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Human Fear Science: इंसान को डर क्यों लगता है? खतरा पहचानते ही दिमाग और शरीर में क्या होता है?
Human Fear Science: इंसान को डर क्यों लगता है और खतरा महसूस होते ही दिमाग शरीर को कैसे तैयार करता है? जानिए अमिग्डाला, एड्रेनालिन, कॉर्टिसोल, फाइट-फ्लाइट-फ्रीज प्रतिक्रिया और क्या कोई व्यक्ति सच में बिल्कुल निडर हो सकता है।
Why do Humans Feel Fear Science Explained in Hindi (Image - AI)
Human Fear Science: डर मनुष्य की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे पुरानी जीवित रहने वाली जैविक व्यवस्थाओं में से एक है। अगर हमारे पूर्वजों को साँप, ऊँचाई, अंधेरा, आग, हिंसक पशु, अचानक आवाज या किसी शत्रु से डर न लगता, तो शायद मनुष्य इतनी लंबी विकास-यात्रा कर ही नहीं पाता। डर का मूल उद्देश्य हमें परेशान करना नहीं, बल्कि खतरे से बचाना है। समस्या तब पैदा होती है जब यही सुरक्षा-व्यवस्था वास्तविक खतरे के बिना भी बार-बार सक्रिय होने लगे या इतनी ज्यादा सक्रिय हो जाए कि जीवन को नियंत्रित करने लगे। आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान बताता है कि डर किसी एक ‘फियर सेंटर’ का काम नहीं है, बल्कि मस्तिष्क के कई हिस्सों, स्वायत्त तंत्रिका तंत्र, हार्मोन, स्मृति और निर्णय प्रक्रिया के बीच बेहद तेज संवाद का परिणाम है। अमिग्डाला इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन डर केवल अमिग्डाला में पैदा होने वाली भावना नहीं है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि डर और खतरा एक ही चीज नहीं हैं। खतरा बाहर मौजूद हो सकता है, जैसे सामने से आती तेज गाड़ी, हमला करता जानवर या अचानक लगी आग। लेकिन डर उस खतरे के प्रति शरीर और मस्तिष्क की प्रतिक्रिया है। कई बार खतरा वास्तविक नहीं होता, केवल उसकी संभावना होती है, फिर भी प्रतिक्रिया पूरी तरह वास्तविक हो सकती है। अंधेरी गली में पीछे से कदमों की आवाज सुनकर हृदय की गति बढ़ जाना इसका उदाहरण है। आपने अभी किसी हमलावर को देखा भी नहीं, लेकिन मस्तिष्क अनिश्चितता को संभावित खतरे की तरह पढ़ सकता है। विकास की दृष्टि से इसमें एक तरह की उपयोगिता थी। जंगल में झाड़ी हिलने पर अगर वह केवल हवा निकली तो डरकर भागने की कीमत कम थी, लेकिन अगर वह शिकारी था और आपने खतरे को नजरअंदाज किया तो कीमत जीवन हो सकती थी। इसलिए जीवित रहने की व्यवस्था अक्सर ‘पहले सावधान, बाद में जाँच’ की दिशा में झुकी रहती है।
खतरे की पहली खबर दिमाग तक कैसे पहुँचती है?
