पत्रकारिता के 200 वर्ष: शीर्षक, वर्तनी और भाषा

Indian Journalism: हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा केवल खबरों का इतिहास नहीं, बल्कि भाषा, शीर्षकों और वर्तनी के बदलते स्वरूप की कहानी भी है।

Yogesh Mishra
Published on: 12 May 2026 6:52 PM IST
200 Years of Indian Journalism History
X

200 Years of Indian Journalism History

200 Years of Journalism: पत्रकारिता केवल खबर नहीं, भाषा की धड़कन है। जब हम पत्रकारिता के 200 वर्षों की बात करते हैं, तो हम केवल अखबारों के इतिहास की बात नहीं कर रहे होते। हम उस यात्रा की चर्चा कर रहे होते हैं, जिसने समाज की सोच बदली। सत्ता से सवाल पूछे। आंदोलनों को जन्म दिया। और सबसे महत्वपूर्ण—भाषा को जनभाषा बनाया। भारत में पत्रकारिता का इतिहास केवल प्रेस मशीनों का इतिहास नहीं है। यह शब्दों का इतिहास है। यह शीर्षकों का इतिहास है। यह वर्तनी की लड़ाइयों का इतिहास है। यह भाषा के बदलते स्वभाव का इतिहास है।वर्तनी के बदलते आकार का इतिहास है।

आज यदि किसी गांव का सामान्य आदमी ‘लोकतंत्र’, ‘संविधान’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘अर्थव्यवस्था,’ ‘आतंकवाद’, ‘डिजिटल इंडिया’ या ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ जैसे शब्द सहजता से बोल लेता है, तो उसके पीछे पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की साधना है।पत्रकारिता ने केवल खबरें नहीं दीं, उसने भाषा को चलना, दौड़ना, गरजना और कभी-कभी रोना भी सिखाया।

भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरुआत 1780 में मानी जाती है, जब James Augusṭus Hicky ने Hicky’s Bengal Gazette निकाला। लेकिन हिंदी पत्रकारिता की वास्तविक शुरुआत 30 मई, 1826 को हुई। जब पंडित पंडित जुगुल किशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तण्ड नाम से एक साप्ताहिक समाचारपत्र प्रकाशित किया।

सोचिए, उस समय न इंटरनेट था। न टीवी। न मोबाइल। परिवहन कमजोर था। अधिकांश लोग निरक्षर थे। लेकिन फिर भी पत्रकारिता शुरू हुई। क्यों? क्योंकि समाज को संवाद चाहिए था। आवाज चाहिए थी।

उस दौर की भाषा संस्कृतनिष्ठ थी। शीर्षक लंबे होते थे। उदाहरण के लिए—

पुराने समय के शीर्षकों की शैली


* कलकत्ता में भयंकर अग्निकांड से जनधन की अपार हानि।

* अंग्रेज सरकार की नवीन नीति से जनता में असंतोष।

इन शीर्षकों में सूचना थी। लेकिन गति कम थी। भाषा साहित्य के करीब थी।

धीरे-धीरे पत्रकारिता ने समझा कि जनता छोटी, स्पष्ट और असरदार भाषा चाहती है। लिहाज़ा बदलाव शुरु हुए।

सूचना से प्रभाव तक शीर्षक का विकास

पत्रकारिता में शीर्षक केवल खबर का नाम नहीं होता। शीर्षक वह पहला दरवाजा होता है जिससे पाठक खबर में प्रवेश करता है। पहले शीर्षक सूचना देते थे। फिर शीर्षक भावनाएं जगाने लगे। फिर शीर्षक बाजार बनने लगे।और आज शीर्षक कई बार पूरा युद्ध बन जाते हैं।स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के शीर्षकों में राष्ट्रवाद था। उदाहरण—

अंग्रेजों भारत छोड़ो।लाठी-गोली खाएंगे, आजादी लेकर रहेंगे। भगत सिंह को फांसी। ये शीर्षक केवल खबर नहीं थे, ये आंदोलन थे।


