Allahabad University: जहाँ चाय की दुकानों पर चलता है देश का सबसे बड़ा अनौपचारिक विश्वविद्यालय

Allahabad University Students Life: इलाहाबाद की ‘बकैती’, प्रतियोगी छात्रों की दुनिया, चाय की दुकानों की बहस और शहर की अनोखी संस्कृति पर आधारित एक व्यंग्यात्मक और जीवंत लेख।

Yogesh Mishra
Published on: 28 May 2026 6:24 PM IST
Allahabad University: जहाँ चाय की दुकानों पर चलता है देश का सबसे बड़ा अनौपचारिक विश्वविद्यालय
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Allahabad University UPSC Students Life: प्रयागराज में दो चीजें शायद कभी खत्म नहीं होतीं। पहली— प्रतियोगी छात्र। दूसरी— ‘बकैती’। यह वह शहर है जहाँ गंगा का जलस्तर घट-बढ़ सकता है। लेकिन चाय की दुकानों पर बहने वाली ज्ञान, बहस और विश्लेषण की धारा कभी नहीं रुकती। यूनिवर्सिटी रोड पर निकल जाइए। हर तीसरा लड़का ऐसे चलता दिखाई देगा जैसे अभी-अभी ‘संघ लोक सेवा आयोग’ (UPSC) का साक्षात्कार देकर कैबिनेट सचिव बनने की औपचारिकता पूरी करके लौट रहा हो। पीठ पर बैग, हाथ में ‘इंडियन पॉलिटी’ (Indian Polity) की किताब, आँखों में अधूरी नींद और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास कि मानो देश की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था उसी के भरोसे चल रही हो। लेकिन वही युवक कमरे पर बनियान में लेटा मिलेगा। ऊपर पंखा चर्र-चर्र कर रहा होगा। टेबल पर आधा खाया समोसा रखा होगा और दीवार पर मोटे अक्षरों में लिखा मिलेगा— ‘ड्रीम बिग’ (Dream Big)।

प्रतियोगी तैयारी से ज्यादा गंभीर होती है उसकी चर्चा


हमारे एक मित्र पिछले पाँच वर्षों से ‘सीरियस प्रिपरेशन’ कर रहे हैं। उनकी गंभीरता का आलम यह है कि किताब खोलते ही उन्हें नींद आने लगती है। लेकिन जैसे ही यूनिवर्सिटी रोड की चाय की दुकान पर बैठते हैं, ऐसा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं कि लगता है ‘संघ लोक सेवा आयोग’ के लोग भी प्रश्नपत्र इन्हीं से पूछकर बनाते होंगे।

एक दिन बड़े दुखी स्वर में बोले,

“देखो भइया, इस देश में टैलेंट की कोई कदर नाहीं है।”

हमने पूछा,

“भैया, पिछले प्रारंभिक परीक्षा में कितना आया था?”

बोले,

“बस एक नंबर से मुख्य परीक्षा छूट गया।”

अब प्रयागराज में ‘बस एक नंबर’ का अर्थ समझना जरूरी है। यहाँ आदमी रेलवे स्टेशन से फाफामऊ तक पहुँच जाए तो भी यही कहेगा— ‘बस थोड़ा आगे आ गए।’

चाय की दुकानें: इलाहाबाद की असली संसद


प्रयागराज की चाय की दुकानें केवल दुकानें नहीं हैं। वे शहर की अनौपचारिक संसद हैं। यूनिवर्सिटी रोड की किसी दुकान पर चार ‘बकैत’ बैठ जाएँ तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति से लेकर स्थानीय निकाय चुनाव तक का ऐसा विश्लेषण होगा कि संयुक्त राष्ट्र भी शर्मिंदा हो जाए।

एक बोला,

“गुरु, अमेरिका का पतन तय है।”

दूसरा तुरंत सहमत हुआ,

“हम तो पहले से कह रहे हैं।”

तीसरा सिगरेट सुलगाते हुए बोला,

“असल खेल चीन समझ रहा है।”

और चौथा, जो अब तक उधार की चाय पी रहा था, धीरे से दुकानदार से बोला,

“पप्पू, एक बिस्कुट अउर देना… खाते में लिख लो।”

प्रयागराज का आत्मविश्वास अलग स्तर का होता है


इस शहर में आदमी की सबसे मजबूत चीज उसका आत्मविश्वास होता है। जेब में पैंतीस रुपये होंगे। लेकिन बात ऐसे करेगा जैसे ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (RBI) का गवर्नर उसी से आर्थिक नीति पर सलाह लेता हो।

हमारे मोहल्ले के तिवारी चाचा हर बातचीत में एक वाक्य जरूर कहते हैं—

“जब हम यूनिवर्सिटी में थे न…”

अब उनका यूनिवर्सिटी जीवन इतना लंबा रहा कि लोगों को संदेह होने लगा कि वे डिग्री कर रहे थे या मुगल साम्राज्य चला रहे थे।

एक दिन किसी लड़के ने उनसे पूछ लिया,

“चाचा, पढ़ाई कैसी करनी चाहिए?”