मान लीजिए आप रात में सड़क पर चल रहे हैं और अचानक सामने साँप जैसी कोई आकृति दिखाई देती है। आँखों से आने वाली दृश्य सूचना मस्तिष्क में पहुँचती है और वहाँ उसका विश्लेषण शुरू होता है। लोकप्रिय विज्ञान में इसे कभी-कभी दो रास्तों से समझाया जाता है, एक अपेक्षाकृत तेज और मोटा अनुमान लगाने वाला मार्ग और दूसरा ज्यादा विस्तृत विश्लेषण वाला मार्ग। वास्तविक मस्तिष्क इससे कहीं अधिक जटिल नेटवर्क है, फिर भी मूल विचार उपयोगी है। मस्तिष्क को खतरे की प्राथमिक चेतावनी पूरी पहचान से पहले मिल सकती है।
यही कारण है कि कभी-कभी हम पहले उछल जाते हैं और बाद में देखते हैं कि वह साँप नहीं, रस्सी थी। प्रारंभिक सुरक्षा प्रतिक्रिया के लिए पूर्ण बौद्धिक निष्कर्ष की प्रतीक्षा करना जीवित रहने की दृष्टि से महँगा पड़ सकता था। अमिग्डाला विभिन्न संवेदनात्मक क्षेत्रों, थैलेमस, कॉर्टेक्स और स्मृति से जुड़ी संरचनाओं से सूचना प्राप्त करती है और संभावित खतरे से जुड़ी सीख तथा शरीर की रक्षात्मक प्रतिक्रिया को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मनुष्यों और पशुओं दोनों पर हुए शोध में भय से जुड़ी सीख में अमिग्डाला की महत्वपूर्ण भूमिका लगातार सामने आई है।
अमिग्डाला कोई ‘डर का बटन’ नहीं है
अक्सर कहा जाता है कि ब्रेन में स्थित ‘अमिग्डाला (Amygdala) हिस्सा डर पैदा करती है’, लेकिन यह आधा सच है। अमिग्डाला बादाम के आकार के कई नाभिकों का समूह है और भावनात्मक महत्व, खतरे की सीख, सामाजिक संकेतों तथा रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं से जुड़ी कई प्रक्रियाओं में भाग लेता है। लेकिन भय का सचेत अनुभव मस्तिष्क के व्यापक नेटवर्क से पैदा होता है। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स परिस्थिति का मूल्यांकन कर सकता है, हिप्पोकैम्पस (Hippocampus ) संदर्भ और स्मृति उपलब्ध कराता है, इंसुला शरीर के अंदर की संवेदनाओं की जानकारी से जुड़ी है, हाइपोथैलेमस शरीर की स्वचालित और हार्मोनल प्रतिक्रिया सक्रिय कर सकता है और मस्तिष्क-तना श्वास, हृदय गति तथा मोटर रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं में भाग लेता है।
इसलिए डर को किसी एक कमरे में बैठे चौकीदार की तरह नहीं, बल्कि पूरे सुरक्षा तंत्र की तरह समझना चाहिए। आधुनिक अध्ययन भी बताते हैं कि भय से जुड़ी सीख और उसके कम होने या नियंत्रित होने में अमिग्डाला, प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस का आपसी संवाद महत्वपूर्ण है।
खतरे का संकेत मिलते ही शरीर में सबसे पहले क्या होता है?
खतरे की पहचान होते ही शरीर का स्वायत्त तंत्रिका तंत्र सक्रिय हो सकता है। खास तौर पर sympathetic nervous system शरीर को तुरंत कार्रवाई के लिए तैयार करता है। इससे एड्रेनालिन और नॉरएड्रेनालिन जैसी रासायनिक प्रणालियाँ सक्रिय होती हैं। हृदय तेजी से धड़क सकता है, रक्तचाप बढ़ सकता है, साँस तेज हो सकती है, पुतलियाँ फैल सकती हैं, मांसपेशियों का तनाव बढ़ सकता है और शरीर ऊर्जा को ऐसे अंगों की ओर मोड़ सकता है जो तत्काल कार्रवाई में काम आएँ। रक्षात्मक प्रतिक्रिया के दौरान adrenaline और noradrenaline की भूमिका तथा हृदय गति, पुतली और मांसपेशियों में होने वाले बदलाव अच्छी तरह दर्ज किए गए हैं। इस प्रक्रिया को अक्सर लड़ो या भागो, कहा जाता है। लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है, क्योंकि शरीर का तीसरा महत्वपूर्ण उत्तर ठिठक जाना भी हो सकता है।
डर में कभी इंसान जम क्यों जाता है?
मान लीजिए अचानक आपके सामने कोई खतरनाक जानवर आ जाए। हर बार शरीर तुरंत भागता नहीं। कभी व्यक्ति कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल स्थिर हो जाता है। इसे कमजोरी या निर्णयहीनता समझना गलत है। आधुनिक अध्ययन बताते हैं कि फ्रीजिंग एक संगठित रक्षात्मक अवस्था हो सकती है, जिसमें शरीर की गति रुकती है और खतरे के बारे में ज्यादा जानकारी लेने तथा अगली कार्रवाई के लिए तैयार होने का मौका मिलता है। इसमें sympathetic और parasympathetic प्रणालियों की जटिल सहभागिता हो सकती है। कुछ जानवरों में स्थिर रहना खुद एक रक्षा रणनीति है, क्योंकि कई शिकारी गति को ज्यादा आसानी से पहचानते हैं। मनुष्य में भी अचानक खतरे के समय क्षणिक स्थिरता ध्यान और संवेदनशीलता बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकती है। इसके बाद परिस्थिति के अनुसार भागना, लड़ना, छिपना या कोई दूसरी प्रतिक्रिया हो सकती है। इसलिए भय प्रतिक्रिया को केवल ‘लड़ो या भागो’ कहना वास्तविक जैविकी को छोटा कर देता है। ज्यादा सही शब्द रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला है।
हृदय इतनी तेजी से क्यों धड़कने लगता है?
