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लोकतंत्र का नया संकट : आँखों देखा भी सच नहीं
AI and Democracy : AI Deepfake के दौर में वीडियो और आवाज पर भरोसा करना कितना सुरक्षित है? जानिए चुनाव, फेक न्यूज, सोशल मीडिया और लोकतंत्र के सामने बढ़ते नए संकट की पूरी कहानी।
AI Deepfake (Image Credit-Social Media)
Artificial Intelligence|AI and Democracy: लोकतंत्र की बुनियाद केवल वोट नहीं है। उसकी असली बुनियाद सच है। मतदाता जिसे सच मानता है, उसी के आधार पर अपनी राय बनाता है और फिर वोट देता है। लेकिन कल्पना कीजिए कि चुनाव से दो दिन पहले किसी बड़े नेता का वीडियो सामने आए। वह ऐसी बात कहता दिखाई दे, जिससे पूरा देश उबल पड़े। उसकी आवाज उसी की हो। चेहरा उसी का हो। होंठ शब्दों के साथ ठीक उसी तरह हिल रहे हों। पीछे वही मंच हो और सामने वही माइक। लाखों लोग वीडियो देख लें। कुछ घंटों में वह करोड़ों मोबाइल फोन तक पहुँच जाए। अगले दिन पता चले कि नेता ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं था। वीडियो एआई से बनाया गया था। तब सवाल केवल फर्जी वीडियो का नहीं रह जाता। सवाल यह हो जाता है कि लोकतंत्र में मतदाता आखिर किसे सच माने?
हम उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं, जिसमें पुरानी कहावत ‘आँखों देखी पर विश्वास करो’अपना अर्थ खो रही है। अब आँखों देखा और कानों सुना भी झूठ हो सकता है। लोकतंत्र ने अफवाहों का सामना पहले भी किया है। झूठे प्रचार का भी किया है। लेकिन अब उसके सामने ऐसा झूठ खड़ा है, जिसके पास सच का चेहरा और सच की आवाज दोनों हैं।
इस खतरे की एक ताजा झलक पाकिस्तान से आई है। वहां रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। वीडियो में वह भारत और पाकिस्तान की प्रगति की तुलना करते दिखाई दिए। कथित तौर पर पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति पर गंभीर सवाल भी उठा रहे थे। वीडियो इतना विश्वसनीय लगा कि भारतीय मीडिया के कुछ हिस्सों ने भी उसे वास्तविक बयान मानकर खबर चला दी। लेकिन पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने 24 अगस्त को स्पष्ट किया कि ख्वाजा आसिफ ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था। मंत्रालय के अनुसार वीडियो की आवाज कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाई गई थी।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि मामला पाकिस्तान का है। महत्वपूर्ण इसलिए है कि जिस सामग्री को प्रशिक्षित पत्रकार भी पहली नजर में वास्तविक मान सकते हैं, सामान्य नागरिक उससे कैसे बचेगा? अब झूठ को सच जैसा दिखाने के लिए महंगे स्टूडियो, कलाकार और बड़ी तकनीकी टीम की जरूरत नहीं है। किसी व्यक्ति की पर्याप्त तस्वीरें और आवाज के नमूने उपलब्ध हों तो उसके चेहरे और आवाज की नकल पहले की तुलना में बहुत आसान हो चुकी है। राजनीति के लिए इसका अर्थ भयावह है। किसी नेता से वह बात कहलवाई जा सकती है, जो उसने कभी कही ही नहीं। किसी प्रत्याशी का काल्पनिक निजी वीडियो बनाया जा सकता है। किसी समुदाय के खिलाफ फर्जी बयान चलाया जा सकता है। सेना, चुनाव आयोग या सरकार के नाम से झूठा संदेश प्रसारित किया जा सकता है। और यह सब उस समय किया जा सकता है जब सच के पास झूठ का पीछा करने के लिए पर्याप्त समय ही न हो।
फर्जी खबर और डीपफेक में यही सबसे बड़ा अंतर है। पुरानी फर्जी खबर पाठक से विश्वास मांगती थी। डीपफेक उसे प्रमाण दिखाता है। पहले कोई कहता था कि अमुक नेता ने ऐसा कहा है। आप पूछ सकते थे - कहां कहा? प्रमाण क्या है? अब आपके सामने उसी नेता का बोलता हुआ वीडियो रख दिया जाएगा। मनुष्य का मस्तिष्क दृश्य और आवाज को प्रमाण मानने का अभ्यस्त है। इसीलिए डीपफेक केवल सूचना की समस्या नहीं है। यह मनुष्य की सहज विश्वास-प्रणाली पर हमला है। खतरा और बड़ा तब होता है, जब राजनीति पहले से ध्रुवीकृत हो। हम प्रायः उस सूचना को जल्दी स्वीकार करते हैं, जो हमारी पहले से बनी धारणा की पुष्टि करती है। यदि किसी