मेरी पत्रकारिता के ‘आलोक’ पड़ाव

Journalist Alok Mehta Memoirs: दैनिक जागरण से आउटलुक और फिर न्यूज़ट्रैक तक की पत्रकारिता यात्रा। वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र ने साझा किए आलोक मेहता के साथ बिताए यादगार अनुभव, बड़े नेताओं के इंटरव्यू, खोजी पत्रकारिता और मीडिया की अनकही कहानियां।

Yogesh Mishra
Published on: 6 Aug 2026 8:02 PM IST (Updated on: 7 Aug 2026 12:01 AM IST)
Journalist Alok Mehta and Yogesh Mishra Memoirs
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Journalist Alok Mehta and Yogesh Mishra Memoirs 

Journalist Alok Mehta Memoirs: बात तकरीबन 2002 की है। मैं उन दिनों ‘दैनिक जागरण’ के दिल्ली ब्यूरो में काम कर रहा था। मेरे पास उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात व राजस्थान जैसे राज्य व मानव संसाधन मंत्रालय, क़ानून मंत्रालय, महिला व बाल कल्याण, युवा व खेल मंत्रालय, साइंस एंड टेक्नोलॉजी जैसे विभाग तथा उस समय के सभी आयोगों को देखने का काम था। उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड, ‘दैनिक जागरण’ के लिए प्रतिष्ठा की भूमि थी।

डॉ मुरली मनोहर जोशी के पास मानव संसाधन मंत्रालय था। हमारे संपादक नरेंद्र मोहन जी का डॉ जोशी से करीबी रिश्ता था। लिहाजा यह भी संवेदनशील था। हमारे ब्यूरो चीफ़ प्रशांत मिश्र थे। उनके उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ-साथ भाजपा नेताओं से बेहद करीबी रिश्ते थे।


प्रशांत जी का हमें पूरा सहयोग व समर्थन था। उन दिनों मानव संसाधन मंत्रालय में यूपी काडर के अफसरों की भरमार थी। लिहाजा हमारे हाथ हर खबर पहले ही लग जाती थी। चूँकि मैंने मानव संसाधन को रेगुलर बीट के रूप में तब्दील कर दिया था सो मैं मीडिया के दूसरे साथियों के केंद्र में आ गया। उस दौर में रवीश कुमार, दीपक शर्मा, दीपक चौरसिया, श्याम लाल यादव, संजीव आचार्य, अरविंद कुमार सिंह, ख़बरों के लिहाज़ से मेरे निकट थे। हर रोज बात और खबरों का आदान प्रदान सहज था।

प्रशांत जी से पहले जागरण ब्यूरो में महत्वपूर्ण पद पर संजीव आचार्य रह चुके थे। उन दिनों ‘आउटलुक’ के हिंदी संस्करण की तैयारी चल रही थी। अंग्रेज़ी ‘आउटलुक’ विनोद मेहता जी व अपने तेवर के लिए बाज़ार व पाठकों के बीच अपनी जगह बना चुकी थी। हिंदी के संपादक का दायित्व आलोक मेहता जी के जिम्मे था। संजीव आचार्य ने एक दिन हमसे कहा कि ‘आउटलुक’ हिंदी के लिए उत्तर प्रदेश में एक रिपोर्टर चाहिए, तुम्हें जाना हो तो बताओ, आलोक जी से मुलाक़ात करवाता हूँ। मैं जानता था कि संजीव रिश्तों को रखने व चलाने में इतने माहिर थे कि उनके क़रीब का कोई आदमी उनकी बात काट नहीं सकता था, खासतौर पर वह भी मध्य प्रदेश का। इसलिए आउटलुक के लिए लखनऊ में चयनित हो जाने का विश्वास तो था। लेकिन दैनिक जागरण को छोड़ने का मन नहीं था। फिर भी, आलोक जी से मुलाकात का लोभ संवरण मैं नहीं कर पाया। उनसे मिलने की मेरी इच्छा जिस वजह से थी, उसमें बड़ी वजह यह थी कि उन्होंने ‘हिंदुस्तान’ को लाटरी के अख़बार से निकाल कर एक दैनिक समाचार पत्र में तब्दील कर दिखाया था। उन्हें पढ़ते हुए भी अच्छा लगता था। उन दिनों तो वह नि:संदेह देश के शीर्ष संपादकों में से एक थे। लिहाजा मैं संजीव के साथ ‘आउटलुक’ ऑफिस चला गया। आलोक जी विनोद जी के साथ बैठे थे। वहीं सीधे मेरा इंटरव्यू हो गया। उन दिनों विधानसभा में पत्रकारों को इमदाद बांटने की एक सूची पेश हुई थी। इसमें पत्रकारों के नाम मायावती व मुलायम सिंह में बंटे हुए थे। इंटरव्यू में बस एक सवाल पूछा गया -“ उत्तर प्रदेश के किस नेता की सूची में आपका नाम है।” मैंने कहा -“ सर, किसी सूची में नहीं।” दूसरा सवाल आया -“ तो कैसे पत्रकार हैं आप।” मेरा जवाब था -“ सर मौक़ा दीजिए।” बस आलोक जी व विनोद जी हंस पड़े।