अब जरूरी हो जाता है कि एक ही खबर को अलग-अलग दौर की भाषा में देखा परखा जाये मान लीजिए खबर है कि बारिश से शहर में बाढ़ आ गई। 1950–60 यानी पुरानी हिंदी पत्रकारिता को दौर में इस खबर का शीर्षक होगा—अतिवृष्टि से जनजीवन अस्त-व्यस्त।पर खबर की भाषा कुछ ऐसी होती थी-लगातार हो रही वर्षा के कारण नगर के विभिन्न क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। नागरिकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।यह भाषा साहित्यिक और औपचारिक थी।अब 1980–90 के अखबारी दौर में इस शीर्षक ने जो आकार लिया , वह रहा—

बारिश से शहर बेहाल। खबर की भाषा ने स्वरुप ग्रहण किया , वह कुछ ऐसी रही—तीन दिन से लगातार हो रही बारिश के कारण शहर के कई इलाके पानी में डूब गए। लोगों का जनजीवन प्रभावित हुआ।यहां भाषा सरल हुई।

टीवी पत्रकारिता के दौर में यह शीर्षक — पानी-पानी हुआ शहर! बन बैठा

इस खबर की भाषा कुछ इस तरह रही—सिर्फ तीन घंटे की बारिश ने पूरे शहर की पोल खोल दी। सड़कें तालाब बन गईं।यहां नाटकीयता बढ़ी।

डिजिटल पत्रकारिता यानी पोर्टल स्टाइल में इस शीर्षक ने जो आकार लिया, वह बना—3 घंटे की बारिश और डूब गई राजधानी! इसकी सब-हेडिंग बनी—स्कूल बंद, ट्रैफिक जाम, लोगों में भारी नाराजगी। यहां ‘इम्पैक्ट’ और ‘क्लिक’ महत्वपूर्ण हो गया।

यूट्यूब या सोशल मीडिया स्टाइल में यह शीर्षक बन बैठा- ऐसी बारिश पहले कभी नहीं देखी होगी!थंबनेल टेक्स्ट-पूरा शहर डूबा! सरकार फेल? देखिए Exclusive तस्वीरें। यहां भावनात्मक उत्तेजना सबसे ज्यादा है।

अब हम आपातकाल के समय की पत्रकारिता की बात करते हैं। 1975 के आपातकाल में जब सेंसरशिप लगी, तब कई अखबारों ने खाली संपादकीय कॉलम छोड़ दिए। वह खाली जगह भी शीर्षक से ज्यादा बोल रही थी।यह पत्रकारिता की भाषा का सबसे बड़ा उदाहरण है—कई बार मौन भी भाषा बन जाता है।

शीर्षकों का मनोविज्ञान

आज का शीर्षक केवल सूचना नहीं देता, वह पाठक की मानसिकता को पकड़ता है।

उदाहरण देखिए—सामान्य शीर्षक—बारिश से दिल्ली में जलभराव। टीवी शैली का शीर्षक—दिल्ली बनी दरिया! डिजिटल पोर्टल शैली—सिर्फ दो घंटे की बारिश और डूब गई राजधानी! यूट्यूब शैली—ऐसी बारिश आपने कभी नहीं देखी होगी! यह परिवर्तन केवल भाषा का नहीं, पाठक की मनोविज्ञान को पकड़ने का है।

अब हम एक ही घटना के पांच शीर्षक पांच अलग अलग कंटेंट व फ़ार्म में देखते हैं।

घटना है पेट्रोल 5 रुपये महंगा। सरकारी शैली में इस खबर का शीर्षक होगा—अंतरराष्ट्रीय कारणों से मूल्य समायोजन। अखबार इसी खबर का शीर्षक लगाता है—पेट्रोल फिर महंगा। टीवी आते आते इसी खबर का शीर्षक हो जाता है- महंगाई का नया झटका! विपक्षी शैली में जनता पर आर्थिक हमला। डिजिटल क्लिकबेट में अब घर से निकलना भी पड़ेगा महंगा!


क्लिकबेट शीर्षकों के कुछ अन्य उदाहरण और देख सकते हैं।मान लीजिए एक कार लांच हुई। सामान्य शीर्षक हुआ—नई कार लॉन्च हुई। क्लिकबेट शीर्षक हुआ—यह कार आते ही बाजार में मचा सकती है तहलका! सामान्य: सोना महंगा हुआ। क्लिकबेट: आज सोना खरीदने वाले जरूर पढ़ें ये खबर!

