Cockroach Janta Party: तिलचट्टा दर्शन और ‘काक्रोच जनता पार्टी’ का उदय

Cockroach Janta Party Politics: अब जब ‘काक्रोच जनता पार्टी’ का गठन हो गया। सोशल मीडिया पर इसकी धूम मची है...

Yogesh Mishra
Published on: 22 May 2026 3:01 PM IST
Cockroach Janta Party Entry Indian Politics Cockroach Survival Story
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Cockroach Janta Party Entry Indian Politics Cockroach Survival Story

Cockroach Janta Party Politics: भारतीय राजनीति में आज तक किसान राजनीति हुई, पिछड़ा राजनीति हुई, दलित राजनीति हुई, गाय राजनीति हुई, मंदिर राजनीति हुई, यहाँ तक कि मच्छरों तक पर नगर निगमों ने अभियान चला दिए। लेकिन इस विशाल लोकतंत्र में एक प्राणी ऐसा भी है, जो सदियों से हर सत्ता परिवर्तन, हर आपदा, हर सभ्यता और हर सफाई अभियान के बाद भी जीवित बचा रहा — तिलचट्टा।

अब जब ‘काक्रोच जनता पार्टी’ का गठन हो गया। सोशल मीडिया पर इसकी धूम मची है। इंस्टा पर एक हफ़्ते से कम समय में तकरीबन दो करोड़ लोग जुड़ गये है। यह संख्या खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी से खासी अधिक है। भारत में यदि सबसे अधिक जीवट, सर्वव्यापी, सर्वकालिक और अजेय समुदाय कोई है, तो वह तिलचट्टों का ही है। वे बिना आरक्षण के हर रसोई में पहुँच जाते हैं। बिना चुनाव लड़े हर घर में सत्ता स्थापित कर लेते हैं। और सबसे बड़ी बात — वे मनुष्य की हर वैचारिक व्यवस्था के बाद भी जीवित रहते हैं। साम्यवाद गिर गया। समाजवाद कमजोर पड़ गया। उदारवाद हाँफ रहा है। लेकिन तिलचट्टा अब भी आत्मविश्वास से सिंक के पीछे बैठा हुआ है।

इसीलिए मेरे मन में अचानक एक गहरा धार्मिक प्रश्न उठा — तिलचट्टे आखिर सात्विक हैं, तामसिक हैं या राजसिक?

यह प्रश्न सुनते ही मेरे कुछ अत्यंत विद्वान, सनातनी और न्यायप्रिय मित्रों के चेहरे ऐसे हो गए जैसे मैंने सीधे वेदों के ड्राफ्टिंग कमेटी पर सवाल उठा दिया हो। कुछ सेकंड तक कमरे में वही सन्नाटा रहा जो आमतौर पर इनकम टैक्स के छापे के दौरान रहता है। फिर अचानक सबको कोई जरूरी काम याद आ गया। कोई मोबाइल देखने लगा। कोई फाइल पलटने लगा। एक सज्जन तो ऐसे उठकर गए जैसे अभी लौटेंगे, लेकिन आज तक नहीं लौटे।

मुझे उस क्षण पहली बार एहसास हुआ कि भारतीय बौद्धिक परंपरा ने तिलचट्टों के प्रश्न की जितनी उपेक्षा की है, उतनी शायद किसी और जीव की नहीं की। गाय पर ग्रंथ हैं। हाथी पर शास्त्र हैं। साँप पर पुराण हैं। यहाँ तक कि कौवों की श्राद्ध व्यवस्था तक मौजूद है। लेकिन तिलचट्टा — जो हर भारतीय रसोई का वास्तविक स्थायी निवासी है — उसे धर्मशास्त्रीय नागरिकता तक प्राप्त नहीं हुई।


लेकिन तभी मुझे गांधारी की वह कथा याद आई, जिसे शायद धर्म के गंभीर अध्येताओं ने उतनी गंभीरता से नहीं पढ़ा जितनी वह मांगती है। कहा जाता है कि एक बार गांधारी से भूलवश एक गर्भवती तिलचट्टा कुचल गई। उसके साथ उसके सौ अंडे भी नष्ट हो गए। ब्रह्मांड, जो हिसाब-किताब के मामले में कभी लापरवाही नहीं करता, ने इस घटना को दर्ज रखा। परिणामस्वरूप गांधारी को अपने सौ पुत्रों की मृत्यु देखनी पड़ी।

अब इस कथा का सबसे विचित्र पक्ष यह नहीं कि गांधारी को दंड मिला। असली प्रश्न यह है कि महाभारत काल में भी तिलचट्टे इतने गंभीर नैतिक महत्व रखते थे कि उनके अंडों की मृत्यु तक को ब्रह्मांडीय न्याय प्रणाली में शामिल किया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि तिलचट्टे केवल कीट नहीं थे, वे धर्म और कर्मफल के मौन गवाह थे।

