वू जेतियन कौन थी? चीन की इकलौती महिला सम्राट कैसे बनी दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में से एक

Wu Zetian ने 690 में चीन की सम्राट बनकर इतिहास बदल दिया। जानिए कैसे एक महल की उपपत्नी सत्ता के शिखर तक पहुंचीं और झोउ राजवंश की स्थापना की।

Yogesh Mishra
Published on: 26 Aug 2026 12:20 AM IST
Wu Zetian
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Wu Zetian (Image Credit-Social Media)

Wu Zetian: वू जेतियन की कहानी केवल एक महिला के सत्ता तक पहुँचने की कहानी नहीं है। यह उस समाज की स्थापित राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को तोड़ देने की कहानी है जिसमें सर्वोच्च शासक का पद लगभग स्वाभाविक रूप से पुरुष के लिए माना जाता था। चीन के लंबे साम्राज्यवादी इतिहास में अनेक महारानियाँ, राजमाताएँ और पर्दे के पीछे से शासन करने वाली प्रभावशाली महिलाएँ हुईं। लेकिन सम्राट की औपचारिक उपाधि लेकर अपने नाम से शासन करने वाली एकमात्र महिला वू जेतियन थीं। उन्होंने 690 में तांग राजवंश को बीच में रोककर अपना झोउ राजवंश स्थापित किया और 705 तक स्वयं शासक रहीं। इससे पहले भी वे वर्षों तक अपने पति और फिर बेटों के शासन के पीछे वास्तविक सत्ता का केंद्र बन चुकी थीं।

एक समृद्ध परिवार में जन्म और महल तक पहुँचीं

उनका जन्म 624 ईस्वी के आसपास एक समृद्ध और प्रभावशाली परिवार में हुआ। उनके पिता वू शिहुओ तांग सत्ता की स्थापना से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उन्हें सामान्य कुलीन लड़कियों की तुलना में बेहतर शिक्षा मिली। पढ़ना, लिखना, इतिहास, राजनीति और दरबारी शिष्टाचार—इन सबने उनके व्यक्तित्व को प्रारंभ से ही अलग बनाया। लगभग चौदह वर्ष की आयु में उन्हें सम्राट ताइज़ोंग के महल में एक निम्न श्रेणी की उपपत्नी के रूप में प्रवेश मिला। उस समय कोई यह कल्पना नहीं कर सकता था कि यही लड़की आगे चलकर पूरे चीन की सर्वोच्च शासक बनेगी।


ताइज़ोंग की मृत्यु के बाद महल की परंपरा के अनुसार उनकी कई निःसंतान उपपत्नियों को बौद्ध मठों में भेज दिया गया। वू भी कुछ समय के लिए मठ में चली गईं। यहीं से उनकी कहानी लगभग समाप्त हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ताइज़ोंग के उत्तराधिकारी गाओज़ोंग का वू से पुराना परिचय था और बाद में उन्हें फिर महल में बुला लिया गया। यह कदम अपने समय के दरबारी मानदंडों के लिहाज से अत्यंत असामान्य था, क्योंकि वू पहले गाओज़ोंग के पिता की उपपत्नी रह चुकी थीं। फिर भी उन्होंने तेजी से सम्राट का विश्वास और प्रेम प्राप्त किया और कुछ ही वर्षों में दरबार की सत्ता-स्पर्धा के केंद्र में आ गईं।

महारानी बनने के लिए दरबार में सत्ता संघर्ष

गाओज़ोंग की वैध महारानी वांग और दूसरी प्रभावशाली उपपत्नी शाओ के साथ वू का संघर्ष हुआ। इसके बाद घटनाएँ तेजी से बदलीं और 655 में वू स्वयं महारानी बना दी गईं। इस सत्ता-संघर्ष से जुड़ी एक अत्यंत विवादास्पद कहानी बाद के इतिहास-ग्रंथों में मिलती है कि वू ने अपनी नवजात बेटी की हत्या स्वयं कर महारानी वांग पर दोष लगाया था। लेकिन आधुनिक इतिहासकार इस कथा को निश्चित तथ्य नहीं मानते, क्योंकि वू के बारे में बाद की अनेक कथाएँ उनके राजनीतिक विरोधियों और तांग समर्थक इतिहासकारों ने लिखीं। इसलिए उनकी जीवनी में यह समझना बहुत आवश्यक है कि वू जेतियन का इतिहास तथ्य और शत्रुतापूर्ण प्रचार, दोनों का मिश्रण है।

