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Dream Science: हम सपने क्यों देखते हैं? क्या हर सपना किसी बात का संकेत होता है?
Dream Science: हम सपने क्यों देखते हैं? क्या हर सपने का कोई मतलब होता है? जानिए REM नींद, याददाश्त, भावनाओं, हेडोनिक नहीं बल्कि न्यूरोसाइंस और नेत्रहीन लोगों के सपनों से जुड़े रोचक तथ्य।
Dream Science (Image Credit-Social Media)
Dream Science: हर रात, चाहे हमें याद रहे या न रहे, हमारा दिमाग एक पूरी अलग दुनिया रच डालता है। कभी उड़ने के सपने, कभी पुराने दोस्तों से मिलने के, कभी परीक्षा में फंसे होने के, और कभी बिल्कुल बेतुके दृश्यों के। सपने इंसान के लिए सदियों से एक रहस्य रहे हैं। कोई इन्हें भविष्य का संकेत मानता है, कोई इन्हें सिर्फ दिमाग की बकवास समझता है। लेकिन न्यूरो साइंस अब इस रहस्य की परतें धीरे-धीरे खोलने लगा है। हम सपने क्यों देखते हैं, क्या इनका सच में कोई मतलब होता है, क्या किसी को सपने न आना मुमकिन है, और क्या नेत्रहीन लोग भी सपने देखते हैं?
हम सपने क्यों देखते हैं?
सबसे पहले एक बात समझनी जरूरी है कि विज्ञान अभी भी सपनों की वजह को लेकर पूरी तरह निश्चित नहीं है। दशकों की रिसर्च के बावजूद अभी तक कोई एक ऐसा साबित सिद्धांत नहीं है जो यह पूरी तरह बता सके कि हम सपने क्यों देखते हैं, या दिमाग में यह सपने आखिर बनते कैसे हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों के पास इसकी वजह समझने के लिए कई मजबूत और एक-दूसरे के पूरक सिद्धांत जरूर हैं।
यादों को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया: सबसे ज्यादा माने जाने वाले सिद्धांतों में से एक यह है कि सपने हमारी यादों को व्यवस्थित करने और मजबूत बनाने में मदद करते हैं। नींद के दौरान, खासकर REM (rapid eye movement) नींद जिसमें आंखें तेजी से घूमती हैं और सबसे ज्यादा सपने आते हैं, के दौरान दिमाग में मेमोरी और भावनाओं को नियंत्रित करने वाले हिस्से बेहद सक्रिय हो जाते हैं। यह दिमाग की एक तरह की 'रात की सफाई' जैसी प्रक्रिया है, जिसमें जरूरी यादें मजबूत की जाती हैं, और गैर-जरूरी जानकारी हटा दी जाती है।
भावनाओं को संभालने का तरीका: एक और मजबूत सिद्धांत बताता है कि सपने हमें दिन भर की भावनात्मक उथल-पुथल को संभालने में मदद करते हैं। नींद, खासकर REM नींद, दिमाग के डर पहचानने वाले हिस्से (एमिग्डाला) की सक्रियता को कम कर देती है, जिससे कोई भावनात्मक रूप से परेशान करने वाला अनुभव अगले दिन कम तीव्र महसूस होता है। यानी सोने से पहले जो बात आपको बेचैन कर रही थी, नींद के बाद वह उतनी भारी नहीं लगती। इस भावनात्मक प्रोसेसिंग का सीधा संबंध REM नींद के दौरान होने वाली दिमागी गतिविधि से जुड़ा माना जाता है।
दिमाग का सर्वाइवल रिहर्सल: एक दिलचस्प सिद्धांत यह भी है कि सपने हमें संभावित खतरों के लिए मानसिक रूप से तैयार करते हैं, जैसे दिमाग का एक रिहर्सल स्पेस। एक शोध में पाया गया कि जिन बच्चों को रोजमर्रा की जिंदगी में असल खतरों का सामना करना पड़ता है, वे उन बच्चों के मुकाबले ज्यादा सपने देखते हैं जिन्हें ऐसी तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता।और उनके सपनों में खतरे से जुड़े दृश्य भी ज्यादा आम पाए जाते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि सपने शायद विकासवादी तौर पर हमें असली जिंदगी की चुनौतियों के लिए तैयार करने का एक तरीका हो सकते हैं।
सपनों की अजीब, बेतुकी बनावट का राज: क्या आपने कभी गौर किया है कि सपने अक्सर इतने अजीब और बेतरतीब क्यों होते हैं, जैसे अपने ऑफिस के सपने में अचानक स्विमिंग पूल दिखना, या बचपन के किसी दोस्त का अचानक सामने आ जाना? इसकी एक दिलचस्प वजह है। REM नींद के दौरान तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है, जो दिमाग के मेमोरी सेंटर (हिप्पोकैंपस) और बाकी कॉर्टेक्स के बीच सामान्य तालमेल को कुछ हद तक बिगाड़ देता है। यही वजह है कि सपने अक्सर बिखरे हुए, अव्यवस्थित और सटीक कालक्रम से हटकर महसूस होते हैं। असल में यह कोई गड़बड़ी नहीं, बल्कि यह दिमाग के कॉर्टेक्स का अपने ही तरीके से नई जानकारी को बड़े ज्ञान नेटवर्क में जोड़ने का एक तरीका हो सकता है, बिना हिप्पोकैंपस की सटीक, कालक्रम-आधारित याद्दाश्त की सख्त जरूरत के।
क्या हर सपना किसी बात का संकेत होता है?