खतरे के समय शरीर भविष्य की कार्रवाई के लिए खुद को तैयार कर रहा होता है। अगर आपको दौड़ना या संघर्ष करना पड़े तो मांसपेशियों को ज्यादा ऑक्सीजन और ऊर्जा चाहिए। हृदय गति बढ़ाकर रक्त का प्रवाह तेज किया जाता है और साँस तेज होने से शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन मिल सकती है।
इसीलिए डर में व्यक्ति अपने सीने की धड़कन बहुत साफ महसूस कर सकता है। कभी यह धड़कन इतनी तेज लगती है कि खुद वही नया डर पैदा कर देती है, ‘मेरे साथ कुछ गलत हो रहा है।’ यही चक्र पैनिक जैसी अवस्था में महत्वपूर्ण हो सकता है, जहाँ शरीर की सामान्य तनाव प्रतिक्रिया को व्यक्ति स्वयं किसी खतरनाक संकेत की तरह पढ़ने लगता है।
हाथ ठंडे और पसीने वाले क्यों हो जाते हैं?
डर में रक्त प्रवाह का वितरण बदल सकता है। त्वचा और पाचन जैसी तत्काल जीवित रहने में कम प्राथमिकता वाली प्रक्रियाओं से संसाधन हटकर बड़ी मांसपेशियों और जरूरी अंगों की ओर जा सकते हैं। साथ ही sympathetic nervous system पसीना बढ़ा सकता है। हथेलियों और तलवों का पसीना पकड़ और घर्षण में मदद कर सकता है, हालांकि मानव भय प्रतिक्रिया की हर विशेषता को एक सरल विकासवादी कहानी से समझाना ठीक नहीं होगा। यही कारण है कि डर में हाथ ठंडे भी लग सकते हैं और पसीने से भीग भी सकते हैं।
मुँह क्यों सूखता है?
खतरे के समय पाचन तंत्र शरीर की प्राथमिकताओं में पीछे चला जाता है। लार और पाचन से जुड़ी सामान्य प्रक्रियाएँ कम हो सकती हैं। शरीर की प्राथमिकता उस समय भोजन पचाना नहीं, बल्कि संभावित खतरे से निपटना होती है। इसलिए मंच पर भाषण देने से पहले भी मुँह सूख सकता है, जबकि वहाँ कोई शेर मौजूद नहीं है। मस्तिष्क सामाजिक अपमान, असफलता या दूसरों के मूल्यांकन जैसी चीजों को भी संभावित खतरे की तरह संसाधित कर सकता है।
पेट में ‘तितलियाँ’ क्यों महसूस होती हैं?
डर या चिंता में पेट का अजीब महसूस होना भी वास्तविक जैविक प्रतिक्रिया है। मस्तिष्क और आँतों के बीच लगातार संवाद चलता रहता है। autonomic nervous system और तनाव से जुड़े हार्मोन पाचन की गति, आँतों की गतिविधि और उनकी संवेदनशीलता बदल सकते हैं। इसलिए परीक्षा, इंटरव्यू या पहली मुलाकात से पहले पेट में हलचल, मितली या शौच की इच्छा तक हो सकती है। मानसिक डर शरीर में काल्पनिक नहीं होता। मस्तिष्क जिस चीज को खतरे की तरह समझता है, उसकी व्याख्या पूरे शरीर की अवस्था बदल सकती है।
एड्रेनालिन कितनी जल्दी काम करता है?
