Diwali Celebration: हर त्योहार पर वही पुरानी जिम्मेदारियां क्यों? बदल रही है दीपावली मनाने की सोच

Diwali Celebration Trends: दीपावली पर घर लौटने और पारंपरिक तैयारियों की जगह फेस्टिवल आउटिंग का चलन क्यों बढ़ रहा है? जानिए युवा पीढ़ी की सोच, महिलाओं की जिम्मेदारियां और बदलती त्योहार संस्कृति की कहानी।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 7 Nov 2026 7:51 PM IST
Changing Diwali Traditions | Diwali Celebration Trends | Festival Outing | Newstrack Hindi News
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Changing Diwali Traditions | Diwali Celebration Trends | Festival Outing | Newstrack Hindi News

Diwali Celebration Trends: दीपावली का मतलब कभी घर लौटना हुआ करता था। दूर शहरों में रहने वाले लोग त्योहार पर अपने परिवार के बीच पहुंचने की कोशिश करते थे। बाहर रहकर पढ़ाई करने वाले बच्चों को भी घर जाने की प्रतीक्षा रहती थी। दूरदराज काम करने वाले लोगों को भी दीपावली पर अपने घर-परिवार शहर और गांव की याद आ जाती थी। पहले से ही ट्रेन और फ्लाइट की टिकटें बुक हो जाती हैं। घर की सफाई, आंगन में रंगोली, दरवाजे पर तोरण, दीपों की कतार, रसोई में बनते पकवान और शाम को परिवार के साथ लक्ष्मी-गणेश की पूजा यही सब दीपावली की पहचान हुआ करती थी। पर समय के साथ अब दीपावली मनाने का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। जहां पहले त्योहार का केंद्र घर हुआ करता था। सभी लोग एक साथ पूजा करते, दीपक जलाते, मिठाइयां बांटते और पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों से मिलते, बड़ों को प्रणाम करते और उनका आशीर्वाद लेते तथा छोटों को अपनी शुभकामनाएं देते थे। यह परंपरा आज भी अधिकांश घरों में यथावत है, लेकिन इसके साथ अब उत्सव मनाने के नए तरीके भी जुड़ गए हैं। जैसे फेस्टिवल आउटिंग। कई परिवार दीपावली की छुट्टियों में पर्यटन स्थलों पर त्योहार मनाना पसंद करते हैं, तो कुछ होटल, रिसॉर्ट और निजी आयोजनों में दीपावली की शाम बिताते हैं। शहरों में क्लबों, किटी पार्टियों में दीपावली पार्टियों, थीम पर आधारित पार्टियों, डिनर पार्टियों का चलन बढ़ रहा है।

घर वापस आने की जगह आज की युवा पीढ़ी दोस्तों के साथ समय बिताना चाहती है, नई जगहों पर जाना चाहती है और त्योहार को अपने तरीके से जीना चाहती है। उनके

लिए त्योहार का अर्थ केवल पारंपरिक पूजा तक सीमित नहीं रह गया है। इस बदलाव को केवल परंपराओं से दूरी के रूप में देखना उचित नहीं होगा। आज की भागदौड़ वाली, तनाव भरी जिंदगी में परिवार के साथ कुछ दिन बिताने और रोजमर्रा की दिनचर्या से बाहर निकलने की इच्छा सभी में स्वाभाविक है। कई कामकाजी परिवारों के लिए बाहर जाकर दीपावली मनाना घर की तैयारियों के दबाव से बचने का एक विकल्प भी बन रहा है। कारण कि अक्सर देखा जाता है कि त्योहार की इस बाहरी चमक-दमक के पीछे तैयारी का बड़ा हिस्सा आज भी महिलाओं के कंधों पर है। पूजा की तैयारी से लेकर घर पर क्या विशेष बनना है, क्या मिठाई मंगवानी है, साथ ही घर की सजावट से लेकर आने वाले मेहमानों की आवभगत और त्योहार को संपूर्ण बनाने की जिम्मेदारी अक्सर उन्हीं की होती है। यह विडंबना भी है कि जिस त्योहार में लक्ष्मी और गणेश की पूजा समृद्धि, सुख और खुशहाली की कामना से की जाती है, उसी त्योहार की तैयारी में घर की महिलाओं का समय, श्रम और आराम सबसे पहले खर्च होता है। उनके लिए ये सब कई बार त्योहार से ज्यादा जिम्मेदारियों का एक लंबा सिलसिला बन जाता है। इन्हीं सब से खुद को बाहर निकाल कर, त्योहार को अपनी तरह से मनाने को उत्सुक आज की युवा पीढ़ी, जिसमें पुरुष और महिला दोनों ही कामकाजी हैं, फेस्टिवल आउटिंग के लिए निकल जाती है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए दीपावाली का अर्थ पिछली पीढ़ी से काफी अलग है। उसके लिए त्योहार का मतलब यह नहीं कि कई दिन पहले से घर की सफाई में जुटा जाए, पूजा की हर रीति को निभाया जाए या रिश्तेदारों और परिवार में आने-जाने के बीच अपनी पसंद और सुविधा को किनारे रख दिया जाए। उनका सीधा सवाल यह होता है कि

