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Senior Age: इंसान की उम्र में ‘बुढ़ापा’ 60 साल से ही क्यों माना जाता है? जानिए इसके पीछे का विज्ञान
Science Behind Senior Citizen Age: भारत में 60 साल की उम्र में वरिष्ठ नागरिक क्यों माना जाता है? जानिए 60 साल की सीमा किसने तय की, शरीर में बुढ़ापा कब शुरू होता है और उम्र व जैविक उम्र में क्या अंतर है।
Why Is 60 Considered Old Age
Senior Citizen Age Explained: अगर किसी व्यक्ति की उम्र 59 साल 11 महीने है तो वह अचानक ‘बूढ़ा’ नहीं होता। लेकिन जैसे ही उम्र 60 साल पूरी होती है, भारत के कानून और कई सरकारी व्यवस्थाओं में उसकी पहचान ‘वरिष्ठ नागरिक’ के रूप में होने लगती है। सवाल यह है कि आखिर 60 ही क्यों?
क्या मानव शरीर में 60वें जन्मदिन पर कोई ऐसा बदलाव आता है जिसके बाद वैज्ञानिक रूप से व्यक्ति को बूढ़ा कहा जा सके? क्या दुनिया के वैज्ञानिकों ने मिलकर तय किया था कि 60 साल से बुढ़ापा शुरू होगा? या किसी सरकार ने यह सीमा अपनी सुविधा के लिए बनाई?
दिलचस्प जवाब यह है कि 60 साल कोई जैविक सीमा नहीं है। यह मुख्यतः सामाजिक और प्रशासनिक सीमा है।
भारत में कानून के अनुसार 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के भारतीय नागरिक को ‘वरिष्ठ नागरिक’ माना जाता है। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 में ‘senior citizen’ की परिभाषा ही 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र वाले भारतीय नागरिक के रूप में दी गई है।
लेकिन दुनिया में हर जगह यह सीमा एक जैसी नहीं है। और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यह नहीं कहता कि 60 की उम्र में शरीर अचानक वृद्ध हो जाता है।
आखिर 60 साल ही क्यों चुना गया?
कभी भी किसी एक व्यक्ति ने बैठकर यह तय नहीं किया था कि आज से इंसान 60 साल में बूढ़ा माना जाएगा।
दरअसल, 60 वर्ष की सीमा धीरे-धीरे जनसंख्या अध्ययन, सामाजिक नीति, रोजगार, पेंशन और स्वास्थ्य व्यवस्था में इस्तेमाल होने लगी। इसका एक बड़ा कारण यह था कि समाज को उम्र के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांटने के लिए एक व्यावहारिक सीमा चाहिए थी।
किसी सरकार को यह तय करना होता है कि वृद्धावस्था से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं किस उम्र से दी जाएं, पेंशन या सामाजिक सहायता किस आयु से शुरू हो, बुजुर्गों के लिए कौन-सी योजनाएं बनाई जाएं और जनसंख्या के आंकड़ों में किस उम्र से लोगों को उम्रदराज (older persons) की श्रेणी में गिना जाए।
ऐसे में 60 वर्ष एक उपयोगी प्रशासनिक सीमा बन गई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कई वैश्विक संदर्भों में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को उम्रदराज (older people) के रूप में देखता है। संयुक्त राष्ट्र के स्वस्थ वृद्धावस्था दशक के संदर्भ में भी 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को उम्रदराज (older people) की श्रेणी में रखा गया है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 60 वर्ष की उम्र में हर इंसान के शरीर में एक जैसी जैविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सच्चाई ये है कि विज्ञान इससे बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाता है।
शरीर में बुढ़ापा शुरू कब होता है?
इस सवाल का कोई एक जवाब नहीं है। क्योंकि बुढ़ापा एक प्रक्रिया है, घटना नहीं। हमारे शरीर की कोशिकाओं में उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे बदलाव होते रहते हैं। डीएनए को नुकसान, कोशिकाओं की मरम्मत क्षमता में बदलाव, प्रोटीन की गुणवत्ता में गिरावट, कोशिकीय स्तर पर क्षति का जमा होना, प्रतिरक्षा प्रणाली में बदलाव और मांसपेशियों तथा हड्डियों की क्षमता में धीरे-धीरे परिवर्तन - ये सभी प्रक्रियाएं जीवन के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग गति से होती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जैविक स्तर पर एजिंग समय के साथ विभिन्न प्रकार की आणविक और कोशिकीय क्षति के जमा होने का परिणाम है। इससे धीरे-धीरे शारीरिक और मानसिक क्षमता में कमी तथा बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। लेकिन ये बदलाव न तो सीधी रेखा में होते हैं और न ही हर व्यक्ति में एक जैसे होते हैं।
यानी 60 साल की उम्र कोई जैविक स्विच नहीं है। 59 साल तक शरीर जवान और 60 की सुबह अचानक बूढ़ा, ऐसा विज्ञान में नहीं होता।
फिर 60 को लेकर इतनी चर्चा क्यों है?