Sympathetic प्रतिक्रिया बेहद तेज हो सकती है, क्योंकि खतरे की स्थिति में सेकंड महत्वपूर्ण होते हैं। adrenal medulla से adrenaline और norepinephrine शरीर को तेजी से कार्रवाई के लिए तैयार कर सकते हैं। इसके साथ एक धीमी लेकिन ज्यादा समय तक चलने वाली तनाव प्रणाली भी सक्रिय होती है, जिसे HPA axis यानी hypothalamus-pituitary-adrenal axis कहते हैं। हाइपोथैलेमस CRH नामक संकेत देता है, पिट्यूटरी ACTH छोड़ती है और अंततः adrenal cortex से cortisol निकल सकता है। यह प्रतिक्रिया सेकंड से मिनट के पैमाने पर विकसित होती है और शरीर को लंबे समय तक चुनौती से निपटने के लिए ऊर्जा और दूसरे संसाधन उपलब्ध कराने में योगदान करती है। इसलिए भय की प्रतिक्रिया की दो गति समझी जा सकती हैं, एक बहुत तेज तंत्रिका प्रतिक्रिया और दूसरी अपेक्षाकृत धीमी हार्मोनल प्रतिक्रिया।
डर में समय धीमा क्यों लगता है?
बहुत से लोग दुर्घटना या अत्यधिक भय के समय कहते हैं कि उन्हें लगा सब कुछ स्लोमोशन में हो रहा था। वास्तव में बाहरी समय की गति बदलने का कोई प्रमाण नहीं है। संभव है कि अत्यधिक उत्तेजना, ध्यान और स्मृति निर्माण के कारण घटना सामान्य अनुभव की तुलना में बहुत ज्यादा विवरण के साथ दर्ज हो। बाद में जब उस स्मृति को दोबारा याद किया जाता है तो इतने सारे विवरणों के कारण घटना लंबी महसूस हो सकती है। इसलिए ‘समय धीमा हो गया’ एक वास्तविक अनुभव हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि घड़ी की गति सचमुच बदल गई थी।
डर में दर्द कम क्यों महसूस हो सकता है?
गंभीर खतरे में कुछ लोगों को चोट का पता तुरंत नहीं चलता। दुर्घटना के बाद व्यक्ति कुछ मिनट तक चलता रहता है और बाद में दर्द ज्यादा महसूस होता है। शरीर की तनाव प्रतिक्रिया endogenous opioid जैसी दर्द-नियंत्रण प्रणालियों और ध्यान के पुनर्वितरण के जरिए दर्द की अनुभूति को कुछ समय के लिए दबा सकती है। जीवित रहने की दृष्टि से यह उपयोगी हो सकता है। अगर शिकारी से भागते समय छोटी चोट का पूरा दर्द तुरंत सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाए तो बच निकलने की संभावना घट सकती है। हालांकि यह प्रतिक्रिया हर व्यक्ति और हर परिस्थिति में एक जैसी नहीं होती।
डर जन्मजात है या सीखा हुआ?
कुछ रक्षात्मक प्रवृत्तियाँ जैविक रूप से तैयार होती हैं। अचानक तेज आवाज से नवजात भी चौंक सकता है। गहराई, ऊँचाई, हिंसक गति या कुछ पशुओं से जुड़ी सतर्कता मनुष्य में अपेक्षाकृत आसानी से विकसित हो सकती है। लेकिन बहुत से डर सीखे जाते हैं। अगर बचपन में कुत्ते ने काट लिया तो कुत्ते का दृश्य भविष्य में भय पैदा कर सकता है। अगर किसी सड़क पर गंभीर दुर्घटना हुई तो वर्षों बाद उसी स्थान पर पहुँचने पर शरीर तनाव में आ सकता है। यह fear conditioning का उदाहरण है, जिसमें पहले तटस्थ संकेत किसी दर्दनाक या खतरनाक घटना से जुड़ जाता है। अमिग्डाला ऐसी भय-संबंधी सीख में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
डर को भुलाया भी जा सकता है?
वैज्ञानिक अर्थ में ‘भय मिटना’ हमेशा पुरानी स्मृति के नष्ट होने जैसा नहीं होता। अगर कुत्ते से डरने वाला व्यक्ति बार-बार सुरक्षित परिस्थितियों में शांत कुत्तों के संपर्क में आता है तो मस्तिष्क नई सीख विकसित कर सकता है कि हर कुत्ता खतरा नहीं है। इसे fear extinction कहा जाता है। इस प्रक्रिया में पुरानी भय स्मृति हमेशा पूरी तरह मिटती नहीं, बल्कि उसके ऊपर एक नई सुरक्षित सीख बन सकती है। यही कारण है कि बहुत पुराना डर तनावपूर्ण परिस्थितियों में कभी-कभी वापस भी आ सकता है। इस प्रक्रिया में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स और अमिग्डाला के बीच संवाद महत्वपूर्ण माना जाता है। यही सिद्धांत कई exposure therapies की वैज्ञानिक नींव है।
हिप्पोकैम्पस डर में क्या करता है?
