मस्तिष्क गंधों को कैसे पहचानता है? कभी बिना किसी वजह सिगरेट, धुआं या इत्र की महक क्यों आने लगती है?

Phantom Smell: कमरे में कोई धुआं न होने पर भी सिगरेट, जलने या इत्र की गंध क्यों आती है? जानिए मस्तिष्क गंधों को कैसे पहचानता है और Phantosmia क्या है।

Yogesh Mishra
Published on: 29 Aug 2026 10:07 AM IST
Phantom Smell
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Phantom Smell (Image Credit-Social Media)

Phantom Smell: कभी आप कमरे में बिल्कुल अकेले बैठे हों और अचानक आपको सिगरेट के धुएं की तेज गंध महसूस हो। आप आसपास देखते हैं, खिड़की-दरवाजा जांचते हैं, लेकिन कहीं कोई सिगरेट नहीं जल रही। फिर भी कुछ देर तक वह गंध इतनी वास्तविक लगती है जैसे कोई आपके ठीक पास बैठकर धूम्रपान कर रहा हो। कभी यही अनुभव इत्र, फूल, जली हुई चीज, मिट्टी या किसी परिचित खुशबू के साथ भी हो सकता है। सवाल है कि जब बाहर कोई गंध थी ही नहीं, तो आखिर आपने उसे महसूस कैसे किया?

इसका जवाब हमारी नाक से ज्यादा हमारे मस्तिष्क में छिपा है। आम तौर पर हम कहते हैं कि हम नाक से सूंघते हैं, लेकिन वैज्ञानिक रूप से नाक केवल वातावरण से रासायनिक संकेत पकड़ती है। उन संकेतों को पहचानकर उन्हें ‘गुलाब’, ‘कॉफी’, ‘धुआं’ या ‘सिगरेट’ का अनुभव मस्तिष्क बनाता है। हवा में मौजूद गंध के बेहद छोटे रासायनिक अणु नाक के ऊपरी हिस्से में मौजूद विशेष तंत्रिका कोशिकाओं (Nerve Cells ) तक पहुंचते हैं। ये कोशिकाएं उस रासायनिक जानकारी को तंत्रिका संकेतों (nerve signals) में बदलती हैं और आगे मस्तिष्क तक भेजती हैं। वहां अलग-अलग संकेतों का पैटर्न पहचाना जाता है और हमें किसी खास गंध का अनुभव होता है।

यानी फूल के अंदर ‘खुशबू’ नाम की कोई चीज सीधे हमारे दिमाग तक नहीं पहुंचती। फूल से निकले रासायनिक अणु (chemical molecules) नाक तक पहुंचते हैं और मस्तिष्क उनकी व्याख्या करके हमें बताते हैं कि यह गुलाब की खुशबू है। यही वजह है कि गंध को समझना वास्तव में यह समझना है कि हमारा मस्तिष्क बाहरी दुनिया से मिली रासायनिक जानकारी को अनुभव में कैसे बदलता है।

नाक गंध पकड़ती है, लेकिन पहचान मस्तिष्क करता है

जब हम सांस लेते हैं तो हवा के साथ गंध पैदा करने वाले अणु नाक के भीतर ऊपर की तरफ मौजूद घ्राण उपकला (Olfactory epithelium ) तक पहुंचते हैं। यहां विशेष घ्राण संवेदी तंत्रिका कोशिकाएं (Olfactory sensory neurons ) होती हैं। इन कोशिकाओं पर ऐसे ग्रहणकर्ता होते हैं जो अलग-अलग रासायनिक अणुओं के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।



यह व्यवस्था किसी साधारण शब्दकोश जैसी नहीं है कि गुलाब के लिए एक ग्रहणकर्ता (receptor) और कॉफी के लिए दूसरा। किसी गंध को पहचानने में कई ग्रहणकर्ता एक साथ सक्रिय हो सकते हैं और एक ही ग्रहणकर्ता कई तरह के अणुओं पर प्रतिक्रिया कर सकता है। मस्तिष्क इन गतिविधियों के पूरे पैटर्न को पढ़ता है। इसे ऐसे समझिए जैसे संगीत में अलग-अलग सुर मिलकर एक धुन बनाते हैं। किसी एक सुर से पूरी धुन की पहचान नहीं होती, लेकिन सुरों का खास मेल उसे पहचानने योग्य बना देता है। गंध के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है।

नाक से निकले तंत्रिका संकेत सबसे पहले घ्राण बल्ब (Olfactory bulb ) तक पहुंचते हैं। वहां इन संकेतों का शुरुआती प्रसंस्करण होता है और फिर सूचना मस्तिष्क के उन हिस्सों तक जाती है जो पहचान, स्मृति, भावना और व्यवहार से जुड़े हैं। यहीं गंध बाकी कई इंद्रियों से अलग और बेहद दिलचस्प हो जाती है।

एक खुशबू अचानक बचपन में क्यों पहुंचा देती है?