हर त्योहार पर वही पुरानी जिम्मेदारियां क्यों? पूजा करनी है तो करें, लेकिन उसका मतलब यह तो नहीं कि पूरा दिन तैयारियों में निकल जाए और पूजा के समय थक-हारकर सिर्फ औपचारिकता करें। घर की सजावट और मिठाई व उपहारों की लंबी सूची से ज्यादा उनके लिए महत्वपूर्ण अपने लिए समय निकालना भी है। सोशल मीडिया पर दीपावली की फोटोज, नए कपड़े, सजावट और उत्सव के वीडियो इस नई जीवनशैली का अब अहम हिस्सा बन चुके हैं। वे कहते हैं कि क्या बाहर जाकर दीपावली मनाने से त्योहार का भाव बदल जाता है? क्या घर में दीपक जलाना ही परंपरा है या परिवार के साथ समय बिताना और अपनापन बांटना भी उतना ही महत्वपूर्ण है? संभवतः हम लोग भूल गएं हैं कि त्योहार का वास्तविक अर्थ किसी एक स्थान, व्यवस्था या रीति-रिवाजों में नहीं, बल्कि उस भावना में छिपा होता है, जिसके साथ हम उसे मनाते हैं। युवा वर्ग अब त्योहार को अपनी सुविधा और पसंद से मनाना चाहता है। उसके लिए त्योहार अपनी जिंदगी के कुछ यादगार पल बनाने का एक मौका भी है।

युवा पीढ़ी की इस सोच में स्वतंत्रता भी है और कहीं-कहीं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति भी। पहले दीपावली पर सिर्फ घर की बनी मिठाइयों का आदान-प्रदान होता था। कुछ समय बाद उसकी जगह बाजार की मिठाईयों ने ले ली और फिर धीरे-धीरे करके उनमें खूबसूरत पैकिंग का मुलम्मा चढ़ गया। अब मिठाइयों को भेजने का प्रचलन कम होकर हैंडमेड चॉकलेट्स, ड्राई फ्रूट्स या गिफ्ट हैंपर्स भेजने का सिलसिला चल रहा है। और युवा पीढ़ी के लिए यह सब बहुत ही बोझ जैसे काम है। उनके अनुसार इन सब लेन-देन का कोई अर्थ ही नहीं है, सिवाय दिखावे और पैसे की फिजूलखर्ची के। पुरानी पीढ़ी इस तरह की सोच को जहां परंपराओं से दूरी मानती है, वहीं युवा इसे अपनी जिंदगी पर अपना अधिकार समझती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आधुनिकता के नाम पर पारिवारिक सहभागिता और पीढ़ियों के बीच संवाद कम होता जा रहा है?‌ असली चुनौती दोनों के बीच संतुलन बनाने की है। आखिर परंपराएं भी तो तभी जीवित रहेंगी, जब अगली पीढ़ी उन्हें बोझ नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा समझकर अपनाएगी। जरूरत युवाओं को परंपराओं में बांधने की नहीं, बल्कि उन्हें यह समझाने की है कि त्योहार केवल अपनी खुशी का नहीं, दूसरों की खुशियों में शामिल होने का अवसर भी है।

अंशु सारडा अन्वि

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