हिप्पोकैम्पस संदर्भ की स्मृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह मस्तिष्क को समझने में मदद करता है कि खतरा कहाँ और किन परिस्थितियों में हुआ था। मान लीजिए किसी व्यक्ति को एक खास सड़क पर दुर्घटना हुई। बाद में उसी सड़क पर जाते ही भय पैदा हो सकता है। हिप्पोकैम्पस उस जगह और घटना का संदर्भ उपलब्ध करा सकता है। इससे एक महत्वपूर्ण क्षमता पैदा होती है। मस्तिष्क केवल ‘कुत्ता खतरनाक है’ नहीं सीखता, बल्कि ‘उस खास परिस्थिति में कुत्ता खतरनाक था’ जैसी ज्यादा सूक्ष्म सीख भी विकसित कर सकता है। अगर संदर्भ की यह सीमा कमजोर पड़ जाए तो डर सामान्यीकृत हो सकता है और एक कुत्ते से हुई घटना सभी कुत्तों के डर में बदल सकती है।
प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स हमें डर से कैसे बचाता है?
मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल क्षेत्र मूल्यांकन, योजना, नियंत्रण और संदर्भ के आधार पर प्रतिक्रिया बदलने में महत्वपूर्ण है। वह अनुभव और वर्तमान जानकारी का इस्तेमाल करके शुरुआती खतरे की प्रतिक्रिया को कम कर सकता है। आप अचानक रस्सी को साँप समझकर पीछे हटते हैं। फिर ध्यान से देखते हैं और पहचानते हैं कि वह रस्सी है। इसके बाद शरीर धीरे-धीरे सामान्य होने लगता है। यही मस्तिष्क की उच्च स्तरीय मूल्यांकन प्रणाली और रक्षात्मक नेटवर्क के बीच संवाद का एक सरल उदाहरण है। इसलिए साहस का अर्थ अमिग्डाला का बंद हो जाना नहीं है। कई बार साहस का मतलब है कि डर सक्रिय होने के बावजूद व्यक्ति प्रीफ्रंटल नियंत्रण, अनुभव और सीख के आधार पर उचित निर्णय ले सके।
क्या किसी व्यक्ति को सचमुच डर ही नहीं लगता?
यहाँ विज्ञान की कहानी बेहद रोचक हो जाती है। अत्यंत दुर्लभ मामलों में अमिग्डाला के दोनों ओर गंभीर क्षति वाले व्यक्तियों में बाहरी खतरों के प्रति डर बहुत कम पाया गया है। सबसे प्रसिद्ध मामला वैज्ञानिक साहित्य में पेशेंट ‘एस.एम.’ के नाम से जाना जाता है। उसे Urbach-Wiethe नामक दुर्लभ रोग के कारण दोनों अमिग्डाला में व्यापक क्षति हुई थी। अध्ययनों में उसने साँपों, मकड़ियों, डरावनी फिल्मों और कुछ अन्य सामान्य रूप से भय पैदा करने वाली परिस्थितियों में बहुत कम डर दिखाया। उसे भयभीत चेहरों को पहचानने और सामान्य fear conditioning में भी कठिनाई थी। कुछ समय तक इससे ऐसा लगा कि अमिग्डाला के बिना मनुष्य शायद डर ही नहीं सकता। लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने ऐसा प्रयोग किया जिसने इस धारणा को बदल दिया।
‘निडर’ महिला को कार्बन डाइऑक्साइड ने डरा दिया
शोधकर्ताओं ने एस.एम.. सहित तीन ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी दोनों अमिग्डाला क्षतिग्रस्त थीं, उच्च सांद्रता वाली कार्बन डाइऑक्साइड श्वास के माध्यम से दी। कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा शरीर में हवा की कमी और घुटन जैसी आंतरिक शारीरिक स्थिति पैदा कर सकती है। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि इन लोगों में डर की प्रतिक्रिया बहुत कम होगी, लेकिन परिणाम उलटा निकला। तीनों ने तीव्र भय का अनुभव किया और कुछ में पैनिक जैसी प्रतिक्रिया भी हुई।
यह खोज बेहद महत्वपूर्ण थी। इससे पता चला कि अमिग्डाला बाहरी खतरों से जुड़े डर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन डर केवल अमिग्डाला पर निर्भर नहीं है। शरीर के भीतर से आने वाले खतरे, जैसे घुटन, कार्बन डाइऑक्साइड का बढ़ना या साँस से जुड़ी गंभीर समस्या, दूसरे तंत्रिका मार्गों के जरिए भी भय और पैनिक पैदा कर सकते हैं। यानी ‘अमिग्डाला निकाल दो और डर खत्म’ वैज्ञानिक रूप से सही बात नहीं है।
क्या पूरी तरह निडर इंसान संभव है?