संजीव ने दूसरे दिन हमें जानकारी दी कि मेरा पत्र तैयार हो रहा है। लेकिन मेरे सामने प्रशांत जी के रहते दैनिक जागरण छोड़ने का कोई आधार नज़र नहीं आ रहा था। मेरा परिवार लखनऊ में ही रहता था। दिल्ली में मैंने ज़्यादातर समय यूपी भवन में ही काट लिया था। दिल्ली के लोग उतना जँचते भी नहीं थे। वे पत्रकार होने की बात बताते ही यह पूछना नहीं चूकते थे कि आप की ‘बीट’ क्या है। यह हमें परेशान करता था।

‘आउटलुक’ वाली बात ऑफिस में भी हमने किसी को नहीं बताई थी। प्रशांत जी को बताने का सवाल ही नहीं उठता था। मैं बेहद असमंजस में जी रहा था। यह असमंजस मेरे चेहरे पर उन दिनों पढ़ा जा सकता था। ब्यूरो में ही हमारे एक सहयोगी आलोक कुमार थे। एक दिन हमने उनसे चर्चा की। पूरी बातचीत में आलोक कुमार ने एक वाक्य कहा,” देश में जितने भी पत्रकार हुए है, उन सब ने पत्रिका में ज़रूर काम किया है। तुम्हें बड़ा पत्रकार होने का अवसर मिल रहा है, छोड़ो मत।” आलोक ने उन दिनों के की शीर्षस्थ पत्रकारों के नाम भी गिनवाये। आलोक की इस बात ने हमें ‘आउटलुक‘ में काम करने के लिए खुद को तैयार करने में बहुत मदद की। लिहाजा हमने साहस जुटा कर प्रशांत जी को बताया। वह बेहद नाराज़ हुए। पर दो तीन दिनों तक मैं बच्चों, पत्नी व परिवार का हवाला देकर उन्हें राज़ी करने में कामयाब हुआ। लेकिन उन्होंने कहा – ‘जाओ, दो तीन महीने तुम्हारे लिए पद ख़ाली रखूँगा। अच्छा न लगे तो लौट आना।‘

मैं लखनऊ आ गया। जब मेरे हम पेशा साथियों को पता चला कि मैंने ‘आउटलुक’ में ज्वाइन कर लिया है तो बस क्या, आलोक जी के पास शिकायतों को अंबार पहुँचने लगा। लोगों ने लिखा कि मैं यूपी भवन में रहता था, मेरे रुकने खाने का बिल एक भाजपा नेता ने दिया था। किसी ने लिखा कि मैं मुलायम सिंह जी का करीबी हूँ। किसी ने भगवा पत्रकार बताने में कोई गलती नहीं की।

अलोक जी को लखनऊ में ‘हिंदुस्तान’ के नाते उन्हें जानने, पहचानने व रिश्तों का दावा करने वालों की कमी नहीं थी। एक बार मैंने सोचा कि मैं भी आलोक जी के लोगों के जरिये अपना पक्ष रखवा दूँ। पर बाद में सोचा कि प्रशांत जी ने जगह रख छोड़ी है। इसलिए देख लिया जाये कि इस दौर में साबित क्या हो पाता है। कभी न कभी इस परीक्षा से गुजरना ही था। लिहाजा मैं निश्चिंत हो गया।

