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BJP vs Opposition: पहले दल मिलाइये फिर दिल
BJP vs Opposition Analysis Report: पटना बैठक में विपक्षी दल एकजुट हुए, पर सवाल है—क्या सिर्फ़ दल मिलाने से मोदी को चुनौती मिलेगी या दिल भी मिलाने होंगे?
BJP vs Opposition Analysis Report Journalist Yogesh Mishra (Image Credit-Social Media)
BJP vs Opposition Analysis Report: कांग्रेस के बैनर पर केजरीवाल की फोटो। ममता और वाम पंथ का साझा मंच। ऐसे तमाम विरोधाभासी और अभूतपूर्व दृश्य बिहार की राजधानी पटना में बीते 23 जून को देखने को मिले। गैर-भाजपाई दलों ने एकता का बिगुल फूंका। इनका मकसद सरकार बनाना नहीं, मोदी हटाना है। ऐसा एक प्रयास 26 साल पहले भी भारतीय लोकतंत्र में हुआ था। पर उस प्रयास की अगुवाई जिस जयप्रकाश नारायण ने की थी, उन्हें मंत्री या प्रधानमंत्री कुछ नहीं बनना था। अभी जिस एकता की शुरुआत हो रही है उसके सभी नेता प्रधानमंत्री की ख्वाहिश पाले बैठे हैं। हालाँकि यह लड़ाई वे चुनावी नतीजे आने के बाद भी लड़ने को तैयार हो सकते हैं। लेकिन देखने की ज़रूरत यह है कि क्या वे मोदी की लोकप्रियता और भाजपा की सक्रियता का मुकाबला कर पाएँगे। दिलचस्प यह भी है कि जब विपक्ष एकता का बिगुल बजा रहा था, तब भाजपा अपने नेताओं के देशव्यापी दौरे का एक चरण पूरा कर चुकी थी।
फिर भी विपक्ष को मोदी पराजय की उम्मीद दिखना लाज़िमी है। क्योंकि अगर थोड़ा निर्मोही होकर भाजपा का मूल्यांकन करें तो केवल चार राज्यों—गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम—में ही भाजपा की सरकार है। भाजपा की राज्य इकाइयाँ और नेता अपनी छवि बचाने या वोट बैंक बना पाने में सफल नहीं दिखते हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नज़र डालें तो भाजपा को क्रमशः 31.34% (17,16,60,230) और 37.99% (22,90,76,879) वोट ही मिले थे। बाकी सभी वोट विपक्ष के पास थे। विपक्षी बँटवारे ने ही भाजपा को सरकार बनाने का मौक़ा दिया।
लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मणिपुर और आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें राजस्थान को छोड़कर कहीं भी आज की तारीख़ में भाजपा की उम्मीद देखना बेमानी है। इससे भाजपा नेता और कार्यकर्ता पराजित मानसिकता में चुनाव में उतरेंगे। निरंतर चुनावी मोड में रहने के चलते वे थके-हारे भी होंगे।
नीतीश कुमार ने भाजपा की तोड़-फोड़ की राजनीति को मात दी। नीतीश अटल के साथ भी काम कर चुके हैं। ऐसे में पूर्व में भाजपा के साथ रहे दलों से बात करने में उनको सहूलियत होगी। राजनीति में बिहार को प्रयोगशाला माना जाता है। 1917 में महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत की थी। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, जेपी का छात्र आंदोलन, मंडल आंदोलन और कमंडल यात्रा—सबका रिश्ता बिहार से जुड़ता है। ऐसे में इतिहास और टोटकों के लिहाज़ से भी विपक्ष को हसीन सपने देखने का हक बनता है।
देश की राजनीति में बिहार और यूपी सबसे उर्वर जगहें हैं। इन दोनों राज्यों के प्रभावशाली नेता बैठक में मौजूद रहे। 15 दलों के दिग्गजों ने तय किया कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ विपक्ष का सिंगल प्रत्याशी खड़ा किया जाएगा। ऐसी एकजुटता इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ ही देखी गई थी, जब 6 पार्टियों ने जनता पार्टी बनाई थी। उस समय जनता मोर्चा, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय लोकदल, जनसंघ और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी एक साथ आए थे।