पति बीमार हुए तो वू के हाथ में आने लगी सत्ता

सम्राट गाओज़ोंग का स्वास्थ्य धीरे-धीरे खराब होने लगा। लगभग 660 के बाद उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हुईं। वू ने शासन के काम में प्रत्यक्ष भूमिका लेना शुरू कर दिया। वह केवल राजमहल की पत्नी नहीं रहीं। राज्य के दस्तावेज, नियुक्तियाँ, प्रशासन और राजनीतिक निर्णय उनके प्रभाव में आने लगे। कुछ स्रोतों में सम्राट और वू के संयुक्त शासन को ‘दो संतों’ की तरह भी वर्णित किया गया है। इस दौर से लेकर 705 तक लगभग चार दशक तक वे चीन की राजनीति के केंद्र में बनी रहीं।

बेटों को सम्राट बनाया, लेकिन सत्ता अपने हाथ में रखी



683 में गाओज़ोंग की मृत्यु के बाद उनका बेटा झोंगज़ोंग सम्राट बना। लेकिन वास्तविक सत्ता वू के हाथ में रही। जब बेटे ने अपने स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय लेने शुरू किए और अपनी पत्नी के परिवार को ऊपर उठाने की कोशिश की, तो वू ने कुछ ही सप्ताह में उसे पद से हटा दिया और दूसरे बेटे रुइज़ोंग को सिंहासन पर बैठा दिया। लेकिन नया सम्राट भी लगभग नाममात्र का शासक था। चीन का प्रशासन मूल रूप से राजमाता वू के नियंत्रण में था।

जब सत्ता हाथ में थी तो खुद सम्राट क्यों बनीं?

यहीं से वह प्रश्न पैदा होता है जिसने उन्हें इतिहास में अद्वितीय बनाया—जब सत्ता पहले ही उनके हाथ में थी, तो उन्हें स्वयं सम्राट बनने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

क्योंकि पर्दे के पीछे सत्ता और औपचारिक संप्रभुता में बड़ा अंतर था। जब तक उनका बेटा सम्राट था, वू की सत्ता सैद्धांतिक रूप से बेटे की मां होने से आती थी। वे इस निर्भरता को समाप्त करना चाहती थीं। लेकिन इसके सामने सबसे बड़ी बाधा राजनीति से ज्यादा वैचारिक थी।

चीनी कन्फ्यूशियसी राजनीतिक परंपरा में परिवार और राज्य की व्यवस्था पितृसत्तात्मक थी। स्त्री को सर्वोच्च शासक के रूप में स्वीकार करना स्थापित सामाजिक कल्पना के बाहर था। चीन में ऐसी कोई लिखित ‘महिलाएँ सम्राट नहीं बन सकतीं’ वाली सार्वभौमिक संहिता नहीं थी। लेकिन सदियों से चली आ रही व्यवस्था ने इसे लगभग अघोषित नियम बना दिया था।

वू ने इस बाधा को केवल सैनिक शक्ति से नहीं तोड़ा। उन्होंने राजनीतिक वैधता का नया विचार तैयार किया।