मायावती की उत्तर प्रदेश में भाजपा के साथ सरकार थी। मेरे काम पर निगाह रखी जाने लगी। इस काम के लिए दिवाकर जी को लगाया गया। मेरी कॉपी कई बार पढ़ी जाने लगी। यूपी भवन में रुकने व मेरा बिल किसी भाजपा नेता द्वारा भरने के बारे में हमने वे सारे चेक दिखाये जिससे हमने पेमेंट किया था। लिहाजा इस तोहमत के ग़लत साबित होने के बाद सब कुछ केवल रेकी पर रखा गया। हमसे दिवाकर जी ने कहा कि मैं अपनी कोई ख़बर तब तक नहीं भेजूँ जब कर उसके काग़ज़ न हों। लिहाजा मैंने सरकारी फाइलों के ढेरों पेपर भेजने शुरू किये। मेरा फोटोकॉपी का बड़ा बिल आने लगा। एक दिन विनोद जी ने दिवाकर से पूछ ही लिया कि उत्तर प्रदेश वाला योगेश मिश्र फ़ोटोकॉपी की दुकान चलाता है क्या?

पर अब काम रूटीन पर दौड़ने लगा, लेकिन अख़बार की तुलना में बेहद थका हुआ। हफ़्ते में मात्र एक दिन। एक बार मुलायम सिंह ने छात्र संघों के पूर्व पदाधिकारियों की एक बैठक बुलाई। मंच भी दिया। मैंने आलोक जी से पूछा कि क्या हमें जाना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि यदि आप छात्र संघ के पदाधिकारी रहे हैं, तो जायें। मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रकाशन मंत्री रह चुका था। कार्यक्रम में चला गया। मुलायम सिंह जी के पार्टी ऑफिस में ही यह कार्यक्रम था। जब मैं मंच से बोल कर उतरा तो मेरी फोटो और अख़बारों में इस खबर की कतरनें आलोक जी तक पहुँचा दीं गईं। आलोक जी ने उन सारे काग़ज़ों व फोटो को लपेटा, एक गोला सा बना कर ऊपर लिख दिया - “ आपके दोस्तों, मित्रों की शुभचिंताएं। हक़ीक़त आप जानते होंगे।” आलोक जी का यह वाक्य मुझे इतना अंदर तक छू गया कि उसे मैंने सँभाल कर रख लिया।

सब बहुत कम लोग जानते हैं कि आज के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी को किसी पब्लिक प्लेटफ़ार्म पर साकेत सिंह ले कर आये थे। कार्यक्रम युवाओं से जुड़ा था। कार्यक्रम स्थल लखनऊ विश्वविद्यालय था। उस समय भाजपा का कोई नेता योगी जी के साथ डायस शेयर करने को तैयार नहीं था। साकेत ने हमसे कहा। मैने उस कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ जी के साथ डायस शेयर किया। उस समय साकेत ‘हिंदवी’ नाम से अपना साप्ताहिक पेपर निकालते थे। उसमें मेरी व योगी जी की डायस पर फोटो व कार्यक्रम की रिपोर्ट छपी। मेरे कुछ मित्रों व शुभचिंतकों ने उसे भी आलोक जी तक पहुंचाया। पर तब तक मैं अग्नि परीक्षा पास कर चुका था लिहाजा आलोक जी ने कुछ नहीं पूछा। जब मैं मिलने गया तो उन्होंने पेपर मोड़ कर हमें थमा दिया। बस।

एक बार हम लोग मायावती पर कवर स्टोरी प्लान कर रहे थे। स्टोरी का इंट्रो हमसे नहीं बन रहा था। पूरा एक दिन लग गया। पत्रिका को मुद्रण में जाना था। आलोक जी ने पूछा कि क्या बात है, तुम्हारी कॉपी नहीं आई। मैंने बताया कि सर इंट्रो बन नहीं पा रहा है। उन्होंने कहा, जो बन रहा है वही कॉपी भेज दो। मैंने थक हार कर कॉपी भेज दी। लेकिन उसपर अपनी बाईलाइन नहीं लिखी। जब छप कर पत्रिका मार्केट में आई तो हमें पढ़ कर बेहद शर्मिंदगी हुई। क्योंकि एक बढ़िया इंट्रो के साथ पूरी कॉपी बहुत बेहतर ढंग से लिखी गई थी। मैंने दिवाकर जी से पूछा कि यह किसने किया है। उन्होंने बताया कि यह आलोक जी ने किया है। कवर स्टोरी थी – ‘माया मेम साहब का कोड़ा।‘ मैंने आलोक जी को फ़ोन किया और बेहतर कॉपी की तारीफ़ करने के साथ ही उनसे काफी कुछ सीख गया। कम से कम दस बार उसे मैंने पढ़ा होगा। वह अंक मेरे पास सुरक्षित है।


