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Best Book for Father: पिता! रक्त-संबंध से आगे आत्मा का संवाद
Best Book for Father: पिता, पुत्र और भारतीय परिवार, एक पुस्तक जो दिल और विचार दोनों को छूती है...
Famous Hindi Book Pita Review Yogesh Mishra
Best Book for Father: समकालीन हिंदी कविता में पिता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किंतु अधिकांश रचनाएँ स्मृति, श्रद्धांजलि या भावुक संस्मरण के दायरे में सीमित रह जाती हैं। अंशुमान द्विवेदी की काव्यकृति ‘पिता’ इस परंपरा से अलग खड़ी दिखाई देती है। यह पुस्तक पिता की प्रशस्ति नहीं। बल्कि पिता और पुत्र के बीच चलने वाला एक गहरा, आत्मिक और सांस्कृतिक संवाद है। यहाँ पिता कोई जैविक पात्र नहीं। बल्कि एक ऐसी जीवित चेतना है जो पुत्र के व्यक्तित्व, आत्मविश्वास, नैतिकता, संस्कार और अस्तित्व के भीतर निरंतर प्रवाहित रहती है।
पुस्तक की आरंभिक कविताएँ ही इसकी वैचारिक दिशा स्पष्ट कर देती हैं। कवि लिखते हैं—
“मेरा अस्तित्व माँ के शरीर से है / तो तुम्हारी आत्मा से।”
यह पंक्ति पूरी पुस्तक का केंद्रीय सूत्र है। कवि माँ को जीवन का जैविक आधार मानते हैं, जबकि पिता को आत्मिक विस्तार। इस प्रकार पिता केवल रिश्ते का नहीं। अस्तित्व के निर्माण का काव्य है।
अंशुमान द्विवेदी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने पिता को पारंपरिक अधिकारवादी या अनुशासनप्रिय छवि तक सीमित नहीं रखा। उनके यहाँ पिता दुलार हैं। झिड़की हैं। आत्मविश्वास हैं। सुरक्षा हैं। अपराधबोध हैं।चिंता हैं और सबसे बढ़कर संवाद हैं। कवि की दृष्टि में पिता वह व्यक्ति नहीं जिसने जन्म दिया। बल्कि वह है जिसने ‘पितापन निभाया’। यह भेद अत्यंत महत्वपूर्ण है और पूरी पुस्तक को विशिष्ट बनाता है।
संग्रह का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष बाल-स्मृतियों का संसार है। पिता के कंधों पर बैठा बच्चा स्वयं को दुनिया से बड़ा महसूस करता है। पिता की पीठ घोड़ा बन जाती है। पिता की साइकिल के नीचे कभी गड्ढे नहीं आते। पिता हमेशा खेल में हार जाते हैं। ये दृश्य केवल स्मृतियाँ नहीं। बल्कि भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की सांस्कृतिक तस्वीरें हैं। कवि इन्हें असाधारण संवेदनात्मक शक्ति के साथ प्रस्तुत करते हैं।
पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष पिता की दृष्टि से लिखा गया हिस्सा है। यहाँ पिता पुत्र को संबोधित करते हैं। पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा, गर्भावस्था के दौरान आशंकाएँ, बच्चे के बोलने, सुनने, देखने और विकसित होने की चिंता—इन सबका इतना सूक्ष्म चित्रण हिंदी कविता में विरल है। सामान्यतः मातृत्व पर अधिक लिखा गया है। किंतु पितृत्व की इस भीतरी घबराहट और प्रेम को बहुत कम कवियों ने शब्द दिए हैं।
अंशुमान पिता को केवल पारिवारिक व्यक्ति के रूप में नहीं देखते। उनके यहाँ पिता संस्कृति का वाहक है। यही कारण है कि पुस्तक के मध्य भाग में कवि पिता-पुत्र संवाद को ‘मनुष्यता का प्राण’ और ‘संस्कृति का व्याकरण’ कहते हैं। यह कथन केवल भावनात्मक नहीं। बल्कि गहरे समाजशास्त्रीय अर्थ रखता है। कवि का मानना है कि जहाँ पीढ़ियों के बीच संवाद टूटता है, वहाँ संस्कृति भी जड़ हो जाती है।