मान लीजिए किसी पुराने घर में प्रवेश करते ही आपको ऐसी खुशबू आती है जो आपको बचपन की याद दिला देती है। कोई पुराना साबुन, दादी के घर की रसोई, बारिश के बाद मिट्टी की गंध या किसी व्यक्ति का इस्तेमाल किया हुआ इत्र अचानक वर्षों पुरानी घटना को आपके सामने ला सकता है। इसका कारण यह है कि घ्राण तंत्र (Olfactory system ) का संबंध मस्तिष्क के उन हिस्सों से बहुत करीब है जो भावनाओं और स्मृतियों से जुड़े हैं। खासकर एमीगडाला (Amygdala) और स्मृति से जुड़े मस्तिष्कीय तंत्र (Nervous System ) गंध के अनुभव के साथ गहराई से जुड़े होते हैं।

इसीलिए कोई खुशबू केवल खुशबू नहीं रहती। वह किसी व्यक्ति, जगह, घटना और उस समय महसूस हुई भावना के साथ जुड़ सकती है। किसी खास इत्र की महक आपको किसी पुराने रिश्ते की याद दिला सकती है। अस्पताल जैसी गंध किसी पुराने डर को वापस ला सकती है। बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू किसी को बचपन के गांव तक पहुंचा सकती है। गंध और स्मृति का यह संबंध इतना मजबूत हो सकता है कि एक छोटी-सी खुशबू अचानक कई साल पुरानी याद को बेहद जीवंत बना दे। लेकिन यहीं एक और रहस्यमय घटना शुरू होती है। अगर मस्तिष्क गंध को पहचान सकता है, तो क्या वह कभी ऐसी गंध का अनुभव भी बना सकता है जिसका स्रोत बाहर मौजूद ही नहीं है? इसका जवाब है - हां।

जब बाहर गंध नहीं होती, फिर भी हमें गंध आती है

चिकित्सा विज्ञान में ऐसी स्थिति को फैंटोस्मिया (Phantosmia) कहा जाता है। इसका मतलब है कि व्यक्ति को किसी बाहरी गंध-स्रोत के बिना भी गंध महसूस होती है। इसे आम भाषा में ‘फैंटम स्मेल’ (phantom smell) भी कहा जाता है।

मान लीजिए कमरे में कोई सिगरेट नहीं है, फिर भी आपको सिगरेट का धुआं महसूस हो रहा है। या कोई चीज जल नहीं रही, लेकिन आपको जलने की गंध आ रही है। व्यक्ति के लिए यह अनुभव बिल्कुल वास्तविक हो सकता है। वह गंध का नाटक नहीं कर रहा होता और न ही जरूरी है कि वह भ्रमित हो। उसके मस्तिष्क में वास्तव में ऐसी तंत्रिका गतिविधि हो सकती है जिसे वह किसी खास गंध के रूप में अनुभव कर रहा है।

सामान्य स्थिति में गंध की प्रक्रिया बाहर से शुरू होती है। हवा में मौजूद रासायनिक अणु नाक को उत्तेजित करते हैं और संकेत मस्तिष्क तक पहुंचते हैं। फैंटोस्मिया में बाहरी गंध-स्रोत मौजूद नहीं होता, लेकिन घ्राण तंत्र के किसी हिस्से में ऐसी गतिविधि हो सकती है जिसकी मस्तिष्क गंध के रूप में व्याख्या कर देता है। हालांकि इसका पूरा जैविक तंत्र अभी वैज्ञानिकों के लिए पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

सिगरेट और जलने की गंध ही बार-बार क्यों?

फैंटोस्मिया का वर्णन करने वाले लोगों में धुआं, जलने की चीज, सड़न या रासायनिक पदार्थ जैसी अप्रिय गंधों का उल्लेख अक्सर मिलता है। लेकिन विज्ञान अभी यह निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि बिना स्रोत के मस्तिष्क ऐसी गंधों को क्यों पैदा करता है। यह कहना आसान होगा कि मस्तिष्क खतरे से जुड़ी गंधों को प्राथमिकता देता है, इसलिए धुएं या जलने की गंध ज्यादा महसूस होती है। लेकिन इसे अभी स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

इतना जरूर है कि धुआं, आग, सड़न और जहरीले पदार्थों की गंध का जैविक महत्व बहुत पुराना है। घ्राण तंत्र ने विकास के दौरान भोजन, खतरे और विषैले पदार्थों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन फैंटोस्मिया में इन खास गंधों के बार-बार सामने आने का सही कारण अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।

क्या इसका मतलब मस्तिष्क में कोई गंभीर बीमारी है?