गंभीर पत्रकारिता में जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई खबर हो तो शीर्षक होगा—जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव। वायरल पत्रकारिता में यही शीर्षक हो जायेगा—धरती खत्म होने वाली है?

वर्तनी — पत्रकारिता की रीढ़

यदि शीर्षक पत्रकारिता का चेहरा है, तो वर्तनी उसकी रीढ़ है।एक छोटी सी गलती पूरा अर्थ बदल देती है।उदाहरण—दिन और दीन। शोक और शौक।आतंक और आतंकवाद। स्वर्गीय और स्वर्गीय।पत्रकारिता में एक गलत मात्रा कई बार प्रतिष्ठा खत्म कर देती है।वर्तनी की गलतियों के चर्चित उदाहरण

उदाहरण 1,

गलत: प्रधानमत्री पहुंचे वाराणसी।

सही: प्रधानमंत्री पहुंचे वाराणसी।

एक मात्रा की गलती प्रतिष्ठा गिरा देती है।

उदाहरण 2

गलत:शौक सभा आयोजित।

सही:शोक सभा आयोजित।

यहां अर्थ ही बदल गया।

उदाहरण 3

गलत: आतंकबादी हमला।

सही: आतंकवादी हमला।

ऐतिहासिक उदाहरण

कई अखबारों में कभी ‘प्रधानमंत्री’ की जगह ‘प्रधामंत्री’ छप गया। कभी ‘जनता’ की जगह ‘जंता’। आज सोशल मीडिया ऐसे स्क्रीनशॉट वायरल कर देता है।पहले गलती अगले दिन सुधरती थी।आज गलती पांच सेकेंड में वायरल हो जाती है।

संस्कृतनिष्ठ से सरल हिंदी तक

पुरानी वर्तनी / शैली नई / प्रचलित शैली

दूरभाष टेलीफोन / फोन

तारयंत्र टेलीग्राफ

चलचित्र फिल्म / मूवी

आकाशवाणी रेडियो

अंतर्जाल इंटरनेट

यंत्रमानव रोबोट

चलदूरभाष मोबाइल

विद्युतीय पत्र ईमेल

बोलने की लाइन:

पत्रकारिता ने देखा कि जनता कठिन शब्दों से दूर भागती है। इसलिए भाषा धीरे-धीरे सरल और बोलचाल की होती चली गई।

उर्दू-प्रभावित पत्रकारिता से हिंदीकरण

1940–60 के अखबारों में उर्दू प्रभाव अधिक था।

पुरानी शैली आज की शैली

इत्तिला सूचना

सियासत राजनीति

इंकलाब क्रांति

तहरीक आंदोलन

खिदमत सेवा

अवाम जनता

हुजूम भीड़

ज़खीरा भंडार

एक समय हिंदी पत्रकारिता पर उर्दू का गहरा प्रभाव था। बाद में हिंदीकरण की प्रक्रिया तेज हुई।

