पंडित विद्यानिवास मिश्र और बशीर बद्र: अपनी ही रचनाओं को पाठ्यक्रम में पढ़ कर प्राप्त किए डिग्री

Bashir Badr And Vidyanivas Mishra: अकादमिक जगत के दो अनोखे सितारे पंडित विद्यानिवास मिश्र और बशीर बद्र, जिन्होंने अपनी ही रचनाओं को पाठ्यक्रम में पढ़कर डिग्रियां हासिल कीं।

Acharya Mahamandaleshwar Sanjay Tiwari
Published on: 30 May 2026 3:52 PM IST
Pandit Vidyaniwas Mishra and Bashir Badr
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पंडित विद्यानिवास मिश्र और बशीर बद्र: अपनी ही रचनाओं को पाठ्यक्रम में पढ़ कर प्राप्त किए डिग्री (Photo- Social Media)

Bashir Badr And Vidyanivas Mishra: अकादमिक विश्व में ऐसे केवल दो नाम हैं। विश्व के साहित्य के इतिहास में ऐसा अन्यत्र कोई उदाहरण नहीं। एक हैं पंडित विद्यानिवास मिश्र। जब उच्च शिक्षा में पहुंचे तो उनकी खुद की रचना चितवन की छाँव उन्हें अपने ही पाठ्यक्रम में पढ़नी पड़ी। दूसरे हैं डॉ बशीर बद्र। बद्र साहब जब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ने पहुंचे तो उस समय तक उनकी गजलें वहां के पाठ्यक्रम में आ चुकी थीं। विचित्र स्थिति तो तब हुई जब बशीर बद्र से उनके ही एक शेर की उन्हीं की व्याख्या से परीक्षक असंतुष्ट हो गए। यह सच में रचना की वह ऊर्जा और शक्ति होती है जब रचना की यात्रा समाज से होकर पाठ्यक्रम तक पहुंचती है और पीढिय़ों को उससे अगली यात्रा के लिए पथ मिलता है।

विश्व के साहित्यिक इतिहास में ऐसे उदाहरण कहीं नहीं हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि इन दोनों सृजनकारों के बहुत निकट रह कर इनसे बहुत कुछ सीखा है। पंडित जी और डॉ बशीर बद्र के कई लंबे साक्षात्कार भी लिये हैं। बशीर बद्र साहब के साथ दर्जन भर से ज्यादा मंचों पर काव्यपाठ भी किया है। तीन बड़े कविसम्मेलन और मुशायरों का संचालन कर बशीर बद्र जी को पढ़वाया भी है। यह अलग बात है कि पत्रकारीय जीवन ने मुझे काव्य मंचों पर ज्यादा दिन रहने नहीं दिया।

इन दोनों रचनाकारों से गहरे सान्निध्य में बहुत सी बातें सीखने को मिलीं। पंडित जी और बशीर बद्र , दोनों को ही रचना से जुड़ने का आधार एक ही कृति बनी। ऐसा उनके साक्षात्कारों से पता चला। बशीर बद्र ने कई बार यह चर्चा की थी। उनकी माता जी अवध क्षेत्र की थीं। कविकुल शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी के मानस की अधिकांश चौपाइयाँ, दोहे, सोरठे उन्हें कंठस्थ थे। बद्र साहब का बचपन उन्हीं को सुनते आगे बढ़ा था, ऐसा वह बताते थे। स्वाभाविक है कि बशीर बद्र पर गोस्वामी जी का असर बहुत था। इसीलिए वह जन कवि के रूप में शायरी कर रहे थे जिसमे केंद्र हमेशा मनुष्य और मनुष्यता बने रहे। लोक समाहित रहा। पंडित विद्यानिवास मिश्र के साथ भी लोक और लोक जीवन सदैव जीवित रहा। मुझे गर्व है कि मुझे इन दोनों महाविभूतियों को ठीक से समझ कर जीने का अवसर मिला।

यह संयोग भी कहा जा सकता है। ठीक बकरीद यानि ईदुल अजहा के दिन डॉ बशीर बद्र चले गए। उनके निधन की सूचना से साइबर आकाश भर गया। सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि की बाढ़ आ गई। यह संख्या करोड़ो में थी किंतु उनके जनाजे अर्थात अंतिम यात्रा केवल 20 लोग शामिल हुए। ऐसा क्यों हुआ, यह गंभीर प्रश्न है। क्या भारत का मुसलमान उन्हें शायर नहीं मानता था ? क्या उनकी नज़र में शायर वह इमरान प्रतापगढ़ी ही हैं जो कुख्यात अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी को अपना आदर्श मान कर कसीदे पढ़ते हैं? या केवल वह मुन्नवर राणा साहब, जो हिंदुओं पर छींटाकशी कर के मुशायरों में वाहवाही लूटते रहे। या वह राहत इंदौरी, जो कहते रहे कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है? यहां कोई नाम लिखने का मन नहीं था किंतु प्रसंग आ गया। इस्लामी अकादमिक दुनिया को इसका मूल्यांकन करना चाहिए।

बशीर बद्र आम जनता के शायर हैं। वह कभी नहीं मरने वाले रचनाकार है जो ग़ालिब के बाद अदब की दुनिया के अमर कृतिकारों में शुमार हो गए। भारत में दो ही रचनाकार ऐसे हुए हैं जिनके शेर हमेशा संदर्भ बन कर हाजिर किए जाते हैं। हर महफ़िल में, हर सम्मेलन में, संसद में,भाषण में, तक़रीर में, जुलूस में और बात को पुष्ट करने के लिए बोले जाते हैं, एक हैं दुष्यंत कुमार और दूसरे हैं बशीर बद्र।

कौन कहता है कि आकाश

में सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत

से उछालो यारों ।।

यह हर क्रांति पथ के यात्री, इंकलाबी की पसंदीदा नज़्म है।

डॉ बशीर बद्र को लोग बार बार याद करते है ऐसे:

उजाले अपनी यादों के

हमारे साथ रहने दो

ना जाने किस गली में

ज़िंदगी में शाम हो जाए।।

कोई हाथ भी ना मिलाएगा

जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिजाज का शहर है

जरा फासले से मिला करो।।

शब्द शिल्प के इस अद्भुत हस्ताक्षर को अंतिम प्रणाम करने से पहले उर्दू अदब से एक विनती है, अपनी दुनिया को परखिए। डॉ वसीम बरेलवी अभी हमारे बीच हैं।

डॉ बशीर बद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

ॐ शांति।।

ये लेखक के निजी विचार है।

Shashi kant gautam

Shashi kant gautam

Publisher Mail ID - skgautam1208@gmail.com

Experienced Hindi Journalist with 6 Years of Experience

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