व्यावहारिक रूप से यह बेहद कठिन है। किसी व्यक्ति में सामान्य भय बहुत कम हो सकता है। जन्मजात व्यक्तित्व, आनुवंशिकी, अनुभव, मस्तिष्क की संरचना, हार्मोन, सीख और संस्कृति सभी भय की संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं। कुछ लोग ऊँचाई से कम डरते हैं, कुछ साँपों से नहीं डरते और कुछ युद्ध या बेहद जोखिम वाली परिस्थितियों में असाधारण रूप से शांत रह सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके शरीर में भय की व्यवस्था ही मौजूद नहीं है।
अमिग्डाला को नुकसान पहुँचे दुर्लभ लोग भी आंतरिक शारीरिक खतरे पर भय अनुभव कर सकते हैं। इसलिए उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ज्यादा सही बात यह है कि मनुष्य में डर की कई प्रणालियाँ हैं और किसी एक प्रणाली को नुकसान होने पर भी दूसरी भय प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। साइकोपैथ व्यक्ति को क्या डर नहीं लगता?
यह लोकप्रिय धारणा भी बहुत ज्यादा सरल है। कुछ व्यक्तित्व लक्षणों से जुड़े लोगों में भय से जुड़ी सीख, खतरे के संकेतों और दूसरों के डर को पहचानने में अंतर मिल सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे जैविक रूप से डर से पूरी तरह मुक्त होते हैं। वे दर्द, गिरफ्तारी, जीवन के खतरे या दूसरे शारीरिक संकटों पर प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इसलिए साइकोपैथ का निडर कहा जाना वैज्ञानिक रूप से सही समीकरण नहीं है।
सैनिक और फायरफाइटर डरते नहीं हैं?
वे भी डरते हैं। प्रशिक्षण का उद्देश्य डर को पूरी तरह मिटाना नहीं, बल्कि डर की स्थिति में भी सही काम करना सीखना है। बार-बार अभ्यास से परिस्थितियाँ परिचित होती हैं, स्वचालित प्रक्रियाएँ विकसित होती हैं और मस्तिष्क खतरे के बीच भी व्यवस्थित कार्रवाई करना सीखता है। इसी कारण सैन्य प्रशिक्षण, अग्निशमन अभ्यास, विमानन आपात प्रशिक्षण और चिकित्सा आपात स्थितियों के ट्रेनिंग का महत्व है। असली साहस अक्सर डर का अभाव नहीं, बल्कि डर के बावजूद उचित व्यवहार करने की क्षमता है।
कुछ लोग डर में भागते हैं, कुछ लड़ते हैं और कुछ जम जाते हैं, क्यों?
इसका कोई एक कारण नहीं होता। खतरे की दूरी, व्यक्ति के बच निकलने की संभावना, पहले का अनुभव, प्रशिक्षण, सामाजिक संदर्भ, व्यक्तित्व और उस समय की शारीरिक अवस्था, सभी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। अगर भागने का रास्ता साफ है तो भागना ज्यादा उपयोगी हो सकती है। अगर रास्ता बंद है और संघर्ष संभव है तो संघर्ष सक्रिय हो सकता है। अगर खतरे की प्रकृति स्पष्ट नहीं है तो फ्रीज़ पहले आ सकता है। इसलिए यह कहना कि ‘बहादुर लोग लड़ते हैं और कमजोर लोग जम जाते हैं’ जीवविज्ञान की दृष्टि से गलत है। तीनों प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग परिस्थितियों में काम आने वाली रक्षात्मक रणनीतियाँ हैं।
क्या डर कभी उपयोगी से हानिकारक बन जाता है?