अंग्रेज़ी शब्दों का हिंदीकरण

पहले बाद में

रेलगाड़ी ट्रेन

संगणक कंप्यूटर

अंतर्जाल इंटरनेट

दुरदर्शन टीवी

चलचित्र सिनेमा

छायाचित्र फोटो

मुद्रणालय प्रेस

कहा जाता है कि कुछ शब्द इतने लोकप्रिय हो गए कि हिंदी उनके सामने हार मान गई।

वर्तनी परिवर्तन के रोचक उदाहरण

पुरानी वर्तनी आधुनिक वर्तनी

हिन्दुस्तान हिंदुस्तान

हिन्दी हिंदी

प्रदर्शिनी प्रदर्शनी

कर्त्तव्य कर्तव्य

विद्वान् विद्वान

सम्पादक संपादक

सम्पूर्ण संपूर्ण

प्रबन्ध प्रबंध

देवनागरी में संयुक्त अक्षरों और अनुस्वार के प्रयोग को समय के साथ सरल बनाया गया।

मात्रा और ध्वनि परिवर्तन

गलत/पुरानी शैली मानक शैली

कौन कौन

क्योँ क्यों

लिये लिए

हुये हुए

जावेगा जाएगा

आवेगा आएगा

यह पत्रकारिता में भाषा के मानकीकरण की प्रक्रिया दिखाता है।

अंग्रेज़ी प्रभाव के बाद बदले शब्द

पहले अब

समाचार पत्र न्यूज पेपर

संवाददाता रिपोर्टर

वार्ताहर पत्रकार

संपादकीय एडिटोरियल

विशेषांक स्पेशल एडिशन

मुखपृष्ठ फ्रंट पेज

शीर्षक हेडलाइन

पत्रकारिता की भाषा अब केवल हिंदी नहीं रही, वह बाजार और तकनीक से प्रभावित मिश्रित भाषा बन गई।

डिजिटल युग की नई भाषा

पुरानी पत्रकारिता डिजिटल पत्रकारिता

समाचार अपडेट

विशेष समाचार ब्रेकिंग न्यूज

चित्र इमेज

पाठक यूजर

प्रतिक्रिया फीडबैक

टिप्पणी कमेंट

प्रसारित वायरल

सोशल मीडिया ने पैदा किए नए शब्द

नया शब्द अर्थ

ट्रोल ऑनलाइन उपहास

वायरल तेजी से फैलना

फेक न्यूज झूठी खबर

स्क्रीनशॉट स्क्रीन की तस्वीर

अनफॉलो संपर्क हटाना

पॉडकास्ट ऑडियो कार्यक्रम

रील छोटा वीडियो

एक ही शब्द की तीन पीढ़ियां

उदाहरण : पत्र

पुराना: पत्र

आधुनिक: चिट्ठी

डिजिटल:मैसेज / DM / Inbox

उदाहरण : वार्ता।

पुराना:वार्ता

बाद में: इंटरव्यू

अब: Podcast / Live Session

पत्रकारिता में सबसे दिलचस्प बदलाव यह दिख रहा है कि पहले खबरों का शीर्षक होता था—प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया। आज यह शीतलदास कर हो गया है—PM ने Mega Project Launch किया। यह एक ही वाक्य में तीन भाषाओं का मिश्रण है—संस्कृत मूल, हिंदी व अंग्रेज़ी। शीर्षकों की वर्तनी यात्रा कुछ इस प्रकार बदली। 1950 हम्मालिन रहे थे-प्रधानमंत्री दिल्ली पधारे। 1980 में हम लिखने लगे-प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचे। 2000 में हमने लिखा—PM पहुंचे दिल्ली। 2026 में डिजिटल मीडिया में इस शीर्षक ने अपना नया स्वरुप कुछ इस तरह ग्रहण किया—

Delhi में PM का Mega Show. साफ है कि पत्रकारिता की वर्तनी यात्रा केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है।यह समाज की बदलती मानसिकता, तकनीक, राजनीति, बाजार और समय की गति का दर्पण है।

जहां कभी ‘सम्पादक’ लिखा जाता था, आज ‘Editor’ लिखा जा रहा है। जहां कभी ‘चलचित्र’ था, वहां आज ‘Reel’ है।यानी पत्रकारिता केवल खबर नहीं बदलती, वह भाषा की दिशा भी बदल देती है।”

भाषा का बदलता स्वरूप


पत्रकारिता की भाषा हमेशा समाज के साथ बदलती रही है।पहला दौर में संस्कृतनिष्ठ भाषा रहीं। शीर्षक बनते रहे-प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन संपन्न। दूसरा दौर में सरल हिंदी तो हुई पर शीर्षक बनने लगे—प्रधानमंत्री ने उद्घाटन किया। तीसरा दौर मिश्रित भाषा का आया। PM ने प्रोजेक्ट लॉन्च किया, लिखा जाने लगा।

