है। दूसरे प्राइमेट्स और जानवरों में इससे मिलती-जुलती प्रतिक्रिया पर भी अध्ययन हुए हैं, लेकिन इसे सभी जानवरों में समान रूप से होने वाला गुण नहीं माना जा सकता।
बिना नसों के झुर्रियां नहीं पड़तीं
इसका एक दिलचस्प प्रमाण उन लोगों से मिलता है जिनकी उंगलियों की कुछ तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं। ऐसे लोगों की उंगलियां पानी में डुबोने पर सामान्य तरीके से सिकुड़ नहीं पातीं। इससे पता चलता है कि यह केवल त्वचा के पानी सोखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि तंत्रिका तंत्र द्वारा नियंत्रित प्रतिक्रिया है।
उंगलियों की झुर्रियां पानी निकालने वाले रास्तों जैसी होती हैं
2011 में प्रकाशित एक शोध में वैज्ञानिकों ने उंगलियों की झुर्रियों के पैटर्न की तुलना पानी की निकासी करने वाले नेटवर्क से की। उनका विचार था कि ये सिलवटें पकड़ के संपर्क वाले हिस्से से पानी को बाहर निकालने में मदद कर सकती हैं। इसी विचार को 'रेन ट्रेड' यानी बारिश में टायर की पकड़ जैसी परिकल्पना कहा गया।
2013 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि झुर्रियों वाली उंगलियों से पानी में डूबी वस्तुओं को कुछ परिस्थितियों में तेजी से उठाया जा सकता है। 2021 के एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि झुर्रियों वाली उंगलियों से गीली वस्तु पकड़ने के लिए जरूरी पकड़ का बल कम हो सकता है। हालांकि, सभी प्रयोगों में एक जैसे नतीजे नहीं मिले हैं। 2014 के एक अध्ययन में झुर्रियों से पकड़ या स्पर्श क्षमता में कोई खास सुधार नहीं पाया गया। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि पकड़ बेहतर बनाने की भूमिका के पक्ष में प्रमाण हैं, लेकिन वैज्ञानिकों में इस पर पूरी सहमति नहीं है।
झुर्रियां पड़ने से छूने की क्षमता कम नहीं होती
एक दिलचस्प सवाल यह है कि जब उंगलियों की सतह बदल जाती है, तो क्या चीजों को महसूस करने की क्षमता भी प्रभावित होती है? 2014 के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने स्पर्श की संवेदनशीलता की जांच की और पाया कि पानी से पड़ी झुर्रियों के कारण मापी गई स्पर्श क्षमता में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया। यानी उंगलियां झुर्रीदार होने के बावजूद छोटी बनावट और कंपन महसूस कर सकती हैं।
तंत्रिकाओं की कार्यक्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं
उंगलियों पर पानी से झुर्रियां पड़ने की प्रक्रिया स्वायत्त तंत्रिका तंत्र के एक हिस्से, यानी सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम पर निर्भर करती है। इसी वजह से कुछ चिकित्सकीय परिस्थितियों में उंगलियों को पानी में डुबोकर झुर्रियां बनने की प्रतिक्रिया देखी गई है। असामान्य प्रतिक्रिया तंत्रिका कार्यक्षमता से जुड़ी समस्या की ओर संकेत कर सकती है, हालांकि यह अकेले किसी बीमारी का निदान नहीं करती।