यह शायद सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है, और इसका जवाब देना उतना आसान नहीं है। सिगमंड फ्रायड के जमाने से ही सपनों की व्याख्या करने की परंपरा चली आ रही है कि हर सपने का कोई गहरा, छिपा हुआ मतलब होता है। लेकिन आधुनिक न्यूरो साइंस इस पूरे विषय को ज्यादा सावधानी से देखता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सपनों की सामग्री अक्सर हमारे जागते जीवन के अनुभवों से जुड़ी होती है। और सपनों में नेगेटिव भावनाएं, जैसे चिंता और डर, पॉजिटिव भावनाओं के मुकाबले ज्यादा आम पाई जाती हैं। यानी सपने पूरी तरह बेतरतीब नहीं होते बल्कि इनका हमारी जागती जिंदगी से एक तार्किक कनेक्शन जरूर होता है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हर सपने का कोई पहले से तय, गुप्त प्रतीकात्मक अर्थ होता है, जैसे कुछ लोकप्रिय 'सपनों की किताबें' दावा करती हैं। ऐसी व्याख्याएं वैज्ञानिक शोध के बजाय सांस्कृतिक और लोक-परंपराओं पर आधारित होती हैं। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो सपने ज्यादातर हमारी भावनाओं, चिंताओं और यादों का प्रतिबिंब होते हैं, न कि किसी रहस्यमयी भविष्यवाणी का जरिया।
क्या किसी का कभी सपने न देखना मुमकिन है?
एक सर्वे में करीब 6.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे कभी सपने नहीं देखते, और इनमें से भी करीब हर 250 में से एक व्यक्ति का दावा है कि उसे कभी भी, एक बार भी सपना याद नहीं रहा। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि ये लोग सच में सपने नहीं देखते?
पेरिस ब्रेन इंस्टीट्यूट की एक अहम रिसर्च इस सवाल का बेहद दिलचस्प जवाब देती है। शोधकर्ताओं ने REM स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर (एक ऐसी स्थिति जिसमें लोग नींद में अपने सपनों को शारीरिक रूप से अभिनीत कर देते हैं, जैसे हाथ-पैर हिलाना या बड़बड़ाना) से पीड़ित उन मरीजों का अध्ययन किया, जो खुद को कभी सपने न देखने वाला मानते थे। हैरानी की बात यह रही कि नींद के दौरान ये लोग भी वैसी ही हरकतें और बड़बड़ाहट दिखा रहे थे, जैसी सामान्य सपने देखने वाले दिखाते हैं, हालांकि जागने पर उन्हें इसकी कोई याद नहीं रहती थी।
इस रिसर्च से निकला सबसे अहम निष्कर्ष यही था कि सपने देखना सार्वभौमिक है, यानी हर कोई सपने देखता है। जबकि सपनों को याद रख पाना व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग-अलग होता है। यानी असल सवाल ये नहीं है कि क्या मैं सपने देखता हूं, बल्कि ये है कि क्या मुझे अपने सपने याद रहते हैं। सुबह उठते ही याद्दाश्त इतनी नाजुक अवस्था में होती है कि अलार्म की आवाज या रोजमर्रा की भागदौड़ अक्सर सपनों को स्थायी याद्दाश्त में दर्ज होने से पहले ही मिटा देती है। कुछ लोगों के व्यक्तित्व में भी फर्क पाया गया है। जो लोग ज्यादा सपने याद रखते हैं, वे अक्सर थोड़े ज्यादा चिंतित, लेकिन साथ ही नए अनुभवों के लिए ज्यादा खुले स्वभाव के भी पाए गए हैं।
क्या नेत्रहीन लोग भी सपने देखते हैं?