ऐसा इसलिए क्योंकि उम्र सिर्फ शरीर का मामला नहीं है।समाज को लोगों की उम्र के आधार पर अलग-अलग जरूरतों का अनुमान लगाना पड़ता है। उदाहरण के लिए 20 साल की आबादी और 70 साल की आबादी की स्वास्थ्य जरूरतें अलग हो सकती हैं। 30 साल के व्यक्ति के लिए रोजगार नीति महत्वपूर्ण हो सकती है, जबकि 70 साल के व्यक्ति के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और अकेलेपन से बचाव जैसी नीतियां ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
इसीलिए उम्र की कुछ श्रेणियां बनाना प्रशासनिक रूप से उपयोगी है।
भारत ने भी 60 वर्ष की सीमा को अपने वरिष्ठ नागरिक कानून में अपनाया। 2007 के माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के व्यक्ति को वरिष्ठ नागरिक माना गया है।
भारत में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकारी नीतियों का इतिहास इससे भी पुराना है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय वृद्धजन नीति 1999 में वृद्ध लोगों की आर्थिक सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य देखभाल, आवास और अन्य जरूरतों के लिए राज्य की भूमिका पर जोर दिया गया था।
इसलिए 60 की सीमा को समझने के लिए इसे ‘बुढ़ापे की वैज्ञानिक शुरुआत’ की बजाय ‘वृद्धावस्था से जुड़ी नीतियों की प्रशासनिक सीमा’ के रूप में देखना ज्यादा सही है।
क्या दुनिया के हर देश में 60 साल के बाद बुजुर्ग माना जाता है?
बूढ़े इंसान (Older person) की कोई ऐसी सार्वभौमिक उम्र नहीं है जिसे पूरी दुनिया ने हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया हो। अलग-अलग देशों और संस्थाओं में अलग-अलग सीमाएं इस्तेमाल की जाती हैं। कहीं 60 वर्ष, कहीं 65 वर्ष और कुछ संदर्भों में इससे भी अलग आयु सीमा उपयोग की जाती है।
इसका कारण भी समझना आसान है।
जिस समाज में औसत जीवन प्रत्याशा 45 या 50 साल थी, वहां 60 वर्ष की उम्र बहुत अलग अर्थ रखती थी। लेकिन आज जब लोग 70, 80 और उससे अधिक उम्र तक जीवित रह रहे हैं, तब 60 को ‘बुढ़ापे’ की अंतिम और निश्चित शुरुआत मानना ज्यादा मुश्किल हो गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में लोग पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं और आज अधिकांश लोगों के 60 के दशक और उसके बाद तक पहुंचने की उम्मीद की जा सकती है।
यानी जिस उम्र को कभी जीवन के अंतिम हिस्से के करीब माना जा सकता था, वह अब कई लोगों के लिए जीवन के एक लंबे नए चरण की शुरुआत बन चुकी है।
60 साल का व्यक्ति आज पहले जैसा नहीं है
आधुनिक चिकित्सा, बेहतर पोषण, टीकाकरण, स्वच्छता, व्यायाम और कई बीमारियों के बेहतर इलाज ने जीवन की तस्वीर बदल दी है। आज 60 साल का व्यक्ति नौकरी कर सकता है, यात्रा कर सकता है, खेल सकता है, नई चीजें सीख सकता है और कई मामलों में 40 या 50 साल की उम्र वाले व्यक्ति जितना सक्रिय जीवन जी सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन साफ तौर पर कहता है कि वृद्ध लोगों में भारी विविधता होती है। कुछ 80 साल के लोगों की शारीरिक और मानसिक क्षमता कई 30 साल के लोगों के समान हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में क्षमता में गंभीर गिरावट इससे काफी कम उम्र में शुरू हो सकती है।
यानी उम्र और शरीर की वास्तविक स्थिति के बीच संबंध है, लेकिन यह संबंध बिल्कुल सीधा नहीं है। इसीलिए आधुनिक चिकित्सा में सिर्फ जन्म की तारीख देखकर किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य क्षमता तय करना पर्याप्त नहीं माना जाता।
तो क्या 60 की उम्र में शरीर में कोई बदलाव नहीं होता?
उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई बदलावों की संभावना बढ़ती है। मांसपेशियों की मात्रा और ताकत कम हो सकती है। हड्डियों का घनत्व घट सकता है। त्वचा में बदलाव आता है। आंखों और कानों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। प्रतिक्रिया की गति बदल सकती है। प्रतिरक्षा प्रणाली में उम्र से जुड़े बदलाव आ सकते हैं और कुछ गैर-संचारी रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।
लेकिन इन बदलावों की गति हर व्यक्ति में अलग होती है।
किसी व्यक्ति ने जीवन भर व्यायाम किया है, संतुलित भोजन लिया है, धूम्रपान नहीं किया और सामाजिक रूप से सक्रिय रहा है तो 60 की उम्र में उसकी कार्यक्षमता किसी दूसरे व्यक्ति से बहुत अलग हो सकती है।
इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन अब ‘healthy ageing’ को केवल बीमारी की अनुपस्थिति से नहीं जोड़ता। उसका जोर इस बात पर है कि व्यक्ति उम्र बढ़ने के बावजूद वह काम कर सके जो उसके लिए महत्वपूर्ण हैं। WHO इसे functional ability के रूप में देखता है।
यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण है।
पुरानी सोच पूछती थी कि “व्यक्ति की उम्र कितनी है?”