एक अंक हिंदी व अंग्रेज़ी दोनों में प्लान किया गया जिसमें बड़े बड़े राजनेताओं के लेख होने थे। मायावती, मुलायम सिंह, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह आदि के लेख लिखवाने की ज़िम्मेदारी मेरी थी। बाक़ी सब तो ठीक था। लेकिन मायावती जी इन सब तरीक़ों से खुद को दूर रखती थीं। उनसे लेख लिखवाना आसान नहीं था। मैंने अपने संपर्क खँगाले और उन तक पहुँचा। उनसे आग्रह किया। पर वह कहने लगीं कि तुम लोग उसे तोड़ मरोड़ कर छाप दोगे। मनुवादी मीडिया हो। हमने उन्हें आश्वस्त किया। खैर, उन्होंने लेख लिखा। उनके कॉमा, फ़ुल स्टाप को भी बिना ठीक किये वैसे ही प्रकाशित किया गया। आज तक मायावती जी ने केवल ‘द हिंदू’ व ‘आउटलुक’ के लिए ही अपने हाथ से लेख लिख कर के दिया है। मेरे पास मायावती जी द्वारा लिखे लेख की कॉपी आज भी सुरक्षित है।

मायावती जी सीधे मीडिया से बात करने से परहेज़ करती रहीं हैं। मायावती जी का शपथ ग्रहण कार्यक्रम था। आलोक जी अपने अंक के लिए उनका एक इंटरव्यू चाहते थे। मैं इस काम पर लगा। काम ख़ासा मुश्किल था। क्योंकि उसी दिन उनका शपथ ग्रहण के बाद उनकी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस थी। हमारे दिल्ली व अंग्रेज़ी आउटलुक के साथी भी मायावती जी के शपथ ग्रहण में आये थे। उन्होंने यह बता दिया कि उन्होंने मायावती जी का इंटरव्यू ले लिया है। मायावती जी का इंटरव्यू न ले पाने की मेरी विफलता ने आलोक जी को भीतर तक परेशान कर दिया। उन्होंने बहुत कुछ समझाया। मैं बार बार कहता रहा कि मायावती जी ने कोई इंटरव्यू दिया ही नहीं है पर मेरी बात उनके गले ही नहीं उतर रही थी। जब आलोक जी ने बताया कि मायावती जी का इंटरव्यू अंग्रेज़ी के साथियों ने कर लिया है तब मैंने शशांक शेखर सिंह जी से पूछा। उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया कि मायावती जी से वन टू वन कोई पत्रकार मिला ही नहीं। वैसे भी उनका पहला इंटरव्यू करने की बात भी मेरी शशांक जी से चुनाव के दौरान ही हो गई थी। उनसे मेरे मधुर संबंध भी थे।

आलोक जी मेरी बात मानने को तैयार ही नहीं थे। उधर अंग्रेज़ी व हिंदी में मायावती जी का इंटरव्यू प्रकाशित करने की तैयारी चलने लगी। मेरे सामने भी सम्मान का सवाल आकर अटक गया। मैंने शशांक शेखर सिंह जी को इतना परेशान किया कि सूचना विभाग की ओर से खंडन जारी हुआ कि मायावती जी ने किसी को कोई इंटरव्यू नहीं दिया था। इसके बाद मेरी जान में जान आई। हुआ यह था कि प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जो सवाल जवाब हुए थे, उन्हें जोड़ कर अंग्रेज़ी के साथियों ने इंटरव्यू बना दिया था।

‘आउटलुक’ में अदृश्य ढंग से हिंदी व अंग्रेज़ी के बीच एक लाग - डाट चला करती थी। आलोक जी हिंदी के प्रखर व प्रबल समर्थक थे। वहीं, विनोद मेहता जी अंग्रेज़ी के साथ इस हद तक खड़े रहते थे कि वह यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं करते थे कि उन्हें हिंदी नहीं आती है। जबकि वह लखनऊ के ला मार्ट व लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़े थे। हालाँकि बाद में लंदन से भी उन्होंने तालीम पाई थी। आलोक जी चाहते थे कि हिंदी में इतना बेहतर काम हो कि अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद किया जाए। खैर, बाद में मायावती जी का इंटरव्यू सतीश मिश्रा जी के सहयोग में दिल्ली में फ़िक्स हुआ। मैंने आलोक जी से कहा कि वह भी चलें। मायावती जी से मिलने का अवसर कोई गँवाना नहीं चाहता। पर उन्होंने साफ मना कर दिया। कहा, “ तुम अकेले जाओ।”