चौथा दौर डिजिटल भाषा का आया। इसमें शीर्षक बनने लगे—PM का बड़ा गेमचेंजर मूव। पुराने अखबार में शीर्षक होते थे—कांग्रेस को भारी बहुमत प्राप्त। 1990 के दौर में शीर्षक बनने लगे—जनता ने बदला सत्ता का समीकरण। आज के टीवी मीडिया ने इस शीर्षक को कुछ इस तरह बदल कर रख दिया—कौन बनेगा सत्ता का सिकंदर? पर डिजिटल मीडिया ने इसे पूरी तरह बदल दिया—इस एक जाति ने बदल दिया पूरा चुनाव! युद्ध व आतंकवाद की खबरों के उदाहरण पर विचार करें तो यह तथ्य हाथ लगता है कि पुरानी पत्रकारिता के शीर्षक होते-सीमा पर संघर्ष तेज। या फिर

सीमा पर दुश्मन को करारा जवाब

हाइपर नेशनलिस्ट डिजिटल दौर में लिखा जाने लगा- घर में घुसकर मारा! यहां भाषा सूचना से ज्यादा भावनात्मक राष्ट्रवाद पैदा करती है।आर्थिक खबरों की भाषा के बदलाव को भी पढ़ने व परखने की जरूरत है। 1960–70 के दौर में लिखा जाता था-मुद्रास्फीति में वृद्धि। पर आज के अख़बार में शीर्षक गढ़े गये- महंगाई ने तोड़ी आम आदमी की कमर। जबकि डिजिटल पोर्टल में लिखा गया- अब और महंगा होगा आपका जीवन! अपराध पत्रकारिता के उदाहरण भी जरूरी हो जाते हैं। पुराना अखबार लिखता था—व्यक्ति की हत्या। टीवी शैली में यह शीर्षक बना—खूनी खेल!

डिजिटल में सनसनी फैलाते हुए इस शीर्षक को लिखा जाता है—रात के अंधेरे में हुआ ऐसा कांड कि कांप उठेंगे!यहां भाषा सूचना नहीं, भय बेच रही है।यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या पत्रकारिता भाषा को समृद्ध कर रही है या बिगाड़ रही है?

हिंदी बनाम हिंग्लिश

आज पत्रकारिता में ‘हिंग्लिश’ का प्रभाव तेजी से बढ़ा है।जैसे ब्रेकिंग न्यूज, अपडेट, एक्सक्लूसिव, फीडबैक, कमेंट, ट्रेंड आदि।

आज की पत्रकारिता में यह खूब दिखता है—

* “CM का Mega Road Show”

* “PM ने बड़ा Message दिया”

* “Opposition का Master Plan”

* “Budget पर Middle Class Shocked”

अब प्रश्न यह है कि क्या यह भाषा की हत्या है?या समय की जरूरत?सच यह है कि भाषा हमेशा बदलती है।संस्कृत से प्राकृत बनी।

प्राकृत से अपभ्रंश।अपभ्रंश से हिंदी।इसलिए भाषा का परिवर्तन स्वाभाविक है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व यह है कि भाषा इतनी भी न बदल जाए कि उसकी आत्मा ही खो जाए।

सोशल मीडिया ने भाषा को कैसे बदला


सोशल मीडिया ने पत्रकारिता की भाषा को सबसे ज्यादा प्रभावित किया।पहले खबर लिखी जाती थी।अब खबर ‘ बेची’जाती है।पहले शीर्षक सूचना था।अब शीर्षक ‘क्लिक’ है।उदाहरण पहले लिखा जाता था-मंत्री ने नई योजना शुरू की।

अब—इस योजना ने सबको चौंका दिया!पहले पत्रकारिता तथ्य केंद्रित थी।अब एल्गोरिद्म केंद्रित होती जा रही है।

टीआरपी और भाषा का पतन

टीवी पत्रकारिता ने भाषा को नाटकीय बनाया।मसलन, देश दहल गया! सबसे बड़ा खुलासा! महाविनाश! देश पूछ रहा है! यहां भाषा सूचना कम और उत्तेजना ज्यादा पैदा करती है।धीरे-धीरे पत्रकारिता ने संवाद की जगह प्रदर्शन को महत्व देना शुरू किया।