बौद्ध धर्म बना सत्ता की वैधता का आधार

यहाँ बौद्ध धर्म उनके लिए बेहद उपयोगी साबित हुआ। तांग शासक परिवार स्वयं को दाओ मत से जुड़े महान पूर्वजों से जोड़ता था। वू ने इसके मुकाबले बौद्ध धार्मिक प्रतीकों और भविष्यवाणियों को बढ़ावा दिया। कुछ बौद्ध ग्रंथों की ऐसी व्याख्या प्रचारित की गई कि एक स्त्री शासक या दिव्य शासक संसार में धर्म की रक्षा करेगा। इस धार्मिक वैधता ने उस समाज में उन्हें एक वैकल्पिक आधार दिया जहाँ कन्फ्यूशियसी परंपरा महिला सम्राट को सहज स्वीकार नहीं करती थी।

उन्होंने अपने लिए एक नया चीनी अक्षर भी बनवाया—झाओ, जिसका अर्थ प्रतीकात्मक रूप से सूर्य और चंद्रमा की रोशनी से आकाश प्रकाशित करने जैसा था। स्वयं के नाम और शाही पहचान को नए प्रतीकों से जोड़ना केवल व्यक्तिगत विलक्षणता नहीं थी। यह यह संदेश था कि उनके शासन के लिए पुरानी भाषा और पुरानी राजनीतिक परंपरा पर्याप्त नहीं है।

690 में बनीं चीन की पहली और एकमात्र महिला सम्राट

आखिरकार 690 में उन्होंने अपने बेटे रुइज़ोंग को हटाकर स्वयं हुआंगदी, यानी सम्राट, की उपाधि ग्रहण कर ली। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उन्होंने अपने आपको केवल ‘महारानी’ नहीं कहा। वह शब्द सम्राट की पत्नी के अर्थ में भी इस्तेमाल हो सकता था। उन्होंने वही सर्वोच्च शासकीय पद लिया जो पुरुष सम्राटों का था।

इसी क्षण चीन के इतिहास में पहली और आखिरी बार किसी महिला ने औपचारिक रूप से सर्वोच्च शाही पद अपने नाम से ग्रहण किया। उन्होंने तांग राजवंश को अस्थायी रूप से समाप्त कर झोउ राजवंश स्थापित किया और लुओयांग को अपनी सत्ता का प्रमुख केंद्र बनाया।

लेकिन वे केवल प्रतीकात्मक सम्राट नहीं थीं। उनका शासन अत्यंत सक्रिय था।

परीक्षा और योग्यता के आधार पर अधिकारियों को आगे बढ़ाया

वू जेतियन के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक योगदानों में एक था प्रतिभा के आधार पर अधिकारियों की भर्ती का विस्तार। चीन में सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षा-व्यवस्था उनसे पहले मौजूद थी। लेकिन उन्होंने उसका विस्तार किया और पुराने कुलीन परिवारों की शक्ति को संतुलित करने के लिए नए शिक्षित अधिकारियों को ऊपर आने का मौका दिया।

इसका राजनीतिक लाभ उन्हें साफ दिखाई देता था—पुराने अभिजात परिवार तांग राजवंश से जुड़े थे। उनमें से कई वू का विरोध करते थे। यदि सत्ता में आने का रास्ता जन्म के बजाय परीक्षा और शाही नियुक्ति से खुले, तो ऐसे नए अधिकारी पैदा किए जा सकते थे जिनकी सफलता स्वयं सम्राट पर निर्भर हो। इस तरह योग्यता-आधारित प्रशासन उनके लिए सुधार भी था और सत्ता-संतुलन का हथियार भी।

उन्होंने सामान्य पृष्ठभूमि से प्रतिभाशाली लोगों को ऊँचे पदों तक पहुँचाया, खेती और कर व्यवस्था पर ध्यान दिया और स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश की। कुछ विवरणों में किसान वर्ग पर बोझ कम करने, कृषि उत्पादन बढ़ाने और प्रशासनिक दक्षता सुधारने के उपायों का उल्लेख मिलता है। उनके शासन में साहित्य और बौद्ध कला को भी संरक्षण मिला।

इसलिए उन्हें केवल रक्तपिपासु तानाशाह के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से अधूरा है। लेकिन उनके शासन का दूसरा चेहरा कहीं अधिक कठोर था।