स्वस्थ डर आम तौर पर खतरे के अनुपात में होता है और खतरा समाप्त होने पर धीरे-धीरे कम हो जाता है। समस्या तब शुरू होती है जब मस्तिष्क बार-बार सुरक्षित परिस्थितियों को खतरे की तरह समझने लगता है। अगर लिफ्ट में एक बार घबराहट हुई और बाद में हर लिफ्ट डर पैदा करने लगे तो बचाव तंत्र वास्तविक खतरे से कहीं ज्यादा सक्रिय हो रहा है। अगर युद्ध समाप्त हो गया लेकिन मामूली आवाज भी शरीर को ऐसे सक्रिय कर दे जैसे गोली चल रही हो, तो पुराना रक्षा नेटवर्क वर्तमान परिस्थिति के अनुसार शांत नहीं हो पाया है। यही कारण है कि एंग्जायटी डिसऑर्डर, फोबिया और पीटीएसडी में भय नेटवर्क और उसके नियंत्रण को समझना महत्वपूर्ण है। भय से जुड़ी सीख और उसके नियमन में अमिग्डाला, प्रीफ्रंटल क्षेत्रों और दूसरी संरचनाओं के बीच संबंधों पर व्यापक शोध हुआ है।
हमें काल्पनिक चीजों से वास्तविक डर कैसे लग सकता है?
यह मानव मस्तिष्क की असाधारण क्षमता का परिणाम है। इंसान को डरने के लिए खतरा सामने होना जरूरी नहीं है। वह भविष्य की कल्पना कर सकता है। ‘अगर नौकरी चली गई तो?’ ‘अगर रिपोर्ट खराब निकली तो?’ ‘अगर विमान गिर गया तो?’‘अगर लोग मेरा मजाक उड़ाएँगे तो?’
मस्तिष्क भविष्य की इन कल्पनाओं को कभी-कभी इतनी गंभीरता से संसाधित करता है कि शरीर वर्तमान खतरे जैसी प्रतिक्रिया देने लगता है। इसका फायदा यह है कि हम भविष्य की तैयारी कर सकते हैं। नुकसान यह है कि इंसान उस चीज से भी डर सकता है जो कभी हुई ही नहीं और शायद कभी होगी भी नहीं। जानवर तत्काल खतरे से डर सकते हैं, लेकिन मनुष्य संभावित भविष्य, सामाजिक प्रतिष्ठा, असफलता, मृत्यु और अपनी कल्पना से भी डर सकता है।
हॉरर फिल्म देखकर डर क्यों लगता है?
क्योंकि बौद्धिक ज्ञान और प्राथमिक रक्षात्मक प्रतिक्रिया एक ही गति से काम नहीं करते। आप जानते हैं कि स्क्रीन पर दिखाई दे रहा भूत नकली है, लेकिन अचानक तेज आवाज, अंधेरा, अप्रत्याशित चेहरा और तेजी से बदलता दृश्य मस्तिष्क के खतरा पहचानने वाले नेटवर्क को सक्रिय कर सकते हैं। कुछ ही देर बाद आपका उच्च स्तरीय मस्तिष्क कहता है, ‘यह सिर्फ फिल्म है।’ इसलिए हॉरर फिल्म का आनंद इसी विरोधाभास से आता है। शरीर कुछ समय के लिए वास्तविक खतरे जैसा व्यवहार करता है, जबकि मस्तिष्क जानता है कि आप सुरक्षित हैं। इसी नियंत्रित भय से कुछ लोगों को रोमांच मिलता है।
डर के बाद राहत अच्छी क्यों लगती है?
रोलर-कोस्टर, हॉरर फिल्म या रोमांचक खेल में व्यक्ति पहले खतरे जैसी उत्तेजना महसूस करता है और फिर सुरक्षित होने की पुष्टि मिलती है। तेज उत्तेजना के बाद सुरक्षा का अनुभव राहत और आनंद पैदा कर सकता है। इसमें तनाव और रिवॉर्ड सिस्टम दोनों की भूमिका हो सकती है। व्यक्ति अपने शरीर की तेज धड़कन को ‘भय’ के बजाय ‘रोमांच’ के रूप में भी समझ सकता है, क्योंकि उसे पता होता है कि परिस्थिति नियंत्रित है। इसलिए डर और रोमांच का शरीर विज्ञान कुछ हद तक एक-दूसरे से मिलता है। अंतर केवल शरीर में होने वाली प्रतिक्रिया में नहीं, बल्कि उस प्रतिक्रिया का संदर्भ और अर्थ समझने के तरीके में भी होता है।
बच्चों में डर कैसे विकसित होता है?