डिजिटल पत्रकारिता और नई चुनौतियां

आज पत्रकारिता मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गई है।अब लोगों के पास लंबा लेख पढ़ने का समय कम है।इसलिए भाषा छोटी हो गई। 800 शब्द की खबर अब 80 शब्द में आ रही है। TL;DR” संस्कृति आ गई है। TL;DR माने Too Long; Didn’t Read, हिंदी में इसका अर्थ होता है—बहुत लंबा था, इसलिए नहीं पढ़ा। या संक्षेप में सार बताइए। शॉर्ट वीडियो ने भाषा को दृश्य आधारित बना दिया।लेकिन खतरा यह है कि कहीं गहराई खत्म न हो जाए।

पत्रकारिता की भाषा और जिम्मेदारी

पत्रकारिता केवल व्याकरण नहीं है।यह सामाजिक जिम्मेदारी भी है।यदि पत्रकार ‘आरोपी’को ‘अपराधी’ लिख दे, तो यह भाषा की गलती नहीं, न्याय की हत्या है। यदि किसी समुदाय के लिए अपमानजनक शब्द इस्तेमाल हो जाएं, तो समाज में तनाव पैदा हो सकता है।इसलिए पत्रकारिता की भाषा संयमित, सटीक और संवेदनशील होनी चाहिए।

कुछ महान पत्रकार और उनकी भाषा का जिक्र जरूरी हो जाता है। गणेश शंकर विद्यार्थी की भाषा सरल लेकिन धारदार थी। बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता में आग थी। महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को नैतिकता से जोड़ा।उनकी भाषा में आक्रामकता नहीं। लेकिन गहरा प्रभाव था।

आने वाला समय — AI और भाषा


अब पत्रकारिता आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में प्रवेश कर चुकी है।AI खबर लिख रहा है।AI शीर्षक बना रहा है।AI वीडियो तैयार कर रहा है।

लेकिन सवाल यह है—क्या AI संवेदना लिख सकता है?क्या AI किसी किसान की आंखों का दर्द समझ सकता है?भाषा केवल शब्द नहीं होती।उसमें अनुभव, संस्कृति, पीड़ा और स्मृति भी होती है। एआई इन सब में से कुछ अपनी खबर या भाषा में पिरो सकता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि पत्रकारिता की आत्मा बची रहनी चाहिए। दो सौ वर्षों की पत्रकारिता ने हमें बहुत कुछ दिया—भाषा दी। संवाद दिया। लोकतंत्र दिया। सवाल पूछने की ताकत दी। लेकिन आज सबसे बड़ा खतरा यह है कि कहीं गति के चक्कर में भाषा की गरिमा न खो जाए।पत्रकारिता की असली ताकत ‘सबसे तेज’ होने में नहीं है।उसकी ताकत ‘सबसे सही’ होने में है।शीर्षक आकर्षक हो सकता है। लेकिन भ्रामक नहीं।भाषा आधुनिक हो सकती है। लेकिन अशिष्ट नहीं।वर्तनी सरल हो सकती है। लेकिन गलत नहीं।

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि खबर कितनी तेज है।

सवाल यह है कि—भाषा कितनी जिम्मेदार है? शीर्षक कितना ईमानदार है? वर्तनी कितनी शुद्ध है?और पत्रकारिता समाज को जोड़ रही है या भड़का रही है? पत्रकारिता के 200 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल खबरें नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भाषा को जनता की आवाज बना दिया।

शीर्षक बदलते रहे, शब्द बदलते रहे, माध्यम बदलते रहे…लेकिन पत्रकारिता की आत्मा हमेशा भाषा में ही बसती रही।

अंत में मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा— जब समाज की भाषा बिगड़ती है, तो समाज की सोच भी बिगड़ने लगती है।और जब पत्रकारिता अपनी भाषा बचा लेती है, तब लोकतंत्र भी सुरक्षित रहता है। वह समाज की बिगड़ी सोच को भी बचा लेती हैं।

( दिनांक 12.5,2026 को डॉ.के. विक्रम राव की पहली पुण्यतिथि पर प्रेस क्लब, लखनऊ में आयोजित क में दिया गया विचार। )

Admin 2

Admin 2

Next Story