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Best Book For Ganga: गंगा की कराह, संस्कृति की पुकार और मनुष्य से संवाद
Best Book For Ganga: इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गंगा केवल नदी नहीं रहती। वह माँ है, स्मृति है, सभ्यता है, करुणा है, क्रोध है और मनुष्य के अपराध-बोध की जीवित साक्षी भी है।
Best Book For Ganga River Culture Review Yogesh Mishra
Best Book For Ganga: अंशुमान द्विवेदी की काव्य-कृति ‘लहर’ केवल नदी पर लिखी गई कविता-पुस्तक नहीं है। बल्कि यह भारतीय सभ्यता के आत्मालोक में उतरने वाली एक बेचैन, करुण और प्रतिरोधी काव्य-यात्रा है। इस संग्रह का केंद्र गंगा है, पर उसका विस्तार समूची नदी-सभ्यता, प्रकृति, मनुष्य, संस्कृति, आस्था, सत्ता और आधुनिक विकास की विकृतियों तक जाता है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गंगा केवल नदी नहीं रहती। वह माँ है, स्मृति है, सभ्यता है, करुणा है, क्रोध है और मनुष्य के अपराध-बोध की जीवित साक्षी भी है। कवि ने गंगा को बोलने दिया है। यह बोलना कहीं विलाप है। कहीं धिक्कार, कहीं आत्मकथा और कहीं मनुष्य के प्रति अंतिम चेतावनी। गंगा कहती नहीं, कराहती है। समझाती नहीं, झकझोरती है।
हृदयनारायण दीक्षित द्वारा लिखित पुरोवाक् इस कृति को वैदिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य देता है। इसमें नदी को केवल जलधारा न मानकर भारतीय ज्ञान-परंपरा, ऋचाओं, छन्दस् और सभ्यता के मूलाधार के रूप में देखा गया है। गंगा, सरस्वती, यमुना, सतलुज, व्यास आदि नदियों के संदर्भ से यह भूमिका बताती है कि भारत का सांस्कृतिक शरीर नदियों के जल से बना है। इस दृष्टि से लहर आधुनिक पर्यावरणीय कविता होते हुए भी अपनी जड़ों में अत्यंत प्राचीन और भारतीय है।
अंशुमान की कविता की शक्ति उसके संवाद में है। यहाँ कवि और लहर के बीच बातचीत है। पर वस्तुतः यह मनुष्य और प्रकृति के बीच मुकदमा है। लहर मनुष्य को ‘धूर्त’, ‘स्वार्थी’, ‘अधर्मी’ कहती है, क्योंकि मनुष्य गंगा की आरती भी गाता है और उसी में कूड़ा, शव, सीवेज और औद्योगिक जहर भी डालता है। यह दोहरा आचरण इस कृति का केंद्रीय नैतिक प्रश्न है।
कवि की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता ने नदी को नाला, जल को वस्तु और आस्था को कर्मकांड बना दिया है। वह बोतलबंद पानी, प्लास्टिक, चर्म-उद्योग, शहरी सीवेज, विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई और कृत्रिम जीवन-शैली पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी पंक्तियों में आक्रोश है।पर वह सतही नारा नहीं बनता। उसमें एक घायल माँ की करुणा और एक ऋषि की चेतावनी साथ-साथ चलती है।
इस संग्रह में गंगा का मानवीकरण अत्यंत प्रभावशाली है। वह बच्चों से खेलती है। नवविवाहितों को आशीष देती है। शवयात्राओं की साक्षी बनती है।साधुओं की श्रद्धा से भीगती है और मनुष्य के पापों से मरणासन्न होती जाती है। कवि गंगा के माध्यम से जीवन और मृत्यु दोनों का अर्थ खोलते हैं। गंगा कहती है कि उसकी जरूरत मृत्यु से अधिक जीवन को है। यह पंक्ति पूरी कृति का दार्शनिक केंद्र कही जा सकती है।
भाषा की दृष्टि से ‘लहर’ मुक्तछंद, गद्य-कविता और संवादात्मक कविता के बीच बहती है। इसमें पारंपरिक छंद का बाहरी अनुशासन नहीं। लेकिन लहरों जैसा आंतरिक लय-संयम है। कहीं भाषा वैदिक स्मृति से दीप्त है।कहीं लोक-संवेदना से भीगी। कहीं राजनीतिक व्यंग्य से तीखी और कहीं पारिवारिक आत्मीयता से भरपूर। कवि संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, लोक-प्रयोग, धार्मिक प्रतीक और आधुनिक जीवन के व्यंग्य—को साथ रखकर एक अलग काव्य-भूमि बनाते हैं।
संग्रह में पिता-पुत्र संवाद से जुड़ी कविता भी विशेष उल्लेखनीय है। यह कविता पुस्तक के नदी-केंद्रित स्वर से अलग दिखती है, पर गहरे अर्थ में उससे जुड़ती है। जैसे नदी सभ्यता की माँ है, वैसे पिता स्मृति, संबल और संस्कार का वृक्ष है। इस कविता में पिता जैविक संबंध से ऊपर उठकर आत्मिक संरक्षण, विश्वास और जीवन-साहस का प्रतीक बनते हैं। इससे पुस्तक का भाव-संसार केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। बल्कि परिवार, संस्कार और मनुष्यत्व तक फैलता है।
कृति को आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कई स्थानों पर कवि का क्रोध बहुत घना हो जाता है और कविता वक्तव्य के निकट पहुँचती दिखाई देती है। कहीं-कहीं विचार भाव पर भारी पड़ता है। फिर भी यह कमी नहीं। बल्कि इस कृति की प्रकृति का हिस्सा है। क्योंकि लहर सौंदर्य-साधना मात्र नहीं। बल्कि सभ्यता के विरुद्ध प्रकृति की चार्जशीट भी है।
अंशुमान द्विवेदी की ‘लहर’ हमें यह याद दिलाती है कि नदी को बचाना केवल पर्यावरणीय कार्यक्रम नहीं, सांस्कृतिक आत्मरक्षा है। गंगा बचेगी तो केवल जल नहीं बचेगा। भाषा बचेगी। स्मृति बचेगी। कृषि बचेगी। आस्था बचेगी और मनुष्य के भीतर बची हुई मनुष्यता भी बचेगी।
यह पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि कवि ने गंगा पर कविता नहीं लिखी। बल्कि गंगा की ओर से मनुष्य के नाम पत्र लिखा है। यह पत्र करुण भी है, कठोर भी।स्मरण भी है, चेतावनी भी। ‘लहर’ का पाठक अंततः केवल पाठक नहीं रह जाता, वह अपराधी, साक्षी और संभवतः प्रायश्चित की राह पर खड़ा मनुष्य बन जाता है।
अंशुमान द्विवेदी की यह कृति हिंदी कविता में पर्यावरणीय चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक आत्मालोचन का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। ‘लहर’ सचमुच एक काव्य-लहर है—जो छूती नहीं, भीतर तक भिगोती है; बहती नहीं, बहा ले जाती है।
पुस्तक: लहर
कवि: अंशुमान द्विवेदी
प्रकाशक: कैवल्य प्रकाशन, 20, रविंद्र गार्डेन, सेक्टर-ई, अलीगंज, लखनऊ
मूल्य: ₹110
समर्पण: माँ श्रीमती उषा जी एवं पिता श्री हरिशंकर शास्त्री जी को


