हम अफवाहों पर इतनी जल्दी यकीन क्यों कर लेते हैं? क्या है Confirmation Bias? कैसे बचें इससे?

How Confirmation Bias Works: हम अफवाहों पर इतनी जल्दी यकीन क्यों कर लेते हैं? जानिए Confirmation Bias, Cognitive Dissonance और Social Proof कैसे हमारी सोच को प्रभावित करते हैं और अफवाहों से बचने के आसान तरीके क्या हैं।

Neel Mani Lal
Published on: 18 Aug 2026 7:08 PM IST
How Confirmation Bias Works
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How Confirmation Bias Works

How Confirmation Bias Works: व्हाट्सएप पर कोई मैसेज घूमता है, बिना किसी सोर्स के, बिना किसी पुख्ता सबूत के। और कुछ ही घंटों में वह मैसेज दसियों लाख लोगों तक पहुंच जाता है। लोग उसे सच मानकर आगे फॉरवर्ड कर देते हैं। कुछ तो उस पर अमल भी कर बैठते हैं। बाद में पता चलता है कि पूरी बात झूठी थी। अफवाह भर थी। ऐसा एक-दो बार नहीं, बल्कि बार-बार होता है। सवाल यह उठता है कि आखिर हम इंसान इतनी आसानी से अफवाहों पर यकीन क्यों कर लेते हैं, कुछ लोग इतने ‘कान के कच्चे’ क्यों होते हैं कि कोई भी बात उन्हें झट से मना लेती है? यह सब हमारे दिमाग के भीतर की किस कमजोरी से जुड़ा है?

दिमाग सच से ज्यादा आसान रास्ता क्यों चुनता है

इस पूरी पहेली को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि हमारा दिमाग हर जानकारी को गहराई से जांचने के लिए नहीं बना। दिमाग हर दिन लाखों संकेतों से जूझता है, और अगर वह हर एक बात को बारीकी से परखने बैठ जाए, तो हम रोजमर्रा के सामान्य काम भी नहीं कर पाएंगे। इसलिए दिमाग ने खुद को तेज और मेहनत बचाने वाला बना लिया है। यह ज्यादातर फैसले शॉर्टकट के जरिए लेता है, जिन्हें मनोविज्ञान की भाषा में ‘हेयुरिस्टिक्स’ (Heuristics) कहा जाता है।

यही शॉर्टकट रोजमर्रा की जिंदगी में तो बहुत काम आते हैं। पर जब बात किसी अफवाह या गलत जानकारी की हो, तो यही आदत हमें आसानी से गुमराह कर देती है। दिमाग यह जांचने में वक्त और ऊर्जा खर्च करने की बजाय, जो बात सुनने में आसान, परिचित या पहले से मौजूद सोच से मेल खाती दिखे, उसी को जल्दी सच मान लेता है। यही वजह है कि कोई भी मैसेज जो सुनने में सरल और तार्किक लगे, चाहे वह पूरी तरह झूठा ही क्यों न हो, हमारे दिमाग को आसानी से भा जाता है।

Confirmation Bias असल में है क्या

‘कन्फर्मेशन बायस’ यानी पुष्टिकरण पूर्वाग्रह। यह हमारे दिमाग की एक बेहद गहरी और सार्वभौमिक आदत है। जिसमें हम उन्हीं जानकारियों पर आसानी से यकीन करते हैं, जो हमारी पहले से बनी सोच, राय या विश्वास से मेल खाती हैं। हम उन जानकारियों को नजरअंदाज कर देते हैं या शक की नजर से देखते हैं, जो हमारी सोच के खिलाफ जाती हैं।

इसे एक आसान उदाहरण से समझें - मान लीजिए किसी व्यक्ति के मन में पहले से यह धारणा बनी है कि कोई खास चीज़ सेहत के लिए हानिकारक है। अब अगर उसे कोई ऐसी खबर मिलती है जो इस बात की पुष्टि करती दिखे, तो वह उसे तुरंत सच मान लेगा, बिना उसका सोर्स जांचे। पर अगर उसे कोई ऐसी वैज्ञानिक जानकारी मिले जो इसके उलट बात कहे, तो वह उस पर शक करेगा, उसमें कमियां ढूंढेगा, या उसे सिरे से नकार देगा। यही असंतुलित व्यवहार कन्फर्मेशन बायस कहलाता है।

यह पूर्वाग्रह इतना गहरा है कि यह सिर्फ आम अशिक्षित लोगों तक सीमित नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे, समझदार और यहां तक कि वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोगों में भी उतनी ही आसानी से काम करता है। कोई भी इंसान इससे पूरी तरह अछूता नहीं है। क्योंकि यह हमारे दिमाग की बुनियादी बनावट का हिस्सा है, न कि किसी की व्यक्तिगत कमजोरी।