सत्ता बचाने के लिए डर और दमन का सहारा


वू जानती थीं कि उनका सबसे बड़ा संकट केवल बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि वैधता का संकट है। पुराने तांग राजपरिवार, दरबारी कुलीन और कन्फ्यूशियसी अधिकारी उनके शासन को अस्वाभाविक और अवैध मान सकते थे।

इसलिए उन्होंने गुप्त सूचनादाताओं और कठोर जांच व्यवस्था को प्रोत्साहित किया। विरोधियों के खिलाफ राजद्रोह के आरोप लगे, पूछताछ हुई, निर्वासन और मृत्युदंड दिए गए और तांग राजवंश से जुड़े अनेक प्रभावशाली लोगों को हटाया गया। उनकी सत्ता के शुरुआती वर्षों में भय राजनीतिक शासन का महत्वपूर्ण उपकरण बना।

वू जेतियन: सुधारक भी, कठोर शासक भी

यहीं वू जेतियन की छवि दो हिस्सों में बँटती है। एक तरफ वह ऐसी शासक थीं जिसने कुलीन वंश की जगह प्रतिभा को अवसर दिया, प्रशासन मजबूत किया और एक विशाल साम्राज्य को संभाला। दूसरी तरफ वह बेहद कठोर राजनीतिक खिलाड़ी थीं जिन्होंने विरोधियों को समाप्त करने में संकोच नहीं किया।

शायद इस विरोधाभास के बिना उनकी सफलता संभव भी नहीं थी। जिस महिला को सत्ता संरचना स्वयं स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, उसे सत्ता बनाए रखने के लिए उन पुरुष सम्राटों से भी अधिक कठोरता दिखानी पड़ सकती थी, जिनकी वैधता जन्म से मान ली जाती थी। यह कठोरता उनकी हिंसा को नैतिक रूप से उचित नहीं बनाती। लेकिन उसके राजनीतिक संदर्भ को समझने में मदद करती है।

विशाल साम्राज्य को संभालना भी बड़ी चुनौती थी

उनके शासन के समय चीन विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य था। तिब्बती साम्राज्य और तुर्क शक्तियों के साथ संघर्ष जारी रहे। चीन की सीमाओं पर कभी सफलता तो कभी पराजय मिली। लेकिन साम्राज्य ध्वस्त नहीं हुआ।

वू ने सैन्य और प्रशासनिक नेतृत्व में नए लोगों को आगे बढ़ाया। यही अधिकारी और सैन्य नेतृत्व बाद के पुनर्स्थापित तांग काल की शक्ति में भी योगदान देते दिखाई देते हैं। इसलिए उनका शासन तांग युग की निरंतरता को केवल तोड़ता नहीं, बल्कि कुछ मायनों में उसके अगले स्वर्णिम चरण की आधारभूमि भी बनाता है।

लुओयांग को बनाया सत्ता और धर्म का नया केंद्र

उनके शासन में लुओयांग का महत्व बहुत बढ़ गया। पारंपरिक तांग राजधानी चांगआन के मुकाबले लुओयांग को राजनीतिक और धार्मिक शक्ति का केंद्र बनाना भी पुराने तांग अभिजात वर्ग से दूरी बनाने का तरीका था। वहाँ विशाल धार्मिक और शाही निर्माण हुए और वू ने अपनी सत्ता को एक नए राजवंश की दृश्य पहचान देने की कोशिश की।

बौद्ध धर्म: आस्था भी और राजनीति भी

उनका बौद्ध धर्म से संबंध भी केवल सत्ता का साधन नहीं था। उन्होंने बौद्ध संस्थानों, धार्मिक ग्रंथों और मूर्तिकला को संरक्षण दिया। लेकिन इसमें राजनीति और आस्था को अलग करना कठिन है।

मध्यकालीन राजशाही में धर्म स्वयं राजनीतिक वैधता का प्रमुख स्रोत था, इसलिए कोई आधुनिक रेखा खींचना कि ‘यह धार्मिक था और यह राजनीतिक’ अक्सर संभव नहीं।