बिना स्रोत के गंध आने के कई संभावित कारण हो सकते हैं। सर्दी-जुकाम, साइनस की समस्या, नाक में सूजन, धूम्रपान, कुछ दवाएं, दांतों से जुड़ी समस्या या किसी वायरल संक्रमण के बाद घ्राण तंत्र में बदलाव इसके पीछे हो सकते हैं। कोरोना के बाद गंध से जुड़ी समस्याओं ने इस विषय को खास तौर पर चर्चा में ला दिया। कुछ लोगों में संक्रमण के बाद गंध की क्षमता कम हुई, कुछ में गंध का अनुभव विकृत हो गया और कुछ लोगों को ऐसी गंध महसूस हुई जो आसपास मौजूद नहीं थी। वायरल संक्रमण के बाद घ्राण तंत्र के सामान्य होने की प्रक्रिया हमेशा एक जैसी नहीं होती।

लेकिन कुछ मामलों में फैंटोस्मिया का संबंध तंत्रिका तंत्र (nervous system) की समस्याओं से भी हो सकता है। उदाहरण के लिए मिर्गी के कुछ रोगियों के ब्रेन के टेम्पोरल लोब (Temporal Lobe ) में दौरे से पहले असामान्य गंध महसूस होने की स्थिति देखी गई है। माइग्रेन, सिर की चोट और कुछ तंत्रिका संबंधी बीमारियों में भी ऐसे अनुभव दर्ज किए गए हैं। बहुत दुर्लभ मामलों में मस्तिष्क की संरचनात्मक समस्या भी इसका कारण हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक-दो बार सिगरेट या धुएं की गंध महसूस करने वाले व्यक्ति को मिर्गी या मस्तिष्क की बीमारी है। कई मामलों में इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता।

फैंटोस्मिया और पैरोस्मिया (Parosmia) में बड़ा अंतर

गंध से जुड़ी दो स्थितियों को अक्सर एक समझ लिया जाता है - फैंटोस्मिया और पैरोस्मिया। दोनों में अंतर समझना जरूरी है। फैंटोस्मिया में गंध का कोई वास्तविक स्रोत मौजूद नहीं होता। उदाहरण के लिए कमरे में कोई सिगरेट नहीं है, लेकिन आपको सिगरेट का धुआं महसूस हो रहा है। पैरोस्मिया में वास्तविक गंध मौजूद होती है, लेकिन मस्तिष्क उसे गलत या बदली हुई गंध के रूप में अनुभव करता है। उदाहरण के लिए आपके सामने कॉफी का प्याला रखा है, लेकिन कॉफी की सामान्य खुशबू के बजाय आपको जले हुए प्लास्टिक जैसी गंध महसूस हो रही है। यानी फैंटोस्मिया में गंध है ही नहीं, जबकि पैरोस्मिया में गंध मौजूद है लेकिन उसका अनुभव बदल गया है।

इसीलिए बिना स्रोत वाली गंध को फैंटोस्मिया मानने से पहले वास्तविक स्रोत की संभावना को भी जांचना जरूरी है। हो सकता है गंध कहीं दूर से आ रही हो, किसी उपकरण से निकल रही हो या किसी ऐसी जगह से आ रही हो जिसे आपने देखा न हो।

क्या पुरानी यादें खुद गंध पैदा कर सकती हैं?

हम जानते हैं कि गंध और स्मृति के बीच मजबूत संबंध है। किसी पुरानी खुशबू को याद करने पर घ्राण तंत्र से जुड़े मस्तिष्कीय हिस्से सक्रिय हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर बार अचानक आने वाली फैंटम स्मेल केवल पुरानी याद का परिणाम है।

किसी गंध को याद करना और बिना किसी बाहरी स्रोत के अचानक गंध महसूस करना दो अलग अनुभव हैं। स्मृति इसमें भूमिका निभा सकती है, लेकिन फैंटोस्मिया को केवल ‘पुरानी याद मस्तिष्क में लौट आई’ कहकर समझाना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं है।