नई सोच पूछती है कि 'व्यक्ति कितना सक्षम है?”
फिर 65 साल की सीमा कहां से आती है?
अगर आपने विदेशों में पेंशन, सेवानिवृत्ति या वृद्धावस्था की चर्चा सुनी है तो 65 साल की उम्र भी काफी आम लगेगी। इसका कारण यह है कि कई देशों में सामाजिक सुरक्षा और पेंशन व्यवस्था के विकास के दौरान 65 वर्ष जैसी उम्रों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन पेंशन की उम्र और जैविक वृद्धावस्था की उम्र एक ही चीज नहीं हैं।
किसी देश में सरकारी पेंशन 65 साल से शुरू हो सकती है, दूसरे देश में 60 या 67 साल से। इसका मतलब यह नहीं है कि पहले देश में लोग 65 पर बूढ़े और दूसरे देश में 60 पर बूढ़े हो जाते हैं।
यह सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की डिजाइन है।
यही अंतर भारत में भी समझना जरूरी है।
भारत में ‘वरिष्ठ नागरिक’ की कानूनी परिभाषा 60 वर्ष है। लेकिन हर सरकारी योजना, कर नियम, पेंशन व्यवस्था या रोजगार संबंधी नियम में उम्र की सीमा एक जैसी होना जरूरी नहीं है।
इसलिए ‘60 साल का मतलब बूढ़ा’ कहना कानूनी और सामाजिक संदर्भ में तो उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसे जैविक सत्य मानना गलत होगा।
क्या भविष्य में वरिष्ठ नागरिक की उम्र 60 से बढ़ सकती है?
जैसे-जैसे जीवन प्रत्याशा बढ़ती है और लोग ज्यादा उम्र तक स्वस्थ रहते हैं, सरकारों को यह सवाल लगातार देखना पड़ता है कि पुरानी उम्र सीमाएं आज भी उचित हैं या नहीं। भारत में भी वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ रही है। WHO के अनुसार 2011 की जनगणना में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 104 मिलियन थी, जो कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत थी।
दुनिया में भी वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ रही है। WHO के अनुसार 2020 में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या दुनिया भर में एक अरब से अधिक थी और 2050 तक यह संख्या लगभग 2.1 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। इस बदलाव का अर्थ यह है कि भविष्य में ‘बुजुर्ग’ शब्द का सामाजिक अर्थ भी बदल सकता है।
असली सवाल उम्र नहीं, क्षमता है
मानव इतिहास में उम्र को हमेशा केवल जैविक संख्या के रूप में नहीं देखा गया। समाजों ने उम्र को जिम्मेदारियों, काम, परिवार, अनुभव और सामाजिक भूमिका से भी जोड़ा।
आज विज्ञान हमें यह समझने में मदद कर रहा है कि chronological age यानी जन्म के बाद बीते वर्षों की संख्या और biological age यानी शरीर की वास्तविक जैविक स्थिति एक ही चीज नहीं हैं।
दो लोगों की उम्र 60-60 साल हो सकती है, लेकिन उनके शरीर, स्वास्थ्य, मांसपेशियों, मस्तिष्क, जीवनशैली और कार्यक्षमता में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है।
इसलिए 60 साल को ‘बुढ़ापे की शुरुआत’ कहना एक प्रशासनिक सुविधा है, शरीर की कोई अंतिम घोषणा नहीं।
भारत में 60 साल पूरा होने पर कानून आपको वरिष्ठ नागरिक मान सकता है। WHO भी कई सार्वजनिक स्वास्थ्य संदर्भों में 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र को older people की श्रेणी में रखता है। लेकिन विज्ञान यह नहीं कहता कि 60वें जन्मदिन पर शरीर अचानक वृद्ध हो जाता है।
दरअसल, आधुनिक विज्ञान की नजर में बुढ़ापा कोई एक दिन शुरू होने वाली घटना नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है।
और शायद इसलिए 60 साल को ‘बुढ़ापे की उम्र’ कहने से ज्यादा सही यह कहना होगा कि 60 साल वह उम्र है जिसे समाज ने वृद्धावस्था की जरूरतों को पहचानने के लिए एक सुविधाजनक सीमा के रूप में चुना है।
कैलेंडर आपकी उम्र बताता है।
लेकिन आपका शरीर वास्तव में कितना बूढ़ा है, यह सिर्फ कैलेंडर तय नहीं करता।