दिलचस्प बात यह है कि कन्फर्मेशन बायस सिर्फ यह तय नहीं करता कि हम किन बातों पर यकीन करते हैं, बल्कि यह यह भी तय करता है कि हम किन बातों को ढूंढने की कोशिश करते हैं। जब किसी व्यक्ति के मन में पहले से कोई राय बन चुकी होती है, तो वह अक्सर अनजाने में ही ऐसी खबरें, वीडियो या पोस्ट खोजने लगता है जो उसकी सोच की पुष्टि करें, और उन स्रोतों से दूरी बना लेता है जो उसकी सोच को चुनौती दे सकते हैं। यही चयनात्मक खोज धीरे-धीरे व्यक्ति के इर्द-गिर्द एक ऐसा सूचना-बुलबुला बना देती है, जिसमें उसे बार-बार वही राय अलग-अलग रूपों में दिखती रहती है, और इससे उसका यकीन और भी मजबूत होता चला जाता है, भले ही असली दुनिया की तस्वीर कुछ और ही क्यों न हो।

हम पहले से मानी हुई बात को छोड़ना क्यों नहीं चाहते

यहां एक गहरा मनोवैज्ञानिक कारण भी छिपा है। जब हम किसी बात पर एक बार यकीन कर लेते हैं, तो वह बात सिर्फ एक जानकारी नहीं रह जाती, बल्कि वह हमारी पहचान का एक हिस्सा बनने लगती है। हमारी राय, हमारी सोच, यह सब मिलकर हमें यह अहसास दिलाते हैं कि हम कौन हैं। इसलिए जब कोई नई जानकारी हमारी पुरानी सोच को चुनौती देती है, तो हमें सिर्फ एक तथ्य का खंडन महसूस नहीं होता, बल्कि यह हमें अपनी ही पहचान पर हमला जैसा महसूस होता है।

यही वजह है कि अपनी गलती मानना या अपनी राय बदलना इंसान के लिए इतना मुश्किल हो जाता है। दिमाग इस असहज एहसास से बचने के लिए एक आसान रास्ता चुनता है। वह अपनी पुरानी सोच में बदलाव करने की बजाय नई जानकारी को ही झुठला देना पसंद करता है। मनोविज्ञान में इसे ‘कॉग्निटिव डिसोनेंस’ यानी संज्ञानात्मक असंगति कहा जाता है, जो उस असहज मानसिक स्थिति को बताता है जब हमारे विश्वास और सामने आई नई जानकारी आपस में टकराती हैं। दिमाग इस टकराव को खत्म करने के लिए अक्सर सच को नजरअंदाज करना ज्यादा आसान समझता है।

भावनाएं तर्क से ज्यादा तेज़ क्यों दौड़ती हैं?

अफवाहों पर यकीन करने के पीछे एक और बड़ा कारण है भावनाओं की तेज़ प्रतिक्रिया। जो जानकारी डर, गुस्सा, हैरानी या उत्साह जैसी तीव्र भावनाएं जगाती है, वह हमारे दिमाग में तर्कसंगत सोच से कहीं ज्यादा तेज़ी से असर डालती है। यही वजह है कि डरावनी, चौंकाने वाली या भावनात्मक रूप से उकसाने वाली अफवाहें सामान्य, सपाट और तथ्यात्मक खबरों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेज़ी से फैलती हैं।

जब कोई खबर हमें भावनात्मक रूप से हिला देती है तो हमारा दिमाग उसे तुरंत आगे साझा करने के लिए बेचैन हो जाता है। ऐसा इसलिए कि इंसानी स्वभाव में अपनी भावनाओं को दूसरों के साथ बांटने की गहरी प्रवृत्ति होती है। इस जल्दबाजी में हम यह जांचना भूल जाते हैं कि जो बात हम आगे बढ़ा रहे हैं, वह सच है भी या नहीं। यही कारण है कि कोई भी डरावनी या भड़काऊ अफवाह बड़ी आसानी से जंगल की आग की तरह फैल जाती है।

सामाजिक दबाव भी बड़ा रोल निभाता है

अफवाहों पर यकीन करने के पीछे सिर्फ व्यक्तिगत मानसिक कमजोरी ही नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव भी बड़ी भूमिका निभाता है। जब हम देखते हैं कि हमारे आसपास के बहुत से लोग, हमारे दोस्त, परिवार या जान-पहचान वाले किसी बात पर यकीन कर रहे हैं, तो हमारा दिमाग स्वाभाविक रूप से यह मान लेता है कि इतने सारे लोग गलत कैसे हो सकते हैं। इसे मनोविज्ञान में ‘सामाजिक प्रमाण’ यानी सोशल प्रूफ (social proof) कहा जाता है।

यही वजह है कि जब कोई मैसेज व्हाट्सएप के किसी परिवार या दोस्तों वाले ग्रुप में बार-बार घूमता दिखे, तो वह अपने आप एक तरह की विश्वसनीयता हासिल कर लेता है, भले ही उसका कोई ठोस सबूत मौजूद न हो। भीड़ का यकीन अक्सर हमें यह सोचने से रोक देता है कि क्या यह बात वाकई सच है, या सिर्फ इसलिए सच लग रही है क्योंकि बहुत से लोग इस पर यकीन कर रहे हैं।