निजी जीवन को लेकर भी बनीं सनसनीखेज कहानियाँ



उनके बारे में सबसे सनसनीखेज कथाएँ उनके निजी जीवन से भी जुड़ी हैं। वृद्धावस्था में उनके दरबार में झांग भाइयों जैसे युवा पुरुष पसंदीदा बने और विरोधी इतिहासकारों ने इस आधार पर उनकी यौन जीवन से जुड़ी कई कहानियाँ लिखीं।

यहाँ भी सावधानी जरूरी है। पुरुष सम्राटों के लिए अनेक उपपत्नियाँ लगभग सामान्य शाही व्यवहार माना जाता था, जबकि महिला शासक के पुरुष साथियों को ऐतिहासिक लेखन में अक्सर नैतिक पतन की कहानी बना दिया गया।

इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी अंतिम वर्षों की दरबारी राजनीति में समस्या नहीं थी। बल्कि यह कि उनके बारे में यौन नैतिकता के आरोप पढ़ते समय उस युग के दोहरे मानदंड समझना जरूरी है।

705 में सत्ता से हटाई गईं और तांग राजवंश फिर लौटा

705 तक वू लगभग अस्सी वर्ष की हो चुकी थीं और उनका स्वास्थ्य गिर रहा था। दरबार में उनके प्रिय झांग भाइयों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था, जिससे वरिष्ठ अधिकारियों में असंतोष था।

फरवरी 705 में दरबारी अधिकारियों ने तख्तापलट किया, झांग भाइयों को मार दिया और वृद्ध वू को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया। उनके बेटे झोंगज़ोंग को पुनः सिंहासन पर बैठाया गया और तांग राजवंश बहाल हो गया।

कुछ महीनों बाद दिसंबर 705 में वू जेतियन की मृत्यु हो गई।

झोउ राजवंश छोटा रहा, लेकिन विरासत बहुत बड़ी थी

उनका अपना झोउ राजवंश केवल लगभग पंद्रह वर्ष चला। पहली नजर में यह असफलता लग सकती है कि उन्होंने नया राजवंश बनाया और उनके जाते ही वह समाप्त हो गया।

लेकिन उनकी वास्तविक राजनीतिक विरासत केवल उस राजवंश की आयु में नहीं मापी जा सकती। उन्होंने लगभग आधी सदी तक चीन की सर्वोच्च राजनीति पर प्रभाव रखा—पहले महारानी के रूप में, फिर राजमाता और संरक्षक शासक के रूप में और अंततः स्वयं सम्राट के रूप में।

उनके शासन ने यह साबित कर दिया कि उस समय की सबसे बड़ी प्रशासनिक मशीनों में से एक को एक महिला केवल पर्दे के पीछे से नहीं, औपचारिक रूप से सर्वोच्च सत्ता ग्रहण करके भी चला सकती है।

‘शब्दहीन स्तंभ’ और वू जेतियन की रहस्यमय विरासत

सबसे दिलचस्प बात उनकी मृत्यु के बाद की स्मृति है। वू और उनके पति गाओज़ोंग का संयुक्त मकबरा प्रसिद्ध क्यानलिंग समाधि परिसर में है। वू के लिए वहाँ एक विशाल पत्थर का स्मारक खड़ा किया गया जिसे अक्सर ‘शब्दहीन स्तंभ’ कहा जाता है, क्योंकि उस पर उनके जीवन की प्रशस्ति खुदी नहीं थी।

इसके कारण के बारे में कई मत हैं। एक लोकप्रिय व्याख्या यह है कि उन्होंने अपना मूल्यांकन आने वाली पीढ़ियों पर छोड़ दिया—हालांकि इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। फिर भी वह खाली स्तंभ उनकी विरासत के लिए लगभग आदर्श प्रतीक बन गया है।

इतिहास ने वू जेतियन को खलनायिका क्यों बनाया?