संभव है कि यदि महाभारत आज लिखी जाती, तो किसी न्यूज़ चैनल पर प्राइम टाइम बहस चल रही होती — “क्या कौरवों के पतन के पीछे तिलचट्टा लॉबी थी?” और स्क्रीन के नीचे लाल पट्टी चल रही होती — “विशेषज्ञों का दावा: गर्भवती तिलचट्टा प्रकरण को इतिहास ने दबाया।”

फिर बद्रीनाथ की कथा सामने आती है। कहा जाता है कि जब Adi Shankaracharya ने नदी से ध्यानमग्न योगी की एक प्रतिमा निकाली — जिसे कुछ लोग तीर्थंकर मानते हैं और कुछ विष्णु नारायण — तब उन्होंने उसे एक चट्टान पर स्थापित कर दिया। लेकिन वह चट्टान वास्तव में तिलचट्टों की एक विकसित आवासीय बस्ती निकली।

अब कल्पना कीजिए उन मूल निवासियों की स्थिति।

पीढ़ियों से बसे हुए प्राणी। उनके पूर्वज शायद वहीं पैदा हुए थे। वहीं मरे थे। वहीं दीवारों की दरारों में उन्होंने अपने भविष्य के सपने जमा कर रखे थे। तभी अचानक एक महान दार्शनिक-संत आते हैं, आध्यात्मिक विकास परियोजना शुरू होती है और बिना किसी पुनर्वास नीति के पूरी कॉलोनी विस्थापित कर दी जाती है।

यह दृश्य आधुनिक शहरी विकास परियोजनाओं से खतरनाक समानता रखता है। भारत में विकास अक्सर वहीं शुरू होता है जहाँ कोई कमजोर पहले से रह रहा होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इंसानों के पास विरोध प्रदर्शन का विकल्प होता है, तिलचट्टों के पास सिर्फ भागने का। संभवतः इसी कारण वे दुनिया के सबसे तेज “अनौपचारिक माइग्रेंट” बन गए।


तिलचट्टे आखिर इस धरती के सबसे पुराने जीवित समुदायों में से हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि वे डायनासोरों के समय से पृथ्वी पर हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब मनुष्य पेड़ों से उतरना सीख रहा था, तब भी तिलचट्टे संगठित नागरिक जीवन जी रहे थे।

और सच कहें तो भारतीय लोकतंत्र में उनका चरित्र सबसे अधिक स्थिर दिखाई देता है। वे हर परिस्थिति में जीवित रहते हैं। गैस चैंबर बचा लेते हैं। कीटनाशक झेल लेते हैं। सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन तिलचट्टे नहीं बदलते।

यदि कभी पृथ्वी पर परमाणु युद्ध हुआ और केवल दो चीजें बचीं — तो संभवतः एक तिलचट्टा होगा और दूसरा उसका आत्मविश्वास।

कहानी आगे कहती है कि अंततः शंकराचार्य ने समझौता किया। शायद यह इतिहास का पहला ‘दैवीय पुनर्वास समझौता’ था। उन्होंने आदेश दिया कि बद्रीनाथ मंदिर में जब भी भोजन का भोग लगे, उसका एक हिस्सा तिलचट्टों को भी दिया जाएगा और कहा जाता है कि यह परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में जीवित है।

इस समय उत्तराखंड के किसी कोने में शायद कोई तिलचट्टा ऐसा प्रसाद खा रहा होगा, जो आपकी थाली से अधिक पवित्र और व्यवस्थित है। कभी-कभी मुझे लगता है कि तिलचट्टे वास्तव में भारतीय आध्यात्मिकता के सबसे ईमानदार अनुयायी हैं। वे मंदिरों में रहते हैं, प्रसाद ग्रहण करते हैं, अंधेरे में तपस्या करते हैं और मनुष्य की तरह धर्म के नाम पर टीवी डिबेट नहीं करते।

तो मेरे विनम्र निष्कर्ष के अनुसार तिलचट्टे निश्चित रूप से सात्विक हैं। वे मंदिरों में भोजन ग्रहण करते हैं। उनके पास भूमि पर ऐतिहासिक दावा है। वे न्यूनतम संसाधनों में जीवन जीते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात — उनके पास एक वास्तविक आचार्य के साथ किया गया आध्यात्मिक समझौता भी है।

हालाँकि मैं कौन होता हूँ अंतिम निर्णय देने वाला?

इस प्रश्न पर बेहतर होगा कि उन लोगों से सलाह ली जाए जो धर्म के नाम पर गरीबों को कुचलने, बेरोजगारों को उजाड़ने और कमजोरों को बाहर धकेलने में विशेषज्ञ हैं — और यह सब अत्यंत सात्विक भाव से करते हैं। संभवतः उन्होंने इस विषय पर अधिक समय तक विचार किया होगा। शायद कुर्सी पर चढ़कर।

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