बच्चों के डर उम्र के साथ बदलते हैं। बहुत छोटे बच्चों में तेज आवाज, अचानक गति और माता-पिता से अलग होने का डर प्रमुख हो सकता है। बाद में अजनबी, अंधेरा, काल्पनिक प्राणी और फिर सामाजिक असफलता या दूसरों के मूल्यांकन जैसे डर विकसित हो सकते हैं। बच्चे दूसरों को देखकर भी डर सीख सकते हैं। अगर माता-पिता हर कुत्ते को देखकर अत्यधिक भय दिखाएँ तो बच्चा यह सीख सकता है कि कुत्ता खतरनाक है, भले उसे खुद कभी कुत्ते ने काटा न हो। इसलिए डर केवल व्यक्तिगत अनुभव से नहीं, बल्कि सामाजिक सीख से भी बनता है।
डर और चिंता में मूल अंतर क्या है?
सरल रूप में देखें तो डर अक्सर किसी अपेक्षाकृत स्पष्ट और तत्काल खतरे से जुड़ा होता है, जबकि चिंता ज्यादा अनिश्चित या भविष्य में होने वाले संभावित खतरे से जुड़ सकती है। सामने साँप है, यह डर है। ‘कहीं भविष्य में साँप न आ जाए’, यह चिंता हो सकती है। लेकिन वास्तविक मस्तिष्क में दोनों प्रणालियाँ काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ी और ओवरलैप करती हैं। इसलिए इनके बीच बिल्कुल कठोर सीमा खींचना संभव नहीं है।
डर न होना वास्तव में खतरनाक क्यों होगा?
हम अक्सर निडरता को आदर्श मानते हैं, लेकिन पूरी तरह निडर होना जीवित रहने के लिए फायदेमंद नहीं होगा। अगर आग से डर न हो तो व्यक्ति जल सकता है। ऊँचाई से डर न हो तो गिरने का जोखिम बढ़ सकता है। तेज वाहन से डर न हो तो सड़क पार करते समय सावधानी कम हो सकती है। किसी हिंसक व्यक्ति के सामने भय न हो तो खतरे का सही आकलन करना मुश्किल हो सकता है। इसलिए स्वस्थ मस्तिष्क का लक्ष्य शून्य डर नहीं है। लक्ष्य है सही खतरे पर सही मात्रा में डर और खतरा समाप्त होने पर उस डर को बंद करने की क्षमता। यही इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। मनुष्य को जीवित रखने वाली व्यवस्था वही है जो कभी-कभी उसे परेशान भी करती है। लाखों वर्षों तक मस्तिष्क ने यह सीखा कि जंगल में गलत चेतावनी देना, असली खतरे को नजरअंदाज करने से ज्यादा सुरक्षित है। आधुनिक दुनिया में जंगल के शेर कम हो गए हैं, लेकिन वही पुराना सुरक्षा तंत्र अब ईमेल, परीक्षा, नौकरी, सामाजिक आलोचना, वित्तीय नुकसान और भविष्य की कल्पना पर भी सक्रिय हो सकता है।
इसलिए जब आपका दिल अचानक तेज धड़कता है, साँस बदलती है, हथेलियाँ पसीजती हैं और पेट सिकुड़ता है, तो शरीर आपके खिलाफ नहीं जा रहा होता। वह वास्तव में एक बहुत पुराना संदेश भेज रहा होता है, ‘कुछ महत्वपूर्ण हो सकता है, तैयार हो जाओ।’
समस्या डर में नहीं, उसकी सटीकता में है। सही खतरे पर डर जीवन बचाता है, लेकिन गलत खतरे पर वही डर जीवन को सीमित कर सकता है। शायद डर को समझने की सबसे सही परिभाषा यही है कि डर भविष्यवाणी है, शरीर की वह जैविक तैयारी जिसमें मस्तिष्क वास्तविक या संभावित खतरे को पहचानकर पूरे शरीर को कुछ ही क्षणों में जीवित रहने की अवस्था में बदल देता है।
और सबसे रोचक तथ्य यह है कि जिन दुर्लभ मनुष्यों में अमिग्डाला को गंभीर नुकसान पहुँचा था और जो साँप, मकड़ी या दूसरे बाहरी खतरों से लगभग नहीं डरते थे, उनके भीतर भी घुटन के संकेत ने भय पैदा किया। इससे एक गहरी बात सामने आती है। प्रकृति ने जीवन की रक्षा किसी एक अलार्म के भरोसे नहीं छोड़ी है। डर के कई रास्ते हैं, क्योंकि जीवित रहने की कीमत बहुत बड़ी है।


