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Cockroach Janta Party: काक्रोच है कि मरता नहीं
Cockroach Janta Party: यह व्यंग्य लेख सोशल मीडिया, राजनीति और लोकतंत्र की विडंबनाओं पर तीखा कटाक्ष करता है। ‘काकरोच जनता पार्टी’ के बहाने व्यवस्था, सत्ता और जनभावनाओं की हास्यपूर्ण लेकिन गहरी पड़ताल की गई है।
Cockroach Janta party
Cockroach Janta Party: अभी कुछ ही दिन तो हुए सोशल मीडिया पर एक नया चमत्कार देखने को मिला। न्याय की मूर्ति की एक टिप्पणी ने संघर्षशील जीव का महत्व बढ़ा दिया, वो है कीड़ा प्रजाति का सबसे घिनौना काक्रोच। बावजूद इसके कि उसकी घुसपैठ अमूमन हर घर में है। यानी सर्वव्यापी है। इस सर्वव्यापी को न्याय के मूर्ति ने काक्रोच कह दिया तो काक्रोच ने दिल पे ले लिया और क्रिया की प्रतिक्रिया के तहत किसी काक्रोच ने फाटाफ़ट बना डाली "काकरोच जनता पार्टी’। पार्टी का बनना नहीं कि काक्रोच और तिलचट्टे दोनों इकट्ठे हो गए ये भूलकर कि हैं तो एक मीडियम हिंदी या अंग्रेजी है तो क्या हुआ? दोनों का औकात तो एक ही है। वो भी सीवर में रहता है और मैं भी। दोनों का काम भी एक ही है मानव मल का शोधन करना। शोधन तो तब भी करते थे जब लोग खुले स्थान का प्रयोग करते थे पर हमारा उनके किचन में प्रवेश नहीं हो पाता था अब हमारा आवास उनके रूम से अटैच होने के कारण हम भी उनसे अटैच हो गए। अब ये बात अलग है कि हमें देखते ही 90 फीसद लोग चिल्ला उठते हैं या चप्पल उठा लेते हैं। बहरहाल... क्रिया की हुई प्रतिक्रिया अचानक राजनीति के गलियारे को धुंआ धुंआ करने लगी।
देश में राजनीतिक दलों की कमी नहीं। हर जाति, धर्म की पार्टी थी। हर क्षेत्र की पार्टी थी, यहां तक कि कुछ पार्टियां तो केवल एक परिवार की थीं। बस एक ही वर्ग उपेक्षित रह गया था 'तिलचट्टा' सो उसने भी बना ली। किसने कहा पता नहीं पर सच ही कहा 'लोक (चंद्र) तंत्र देर से सही, न्याय करता है। गर टिप्पणी न की जाती तो काक्रोच भी एकजुट न होते आखिर उन्हें भी तो जीवित रहने का अधिकार है। शायद उन्हें इंतजार था कि उन्हें कोई कुछ कहे और वे दिखा दें कि हममें भी है दम हम नहीं किसी से कम। रातोंरात सोशल मीडिया पर #CockroachLivesMatter ट्रेंड करने लगा।
सुबह होते-होते काकरोच जनता पार्टी “काजपा” अस्तित्व में आ गई।
पता चला कि पार्टी का चुनाव चिह्न था चप्पल से बचता तिलचट्टा था।
पहले दिन पार्टी के इंस्टाग्राम पर केवल चार फॉलोवर थे। दूसरे दिन चार लाख, तीसरे दिन चालीस लाख और एक सप्ताह में डेढ़ करोड़।
राजनीतिक पंडित हैरान थे तो सत्ता के गलियारे (दोनों कहां पाए जाते हैं पता नहीं) में लोग परेशान थे, कि आखिर इतने लोग अचानक तिलचट्टों के समर्थन में कैसे आ गए? बाद में पता चला कि आधे लोग इसलिए जुड़े कि वे आजिज आ चुके थे कि ये जो न्याय की देवी हैं वे अपनी आंखों पर कब तक पट्टी बांधे रहेंगी? और बाकी इसलिए कि उन्हें हर उस चीज़ से प्रेम हो जाता है जिस पर सरकार नाराज़ हो जाए।
बहरहाल...सरकार ने तुरंत संज्ञान लिया। गृह मंत्रालय ने बयान जारी किया कि “कुछ विदेशी, अर्बन नक्सल, माओवादी, ख़ान मार्केट वालों और टुकड़े-टुकड़े गैंग के भटके हुए तिलचट्टों ने सीवर के काक्रोचों के माध्यम से देश की स्थिरता बिगाड़ना चाहते हैं। इसके बाद आनन-फानन में काकरोच जनता पार्टी का इंस्टाग्राम हैंडल निलंबित कर दिया गया। कारण बताया गया। “यह अकाउंट अत्यधिक रात्रिचर गतिविधियों में लिप्त पाया गया था।”लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। देशभर के सीवरों, नालों और सरकारी दफ्तरों से समर्थन उमड़ पड़ा।
लोग कहने लगे,“कम से कम काकरोच जनता पार्टी वाले सफाई तो करते हैं।” यह टिप्पणी सरकार को सबसे ज्यादा चुभी। इस बीच उसके हजारों, फिर डेढ़-दो करोड़ फॉलोअर हो गए क्योंकि संघर्षशील प्राणी कभी मरते नहीं।बिल्कुल उन नेताओं की तरह जो हर चुनाव हार कर भी अगले चुनाव में ‘नए अवतार’ में आ जाते हैं। जैसे ही इस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र की पांच मांगें रखीं, सरकार सतर्क हो गई। क्या थीं वो मांगें? हर गली के नाले को ‘मुख्यमंत्री नाली योजना’ का दर्जा मिले। चप्पल को राष्ट्रीय हथियार घोषित किया जाए, लेकिन उठाने पर रोक लगे। 'दीवारों से आवाज़’ आने पर कानूनी संज्ञान लिया जाए (वैसे ही जैसे काकरोच दीवारों में छिपते हैं)। सीवर के मानव मल को ‘जैविक संपदा’ घोषित कर उस पर जीएसटी लगाया जाए। सूर्यकांत को ‘काकरोच रत्न’ से सम्मानित किया जाए। पर सरकार बहादुर ने भी अपने तेवर बदले 'तू डाल डाल हम पात-पात'।
उसने ‘शिकंजा’ कसा, इंस्टाग्राम हैंडल सस्पेंड! यानी जिस हाथी पर सवार होकर पार्टी बढ़ रही थी, उसी की सूंड़ ने उसे उछाल दिया। पर असली ‘शिकंजा’ कभी सड़कों पर भ्रष्टाचार पर कसा जाता तो बात बनती।एक सवाल डायनासोर भी मर गए। तो क्या ‘काकरोच जनता पार्टी' भी मरेगी नहीं? शायद नहीं। अगर इसका इंस्टाग्राम हैंडल सस्पेंड होगा, तो यह ट्विटर पर आएगी, फिर सिग्नल पर, फिर व्हाट्सएप के फॉरवर्ड मैसेज में। और जब तक हम चप्पल उठाना भूलते रहेंगे, यह हमारी रसोई, हमारे सीनेट और हमारे मानस पटल पर राज करती रहेगी।