पुस्तक का एक उल्लेखनीय आयाम आधुनिक शिक्षा और बाज़ारवादी सभ्यता की आलोचना है। कवि को लगता है कि शिक्षा मनुष्य नहीं, उत्पाद तैयार कर रही है। विद्यालय संवेदनशील व्यक्तित्व के निर्माण की जगह प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता बना रहे हैं। यह दृष्टि कई स्थानों पर तीखी और वैचारिक हो जाती है। कवि यहाँ केवल पिता नहीं रहते, एक चिंतक और सांस्कृतिक आलोचक के रूप में सामने आते हैं।
इसी क्रम में दाम्पत्य, परिवार और संस्कार पर लिखी कविताएँ पुस्तक को व्यापक सामाजिक संदर्भ देती हैं। कवि के लिए परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं। बल्कि सभ्यता का प्रशिक्षण केंद्र है। वे मानते हैं कि संस्कार पुस्तकों से नहीं, अभ्यास और जीवन से विकसित होते हैं। यह दृष्टि पुस्तक को निजी अनुभव से उठाकर सामाजिक विमर्श में बदल देती है।
शिल्प की दृष्टि से पिता मुक्तछंद और गद्य-कविता की सीमा पर खड़ी रचना है। कविताएँ कथात्मक भी हैं, संवादात्मक भी और कहीं-कहीं दार्शनिक गद्य की तरह भी बहती हैं। यह पुस्तक पारंपरिक काव्य-सौंदर्य की अपेक्षा भाव और विचार की निरंतरता पर अधिक भरोसा करती है। कई कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो कोई पिता और पुत्र रात के सन्नाटे में वर्षों से दबे हुए मन की गाँठें खोल रहे हों।
भाषा सरल है, किंतु उसकी संवेदना अत्यंत गहरी है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, लोक-स्मृतियाँ, पौराणिक प्रसंग और आधुनिक जीवन के अनुभव एक साथ उपस्थित हैं। अहिल्या-गौतम की कथा हो, पिता के कंधों की स्मृति हो या आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की आलोचना—कवि हर जगह अनुभव की सच्चाई को प्राथमिकता देते हैं।
हाँ, आलोचनात्मक दृष्टि से कहा जा सकता है कि कुछ कविताओं में वैचारिक वक्तव्य कविता पर भारी पड़ता है और कहीं-कहीं पुनरावृत्ति का आभास भी होता है। किंतु यह पुनरावृत्ति भी एक तरह से उसी भाव-संसार की तरंगें हैं, जिनमें कवि बार-बार लौटकर पिता की उपस्थिति को नए अर्थों में खोजते हैं।
समकालीन समय में जब परिवार, संवाद और पीढ़ियों के संबंध लगातार बदल रहे हैं, पिता केवल एक कविता-संग्रह नहीं। बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति का भावनात्मक दस्तावेज बनकर सामने आती है। यह पुस्तक पिता को देवत्व प्रदान नहीं करती। बल्कि उन्हें एक संवेदनशील, संघर्षशील, प्रेममय और मानवीय व्यक्ति के रूप में देखती है।
अंशुमान द्विवेदी की ‘पिता’ पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि यह पुस्तक पिता के बारे में नहीं, पिता के साथ लिखी गई है। इसमें श्रद्धा है।स्मृति है। आत्मालोचन है। संवाद है और वह आत्मिक ऊष्मा है जो केवल अनुभव से पैदा होती है।
यह संग्रह उन सभी पाठकों को पढ़ना चाहिए जो पिता को केवल परिवार का मुखिया नहीं। बल्कि अपने व्यक्तित्व के मौन निर्माता के रूप में समझना चाहते हैं। पिता अंततः एक पुस्तक नहीं, पीढ़ियों के बीच पुल बनाने का काव्यात्मक प्रयास है—और इसी कारण यह समकालीन हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाने की क्षमता रखती है।
पुस्तक: पिता
कवि: अंशुमान द्विवेदी
प्रकाशक: राव आईएएस इंस्टीट्यूट, सुभांश कॉम्प्लेक्स-1, फैजाबाद रोड, कुकरैल बंधा, लखनऊ
मूल्य: ₹220
समर्पण: माँ श्रीमती उषा जी एवं पिता श्री हरिशंकर शास्त्री जी को