यह प्रवृत्ति खासतौर पर उन मामलों में और मजबूत हो जाती है जहां जानकारी किसी ऐसे व्यक्ति से आती है जिस पर हम पहले से भरोसा करते हैं, जैसे कोई करीबी रिश्तेदार, पुराना दोस्त या कोई ऐसा व्यक्ति जिसे हम समझदार मानते हैं। ऐसे में हम यह सोचकर उस बात की पड़ताल करना जरूरी ही नहीं समझते कि आखिर यह इंसान झूठ क्यों बोलेगा। हम भूल जाते हैं कि भेजने वाला खुद भी किसी और की भेजी हुई गलत जानकारी का शिकार हो सकता है। यही जंजीर एक के बाद एक कड़ी जोड़ते हुए पूरे समाज में अफवाह को तेज़ी से फैला देती है।

‘कान के कच्चे’ होने के पीछे क्या है?

अब बात करते हैं उन लोगों की, जिन्हें अक्सर ‘कान के कच्चे’ कहा जाता है, यानी ऐसे लोग जो किसी भी बात पर जल्दी यकीन कर लेते हैं और आसानी से किसी की बातों में आ जाते हैं। इसके पीछे कई मनोवैज्ञानिक वजहें हो सकती हैं। कुछ लोगों में स्वाभाविक रूप से भरोसा करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है, जिसकी वजह से वे किसी भी बात को शक की नजर से देखने के बजाय आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। कुछ लोगों में गहराई से सवाल पूछने या तथ्यों की जांच करने की आदत विकसित नहीं हो पाती, जिसकी बड़ी वजह शिक्षा, परवरिश और सोचने के तरीके पर निर्भर करती है।

इसके अलावा जो लोग अकेलापन महसूस करते हैं या अपने समूह में स्वीकृति चाहते हैं, वे भी अक्सर बिना सवाल किए किसी बात पर यकीन कर लेते हैं, ताकि वे अपने समूह से जुड़े रह सकें और अलग-थलग महसूस न करें। यह इंसानी स्वभाव की एक गहरी सामाजिक जरूरत से जुड़ा हुआ व्यवहार है, न कि सिर्फ किसी की बुद्धि की कमी।

इससे बचने का रास्ता क्या है

चूंकि यह सारी प्रवृत्तियां हमारे दिमाग की बुनियादी बनावट का हिस्सा हैं इसलिए इनसे पूरी तरह बचना नामुमकिन है। पर इन्हें कम जरूर किया जा सकता है। सबसे पहला और सबसे असरदार तरीका है किसी भी बड़ी या चौंकाने वाली जानकारी पर तुरंत यकीन करने और उसे आगे बढ़ाने से पहले एक पल रुकना। यह छोटा सा ठहराव अक्सर हमें यह सोचने का मौका देता है कि क्या यह बात वाकई सच हो सकती है।

दूसरा तरीका है जानकारी के मूल स्रोत तक जाने की आदत डालना। किसी भी दावे को सिर्फ इसलिए सच मान लेने के बजाय कि वह किसी परिचित से आया है या बार-बार दोहराया जा रहा है, यह जांचना जरूरी है कि उसके पीछे कोई भरोसेमंद और सत्यापित स्रोत मौजूद है या नहीं।

तीसरा और शायद सबसे मुश्किल तरीका है खुद को जानबूझकर अपनी सोच के विपरीत नजरियों के सामने रखना। यानी सिर्फ वही खबरें और राय पढ़ना जो हमारी पहले से बनी सोच से मेल न खाती हों, बल्कि जानबूझकर अलग नजरिए भी सुनना और समझना, ताकि हमारा दिमाग किसी एक ही तरह की सोच के दायरे में सीमित न रह जाए।

ये कोई असामान्य बात नहीं

अफवाहों पर यकीन करना कोई अकेली या असामान्य कमजोरी नहीं, बल्कि यह इंसानी दिमाग की बुनियादी बनावट का ही एक स्वाभाविक हिस्सा है। हमारा दिमाग मेहनत बचाने के लिए शॉर्टकट अपनाता है, अपनी पुरानी सोच से जुड़ी रहने की कोशिश करता है, भावनाओं को तर्क से पहले प्राथमिकता देता है, और भीड़ के यकीन को अपनी सोच का आधार बना लेता है। यही सब मिलकर कन्फर्मेशन बायस जैसी प्रवृत्ति को जन्म देते हैं, जिसकी वजह से हम वही मानते हैं जो हम पहले से मानना चाहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को समझ लेने के बाद ही हम खुद को थोड़ा और सजग, थोड़ा और सवाल पूछने वाला और अफवाहों के जाल में कम फंसने वाला इंसान बना सकते हैं।

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