यह सबसे ज्यादा उलझा हुआ सवाल है। इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति जन्म से नेत्रहीन है, या बाद में किसी वजह से उसकी दृष्टि गई है।
जो लोग बड़ी उम्र में नेत्रहीन हुए हैं, यानी जिन्होंने कभी देखने का अनुभव किया था, वे अक्सर अपने सपनों में विज़ुअल इमेजरी यानी दृश्य छवियां देखना जारी रखते हैं।क्योंकि उनका दिमाग पहले से ही दृश्य यादों से भरा होता है। लेकिन जन्म से नेत्रहीन लोगों का मामला कहीं ज्यादा पेचीदा है, और वैज्ञानिकों के बीच इस पर लंबे समय से बहस चलती आ रही है।
पारंपरिक तौर पर माना जाता रहा है कि जन्मजात नेत्रहीन लोगों के सपनों में कोई विज़ुअल कंपोनेंट नहीं होता, बल्कि उनके सपने सुनने, छूने, सूंघने और स्वाद जैसी दूसरी इंद्रियों पर आधारित होते हैं। एक शोध में यह पुष्टि हुई कि जन्मजात नेत्रहीन लोगों के सपनों में ऑडिटरी (सुनने से जुड़े), टच से जुड़े, गंध और स्वाद से जुड़े अनुभव सामान्य दृष्टि वाले लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा पाए जाते हैं।
लेकिन हाल के कुछ शोधों ने इस मान्यता को चुनौती दी है। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि जन्मजात नेत्रहीन लोगों के सपनों में भी कुछ हद तक दृश्य जैसी छवियां मौजूद हो सकती हैं। हालांकि यह बेहद दुर्लभ है और इसे लेकर वैज्ञानिकों के बीच अभी भी असहमति बनी हुई है। इसकी एक संभावित वैज्ञानिक वजह है, दिमाग में जो हिस्सा सामान्य तौर पर सिर्फ आंखों से मिलने वाली जानकारी को प्रोसेस करता है (विजुअल कॉर्टेक्स), नेत्रहीन लोगों में यह हिस्सा पूरी तरह बेकार नहीं बैठता, बल्कि यह दूसरी इंद्रियों (जैसे सुनना और छूना) से मिलने वाली जानकारी को प्रोसेस करने के लिए फिर से इस्तेमाल होने लगता है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यही क्रॉस-मॉडल प्रक्रिया कभी-कभी सपनों में हल्की दृश्य जैसी अनुभूतियां पैदा कर सकती है। हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर सतर्क करते हैं कि सिर्फ विजुअल कॉर्टेक्स में हलचल होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति सच में देख रहा हो, जैसा एक आम इंसान देखने को समझता है।
एक और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि नेत्रहीन लोगों के सपनों में रैपिड आई मूवमेंट अक्सर अनुपस्थित पाई गई है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह इसलिए होता है क्योंकि आंखों की उन गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले तंत्रिका मार्ग इस्तेमाल ही नहीं होते, जिससे दृश्य छवियां बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
अब भी एक रहस्य
सपने हमारे दिमाग के सबसे रहस्यमयी पहलुओं में से एक बने हुए हैं, फिर भी विज्ञान ने इन्हें समझने में काफी प्रगति की है। सपने संभवतः यादों को व्यवस्थित करने, भावनाओं को संभालने और शायद हमें भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करने का काम करते हैं, न कि किसी रहस्यमयी शक्ति का संदेश। हर कोई सपने देखता है, चाहे उसे याद रहे या न रहे, और यहां तक कि जन्मजात नेत्रहीन लोगों का दिमाग भी अपने-अपने तरीके से एक समृद्ध, संवेदी दुनिया रच लेता है।
यह पूरा विषय हमें याद दिलाता है कि हमारा दिमाग सोते समय भी उतना ही सक्रिय, रचनात्मक और जटिल बना रहता है, जितना जागते हुए होता है।