मतदाता को किसी नेता से पहले ही घृणा है और उसी नेता का आपत्तिजनक फर्जी वीडियो उसके मोबाइल पर आता है, तो वह उसकी सत्यता जांचने से पहले उसे आगे भेज सकता है। कुछ ही घंटों में झूठ हजारों समूहों और लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। बाद में खंडन आएगा। तथ्य-जांच होगी। वीडियो हटेगा। लेकिन तब तक वह अपना राजनीतिक काम कर चुका होगा। चुनाव में मतदान के ठीक पहले फैलाई गई ऐसी सामग्री विशेष रूप से खतरनाक हो सकती है। मतदान समाप्त होने के बाद किया गया खंडन लोकतंत्र को उसका खोया हुआ वोट वापस नहीं दिला सकता।
भारत इस खतरे से अनजान नहीं है। निर्वाचन आयोग ने मई 2024 में राजनीतिक दलों को सोशल मीडिया के जिम्मेदार इस्तेमाल का निर्देश देते हुए डीपफेक और भ्रामक सामग्री के प्रसार से बचने को कहा था। ऐसी सामग्री संज्ञान में आने पर तीन घंटे के भीतर हटाने का निर्देश भी दिया गया। जनवरी 2025 में आयोग ने एक कदम आगे बढ़कर चुनाव प्रचार में इस्तेमाल होने वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित या महत्वपूर्ण रूप से बदली गई सामग्री को स्पष्ट रूप से चिह्नित करने की सलाह दी। अप्रैल 2026 में आयोग ने फिर कहा कि कृत्रिम रूप से निर्मित या बदली गई प्रचार सामग्री पर ‘AI-Generated’, ‘Digitally Enhanced’ या ‘Synthetic Content’ जैसा स्पष्ट संकेत होना चाहिए। केंद्र सरकार भी समस्या की गंभीरता स्वीकार करती है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने पिछले महीने बताया कि डीपफेक पहचान से जुड़ी 13 जिम्मेदार कृत्रिम बुद्धिमत्ता परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है और मौजूदा कानूनों के तहत पहचान की चोरी, प्रतिरूपण तथा गोपनीयता उल्लंघन जैसे मामलों से निपटने के प्रावधान मौजूद हैं। ये कदम जरूरी हैं। लेकिन तकनीक की रफ्तार कानून और नियमन से कहीं तेज है। चुनावी राजनीति में तीन घंटे भी बहुत लंबा समय है। तीन घंटे में एक उत्तेजक वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। असली चुनौती इसलिए केवल फर्जी सामग्री हटाना नहीं, उसे निर्णायक नुकसान करने से पहले पहचानना है।
इसके साथ एक दूसरी और शायद अधिक गंभीर समस्या पैदा हो रही है। इसे सरल भाषा में ‘सच पर भी अविश्वास’ कहा जा सकता है। जब समाज यह जान जाएगा कि कोई भी वीडियो नकली बनाया जा सकता है, तब असली वीडियो में पकड़ा गया व्यक्ति भी कह सकता है कि यह डीपफेक है। यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता झूठ को सच बनाने के साथ सच को झूठ बताने का हथियार भी दे रही है। कल तक वीडियो किसी घटना का प्रमाण था। आने वाले समय में वीडियो स्वयं विवाद का विषय होगा। किसी नेता का वास्तविक आपत्तिजनक बयान सामने आए और वह कह दे कि आवाज मेरी नहीं है। किसी भ्रष्टाचार का वास्तविक दृश्य आए और संबंधित व्यक्ति उसे कृत्रिम घोषित कर दे। सामान्य नागरिक किसकी बात मानेगा? यही वह बिंदु है जहां संकट किसी तकनीक से निकलकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुँच जाता है। अदालत, मीडिया, पुलिस, निर्वाचन आयोग और स्वतंत्र तथ्य-जांच संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हुआ तो हर व्यक्ति अपना अलग सच चुनने लगेगा। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। लेकिन लोकतंत्र तभी चलता है जब मतभेद रखने वाले लोग कम से कम तथ्यों की एक साझा जमीन स्वीकार करें। यदि तथ्य ही पक्षों में बंट गए, तो बहस विचारों की नहीं, काल्पनिक वास्तविकताओं की होगी।