घ्राण तंत्र नाक से लेकर मस्तिष्क तक कई स्तरों पर काम करता है। इनमें से किसी स्तर पर असामान्य गतिविधि गंध के अनुभव को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि इस विषय पर वैज्ञानिक शोध अभी जारी है।

खाने का स्वाद भी काफी हद तक गंध है



गंध की ताकत को समझने के लिए भोजन से बेहतर उदाहरण शायद कोई नहीं है। जब आप खाना खाते हैं तो उसके वाष्पशील अणु (volatile molecule ) सिर्फ नाक से नहीं, बल्कि मुंह के पीछे से होते हुए नाक तक पहुंचते हैं। इस प्रक्रिया को रेट्रोनैजल ऑलफैक्शन (Retronasal olfaction) कहा जाता है। यही कारण है कि तेज सर्दी में नाक बंद हो जाए तो खाना अचानक फीका लगने लगता है। जीभ हमें मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा और उमामी जैसे मूल स्वादों की जानकारी देती है। लेकिन आम, कॉफी, चॉकलेट, इलायची या किसी खास व्यंजन की पहचान में गंध की भूमिका बहुत बड़ी होती है। इसलिए घ्राण तंत्र में समस्या केवल यह नहीं करती कि आपको फूल की खुशबू कम महसूस होगी। इससे खाने का आनंद, भूख और जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

कभी अचानक धुएं की गंध आए तो क्या करें?

अगर आपको अचानक गैस, धुआं, जलते तार या किसी रसायन की गंध आए तो सबसे पहले यह मान लेना ठीक नहीं है कि यह मस्तिष्क की बनाई हुई गंध है। पहले वास्तविक स्रोत की जांच करनी चाहिए। हो सकता है कोई उपकरण गर्म हो रहा हो, कहीं गैस का रिसाव हो, बाहर से धुआं आ रहा हो या कोई ऐसी गंध हो जिसकी मौजूदगी दूसरे व्यक्ति ने अभी महसूस न की हो।

लेकिन अगर ऐसी गंध बार-बार आने लगे, आसपास किसी दूसरे व्यक्ति को बिल्कुल महसूस न हो, आपकी सामान्य सूंघने की क्षमता भी बदल गई हो या हाल में सिर पर चोट, संक्रमण या कोई दूसरा नया तंत्रिका संबंधी लक्षण हुआ हो, तो डॉक्टर से जांच कराना उचित है। खासकर अगर इसके साथ चेतना में बदलाव या दौरे जैसा अनुभव हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

असली रहस्य नाक में नहीं, मस्तिष्क में है

गंध की पूरी कहानी हमें मानव मस्तिष्क के बारे में एक बहुत बड़ी बात समझाती है। हम बाहरी दुनिया को सीधे-सीधे अनुभव नहीं करते। हमारी इंद्रियां बाहर से संकेत लेकर आती हैं और मस्तिष्क उन संकेतों की व्याख्या करके हमारे लिए एक अनुभव तैयार करता है।

आंखों में आने वाली रोशनी को मस्तिष्क रंग और आकार में बदलता है। हवा के कंपन को आवाज में बदलता है। इसी तरह हवा में मौजूद रासायनिक अणुओं को वह गुलाब, कॉफी, धुआं, बारिश या किसी पुराने इत्र की खुशबू में बदल देता है।

सामान्य परिस्थितियों में बाहरी दुनिया और मस्तिष्क की बनाई अनुभूति इतनी अच्छी तरह मेल खाती है कि हमें इस प्रक्रिया का एहसास ही नहीं होता। लेकिन फैंटोस्मिया जैसी स्थिति उस पर्दे को कुछ देर के लिए हटा देती है। तब हमें पता चलता है कि गंध केवल बाहर मौजूद किसी वस्तु का गुण नहीं है। वह उस वस्तु और हमारे मस्तिष्क के बीच होने वाली एक जटिल प्रक्रिया का अनुभव है। शायद इसी वजह से कभी कोई पुरानी खुशबू अचानक वर्षों पुरानी याद को वापस ले आती है और कभी बिना किसी सिगरेट के कमरे में धुएं की गंध महसूस होने लगती है। बाहर की दुनिया में उस समय शायद कुछ भी नहीं बदला हो, लेकिन मस्तिष्क ने गंध का एक ऐसा अनुभव बना दिया होता है जो हमें पूरी तरह वास्तविक लगता है। यही घ्राण शक्ति का सबसे बड़ा रहस्य है - हम सिर्फ गंध को महसूस नहीं करते, हमारा मस्तिष्क गंध का अनुभव बनाता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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