लेकिन सवाल यह अनुत्तरित रह जाता है कि मोदी हटाओ तो लाओ किसको? दरअसल, नरेंद्र मोदी का कद इतना बढ़ चुका है कि पूरे भारत के छोटे-बड़े दलों में उनके आसपास तक का कोई नेता या व्यक्तित्व है ही नहीं। विपक्षी दल और उनके क्षत्रप यह बखूबी जानते हैं। उन्हें पता है कि तमाम टोटकों और उपायों के बावजूद मोदी के स्तर को छू पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि फ़िलवक्त असंभव है। इसीलिए तमाम गठबंधनों और महागठबंधनों के बावजूद विपक्ष एकल नेता का नाम पेश नहीं कर पाया है।
इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ विपक्षियों के एकजुट होने का सवाल रहा तो सफलता का राज विपक्षी एकजुटता नहीं बल्कि आपातकाल का जनाक्रोश था। अभी ऐसी कोई स्थिति नहीं है। जनाक्रोश तो दूर की बात है। राज्यों के चुनाव अलग बात हैं—सो हिमाचल, कर्नाटक, दिल्ली, पंजाब आदि की तुलना लोकसभा चुनाव से नहीं की जानी चाहिए।
वन अगेंस्ट वन के फ़ॉर्मूले से भाजपा समेत एनडीए को क़रीब 350 सीटों पर कड़ी टक्कर का सामना करना होगा। जिन राज्यों के प्रमुख नेताओं की इस बैठक में भागीदारी रही, उनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, झारखंड, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को मिलाकर लोकसभा की कुल 283 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस शासित चार राज्यों में 68 सीटें हैं। वर्तमान में इनमें से 165 पर भाजपा तथा 128 पर विपक्षी पार्टियों के सांसद हैं, जबकि बाकी सीटें उन दलों के पास हैं जो इस मेगा गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं।
पटना बैठक में शामिल हुए क्षत्रपों के राज्यों के पास लोकसभा की 90 सीटें हैं। इनमें बिहार में जेडीयू के पास 16, पश्चिम बंगाल में टीएमसी के पास 23, महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव) के पास 18 और एनसीपी के पास 4, तमिलनाडु में डीएमके के पास 23, पंजाब और दिल्ली में आप के पास 2, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 3 तथा झारखंड में जेएमएम के पास 1 सीट है। 2019 के लोकसभा चुनाव के मुताबिक 185 सीटें ऐसी हैं, जहाँ भाजपा का मुकाबला क्षेत्रीय दलों से था। वहीं 97 सीटें ऐसी थीं, जहाँ क्षेत्रीय दल नंबर एक या नंबर दो पर थे और भाजपा या कांग्रेस तीसरे-चौथे नंबर पर। इनमें 43 सीटों पर विपक्ष पहले से क़ाबिज़ है—तो इनके एकजुट लड़ने की स्थिति में शेष 54 सीटों पर भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। वहीं, 71 सीटों पर कांग्रेस और क्षेत्रीय दल आमने-सामने थे। जबकि 190 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था। इनमें से 175 पर भाजपा क़ाबिज़ है।
विपक्षी दल एक साथ तो आए हैं, लेकिन सीट बँटवारे के फ़ॉर्मूले पर दोनों कितने सहमत होंगे, यह कहना मुश्किल है। सब छोटे-छोटे दलों की अपनी दुकानें हैं, जातीय गणित हैं, स्वार्थ हैं। ऐसे में कौन किसको देखेगा? किसी अन्य के प्रभुत्व और रणनीति को वे कैसे स्वीकार करेंगे? हाँ, यह ज़रूर है कि इस कुनबे में एक को छोड़कर कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसके रिश्ते भ्रष्टाचार के किसी न किसी कांड से न जुड़े हों। यह एकजुटता का अकाट्य तर्क हो सकता है। पर कल तक ज़मीन पर अपने कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के खिलाफ़ भिड़ा रहे ये नेता—क्या उनके कार्यकर्ता इतनी आसानी से “पहले दल मिलाइये फिर दिल” के नारे को मानेंगे? यही यक्ष प्रश्न है।
2025 की सच्चाई यह भी है कि विपक्षी गठबंधन “INDIA ब्लॉक” ने लोकसभा चुनाव तो लड़ा, लेकिन सीट बँटवारे को लेकर खींचतान अंत तक जारी रही। नतीजा यह हुआ कि कई राज्यों में “वन अगेंस्ट वन” फ़ॉर्मूला टूट गया और भाजपा को अतिरिक्त फ़ायदा मिल गया। चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 60 से अधिक सीटें ऐसी थीं, जहाँ विपक्ष अगर एकजुट रहता तो भाजपा हार जाती। यह याद दिलाता है कि केवल दल मिलाने से काम नहीं चलेगा—दिल भी मिलाने होंगे।
(मूलरूप से 26.6.2023 को प्रकाशित। सितंबर, 2025 में पुनः संशोधित।)