समस्या का तीसरा पहलू सोशल मीडिया की संरचना है। वहां सत्य और असत्य की प्रतियोगिता बराबरी की नहीं है। सनसनी शांत तथ्य से तेज दौड़ती है। क्रोध सावधानी से अधिक साझा किया जाता है। भय विवेक से जल्दी फैलता है। राजनीतिक प्रचार इसे अच्छी तरह समझता है। भारत जैसे विशाल देश में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं। करोड़ों लोग संदेश-समूहों और छोटे वीडियो के माध्यम से राजनीतिक सामग्री प्राप्त करते हैं। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ही झूठ को हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, भोजपुरी या किसी स्थानीय बोली में अलग-अलग रूप देकर कुछ मिनटों में फैला सकती है। एक राष्ट्रीय स्तर का झूठ स्थानीय चेहरे और स्थानीय भाषा पहन सकता है। इसलिए अगली पीढ़ी का दुष्प्रचार पहले से अधिक विकेंद्रीकृत, व्यक्तिगत और लक्ष्य-आधारित होगा। चुनाव आयोग की निगरानी बड़े दलों और सार्वजनिक खातों तक पहुँच सकती है। लेकिन बंद संदेश-समूहों, छोटे खातों और हजारों स्थानीय नेटवर्कों में फैलती सामग्री को रोकना कहीं कठिन होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोकतंत्र की शत्रु है। यही तकनीक डीपफेक पहचान सकती है। चुनावी सूचनाओं का अनुवाद कर सकती है। मतदाता को उसके क्षेत्र और उम्मीदवारों के बारे में जानकारी दे सकती है। प्रशासन को गलत सूचनाओं की पहचान में सहायता कर सकती है। दिव्यांग मतदाताओं के लिए सूचना अधिक सुलभ बना सकती है। प्रश्न तकनीक का नहीं, उसके उपयोग और जवाबदेही का है। हर नई तकनीक ने लोकतंत्र को अवसर और खतरा दोनों दिए हैं। छापाखाने ने ज्ञान फैलाया तो दुष्प्रचार भी। रेडियो ने जनता को जोड़ा तो तानाशाहों ने उसे प्रचार का हथियार बनाया। टेलीविजन ने राजनीति को घर तक पहुँचाया तो छवि को विचार से अधिक महत्वपूर्ण भी बनाया। सोशल मीडिया ने प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति दी तो अफवाह को भी अभूतपूर्व गति दी। अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने एक और सीमा तोड़ दी है। उसने मनुष्य को केवल सूचना बनाने की नहीं, कृत्रिम वास्तविकता बनाने की शक्ति दे दी है।
इसलिए समाधान केवल नया कानून बना देने से नहीं निकलेगा। राजनीतिक दलों को कृत्रिम सामग्री की स्पष्ट घोषणा के लिए बाध्य करना होगा। तकनीकी मंचों को संदिग्ध सामग्री की पहचान और स्रोत बताने की अधिक मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी। चुनाव के संवेदनशील समय में शिकायत और जांच की गति घंटों से घटाकर यथासंभव मिनटों तक लानी होगी। मीडिया संस्थानों को वायरल वीडियो को खबर बनाने से पहले डिजिटल सत्यापन की स्थायी व्यवस्था बनानी होगी। राजनीतिक दलों के लिए भी एक साझा आचार-संहिता जरूरी है। क्योंकि डीपफेक का हथियार आज विरोधी के खिलाफ आकर्षक लग सकता है। लेकिन कल वही हथियार आपके खिलाफ होगा। सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की भी होगी। हमें डिजिटल साक्षरता की नई परिभाषा बनानी पड़ेगी। अब पढ़ना-लिखना जानना पर्याप्त नहीं है। यह जानना भी जरूरी होगा कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाली हर चीज सच नहीं होती। किसी उत्तेजक वीडियो को देखकर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसका स्रोत देखना, विश्वसनीय समाचार माध्यमों से पुष्टि करना और संदेह होने पर उसे आगे न भेजना लोकतांत्रिक नागरिकता का नया संस्कार बनाना होगा।
लोकतंत्र के सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि मशीन झूठ बोलने लगी है। मनुष्य हजारों वर्षों से झूठ बोलता आया है। असली खतरा यह है कि मशीन ने झूठ को प्रमाण का चेहरा दे दिया है। आने वाले चुनावों में लड़ाई केवल भाजपा और कांग्रेस, सत्ता और विपक्ष या एक विचारधारा और दूसरी विचारधारा के बीच नहीं होगी। एक अदृश्य लड़ाई सच और उसके कृत्रिम प्रतिरूप के बीच भी चलेगी। लोकतंत्र में मतदाता सर्वोच्च है। लेकिन उसकी सर्वोच्चता तभी अर्थपूर्ण है, जब उसका निर्णय वास्तविक सूचनाओं पर आधारित हो। जिस दिन नागरिक यह तय नहीं कर पाएगा कि उसने जो देखा और सुना वह वास्तव में हुआ भी था या नहीं, उस दिन मतदान तो होगा, परिणाम भी आएंगे, सरकारें भी बनेंगी, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगेगी। बीसवीं सदी ने हमें सिखाया था कि हर सुनी हुई बात पर विश्वास मत करो। इक्कीसवीं सदी अब उससे कहीं कठिन पाठ पढ़ा रही है कि हर देखी हुई बात पर भी विश्वास मत करो।
(लेखक पत्रकार हैं)