यह अकेली घटना नहीं है। ऐसी कई बातें याद आ रही हैं। एक वाक़या नरेंद्र मोदी जी के इंटरव्यू का भी है। बात उस समय की है जब राजनाथ सिंह जी पहली बार अध्यक्ष बने थे। जनवरी, 2007 का समय रहा होगा। भाजपा कार्यसमिति की बैठक लखनऊ में हुई थी। नरेंद्र मोदी जी भी आये थे। उस समय मीडिया में नरेंद्र मोदी जी का बड़ा आकर्षण था। हमारे सामने भी उनका इंटरव्यू लेने की चुनौती थी। मोदी जी होटल ताज में रुके। उनके साथ के ओ.पी. सिंह जी को मैंने अप्रोच किया। उन्होंने ताज होटल से निराला नगर स्थित शिशु मंदिर तक उनकी गाड़ी में जाने का अवसर दिला दिया। ढेर सारे सवालों के बीच एक सवाल हमें पूछना था - “ कहा जाता है कि आप एस्सारदानी, अडानी, अंबानी और टोरंटो जैसे कुछ ख़ास उद्योग समूहों को संरक्षण देते हैं। जिसके चलते छोटे और मझोले उद्योगों को आपकी सरकार का अपेक्षित संरक्षण नहीं मिल पाता है। इसकी क्या वजह है?” इस सवाल पर मोदी जी एक छोटा सा पॉज लिया। फिर कहा - “ आप इसका उत्तर लिख सकोगे?” हमने तपाक से कहा -“ आप रिकार्ड पर बोलेंगे तो जरूर।” मोदी जी का उत्तर था – “आउटलुक का क्या एजेंडा है, मुझे नहीं मालूम। लेकिन मेरे प्रदेश में विरोधी दल ने भी कभी ऐसे आरोप नहीं लगाये हैं। इसलिए आप के पेट में पीड़ा होती है तो उसकी दवा मेरे पास नहीं है।“ जब इंटरव्यू छप कर आया तो यह पूरी बात जस की तस छपी थी।

अन्ना आंदोलन के दौर में आलोक जी पूरी टीम लेकर ‘नई दुनिया’ में आ गये थे। आंदोलन अपने शबाब पर था, उसी बीच आलोक जी का फ़ोन आया कि हम तुम्हें एक कठिन काम देना चाहते हैं। इस काम को उन्होंने दिल्ली के साथियों को दिया था, पर किसी कारण से वे उसे अंजाम तक पहुँचा नहीं पाये थे। काम था - तथ्य व सत्य से यह साबित करना कि अन्ना हजारे जी का संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से था।


खैर, आलोक जी कठिन काम देने नहीं, करवा लेने के महारथी हैं। हमने अपने सोर्स पर काम शुरू किया। पता चला कि नाना जी देशमुख व अन्ना जी में निकटता थी। नानाजी देशमुख का संघ से रिश्ता जग जाहिर था। हमें एक पत्रिका गोंडा से हाथ लगी जिसमें यह दिया हुआ था कि एक संगठन में नानाजी देशमुख अध्यक्ष व अन्ना हजारे महासचिव थे। नाना जी ने संघ तथा अन्य संस्थाओं की बैठक में अन्ना की खासी प्रशंसा की थी। नानाजी देशमुख की सलाह पर ही संघ की शाखाओं में अन्ना का नाम आदर से लिया जाता था। चित्रकूट से एक पत्रिका में एक फोटो मिली जिसमें गोंडा के दीनदयाल संस्थान में आयोजित एक गोष्ठी में शिरकत करने आये नानाजी देशमुख व अन्ना साथ साथ थे। बस, हम लोगों का काम चल गया। इस खबर के छपते ही देश के सभी चैनलों ने इसे लपक लिया। मेरी जानकारी में यह पहली खबर थी, जिसे अख़बार से सभी चैनलों ने एक साथ उठाया। अब सारे चैनल के लोग आलोक जी को इस खबर पर स्क्रीन शेयर करने को बुलाने लगे। पर, आलोक जी ने साफ किया कि इस खबर पर केवल योगेश को अप्रोच करें, वही बैठेगा। बस, देश के हर छोटे बड़े चैनलों पर मैं छाया रहा।