बस फिर क्या था। तिवारी चाचा ने 1974 से कथा शुरू कर दी। ‘जेपी आंदोलन’, छात्र राजनीति, कॉफी हाउस, प्रेम पत्र, लाठीचार्ज— सबका ऐसा वर्णन कि लगता था कोई वृत्तचित्र चल रहा हो। बीच-बीच में ऐसे रुकते जैसे इतिहास चैनल पर विज्ञापन आ गया हो।

आधे घंटे बाद लड़का बेचारा बोला,

“चाचा, ठीक है… लेकिन ‘रीज़निंग’ (Reasoning) कैसे पढ़ें?”

तिवारी चाचा गंभीर होकर बोले,

“मैथ्स बाद में… पहले वैचारिक स्पष्टता जरूरी है।”

प्रयागराज की बकैती शहर छोड़ने पर भी नहीं जाती


प्रयागराज का आदमी कहीं भी चला जाए, उसकी ‘बकैती’ उसके साथ जाती है।

दिल्ली में मिलेगा तो कहेगा,

“दिल्ली ठीक है, लेकिन बात प्रयागराज जैसी कहाँ…”

मुंबई में मिलेगा तो बोलेगा,

“यहाँ पैसा है गुरु, शांति नाहीं है।”

और गाँव लौटकर ऐसे व्यवहार करेगा जैसे विदेश यात्रा करके आया हो—

“हम शहर देखकर आ रहे हैं।”

यहाँ प्रेम भी आधा दर्शन, आधा संकोच होता है

प्रयागराज का प्रेम भी बड़ा दिलचस्प होता है। लड़का छह महीने तक कोचिंग के बाहर लड़की को देखकर वापस लौट आएगा।

दोस्त पूछेंगे,

“बात किए?”

वह धीरे से बोलेगा,

“अभी सही टाइम नै न आवा बे…”

फिर वही युवक रात में ‘फेसबुक’ (Facebook) पर लिखेगा—

“कुछ प्रेम अधूरे ही अच्छे लगते हैं…”

और नीचे उसका दोस्त टिप्पणी करेगा—

“पहले बात तो कर ले बे।”

रिक्शेवाले भी यहाँ दार्शनिक होते हैं


प्रयागराज में रिक्शेवाले तक जीवन दर्शन सुनाते मिल जाते हैं।

एक बार हम रिक्शे पर बैठे तो चालक बोला,

“बाबू, जिंदगी में आदमी को शांत रहना चाहिए…”

हम उसके विचारों से प्रभावित ही हुए थे कि तभी सामने से एक ‘ई-रिक्शा’ (E-rickshaw) ने कट मार दिया। रिक्शेवाला तुरंत चिल्लाया—

“अबे मरबे का बे! पूरा खानदान लेकर निकल पड़े हो का?”

बकैती: प्रयागराज की सांस्कृतिक पहचान

प्रयागराज की ‘बकैती’ में एक अद्भुत लोकतंत्र दिखाई देता है। यहाँ प्रोफेसर, छात्र, रिक्शेवाला, पानवाला— सभी बराबरी से ज्ञान देते हैं। कोई किसी से कम नहीं समझता।

और सबसे मजेदार बात यह है कि प्रयागराज का आदमी अपनी ‘बकैती’ पर शर्मिंदा नहीं होता। उसे इस पर गर्व होता है।

क्योंकि इस शहर में ‘बकैती’ केवल समय बिताने का माध्यम नहीं है।

यहाँ यह एक सांस्कृतिक परंपरा है।

एक जीवन शैली है।

एक सामाजिक पहचान है।

(साभार— इलाहाबाद/प्रयागराज की छात्र संस्कृति और लोक व्यवहार पर आधारित जनस्मृतियाँ एवं सामाजिक व्यंग्य शैली)

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