क्योंकि इतिहास आज तक यह तय करता रहा है कि वू जेतियन को क्या कहा जाए—क्रूर हड़पने वाली, महान प्रशासक, नारी सत्ता की अग्रदूत, या बेहद महत्वाकांक्षी निरंकुश शासक?

वास्तविकता यह है कि वह इन आसान श्रेणियों से कहीं अधिक जटिल थीं। उनके बारे में पुराने चीनी इतिहास-ग्रंथों में अत्यंत नकारात्मक वर्णन मिलने का एक कारण यह भी था कि बाद का आधिकारिक इतिहास फिर उसी तांग और कन्फ्यूशियसी राजनीतिक परंपरा में लिखा गया जिसे उन्होंने चुनौती दी थी।

एक महिला का अपने बेटे को हटाकर स्वयं सम्राट बनना उस व्यवस्था के मूल सिद्धांत के लिए असहज था। इसलिए उनके शासन की वास्तविक हिंसा के साथ-साथ उनके लिंग को लेकर नैतिक आलोचना भी इतिहास में जुड़ती गई।

आधुनिक इतिहासकार इसीलिए उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड और उनके विरोधियों द्वारा लिखे चरित्र-वर्णन को अलग-अलग परखने की कोशिश करते हैं।

उन्होंने सिर्फ सिंहासन नहीं जीता, सत्ता की भाषा बदल दी


उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिभा शायद यही थी कि उन्होंने यह समझ लिया था कि सत्ता केवल सेना और महल पर नियंत्रण का नाम नहीं है। सत्ता के लिए कहानी भी चाहिए।

उन्होंने अपना धार्मिक आधार बनाया, नए प्रतीक बनाए, राजधानी की राजनीतिक भूमिका बदली, नए अधिकारियों को ऊपर उठाया, पुराने कुलीन वर्ग को कमजोर किया और अंत में स्वयं राजवंश का नाम बदल दिया।

यानी उन्होंने केवल सिंहासन पर बैठने की कोशिश नहीं की—उन्होंने उस व्यवस्था को ही पुनर्गठित किया जो तय करती थी कि सिंहासन पर बैठने का अधिकार किसे है।

चीन की इकलौती महिला सम्राट क्यों बनीं इतिहास की मिसाल?

और इसलिए वू जेतियन को केवल ‘चीन की पहली महिला शासक’ कहना भी कम है। चीन में उनसे पहले और बाद में शक्तिशाली महिलाएँ पर्दे के पीछे से शासन करती रहीं। वू का असाधारण कदम यह था कि उन्होंने पर्दा ही हटा दिया और कहा—राजा मेरा बेटा नहीं, शासक मैं स्वयं हूँ।

यही कारण है कि वे विश्व इतिहास की सबसे असाधारण महिला शासकों में गिनी जाती हैं। जिस चीन में दो हजार से अधिक वर्षों तक शाही पद का इतिहास चला, वहाँ असंख्य पुरुष सम्राट हुए—लेकिन औपचारिक रूप से ‘हुआंगदी’ बनकर शासन करने वाली महिला केवल वू जेतियन रहीं।

उनकी कहानी का सबसे सटीक निष्कर्ष शायद यह है—वू जेतियन केवल उस व्यवस्था में ऊपर नहीं पहुँचीं जिसमें पुरुषों का वर्चस्व था। उन्होंने सत्ता तक पहुँचने के बाद उस व्यवस्था की वैधता की भाषा ही बदल दी।

उनकी राजनीति में योग्यता भी थी और आतंक भी, सुधार भी था और निर्दयता भी, धार्मिक संरक्षण भी था और धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग भी। इसलिए उन्हें देवी या खलनायिका बनाकर समझना दोनों ही गलत होंगे। वह एक असाधारण रूप से सक्षम, महत्वाकांक्षी और कठोर शासक थीं।

और इतिहास में उनकी सबसे बड़ी विजय यह थी कि उन्होंने उस पद को हासिल किया जिसे उनके समाज ने किसी महिला के लिए लगभग अकल्पनीय बना रखा था।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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