अन्ना जी का पूरा आंदोलन बिखर गया। संघ लोग भी हमें फ़ोन करने लगे क्योंकि यह पूरा आंदोलन संघ के सहयोग से शुरू हुआ और बढ़ा। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल ने इसे लपक लिया। जिससे संघ के लोग भी दुखी थे। आज भी एआई पर जाकर अन्ना आंदोलन के खत्म होने के कारण पूछे जायें तो वह एक कारण ‘नई दुनिया’ की खबर भी गिनाया जाएगा।

आलोक जी रिपोर्टर को स्टार बना कर रखना चाहते रहे। उन्होंने मुझे लखनऊ में बैठ कर टूजी, कामन वेल्थ, कोलगेट में हुए गोलमाल की खबरें लिखने का अवसर दिया। हमने लखनऊ में बैठ कर दुनिया के सबसे बड़े बैंकिंग फ्राड, स्विस बैंक, हसन अली पर खबरें लिखीं। मेरी कोई खबर रोकी नहीं गई। बस काग़ज़ माँगे गये। उन दिनों जाँच एजेंसियों में मेरे कई मित्र थे। लिहाजा हमें दिक्कत नहीं होती थी। आलोक जी का मानना था कि रिपोर्टर के लिंक कहीं भी हो सकते हैं। बीट व एरिया केवल इसलिए बंटे होते हैं ताकि रूटीन पर वह नज़र बनाये रखे।

आलोक जी नोटिस से डरते नहीं थे। वह विरोध का सम्मान करने के आदी तो थे लेकिन विरोध का जवाब देने में भी चूकते नहीं थे। बेवजह के विरोध से लड़ने का साहस देते थे। लड़ाई में खुद भी मजबूती से खड़े रहते थे। एक बार आज़म ख़ाँ पर हमने स्टोरी की, उनके जौहर विश्वविद्यालय व उनके विभाग को मिलाकर। आज़म जी ने ‘आउटलुक’ की प्रतियाँ रामपुर में जलवा दीं। मेरे खिलाफ बेहद तल्ख़ भाषा में एक बड़ा पत्र लिखा। पर आलोक जी ने नोटिस ही नहीं लिया।

एक बार हमने अमर सिंह व जया प्रदा तथा उनके साथ विदेश गये एक प्रतिनिधिमंडल पर खबर थी। खबर की शुरुआत कुछ ऐसे थी – “तकरीबन डेढ़ दोस्त पहले शराबी फिल्म में अभिनेता अमिताभ बच्चन को शराब न पीने की नसीहत देने वाली जया प्रदा इन दिनों उत्तर प्रदेश के लोगों को उम्दा शराब पिलाने का गुर सीखने विदेश गईं हैं..।“


अमर सिंह जी को यह बात बहुत अखरी। उन्होंने बनारस में मेरी इसी खबर पर प्रेस कांफ्रेंस कर के खूब खरी खोटी सुनाई। आलोक जी ने टीवी पर ये देखा। उन्होंने फोन किया और पूछा कि क्या मैं अमर सिंह जी से बात कर सकता हूँ। मैंने कहा, क्यों नहीं? अलोक जी ने पूरी बात बताई। फिर मैंने अमर सिंह जी को फोन लगाया। उनके साथ सहारा के एक शुक्ला जी रहा करते थे। मेरे परिचित भी थे। उन्होंने फोन अमर सिंह जी को दिया। मैं बरस पड़ा। बहुत कुछ सुनाया। अमर सिंह जी ने मेरा फोन काट कर आलोक जी को करीब आधा दर्जन बार फोन किया। आलोक जी ने उनका फोन नहीं उठाया। उन्होंने हमें फिर फोन किया। पूछा क्या हुआ? मैंने पूरी बात बताई। उन्होंने कहा कि क्या मैं अमर सिंह को फिर फोन कर सकता हूँ। मैंने कहा, सर मैं रिपोर्टर हूँ। मेरे लिए दोबारा फोन करना कोई प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। आलोक जी ने हमें यह नहीं कहा कि मैं अमर सिंह जी से क्या बात करूँ। पर यह ज़रूर कहा कि मैं अमर सिंह जी को फोन करते समय यह बता दूँ कि उन्होंने ने आलोक जी को कई फोन किये थे। अमर सिंह जी को जब मैंने फोन किया तब तक वह मेरी कुंडली खँगाल चुके थे। दूसरी बार फोन में अमर सिंह जी ने भोजपुरी में बात की। मैं कुशीनगर यानी भोजपुरी इलाक़े से आता हूँ। इसलिए उनके संदेश समझने में हमें पल भर नहीं लगा। इससे पहले मैं मुलायम सिंह जी से अमर सिंह जी की शिकायत कर चुका था। मुलायम सिंह जी ने कहा कि मैं एयरपोर्ट के प्राइवेट हैंगर की तरफ़ पहुंचूं। वह अमर सिंह जी को वहां पहुंचने को कह रहे हैं। मुलायम सिंह जी उत्तर प्रदेश में कहीं यात्रा पर थे। वह भी पहुँचे। वहां उन्होंने अमर सिंह जी को मेरे बारे में बताया। हम दोनों का हाथ मिलवाया। यह मेरी अमर सिंह जी से वन टू वन पहली व अंतिम मुलाक़ात थी।

हमने मुलायम सिंह जी की सरकार के खिलाफ खबर लिखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वे विरोध की ख़बरों पर बुलाकर बात करते थे। पुलिस व एफआईआर की ओर नहीं जाते थे। उनकी मीडिया की दृष्टि को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने हिंदी व अंग्रेज़ी ‘आउटलुक’ को बिना मांगे अड़तालीस लाख का विज्ञापन एक बार में दिया था।

‘नई दुनिया’ के जागरण समूह का हो जाने के बाद आलोक जी ने ‘नेशनल दुनिया’ अख़बार दिल्ली से निकाल दिया। शायद यह देश का पहला अख़बार रहा होगा जिसकी कोई डमी नहीं निकली, बस सीधे फ़ाइनल अख़बार बाज़ार में आ गया। आलोक जी की पूरी टीम इस अख़बार में रातों रात काम करने लगी। इस अख़बार में मैंने एक बार एक ख़बर लिखी कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। हमें संघ व भाजपा सूत्रों तथा गुजरात के एक साथी आशुतोष पटेल से भी यह पता चला था कि भाजपा का दिल्ली में ताजपोशी के लिए क्या प्लान है। बात सितंबर 2012 की थी। हमने यह खबर लिखी –“राष्ट्रीय फलक पर मोदी को बैठाने की तैयारी।“ इसमें हमने मोदी जी के पहले प्रचार प्रमुख फिर प्रधानमंत्री बनने की रिपोर्ट दी थी। इसमें यह भी था कि मोदी के हटने पर आनंदी बेन पटेल गुजरात की मुख्यमंत्री होंगी। 2012 में आलोक जी क्या, किसी के लिए भी यह यकीन करने वाली खबर नहीं थी। पर मैं इस खबर को छापने की ज़िद पर था। आलोक जी ने मेरी ज़िद मान ली। इस खबर को 29.11.2012 को अख़बार के पहले पेज पर प्रकाशित किया। इसने मुझे एक बार फिर सुर्ख़ियाँ दीं। अख़बार भी लंबे समय तक सुर्खियों में रहा। आलोक जी के नाते हमें वॉयस ऑफ अमेरिका व डॉयचे वेले (Deutsche Welle / DW) में भी काम करने का अवसर मिला।


आलोक जी के साथ मेरी पारी तब खत्म हुई जब ‘नेशनल दुनिया’ बंद हो गया। फिर मैं ‘न्यूज़ एक्सप्रेस’ चैनल में आ गया। पर अपने पत्रकारिता जीवन की सबसे लंबी पारी अलोक जी के साथ खेलने के कारण केवल उनसे ही नही, उनके पूरे परिवार व रिश्तेदारों से रिश्ते हो गये थे। उनके साथ कभी संपादक व रिपोर्टर के बीच की खाई का ख़्याल ही नहीं आया। उनके साथ मेरी पारी इतनी आकर्षक रही कि मैंने पूरे उत्तर प्रदेश के तक़रीबन हर ब्लाक तक कम से कम से कम दो बार की यात्रा पूरी की। लोग मुझे ‘आउटलुक वाले योगेश मिश्र’ के रुप में जानने लगे। आज भी उत्तर प्रदेश के तमाम लोगों व जगहों में मेरी यह पहचान है।

‘न्यूज़ एक्सप्रेस’ भी लंबा नहीं चल सका। लिहाजा हमने अपना आन लाइन मीडिया ‘Newstrack. Com’ के नाम से शुरू किया। इसके ‘अबाउट अस’ में हमने प्रेरणा पुरुष के नाम में आलोक मेहता जी, अच्युतानंद मिश्र जी व के. विक्रम राव जी का नाम रखा था। पोर्टल ठीक चल निकला। एक दौर में तो हम लोग एक महीने में नौ करोड़ पेज व्यू तक गये। अब तक 32 करोड़ लोग सर्च करके ‘Newstrack.com’ देख चुके हैं। वैसे तो पूरे दस सालों में ‘Newstrack.com’ देखने वालों की कुल संख्या 154 करोड़ बैठती है।

एक बार हमारे किसी साथी के हाथ भाजपा के एक सांसद की डिग्री से जुड़ी खबर लग गई। उन्होंने सांसद जी से उनका पक्ष जानने के लिए मेल कर दिया। वह सांसद जी मेरे भी निकट सहयोगी हैं। मैं उन्हें पसंद भी करता हूँ। पर इस खबर के बारे में उन्होंने मुझे फोन करने की जगह राजेश्वर सिंह को फोन किया। राजेश्वर सिंह से मेरे छोटे-बड़े भाई के रिश्ते तब से हैं,जब से वह उत्तर प्रदेश पुलिस में थे। उनके फोन के बाद हमने अपने साथी से खबर के बारे में पूछा। यहीं से खबर की बात आई गई हो गयी। पर सांसद जी को शायद राजेश्वर सिंह जी पर यकीन नहीं हुआ होगा। तभी उन्होंने आलोक जी को अप्रोच किया। आलोक जी ने हमें फोन किया। पर खबर के बारे में बात करने की जगह यह कहने लगे कि आप ने अपने पोर्टल ‘Newstrack.com’ पर मेरा नाम लिख कर हमें बदनाम कर रहे हैं। इसके बाद खबर का जिक्र किया। आलोक जी की यह बात हमें बहुत अखरी। हमने भी कुछ तल्ख़ बातचीत की। ग़ुस्से में मैं क्या कह व सुन रहा था हमें याद नहीं। पर एक बात याद है कि मैंने कहा कि – सर, ‘ईमानदारी व सच्चाई की परीक्षा में किसी से पीछे नहीं रहूँगा।‘ उसी दिन हमने पोर्टल से तीनों लोगों का नाम हटा दिया। सोचा कि यह यात्रा अपने कुछ साथियों के साथ जारी रखूँगा। हमने आलोक जी से संबंध विच्छेद कर लिया। घर आकर हमने पूरी बात बताई। पर यह बात मेरे घर वालों को पसंद नहीं आई। मेरी पत्नी आलोक जी के ससुराल व साढ़ू के परिवार से संबंध चलाती रहीं। हमें भी पछतावा होता रहा।

जुलाई महीने में अचानक आलोक जी का फोन आया। उनके फोन ने उस दिन को मेरे लिए यादगार बना दिया। आलोक जी ने कहा, आपका ग़ुस्सा शांत हो गया होगा। मैं क्षमायाचना मुद्रा में ही रहा। उन्होंने कहा कि ‘मैं आपको इसलिए फोन कर रहा हूँ कि मेरे ऊपर आपके लखनऊ के साथी एक किताब संपादित कर रहे हैं। मैंने बहुत सोचा कि मेरे खिलाफ कौन लिख सकता है। तो हमें आप की याद आई। आप उस किताब के लिए मेरी जो कमियाँ हैं, उस को समेटते हुए लिख दें।‘ मैंने कहा, ‘सर आप में बहुत अच्छाइयाँ भी हैं।‘

मैंने अपने व आलोक जी की यात्रा के कुछ ही पड़ावों का जिक्र किया है। मेरे पत्रकारिता जीवन में सबसे लंबी यात्रा आलोक जी के ही साथ रही। इसलिए तमाम पल छूट जा रहे हैं, उन पलों व अहसासों को फिर कभी शब्द मिलेंगे।

प्रशांत दी ने हमें अवसर दिया। आलोक जी ने ब्रांड बनाया। बन पाया या नहीं इसका मूल्यांकन मुझे पढ़ने वाले सुधि पाठक ही समय समय पर करते होंगे।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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